Posted in हिन्दू पतन

दोस्तों ये बही विनोद दुआ हैँ जिन्होंने 2002 के करीब गुजरात मे मोदी जी कि सरकार को गिराने मे कोई कसर नही छोडी थी…

खैर मुझे याद है टीवी सीरियल रामायण जब अपने चर्मोत्कर्ष पर था तो स्वर्गीय विनोद दुआ जो उस समय एनडीटीवी में एंकर थे, राम का किरदार निभा रहे अरुण गोविल का इंटरव्यू लेने पहुंचे। उन्होंने अरुण गोविल से कहा आप जनता को राम के काल्पनिक चरित्र में फंसा कर अंधविश्वासी बना रहे हैं, जब राम का अस्तित्व ही कभी नहीं रहा तो उसका किरदार निभा कर आप क्या हासिल करना चाहते हैं ? इस पर अरुण गोविल ने कहा तब तो मोहम्मद का प्रमाण आपके पास जरूर होगा ? दोनों के बीच ये तीखा युद्ध फिर अपशब्दों में बदल गया और अरुण गोविल ने उन्हें लगभग धक्का मारकर भगाया।

सुनते हैं इन्हीं विनोद दुआ की मृत्यु पर इनकी शव यात्रा में लगभग 800 लोगों की भीड़ रामनाम सत्य है का नारा लगाते हुए चल रही थी। विनोद दुआ की इकलौती बेटी मल्लिका ने पूरे सनातनी पद्वति से इनका दाह संस्कार कराया था। जो वामपंथी विनोद दुआ पूरी जिंदगी राम पर और सनातन धर्म पर प्रश्न चिन्ह लगाता रहा वो भी मृत्योपरांत सनातन की शरण मे ही आया।

असल मे कितना भी बड़ा वामपंथी कोई क्यों न हो, मृत्यु का भय उसे अपनी वास्तविकता से रूबरू करा ही देता है। बड़े से बड़ा पापी भी सदगति पाना चाहता है। जवाहरलाल नेहरू खुद को एक्सिडेंटल हिन्दू कहकर हिन्दू धर्म का मजाक उड़ाते रहे और जब कभी हिंदुओं ने इनसे प्राणरक्षा की गुहार लगायी उनकी अनसुनी कर हमेशा मुस्लिमों का ही साथ दिया । खुद को एक्सिडेंटल हिन्दू कहने वाले नेहरू ने मृत्यु से पहले सदगति पाने की इच्छा में अच्छा बहाना ढूंढा, उन्होंने कहा मैं बचपन से गंगा नदी को देखकर बड़ा हुआ हूँ, इससे मुझे अगाध प्यार है। हिन्दू धर्म के नाते नहीं पर इस गंगा नदी से लगाव के चलते मैं चाहता हूँ मेरी अस्थियां इसमे प्रवाहित की जाएं। ऐसे वामपंथियों की भारत मे कमी नहीं है जो नाम रखेंगे कन्हैया कुमार और सीताराम येचुरी, हिन्दू धर्म का मजाक भी बनाएंगे और मृत्यु के समय चाहेंगे कि गंगा मैया इन्हें शरण मे ले ले। इनकी मृत्योपरांत रामनाम सत्य है का नारा अवश्य सुनाई देगा। कमी हमारे पंडितों में भी है जो ऐसे वामपन्थियों के कर्मकांड के लिए तैयार हो जाते हैं। अगर मुस्लिमों के पैगम्बर को कोई अपशब्द कहे तो मेरा दावा है दुनिया का कोई भी हाजी, मौलाना ऐसे व्यक्ति का मर्सिया नहीं पढ़ेगा चाहे आप कितना भी लालच क्यों न दें।
रघुवंशी आकाश जाटव

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