Posted in हिन्दू पतन

हम जब जब हारे, घर के गद्दारों के कारण हरे…. अन्यथा अपने प्रचंड पौरुष के सामने टिकने की औकात ना तो जिहादियों की थी ना अंग्रेजों की

आत्मा झकझोर देने वाली घटना, इतिहास स्मृति पर्व.

1अगस्त सन 1857 ई.
कालेयांवाले दा खूह.
150 वर्षो तक तर्पण को तरसती रही सन 1857 ई. में देश की स्वतंत्रता प्राप्ति को लेकर हुए प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के महान क्रांतिकारीयों की आत्माएं.

अमृतसर के समीप स्थित अजनाला गांव, अजनाला गांव में मौजूद “कालों का कुआं” इसको ‘शहीदां वाला खूह’ के नाम से भी जाना जाता है. यह वहीं कुआं है जिसमें सन 1857 ई. की क्रान्ति के दौरान अंग्रेजों ने 282 क्रान्तिकारियों को जिन्दा दफन कर दिया था. 2 मार्च 2014 यानि, 157 साल बाद जब इस कुएं की खुदाई की गई तो इस कुएं से एक बाद एक 282 क्रान्तिकारियो के नरकंकाल मिले. स्थानीय गुरूद्वारा शहीदगंज प्रबंधन समिति की ओर से सिख इतिहासकारों की राय पर यह खुदाई शुरू की गई थी. खुदाई करने वाले जैसे-जैसे इस कुएं की गहराई में जाते गए, वैसे-वैसे इस कुएं से शहीदों की अस्थियां मिलनी शुरू हुई. खुदाई कार्य के दौरान मौजूद लोगों की आंखों से आंसूओं की धारा माहौल को गमगीन कर देती.
10 मई 1857 को पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ भारतीयों ने क्रांति की, जिसे अंग्रेजों व उनके वेतनभोगी इतिहासकार सिपाही विद्रोह भी कहते हैं. 13 मई को लाहौर की मीयांमीर छावनी में प्रात: 8 बजे बंगाल नेटिव इन्फेंट्री पैदल सेना के सिपाहियों का निशस्त्रीकरण कर दिया गया ताकि इस क्षेत्र में सेना विद्रोह न कर पाए. सुबह की परेड के बाद इन सिपाहियों को कैद कर लिया गया.
30 जुलाई तक कैद में रहने के बाद सैनिकों ने भी क्रांति का झंडा उठा लिया और अंग्रेजों की कैद से भाग निकले.
31जुलाई को इन सैनिकों का जत्था अजनाला कस्बे के 5—6 किलोमीटर पीछे रावी नदी के किनारे स्थित डडीयां गांव के पास पहुंचा, भूख व थकान के मारे इन सैनिकों का बुरा हाल था, इनके पास देश के लिए लड़ने का जज्बा तो था परंतु हथियार व राशन नहीं. गांव के जमींदारों ने इन सैनिकों को रोटी-पानी देने का लालच देकर गांव में ठहरा लिया और तहसीलदार दीवान प्राण नाथ को इसकी सूचना दे दी. तहसीलदार ने अमृतसर के तत्कालीन उपायुक्त फेड्रिक कूपर को इसकी जानकारी भेजी. उस समय थाने व तहसील में जितने भी सशस्त्र सिपाही थे उक्त गांव में भेज दिए गए ताकि इन सैनिकों को शहीद किया जा सके. गांव में पहुंचते ही ब्रिटिश सेना व पुलिस के जवान इन थके मांदे व भूखे सिपाहियों पर भूखे भेडि़यों की तरह टूट पड़े.150 सिपाही जख्मी होकर अपनी जान बचाने के लिए रावी नदी में कूद गए और शहीद हो गए. 50 सिपाही लड़ते हुए नदी में गिर गए और सदा के लिए अलोप हो गए. इतने में उपायुक्त कूपर अपने सैनिकों के साथ गांव में पहुंच गया. गांव के लोगों की सहायता से कूपर ने 282 सैनिकों को गिरफ्तार कर लिया और रस्सियों से बांध कर इन्हें अजनाला लाया गया. 237 सैनिकों को थाने में बंद करने के बाद बाकी सैनिकों को एक कोठरी में ठूंस दिया गया. योजना के अनुसार इनको 31 जुलाई को फांसी लगाया जाना था, परंतु भारी बरसात के कारण इस योजना को अगले दिन के लिए लंबित कर दिया गया.
अगले दिन 1अगस्त को ईद वाले दिन 237 सिपाहियों को 10—10 की टोली में बाहर निकाला गया और गोलियों से भून दिया गया. सफाई कर्मचारियों ने इन लाशों को एक-दूसरे के ऊपर इस तरह गिराना शुरू कर दिया कि वहां लाशों का ढेर लग गया. इन सिपाहियों को बलिदान किए जाने के बाद कोठडी बुर्जी में बंद सिपाहियों को बाहर निकाला गया तो यहां पर बहुत से सैनिक तो दम घुटने, भूख-प्यास व थकान के मारे पहले ही शहीद हो चुके थे. कूपर के आदेश पर ब्रिटिश सेना ने अर्ध बेहोशी की हालत में बाकी सैनिकों को भी शहीद कर दिया. जिला गजेटियर 1892-93 के पृष्ठ क्रमांक 170 -71 के अनुसार इन सैनिकों के शव एक खाली पड़े कुएं में डलवा कर ऊपर टीला बनवा दिया गया जिसे कालेयांवाले दा खूह नाम दे दिया गया.

अनुसंधानकर्ता : श्री सुरिन्दर कोचर.
साभार : पंकज चौहान
संकलन : दिनेश भंडुला

Unknown's avatar

Author:

Buy, sell, exchange old books 8369123935

Leave a comment