वैशाली में वर्तमान बिहार के किसी हिस्से से पांच सौ मत- मतांतरो से अधिक जानने वाला एक विद्वान आया और उसने आकर शास्त्रार्थ के लिए सबको ललकारा। कोई उसके पांडित्य के सामने ठहर न पाए। वो अजेय घोषित होता इसके पहले ही एक विद्वान स्त्री, जो वहीं की थी, उसके समक्ष आई जो स्वयं भी पांच सौ के करीब मत- मतांतरो की विद्वान थी।
दोनों में शास्त्रार्थ शुरू हुआ पर कोई किसी से कम नहीं दिख रहा था। शास्त्र चर्चा देखने वालों ने सोचा कि अगर इन दोनों का वैवाहिक संबंध करा दिया जाए तो इनसे जो संतान जन्म लेगी वो कितनी विद्वान होगी।
फिर सबकी सहमति से दोनों का विवाह करा दिया गया। कालांतर में उन्हें एक पुत्र और चार पुत्री हुई। पांचों ने अपने मां और पिता से समस्त मत- मतांतरो की शिक्षा ली। बेटे की विद्वता के कारण उसे वहीं के लिच्छवी गणराज्य में आचार्य बना लिया गया पर बेटियों ने किसी लाभ के पद को ग्रहण करने से इंकार कर दिया और वो चारों बहनें देश भर में शास्त्रार्थ करने निकल गईं। वो चारों बौद्ध महाविहारों के द्वार पर जाकर उन्हें ललकारने लगी। बौद्ध आचार सारिपुत्त से उन्होंने हजार से अधिक प्रश्न पूछे। महास्थविर को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दी और इस तरह चारों बहनें देश में प्रसिद्ध हो गईं।
उनके सम्मान में बौद्धों और सनातन के बड़े बड़े आचार्यों के मस्तक झुके रहते थे। किसी ने उनका असम्मान नहीं किया, किसी ने उनको गालियां नहीं दी, असहमति पर हिंसा नहीं की।
भारत भूमि के अंदर जन्में सारे मत मतांतरों के लोग एक दूसरे का अध्ययन करते थे; एक दूसरे को समझते थे और इसलिए हमारे इतिहास पर कोई कितना भी कीचड़ उछाले, कितना भी भेद दिखाए, हम एक ही रहे हैं।
मैं बिहार बल्कि बिहार के उस इलाके से हूँ जहां बौद्ध मत और जैन मत परवान चढ़े। उसी क्षेत्र के पास याज्ञवल्क्य हुए जिनके बनाए विधानों से हिन्दू धर्म के काफी विधान आज संचालित हो रहा है, उसी क्षेत्र में सिखों के खालसा पंथ के प्रवर्तक जन्में, बाबा श्रीचंद का उदासी संप्रदाय आगे बढ़ा, इसलिए भारत भूमि के मत, पंथों पर लिखना मैं अपना उत्तरदायित्व समझता हूँ और इसलिए अपनी पुस्तक #इनसाइड_द_हिन्दू_मॉल में मत, पंथों पर लिखा था और अब अगली पुस्तक #अमृत_कुंभ में इसका और भी विस्तार है। इस पुस्तक में हिंदुओं के अंदर के पंथों के
संबंधों पर काफी गहराई से चिंतन है।
जिनको भी हिन्दू धर्म के मत, पंथ और संप्रदायों के अध्ययन में रुचि है; उनके लिए मेरी यह पुस्तक संग्रहणीय होगी। इसलिए भी ताकि आप हमें आपस में लड़ाने वालों को प्रत्युत्तर देना आ सके। वरना, शिवकांत शर्मा जी की तरह हमारी आपकी उम्र भी प्रोपागेंडा वालों को जवाब देते निकल जाएगी।
Abhijeet Singh