लौकिक यातनाओं से गुजरता
#महाभारत काल का साक्ष्य
#भागलपुर में
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भागलपुर अपने इतिहास को बिगाड़ने के लिए ख्यात है। यहां के पुरातात्विक टीलों पर बसे लोगों को अपनी विरासत से अधिक पसंद निज संपत्ति है। पुरातात्विक सामग्रियों को धड़ल्ले से नष्ट किया जा रहा है जिसमें इनकी मौन सहभागिता है। इस भागलपुर ने छद्मनामों को अपना आदर्श बना कर मूर्तियों की स्थापना कर लिए और अपने यशस्वी नायकों को भुला दिया। कर्ण के नाम से चम्पा नगर का टीला ही है। इस पर बड़ी आबादी बसी हुई है। यहां जिनके घर के नीचे कोई पुरातात्विक सामग्री मिलती है, वे नष्ट कर देते हैं। उन्हें डर होता है कि अगर प्रशासन को जानकारी मिलेगी तो वे इस स्थान को निर्माण कार्य के लिए प्रतिबंधित कर देंगे। सरकार भी इस आफत से बचना चाहती है कि उनका वोट बैंक प्रभावित न हो जाए। इसी तरह अंदर ही अंदर एक षड्यंत्र है कि भागलपुर यानी प्राचीन अंग देश के महाराजा रोमपाद, महाराजा सेनापति कर्ण, महर्षि पालकाप्य (‘गज आयुर्वेद’ के रचयिता) को बिसरा दिया जाए। यहां के लोग नहीं चाहते कि दानवीर कर्ण की विशालकाय प्रतिमा लगाई जाए। क्योंकि इससे इतिहास जीवंत होने लगेगा। यहां महावीर जैन और महात्मा बुद्ध को भी भुला दिया गया।
भागलपुर में लगभग दर्जन भर विशालकाय टीले हैं जिनके नीचे इतिहास दबा हुआ है। इन्हें अब तेजी से नष्ट किया जा रहा है। ह्वेनसांग 7वीं शताब्दी में भागलपुर के चम्पा (अब नगर) में आए थे। तब जिन मठों और मंदिरों की चर्चा उन्होंने किये हैं वे इन टीलों के नीचे दबे हुए हैं। समय के बवंडर, विदेशी बर्बर आक्रमणों के उपरांत उपेक्षा और गंगा की अलमस्त लहरों ने मिट्टी डालकर इन विशाल धरोहरों को गर्भ में सुरक्षित कर लिया था जिन्हें तथाकथित बुद्धिजीवी कहे जाने वाले यहां के निवासी मृत विशालकाय जंतु को गिद्ध की भांति नोचते आ रहे हैं।
एक ऐसा ही टीला भागलपुर के सबौर में है। उसे भी नष्ट करने का यत्न जारी है।
खांडवप्रस्थ के बागपत (व्याघ्रप्रस्थ), सोनीपत (स्वर्णप्रस्थ), पानीपत (पाण्डवप्रस्थ), तिलपत (तिलप्रस्थ) और श्रीप्रस्थ (इंद्रप्रस्थ) जैसा ‘प्रस्थ’ नाम वाला एक ग्राम भागलपुर नगर के आसपास यानी प्राचीन अङ्ग क्षेत्र में है।
यह ग्राम भी महाभारत काल का प्रतीत होता है। यहां कुछ अतिप्राचीन टीले हैं जिससे कभी मौर्यकाल तो कभी शुंगकाल के आहत (पंचमार्क) सिक्के प्राप्त होते रहे हैं। यहां से 2″ का एक सुंदर नंदी भी प्राप्त हुआ है। यहां पेंटेड ग्रे वेयर (PGW) मिलते हैं। इतिहासकार बीबी लाल इन्हें महाभारत काल का मानते हैं। कौशाम्बी और इंद्रप्रस्थ में उन्हें यही मृदभांड मिले थे।
यह स्थान गंगा के किनारे है। पूर्वकाल में गंगा और इस टीले के मध्य एक सड़क थी। टीले के नीचे विशाल भवनों के अवशेष हैं। यह भी अन्य पुरास्थलों की भांति स्ट्रेटिफ़ायड है। टीले के पूर्वी भाग में मानव अस्थियों के अवशेष अत्यधिक मात्रा में मिलते हैं जो अंग भंग प्रतीत होते हैं, मानो कोई भीषण नरसंहार हुआ है।
टीले के दक्षिण-पश्चिम में एक विशाल अन्नागार था। दो वर्षों पूर्व यहां खेत बनाने के क्रम में लगभग 2 दर्जन विशालकाय अन्नकोष मिले थे। ये अन्नकोष मिट्टी के बने विशालकाय घड़े थे जिन्हें स्थानीय लोगों ने नष्ट कर दिया लेकिन इसके अवशेष देखे जा सकते हैं। ये घड़े हाल में तमिलनाडु के आदिचन्नूर में मिले घड़े से भी बड़े थे।
इस स्थान पर 7वीं सदी में आए चीनी यात्री ह्वेनसांग नहीं पहुंचे। क्योंकि वो उस मार्ग से गए ही नहीं इसलिए अपने यात्रा वृतांत में उन्होंने इसकी चर्चा नहीं की। यहां फ्रांसिस बुकानन, विलियम फ्रेंकलिन, एनएल डे जैसे सर्वेयर – इतिहास मर्मज्ञ पहुंचे। किन्तु, इस स्थान की विवेचना ही गलत की। फ्रेंकलिन की विवेचना का पुछल्ला पकड़कर ही भागलपुर का आधुनिक गजेटियर लिखनेवाले पीसी रायचौधुरी ने नंदो लाल डे के हवाले से वही गलत और घिसीपिटी कहानी कह दी जिसका भूगोल तक उक्त ग्रंथों से फिट नहीं बैठता। फ्रेंकलिन ने इस स्थान को ‘मार्कण्डेय’, ‘वायु’ और ‘हरिवंश पुराण’ के संदर्भों से जोड़ने का प्रयत्न किया मगर लक्ष्य तक नहीं पहुंचे किन्तु एक आउटलाइन अवश्य खींच दिए। उन्होंने ‘धरणी कोष’ और ‘चौर पंचासिका’ से संदर्भ भी लिए किन्तु लक्ष्य से भटक गए। उन्हीं कहानियों को लेकर अब भी इतिहास के खोजी प्रवृत्ति के लोग वैतरणी पार कर रहे हैं।
इस स्थान का नाम #कुरूप्रस्थ है जिसे अपभ्रंश में कुर्पट कहते हैं। यह कुरूपत ही है। कुरुओं की रियासत।
‘अष्टाध्यायी’ में पाणिनी ने लिखे कि ‘प्रस्थ’ अब गांवों के नाम से हट रहा है। किन्तु यहां तो प्रस्थ प्राप्त है वह अब ‘पट’ में बदल गया है।
‘सांख्यायन श्रौतसूत्र’ में भी कुरुओं के अन्यत्र फैलने की बात है। ‘मत्स्य पुराण’ में उधृत है कि भारत युद्ध के उपरांत कौरव मगध और इसके आसपास भी बस गए। बुद्धघोष द्वारा त्रिपिटकों की टीकाओं में भी बुद्ध द्वारा कुरुओं के मध्य उपदेश का प्रसंग आया है।
गंगा द्वारा सिंचित प्रदेश को भी ‘प्रस्थ’ कहने की प्रथा थी किन्तु पाणिनी के काल तक यह समाप्त हो चली थी।
इस विशाल टीले पर खेती होती ही है, एक विशाल बरगद के नीचे एक मजार भी बना दिया गया है। टीले के बीचों बीच एक कुआं भी है। लोग यहां इसलिए जाते हैं कि उन्हें सुलेमान की तरह कुछ रत्न और सिक्के तथा आभूषण मिल जाएंगे। हाँ, वही सुलेमान जिसकी चर्चा 1813 में यहां पालिबोथरा (पाटलिपुत्र) को ढूंढते हुए आए विलियम फ्रेंकलिन ने की है।
बिहार में सरकार प्राचीन टीलों के संरक्षण और उत्खनन को लेकर बहुत उदासीन है। सबकुछ सरकार के ऊपर छोड़ी हुई जनता तो स्वार्थ में इस तरह डूबी हुई है कि उसे संस्कृति का संरक्षण बेकार लगता है। भारतवर्ष की गौरवशाली परम्परा और इतिहास उत्तरोत्तर नष्ट हो रही है। हम कब चेतेंगे भला!
– Uday Shankar ©
Repost : अगस्त 16, 2023
छवियां :
कुरुपत से प्राप्त कुछ पुरातात्विक सामग्रियां















