मैं कहता हूं पत्नी को छोड्कर मत भाग जाना। पत्नी की मान्यता गिर जाए, बस काफी है। पत्नी के प्रति पत्नी— भाव गिर जाए, बस काफी है। पत्नी में भी परमात्मा दिखायी पड़ने लगे, बस काफी है। मेरा—तेरा गिर जाए, वही झूठ है। लेकिन वह झूठ तो नहीं छोड़ते। अगर तुम हिमालय भी भाग गए, तो भी तुम्हारी पत्नी तुम्हारी है, यह झूठ तो तुम्हारे साथ जाता है, पत्नी छोड़ जाते हो।
स्वामी राम के जीवन में एक उल्लेख है, वह अमरीका से लौटे हैं। सरदार पूर्णसिंह उनके शिष्य थे और उनके पास हिमालय में रहते थे। एक दिन उनकी पत्नी दूर पंजाब से मिलने आयी। पत्नी बड़ी गरीब हालत में थी। स्वामी राम छोड्कर घर भाग गए, पत्नी किसी तरह पाल रही थी बच्चों को, किसी तरह अपना जीवन चला रही थी। किसी तरह थोड़े पैसे इकट्ठे करके कि स्वामी राम वापस आए हैं, उनके दर्शन कर आए, वह हिमालय गयी।
स्वामी राम को पता चला तो उन्होंने सरदार पूर्णसिंह को कहा कि यह झंझट कहां से आ गयी। मैं इससे मिलना नहीं चाहता। तुम किसी तरह इसको टालो। सरदार पूर्णसिंह तो बहुत हैरान हुए, क्योंकि स्वामी राम ने कभी किसी से मिलने से इनकार नहीं किया। कोई भी आया, पुरुष हो कि स्त्री। इस स्त्री से मिलने के इनकार का तो मतलब ही यही होता है कि इसके प्रति अभी भी पत्नी— भाव है। और तो क्या अर्थ होता है! अगर पत्नी— भाव गिर गया तो यह भी वैसी स्त्री है जैसी और स्त्रियां हैं। जब किसी और से मिलने में कोई रुकावट नहीं, तो इससे मिलने में क्या रुकावट है? इस बिचारी का क्या कसूर है?
तो सरदार पूर्णसिंह ने कहा कि अगर आप इस स्त्री से नहीं मिलेंगे, तो मैं आपको छोड्कर जाता हूं। मेरी श्रद्धा डावाडोल हो गयी। क्योंकि आप तो कहते हैं कि सब छोड़ चुके, अगर छोड़ चुके तो यह भाव अब तक मन में क्यों है कि यह झंझट कहां से आ गयी? तो झंझट जरूर कहीं भीतर है।
स्वामी राम को भी समझ में आया—वह बड़े समझदार, बोधवान व्यक्ति थे। उनकी आंख से आंसू गिर गए और उन्होंने कहा, तुम ठीक कहते हो, थोड़ी झंझट मेरे भीतर थी। तुमने मुझे खूब ठीक समय पर चेताया। तुमने मुझे चेता दिया। उसे बुलाओ। वह आयी तो उसके पैर छुए। और उसी दिन उन्होंने संन्यासी का जो पुराना रूप—ढंग था, वह छोड़ दिया। क्योंकि उन्होंने कहा कि उसमें वह जो त्याग की अकड़ है, वही भ्रांत है।
तुम जानकर यह हैरान होओगे कि स्वामी राम गैरिक वस्त्रों में नहीं मरे। जब वह मरे तो वह साधारण वस्त्र पहने हुए थे। पर मैं तुमसे कहता हूं कि वह परम संन्यासी होकर मरे। उनको एक बात समझ में आ गयी कि यह भी अकड़ है मेरी कि मैं त्यागी, कि मैंने सब छोड़ दिया, इसमें भी भ्रांति है। छोड़ने को क्या है, पकड़ने को क्या है!
ओशो