रामकथा.
वारानिकोवजी ने अज़रबैजान में कभी अपने बचपन के दिनों में एक गड़ेरिया के मुंह से रामकथा सुनी थी । कथा श्रवण मात्र से वे भावविभोर हो गए । वे भारत के राम को देखना चाहते थे। स्पर्श करना चाहते थे । उनकी इच्छा पूरी हुई । वे मास्को यूनिवर्सिटी में भारतविद्या के प्रोफेसर नियुक्त हुए । राम को गहराई में आत्मसात किया । उन्होंने रामचरित मानस का रूसी भाषा में अनुवाद किया । पूरे रूस को रामकथा से परिचित करवाया । वह रूस के तुलसीदास थे । मृत्यु के समय भी वे राम का चिंतन कर रहे थे । मास्को के पास एक शांत जगह उन्हें दफना दी गई । उनकी इच्छा के अनुसार, समाधि के ऊपर दो श्लोकों में राम की अपार महिमा लिखी गई । गोरखपुर के हनुमान प्रसाद पोद्दार जी की तरह उनमें राम को खोजने की जिजीविषा थी । वे सफल हुए । उनका स्वप्न फलीभूत हुई । आज रूस की आधुनिक पीढ़ी राम और उनके भारत को बहुत अच्छा जानते हैं । वारानिकोव जी ने रूस को राममय कर दिया । आज रूस और भारत एक हैं । इसके मूल में राम और सनातन चिंतन है ।
