Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

क्रोध की दवा – एक प्रेरणादायक कहानी

एक गाँव में एक स्त्री रहा करती थी। उसका नाम शोभा था। शोभा स्वभाव से अत्यंत क्रोधी थी। गुस्सा तो जैसे उसकी नाक की नोक पर बैठा रहता था। छोटी-छोटी बातों पर वह भड़क उठती और सामने वाले को खरी-खोटी सुनाने में देर नहीं करती। चाहे घर का कोई सदस्य हो या बाहर का कोई पड़ोसी, वह किसी को नहीं बख्शती थी। उसके तीखे बोल और चिड़चिड़े स्वभाव से आस-पड़ोस के लोग परेशान हो चुके थे। कोई भी उससे सीधे मुंह बात करने से कतराता था।

घर का माहौल भी शोभा के गुस्से से अछूता नहीं था। पति और बच्चे उसकी आवाज़ से कांपने लगे थे। रोज़ घर में कलह का वातावरण बना रहता। शोभा को स्वयं भी यह बात खटकती थी कि उसके गुस्से के कारण लोग उससे दूर होते जा रहे हैं, और घर में प्रेम और शांति की जगह तनाव ने ले ली है।

शोभा को यह भी अनुभव होता था कि जब गुस्सा शांत हो जाता है, तब उसे बहुत पछतावा होता है। वह सोचती, “क्यों मैं इतनी बातें बोल गई? क्यों मैं खुद पर नियंत्रण नहीं रख पाई?” लेकिन जब अगली बार कोई बात होती, वह फिर अपने आप पर काबू खो बैठती। वह स्वयं को लाचार महसूस करने लगी थी।

एक दिन गाँव में एक प्रसिद्ध महात्मा का आगमन हुआ। लोग उन्हें सुनने और उनसे मिलने दूर-दूर से आ रहे थे। उनके प्रवचन में आत्मसंयम, शांति और सदाचार की बातें होती थीं। जब शोभा को महात्मा की कीर्ति और उनके चमत्कारी उपायों की बात पता चली, तो उसने निश्चय किया कि वह उनसे मिलकर अपने गुस्से को शांत करने का कोई उपाय पूछेगी।

अगली सुबह वह महात्मा के पास पहुँची। उसने उनके चरणों में प्रणाम किया और विनम्रता से बोली,
“गुरुवर! मैं अपने गुस्से से बहुत पीड़ित हूँ। जब भी मुझे गुस्सा आता है, मैं अपना आपा खो देती हूँ। लोगों को बुरा-भला कह देती हूँ और बाद में बहुत पछताती हूँ। मेरे रिश्ते बिगड़ते जा रहे हैं। कृपा करके मुझे कोई ऐसा उपाय बताइये जिससे मैं इस गुस्से पर काबू पा सकूं।”

महात्मा ने ध्यानपूर्वक उसकी बात सुनी और मुस्कराते हुए एक छोटी सी शीशी उसे दी।
उन्होंने कहा,
“पुत्री, इस शीशी में क्रोध शांत करने की दिव्य औषधि है। जब भी तुम्हें गुस्सा आये, इस शीशी को मुँह से लगाकर इसके कुछ घूंट पी लेना। लेकिन ध्यान रखना, जब तक मुंह में यह दवा हो, तब तक कुछ बोलना नहीं।”

शोभा ने शीशी को दोनों हाथों से लिया और श्रद्धा से सिर झुकाकर धन्यवाद दिया। वह घर लौटी और जैसे ही अगली बार उसे गुस्सा आया, उसने शीशी से कुछ घूंट पानी पिया और मुंह बंद कर लिया। परिणाम चौंकाने वाला था — जब उसने कुछ नहीं कहा, तो बात वैसे ही शांत हो गई। न कोई झगड़ा हुआ, न कलह। यह अनुभव उसके लिए नया था।

फिर जब भी गुस्सा आता, वह शीशी से पानी पीती और चुप हो जाती। धीरे-धीरे उसने पाया कि उसका गुस्सा कम होने लगा है। न सिर्फ बाहर के लोग, बल्कि उसके अपने घरवाले भी अब उसे नए नज़रिये से देखने लगे थे। उसके रिश्तों में सुधार आने लगा। सात दिन बाद शीशी की दवा समाप्त हो गई।

वह पुनः महात्मा के पास पहुँची और बोली,
“गुरुवर! आपने मुझे जो दवा दी, वह तो अद्भुत निकली। पीते ही मेरा गुस्सा ठंडा हो जाता है। अब वह दवा समाप्त हो गई है, कृपया मुझे उसकी एक और शीशी दें।”

महात्मा मुस्कराए और बोले,
“पुत्री, उस शीशी में कोई औषधि नहीं थी। उसमें तो केवल साधारण पानी था। जब भी तुम गुस्सा करती थी, तब तुम उस पानी को पीने में व्यस्त हो जाती थी और इस कारण कुछ बोल नहीं पाती थी। यही मौन ही असली दवा है। जब इंसान गुस्से में होता है, तो सबसे अधिक नुकसान उसकी जुबान से निकलने वाले शब्द करते हैं। यदि वह कुछ बोलने के बजाय कुछ क्षण मौन रह जाए, तो क्रोध स्वतः ही शांत हो जाता है।”

शोभा की आंखों से आंसू बहने लगे। उसने कहा,
“गुरुवर, आपने मेरी आँखें खोल दीं। मैं समझ गई कि असली दवा मेरे ही व्यवहार में छुपी है। अब मैं हर बार गुस्से के समय चुप रहूंगी और स्वयं को संभालूंगी।”

सीख:
गुस्सा आने पर यदि हम चुप रह जाएं और कुछ समय के लिए स्वयं को रोक लें, तो बड़े से बड़ा झगड़ा टल सकता है। क्रोध की सबसे सरल और कारगर दवा है — “मौन।”

…✍️

#moralstoryhindi
#viralphotochallenge
#explorepage
#viralstory
#hindikahani
#motivation

Unknown's avatar

Author:

Buy, sell, exchange old books 8369123935

Leave a comment