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कहानी: “गणित के मास्टर जी और ट्रांसफर का जादुई सूत्र”

राजस्थान के गांव ढींगड़ा का सरकारी स्कूल वैसे तो छोटा था, लेकिन वहां के टीचर इतने पुराने थे कि लगता था जैसे स्वतंत्रता संग्राम में भी पढ़ा चुके हों।
यहां के गणित के मास्टर रघुनंदन प्रसाद हर सुबह साइकिल से आते और स्कूल की घंटी से पहले हाजिर हो जाते—जैसे स्कूल न हुआ, कोई ट्रेन हो जो छूट न जाए।
मास्टर जी पढ़ाते थे गणित, लेकिन असल में वो लड़ रहे थे ज़िंदगी के सबसे कठिन सवाल से —
“ट्रांसफर कब होगा?”
एक दिन मास्टर जी स्कूल की मीटिंग में सुने कि “गुप्ता सर को डेपुटेशन में भिजवा दिया गया है भिवाड़ी!”
मास्टर जी की आंखें चमक उठीं,
“अरे वाह! डेपुटेशन! ये तो कोई नया जादुई मंत्र है!”
अब मास्टर जी जुट गए इस मंत्र को समझने में। पहले तो सोचा कि RTI डालें—फिर याद आया, उनकी पेंशन का हिसाब भी RTI से नहीं आया, तो इस से क्या ही आएगा!
फिर एक दिन चाय की दुकान पर पता चला कि “डेपुटेशन योग्यता से नहीं, ‘जुड़ाव’ से होता है।”
“किससे जुड़ाव?” मास्टर जी ने पूछा।
“ऊपरवाले से!” दुकानदार ने आंख मारते हुए जवाब दिया।
मास्टर जी थोड़े उलझे, “मतलब भगवान?”
“नहीं, प्रधान जी के जीजा जी से!”
अब मास्टर जी ने गांव में अपने सभी ‘जुड़ाव’ खंगाल डाले—भाई का साला, साले का मामा, मामा का पेंटर दोस्त—सब के सब या तो बेरोजगार थे या खुद ट्रांसफर का सपना देख रहे थे।
इधर गुप्ता सर 6 महीने में ही टेढ़ा मुंह बनाते स्कूल से विदा हो लिए और व्हाट्सएप स्टेटस में लिखा—
“डेपुटेशन – माय न्यू अड्डा।”
गांव के बाकी मास्टर हक्के-बक्के!
“हम तो पढ़ाने आए थे, ये तो राजनीति निकली!”
मास्टर जी को भी चिढ़ सी होने लगी, लेकिन वो हार मानने वालों में से नहीं थे।
बीईओ ऑफिस में मास्टर जी ने पूछा:
“साहब, मेरे ट्रांसफर का क्या हुआ?”
साहब बोले:
“अरे मास्टर जी, डेपुटेशन ट्रांसफर नहीं होता। ये तो शिक्षण व्यवस्थार्थ विशेष स्थिति है!”
मास्टर जी बोले:
“तो साहब, हमारे घर की भी ‘व्यवस्था’ कई सालों से डगमगाई है, वहां कब भेजा जाएगा?”
स्कूल के बच्चों को भी अब मास्टर जी की तकलीफ समझ आने लगी थी।
एक दिन मास्टर जी ने सवाल पूछा:
“अगर 15 साल से ट्रांसफर नहीं हुआ, और बाकी के 3 लोग मंत्री जी से पहचान बनाकर डेपुटेशन पर निकल गए, तो बाकी कितने मास्टर जी दुखी होंगे?”
पीछे से लड्डू बोला:
“सभी दुखी होंगे मास्टर जी!
फिर उन्होंने चालाकी से बच्चों को ट्रांसफर एप्लिकेशन लिखना सिखाया।
“प्रिय शिक्षा विभाग, कृपया हमारे मास्टर जी को हमारी मम्मी के पास ट्रांसफर कर दीजिए ताकि वो रोज टिफिन ला सकें।”
सच कहूं, ये चिट्ठियां इतनी प्यारी थीं कि किसी भी विभागीय अफसर का दिल पिघल जाए—अगर उन्हें कभी भेजी जातीं तो। लेकिन मास्टर जी ने उन्हें संभालकर अपनी डायरी में चिपका दिया।
एक दिन अचानक ही गांव में चर्चा उठी—”अब ट्रांसफर पॉलिसी आ रही है, सब मेरिट से होगा!”
मास्टर जी ने फिर डायरी निकाली, फिर लिखा—
“अबकी बार पक्का। ट्रांसफर होगा। जय शिक्षा।”
इधर, सरकार की ट्रांसफर पॉलिसी बनते-बनते राम मंदिर बन गया, चंद्रयान-3 चाँद पर पहुंच गया, लेकिन पॉलिसी अभी भी “ड्राफ्टिंग में है साहब”।
सरकार हर साल प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहती:
“बहुत जल्द ट्रांसफर पॉलिसी आ रही है। पारदर्शी, निष्पक्ष और मेरिट आधारित!”
उसी दिन लड्डू ने पत्र लेखन में लिखा:
**”प्रिय सरकार जी,
आपने कहा था ट्रांसफर पॉलिसी आ रही है। अब लगता है ये पॉलिसी नहीं, Netflix की वेब सीरीज़ है – हर साल ‘कमिंग सून’।
प्लीज़ हमारे मास्टर जी को उनकी मम्मी (मतलब पत्नी) के पास भेज दो।
हम वादा करते हैं –
होमवर्क समय पर करेंगे,
प्रार्थना में ‘जय शिक्षा, जय ट्रांसफर’ बोलेंगे,
और दीवारों पर सिर्फ प्रेरणादायक नारे लिखेंगे!”
लड्डू का पत्र जब मास्टर जी ने डायरी में चिपकाया,
तो कुछ पल के लिए उनकी आंखें ठहर गईं।
कई सालों से वो अपने ट्रांसफर के लिए लड़ रहे थे—
कभी आवेदन से, कभी अर्ज़ी से, कभी जान-पहचान से और कभी उम्मीद से।
लेकिन पहली बार उन्हें लगा कि शायद उनका ट्रांसफर नहीं हुआ,
पर उनकी सोच, उनकी मेहनत, और उनका अपनापन…
वो इस गांव के बच्चों में ज़रूर ट्रांसफर हो गया।
शाम को स्कूल की घंटी बजी।
बच्चे चले गए। मास्टर जी अकेले स्टाफ रूम में बैठे रहे।
पुरानी डायरी के पन्नों को पलटा…
हर पन्ना एक असफल आवेदन की तरह सरसराया।
तभी एक बच्चा भागता हुआ आया—लड्डू।
उसने मास्टर जी को एक चित्र दिया—जिसमें एक मास्टर जी थे, हाथ में बैग लिए, और उनके पीछे लिखा था:
“मास्टर जी, आप ट्रांसफर न भी हो पाएं,
तो भी आप हमारे दिलों में तो हमेशा रहेंगे।
आपका स्कूल, आपकी क्लास, और आपकी बातें कभी नहीं जाएंगी।”
मास्टर जी ने चित्र देखा, चुपचाप मुस्कराए,
डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा:
“इस साल भी ट्रांसफर नहीं हुआ…
लेकिन शायद, अब इसकी ज़रूरत भी नहीं।
जहां प्यार मिले, वहीं सेवा करना सबसे बड़ा ट्रांसफर होता है।”
फिर नीचे लिखा:
“जय शिक्षा,
जय हर उस शिक्षक को,
जो बिना पोस्टिंग बदले,
किसी की ज़िंदगी बदल देता है…”

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