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બિહારના છપરા જિલ્લાની આ વાર્તા સામાજિક કુરીતિઓ અને માનવીય સંવેદનાઓ પર એક જોરદાર પ્રહાર કરે છે. તમે આપેલા લેખનો સુંદર ગુજરાતી અનુવાદ નીચે મુજબ છે:
સાધુને વિધવા મહિલાએ એક રાતનો આશરો આપ્યો… સવારે એવું સત્ય સામે આવ્યું જેણે આખા ગામને સ્તબ્ધ કરી દીધું!

બિહારના છપરા જિલ્લામાં ગંગાના શાંત કિનારે વસેલી એ નાનકડી ઝૂંપડી માત્ર માટી અને ઘાસનો ઢગલો નહોતી, પરંતુ એક સ્ત્રીના એકલવાયાપણું અને તેના સંઘર્ષની મૌન સાક્ષી હતી. છપરાની એ ભીની માટી પર બનેલી પગદંડીઓના છેલ્લા છેડે, જ્યાં ગામનો શોરબકોર ઓછો થઈ જતો અને ગંગાની લહેરોનો અવાજ સ્પષ્ટ સંભળાતો, ત્યાં રાધા નામની એક વિધવા મહિલા રહેતી હતી.

દુઃખનું ઓથાર અને સામાજિક તિરસ્કાર
રાધાની ઉંમર માંડ ૨૫ થી ૩૦ વર્ષની હશે, પરંતુ તેના ચહેરા પરની કરચલીઓ ઉંમરની નહીં પણ એ અકસ્માતોની હતી જેણે તેને સમય પહેલા જ વૃદ્ધ કરી દીધી હતી. પતિની અચાનક બીમારી અને મૃત્યુએ રાધાના અસ્તિત્વને સમાજની નજરમાં એક ‘અપશુકન’ બનાવી દીધું હતું. તે ઝૂંપડીમાં ન તો બાળકોનો કિલકિલાટ હતો, ન તો ચૂલાની એ હૂંફ જે એક ભરેલા-પૂરા પરિવારનો સંકેત આપે છે; ત્યાં માત્ર સન્નાટો હતો, જે રાતની સાથે વધુ ઊંડો થતો જતો.

સમાજનો અન્યાયી દ્રષ્ટિકોણ
સમાજની નજરમાં એક યુવાન વિધવાનું એકલા રહેવું કોઈ ગુનાથી ઓછું નહોતું, અને રાધા દરરોજ આ અદ્રશ્ય કઠેડામાં ઊભી રહેતી હતી.

* મહિલાઓનો વ્યવહાર: ગામની સ્ત્રીઓ જ્યારે કૂવા પર પાણી ભરવા જતી, ત્યારે રાધાને જોતા જ વાતો ધીમી કરી દેતી અને તેમના ચહેરા પર એક અજીબ શંકા તરવા લાગતી.
* પુરુષોની નજર: પુરુષો તેને ત્રાંસી નજરે જોતા—કોઈ સહાનુભૂતિના બહાને તો કોઈ તેની સુંદરતાને પોતાની ગંદી નજરોથી માપવા માટે.

રાધાએ પોતાને દુનિયાથી અલગ કરી લીધી હતી. સાંજ પડતાની સાથે જ તે પોતાની ઝૂંપડીનો કાચો દરવાજો અંદરથી બંધ કરી દેતી અને દીવાની ઝાંખા પ્રકાશમાં પોતાના પડછાયા સાથે વાતો કરતી. તેના માટે સુરક્ષાનો અર્થ માત્ર ચાર દીવાલો નહોતી, પણ એ સવાલોથી બચવું હતું જે સમાજની ઝેરી જીભથી નીકળતા હતા.

એક રાતની પનાહ અને ચોંકાવનારું સત્ય
આ એ જ રાતની વાત છે જ્યારે એક સાધુએ તેની ઝૂંપડીનો દરવાજો ખખડાવ્યો અને એક રાત માટે આશરો માંગ્યો. રાધા માટે આ ધર્મસંકટ હતું—એકબાજુ અજાણ્યો પુરુષ અને બીજી બાજુ અતિથિ ધર્મ. પણ તેણે આશરો આપ્યો. અને જ્યારે સવાર પડી, ત્યારે ગામના લોકો સમક્ષ જે સત્ય આવ્યું તેણે દરેકના હોશ ઉડાવી દીધા.

> નોંધ: આ વાર્તાનો ઉત્તરાર્ધ એટલે કે સવારે શું સત્ય સામે આવ્યું, તે જાણવા માટે ગામના લોકોની માનસિકતા અને રાધાના ચારિત્ર્ય પરની કસોટીની આ અત્યંત ભાવુક ક્ષણ છે.
#storytelling #truestory #fb #viral

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इस देश को सबसे बड़ा नुक्सान दो प्रधानमंत्री के काल में हुआ – जिसमे पहला नाम है इंद्र कुमार गुजराल ..

इंद्र कुमार गुजराल – पैदाइशी कम्युनिष्ट जो कांग्रेस में गया और फिर जनता दल में ..

1996 में जब देवेगौड़ा प्रधानमंत्री थे तब कम्युनिष्टों की पसंद IK Gujral को विदेश मंत्री बनाया और तबसे ही इसने भारत के विदेश मामलों को ख़राब करना चालू कर दिया ..

इसके काल में भारत पाकिस्तान से आगे की सोच ही नहीं पाया .. फिर जब ये प्रधानमंत्री बना तो इसने पाकिस्तान के साथ उस समझौते को किया जिसमे लिखा था कि भारत अपने सारे केमिकल हथियार ख़त्म कर देगा .. जबकि इसके PM बनने के पहले भारत कहता आया था कि उसके पास केमिकल हथियार हैं ही नहीं ..

मतलब इस कम्युनिस्ट इन्द्र कुमार गुजराल ने विश्व में ये साबित करवाया की भारत झूठ बोलता रहा है ..

एक और काम जो इसने किया वो ये कि इसने भारत के PMO से ख़ुफ़िया विभाग और RAW का पाकिस्तान डेस्क खत्म कर दिया ..

August 1997 में अमेरिका में पाकिस्तान के PM से मुलाकात होते ही वहीँ से इसने आदेश किया की इसके भारत लौटने तक RAW का पाकिस्तान डेस्क ख़त्म होना चाहिए …

इसके बाद इस दौरान भारत के पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सऊदी, कुवैत, यमन, UAE आदि जगहों पर स्थित १०० के ऊपर एजेंट मारे गए ..

एक हफ्ते में सारा खुफिया विभाग ध्वस्त हो गया और RAW नेस्तनाबूद हो गई .. पूरा का पूरा ख़ुफ़िया ढाँचा नेस्तनाबूद हो गया पाकिस्तान से लेकर फिलिस्तीन तक ….

उसका नतीजा ये हुआ कि भारत को OIC इलाके में उसके खिलाफ हो रहे षडयंत्रो का पता ही नहीं चलता था …

भारत में 1997 से लेकर 2001 तक का समय बेहद कठिन रहा, भारत बिना किसी ख़ुफ़िया जानकारी के रहा और कोई ऐसा महीना नहीं गया जब भारत में बम विस्फोट से लेकर सीमा पर छिटपुट आतंकी हमले न हुए ..

1998 में वाजपेयी सरकार आई और 1999 में कारगिल हुआ, ख़ुफ़िया फेलियर पर खूब कोसा गया सरकार को लेकिन कम्युनिष्ट मीडिया ने गुजराल डोक्टराइन नामक उस बेहूदे कागज़ के पुलिन्दे को गोल कर गई जिसको उसको लेकर कम्युनिष्टों को अभी मुहब्बत है क्योंकि उसमे भारत की नाकामी है …

भारत के ख़ुफ़िया विभाग को ख़त्म करके और RAW को नेस्तनाबूक करके, उसके लोजिस्टिक को बर्बाद और एजेंटों के खात्मे के बाद हाल बहुत खराब हो गया …

Indian Airline का हाईजैक होकर कंधार जाना, संसद भवन हमला, कोइम्बटूर हमला, अक्षरधाम, लाल किला हमला आदि होता गया और भारत सरकार पूरे 3 वर्ष तक कुछ जान ही नहीं पाई ख़ुफ़िया से …

अटल सरकार ने आने के कुछ महीने में ही फिर से RAW का पाकिस्तान डेस्क और इंटेलिजेंस का OIC विंग चालू किया था जिसको भारत में ही खड़ा करने में 2002 तक का समय लग गया ..

फिर उसका विदेशों में एजेंट बनाना आदि करते करते 2004 में अटल सरकार चली गई … लोगों को अक्सर कारगिल और IC814 के हाईजैक को लेकर अटल सरकार पर हमला करते पाया जाता है लेकिन गुजराल के कारनामे ने भारत का जो नुक्सान कराया उस पर कभी बात ही नहीं हुई ..

पेट्रोल डीज़ल, आलू – मटर – टमाटर के भाव, IT के स्लैब में बदलाव और एरियर को अपना सबसे बड़ा समस्या समझने वाली जनता को पता ही नहीं कि देश को असुरक्षा के किस दल दल में धकेल दिया गया था …

समय रहते अटल सरकार ने कदम उठाया लेकिन ध्वस्त करना आसान है, खड़ा करना मुश्किल – वो भी ख़ुफ़िया जैसा विभाग जिसमे कई वर्ष लगते हैं एक एजेंट खोजने में

अगले है हमारे ईमानदार प्रधान मंत्री श्री मनमोहन सिंह जी …

जिन पर कोई छीटा नहीं पड़ता .. ये अगर दिल्ली के नज़फगढ़ नाले में कूद के निकलें तो भी गंगोत्री में नहाए जैसे साफ़ निकलते हैं ….

इन्होने गुजराल जैसा तो नहीं किया और RAW तथा intelligence तो टच नहीं किया लेकिन पाकिस्तान और भारत के कम्युनिष्टों के बनाए भंवरजाल और जालसाज़ी को खूब ढील दिया ..

इन्होने intelligence और सुरक्षा विभाग को इस लायक न छोड़ा की देश में मुंबई का हमला से लेकर अनेकों शहरों, ट्रेनों में बम विस्फोट को न पहले जान पाए और न रोक पाए ….

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2007 – 2008 के आस पास पाकिस्तान के लाहौर में एक घटना घटी … पाठ्यपुस्तकों में भगत सिंह और उनके साथियों राजगुरु तथा सुखदेव के लिए लिखा गया कि “भगत सिंह और उसके दो काफिर साथियों ने पडोसी देश के आज़ादी के लिए काम किया, उस देश के लिए जो हमारा दुश्मन है और जिसकी आज़ादी की लड़ाई से हमें कोई सरोकार नहीं, हम उनके बारे में क्यों पढ़े … ये उनके हीरो हैं, हमारे हीरो हमारे खुद के देश में हैं जिनको हम पढ़ेंगे … ” ..

इस तरह के मामले की शुरुवात होंने के खिलाफ मोर्चा खोला पाकिस्तान के मशहूर columnist और लेखक हसन निसार ने … हसन निसार खुले मंचों पर भगत सिंह को पाकिस्तान देश की आज़ादी का सिपाही और हीरो घोषित करने लगे … उन्होंने लाहौर चौक का नाम भी भगत सिंह चौक रखने का मांग रखा

इस सबके बीच बड़े सफाई से ये बात चलाई गई कि ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि दोनों देश के लोगों में कोई संवाद नहीं है .. दोनों देश के लोगों के बीच संवाद बढ़ना चाहिए ..

इस संवाद को बढ़ाने के लिए पाकिस्तान के अखबार The Jung और भारत के Times of India ने आपस में मिल कर कार्यक्रम चालू किया गायक, कलाकार, खिलाड़ी लोगों का आना – जाना, मुशायरों का आयोजन …

सब चालू किया …

बस यहीं पर पाकिस्तान ने भारत के अंदर बहुत अंदर तक घुसपैठ कर लिया …

पाकिस्तान से जो आते थे वो सब ISI की निगरानी में उनके सिखाए, उन पर निगाह रखने वाले, और सीधे ISI एजेंट उनके मैनेजर आदि के रूप में खूब आए .. भारत के intelligence और RAW को इनके दूर रहने का आदेश मनमोहन सरकार ने दिया ..

सरकार ख़ुफ़िया विभाग से पाकिस्तान की तरफ से आने वाले लोगों की लिस्ट से लेकर कार्यक्रम आदि सब छिपा के रखती थी …

उधर से आए ये ISI के एजेंट यानी “अमन की आशा” गिरोह पूरे भारत की रेकी करते, अपने स्लीपर सेल बनाते और निकल जाते और फिर पीछे से भारत में मुम्बई हमला, कई अलग अलग शहरों में बम ब्लास्ट, कश्मीर में बेरोक टोक हमले कराते रहते ..

कश्मीर में तैनात सेना पर इल्जाम लगा के जेल में डालना आदि जैसे कारनामे मनमोहन सरकार ने अंजाम दिए इसी कम्युनिष्टों के “अमन की आशा गैंग के निर्देश पर …

भारत की अधिकतर मूर्ख जनता इन अमन की आशा वालों के जाल में फंसी हुई नुसरत फतह अली आदि के गीतों पर झूमती … जबकि उसका खरीदा हर एक CD /DVD का पैसा पाकिस्तान परस्ती और उसके अपने ही सेना के खून बहाने में लगता ..

इधर से जो जाते थे उनको पाकिस्तानी पश्तून – कश्मीरी – अफगानी – उक्रैन की लड़कियां, महँगी शराब .. महँगी घडिया आदि देकर अपने ओर रखते थे ..

अय्याशी के गर्त में डूबे इन अन्धों और लालची अमन की आशा वाले लोगों ने इस कांसेप्ट के कारण खूब पलीता लगाया देश को …

इस गैंग को प्रायोजित करने का काम भी मनमोहन सरकार ने किया है पाकिस्तान में हुए भगत सिंह वाली घटना के बाद ही भगत सिंह को आतंकवादी बताने वाले कम्युनिष्टों ने उनको अपना हीरो बनाकर पेश करना चालू किया ..

कम्युनिष्टों के पाकिस्तानी मिलीभगत से किए जा रहे इस जालसाज़ी को बाद में खोलेंगे …

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इधर 4 साल से अमन की आशा गैंग का धंधा बंद है .. कश्मीर में आतंकी मारे जा रहे हैं .. देश में गड़बड़ी फैलाने से पहले स्लीपर सेल वाले दबोच लिए जा रहे हैं ..

पत्थरबाज बक्शे नहीं जा रहे हैं .. मनमोहन सरकार द्वारा फंसाए गए सारे सेना के अफसर आदि न्यायालय से बरी किए जा रहे हैं … पाकिस्तान और म्यांमार सीमा पार करके आतंकियों के खिलाफ सेना सर्जिकल स्ट्राइक कर रही है …

पाकिस्तानी गोलीबारी का मुंहतोड़ जवाब दे रहा है .. कुछ हफ्ते पहले पाकिस्तानी मीडिया मोदी सरकार आने के बाद अपने 1600 के ऊपर सैनिक मारे जाने का दावा करके कृन्दन कर रही थी …

भारत अपनी सुरक्षा के लिए फ्रंट फुट पर खेल रहा हैं ..

अभी भारत को ऐसे ही करना चाहिए …

यूँ ही नहीं पाकिस्तान से लेकर चीन मीडिया में रोज एक प्रोग्राम मोदी पर होता ही है

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जयद्रथ ने अभिमन्यु को एक खरोंच भी नही लगाई थी फिर भी अर्जुन ने उसको मारने की प्रतिज्ञा क्यों ली? ये बहुत रोमांचक प्रसंग है।

सबसे पहले तो यह समझे कि जयद्रथ कौन था!!

वो दुर्योधन की बहन का पति था, जब पांडव वनवास में थे तब दुर्योधन ने ऋषि दुर्वासा को पांडवों के पास भेजा ताकि वह क्रोधित होकर पांडवों को श्राप दे।

जब उसका यह पैंतरा असफल हो गया तब उसने जयद्रथ को भड़का कर पांडवों के पास भेजा। जयद्रथ ने मौका देखा जब कोई भी पांडव आस पास नहीं था तब उसने द्रौपदी का हरण कर लिया और उसको लेकर अपने राज्य की तरफ़ रथ से भाग निकला। पर अर्जुन और भीम ने उसको रास्ते में ही पकड़ लिया,भीम ने उसके सिर के बाल जगह-जगह से काट दिए और उस को जमकर पीटा। पर युधिष्ठिर ने दया दिखाते हुए जयद्रथ को जीवित छोड़ छोड़ दिया!!

कहा जाता है कि इसके बाद जयद्रथ ने महादेव की तपस्या की और यह वरदान प्राप्त किया कि एक दिन के लिए अर्जुन को छोड़कर वह सभी पांडवों पर भारी पड़ेगा।

महाभारत युद्ध के तेरहवें दिन जब गुरु द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह की रचना की, तो सुशर्मा नाम के राजा ने अर्जुन को बड़ी चालाकी से युद्ध भूमि के एक हिस्से में अटका लिया ताकि चक्रव्यूह से युधिस्ठिर को बन्दी बनाया जा सके।

बचे हुए पांडव दल में यह योजना बनी की अभिमन्यु चक्रव्यूह तोड़ना तो जानता है तो वह अंदर घुसते जाएगा और बाकी लोग उसके पीछे- पीछे चक्रव्यूह में घुसकर चक्रव्यूह को अंदर से तोड़ देंगे। अभिमन्यु तो अंदर चला गया पर बाकी लोगों को जयद्रथ और उसकी सेना ने किसी तरह से बाहर ही रोक दिया।

अब इसमें अभिमन्यु के चक्रव्यूह तोड़ने की क्षमता जिम्मेदार थी या बाकी लोगों को चक्रव्यूह की जानकारी नहीं होना या जयद्रथ की एक दिन की वीरता का वरदान !! यह अपनी-अपनी सोच है।

मुझे तो लगता है कि बाकी लोग चक्रव्यूह तोड़ना नहीं जानते थे इसलिए वह उसके दरवाजे पर अटक गए इसमें जयद्रथ के वरदान का कोई हाथ नहीं था। क्योंकि पाण्डवों के अलावा धृष्टधुम्न,सात्यकि जैसे योद्धा भी थे जो जयद्रथ को आसानी से हरा सकते थे वो भी असफल रहे क्योंकि चक्रव्यूह को तोड़ना नही जानते थे। ये कारनामा जयद्रथ की औकात के बाहर का था इसलिए महादेव से मिले वरदान की कहानी बन गई।

बाकी कहानी तो हम जानते ही हैं कि अभिमन्यु का वध कई लोगों ने मिलकर किया।

अब मेरे प्रश्न मेरे मन में प्रश्न यह उठता है की अर्जुन ने जयद्रथ के वध की प्रतिज्ञा क्यों की। जबकि अभिमन्यु का वध तो चक्रव्यूह के अंदर हुआ था वहां पर तो जयद्रथ उपस्थित भी नहीं था।

वास्तव में जिन महारथियों ने मिलकर अभिमन्यु का वध किया था ,वो कैसे भी हों पर युद्ध भूमि में वीर थे। उनमें से किसी को भी अभिमन्यु के वध पर गर्व तो नहीं ही हुआ होगा।

चूंकि वह बहुत ज्यादा उग्र हो रहा था कौरवों की सेना को मार रहा था इसलिए सबको मिलकर उसका वध करना पड़ा। इसलिए उस दिन किसी ने अपनी वीरता पर गाल नहीं बजाए होंगे। जबकि जयद्रथ सबको जा जाकर सुना रहा होगा कि किस तरह उसने कई पांडव योद्धाओं को चक्रव्यू के द्वार पर ही रोक लिया इसलिए अंदर के लोग अभिमन्यु का आखेट कर पाए। इसी तरह की बातें अर्जुन के कान में पड़ी। और पांडव अभिमन्यु की सहायता के लिए पीछे-पीछे जा रहे थे, लेकिन जयद्रथ ने उन्हें व्यूह के द्वार पर ही रोक दिया। जिससे अभिमन्यु को कोई सहायता नहीं पहुंच सकी। इसलिए उसने अगले दिन के सूर्यास्त से पहले जयद्रथ के वध की प्रतिज्ञा की ताकि अभिमन्यु वध का यश जयद्रथ को न मिले।

अगले दिन सारी कौरव सेना का एक ही लक्ष्य था कि जयद्रथ को किसी भी तरह शाम तक जिंदा रखो। जब दुर्योधन को अर्जुन की भीषण प्रतिज्ञा का पता चला, तो वह डर गया। द्रोणाचार्य ने जयद्रथ को बचाने के लिए तीन परतों वाला सैन्य चक्र बनाया।
सबसे आगे शकट व्यूह, बीच में चक्रव्यूह और अंत में पद्मव्यूह। जयद्रथ को इन तीनों व्यूहों के सबसे पिछले हिस्से में, यानी अर्जुन से मीलों दूर रखा गया, जहाँ हज़ारों योद्धा और हाथी उसकी सुरक्षा में तैनात थे।

अर्जुन के पास सूर्यास्त तक का ही समय था। उस दिन अर्जुन ने अपनी पूरी शक्ति झोंक दी। मार्ग में द्रोणाचार्य, दुर्योधन और कर्ण जैसे योद्धाओं ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन अर्जुन किसी से उलझने के बजाय गांडीव से रास्ता बनाते हुए आगे बढ़ते रहे। श्रीकृष्ण ने रथ को इतनी कुशलता से चलाया कि वे शाम तक जयद्रथ के करीब पहुँच गए, लेकिन तब तक सूर्य अस्ताचल की ओर झुक चुका था। उस दिन अर्जुन और बाकी पाण्डवों ने मिलकर सहस्त्रों कौरव सैनिकों को मार दिया, सर्वाधिक विनाश हुआ।

जैसे-जैसे शाम हुई, जयद्रथ और कौरव सेना में उत्साह बढ़ने लगा क्योंकि अर्जुन अपनी प्रतिज्ञा के हारने के करीब थे। तभी श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया से सूर्य को बादलों के पीछे छिपा दिया। चारों ओर अंधेरा छा गया और ऐसा लगा मानो सूर्यास्त हो गया हो। यह देख कौरव सेना खुशी से झूम उठी। अर्जुन ने गांडीव नीचे रख दिया और अग्नि समाधि की तैयारी करने लगे।

जयद्रथ, जो अब तक डरा हुआ छिपा था, अर्जुन को जलता हुआ देखने की उत्सुकता में सबसे आगे निकल आया और अट्टहास (ज़ोर से हंसना) करने लगा।

जैसे ही जयद्रथ अर्जुन के ठीक सामने आया, श्रीकृष्ण ने बादलों को हटा दिया और सूर्य फिर से चमकने लगा। अभी सूर्यास्त नहीं हुआ था! श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा–

“पार्थ! सूर्य अभी अस्त नहीं हुआ है। वह देखो जयद्रथ तुम्हारे सामने खड़ा है। उठाओ अपना गांडीव और इसका मस्तक धड़ से अलग कर दो!” अंततः जयद्रथ भी मारा गया।

जयद्रथ को मारना इतना सरल नहीं था। उसके पिता वृद्धक्षत्र ने उसे वरदान दिया था कि “जो भी जयद्रथ का मस्तक पृथ्वी पर गिराएगा, उसके अपने सिर के भी सौ टुकड़े हो जाएंगे।”
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को निर्देश दिया कि बाण इस प्रकार चलाओ कि जयद्रथ का सिर सीधे उसके पिता की गोद में जाकर गिरे, जो पास के ही आश्रम में तपस्या कर रहे थे। अर्जुन ने वैसा ही किया। जब वृद्धक्षत्र अपनी तपस्या से उठे, तो जयद्रथ का सिर उनकी गोद से नीचे गिर गया और उसी क्षण उनके अपने सिर के भी सौ टुकड़े हो गए।

इस तरह की प्रतिज्ञाएं हमेशा परेशानी लाती हैं, अगर सिर्फ अर्जुन और जयद्रथ का द्वंद युद्ध होता तो 15 मिनट में फैसला हो जाता पर न तो जयद्रथ इस चुनौती को स्वीकार करता न ही दुर्योधन ऐसा होने देता।

कृष्ण कभी इस तरह की प्रतिज्ञाओं के पक्ष में नही रहते थे, वो “विजिगीषु” थे मतलब विजय की इच्छा रखने वाला । अधर्मियों पर विजय सबसे बड़ा ध्येय था। मुझे तो लगता है अगर उस दिन अर्जुन जयद्रथ का वध नही कर पाता तो स्वयं श्री कृष्ण शस्त्र धारण करके युद्ध ही खत्म कर देते।

जय श्री कृष्णा 🙏🏻À

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जब जयद्रथ को मारने की प्रतिज्ञा अर्जुन कर लेते हैं कि सूर्यास्त तक नहीं मारा तो अग्नि समाधी ले लूंगा!!

तो आचार्य द्रोण कमलव्यूह के अंदर जयद्रथ को छुपा देते हैं जिसका आकर 32 कोस का था। जाहिर है वह उस तक कैसे पहुँचते ! जयद्रथ की सुरक्षा में बड़े बड़े वीर तैनात थे।

भगवान कृष्ण बोले, अर्जुन तुम रास्ता साफ करो मैं रथ ले चलता हूँ। संध्या हो आई अब भी 12 कोस रह गया ।

कृष्ण रथ से उतर गये ! अर्जुन ने पूछा, “केशव यह क्या ?”

कृष्ण ने कहा अश्व थक गये हैं। आगे बोलते हुये भगवान कृष्ण जो बोले वह ध्यान देने योग्य है…..

“अर्जुन कदाचित तुमने मेरे उपदेश पर ध्यान नहीं दिया था जो युद्ध के शुरू में मैंने दिया था ! तुम प्रतिज्ञा करने वाले होते कौन हो ? तुम तो निमित्त हो, यदि तुम प्रतिज्ञा न किये होते तो अब तक जयद्रथ को मार देते। तुम्हारा ध्यान एक तरफ सूर्य पर है दूसरी तरफ जयद्रथ पर। इसलिये तुम्हारे निशाने चूक रहें हैं। ऐसा लक्ष्य तय कर दिये कि असफल होने पर तुम्हें ही विनष्ट कर देगा…. यह डर ही तुम्हें हरा देगा।”

भगवान के वचन बड़े सारगर्भित हैं। मुझे नहीं लगता आज तक किसी ने इतनी सुंदर यथार्थ बात की हो ! कई संदर्भों में बात हो सकती है, लेकिन वर्तमान में देखिये सब प्रतिज्ञाबद्ध हो रहे हैं…

धारा 370 हटा दो तभी समर्थन करेंगे !

पाकिस्तान पर हमला कर दो… तभी समर्थन करेंगे !

राममंदिर बना दो… तभी समर्थन करेंगे !

नेतृत्व सक्षम है किसी प्रतिज्ञा की आवश्यकता क्या है ? निश्चित ही दंडात्मक कार्य होगा और हो रहा है। यह ठीक है कि इस समय भावना प्रबल है परंतु इसी समय सुनियोजित तरीके से काम करने की आवश्यकता है। जो विरोधी हैं वह भी यही ढाल बना रहे हैं। फिलहाल उनसे न 370 से मतलब है न राम मंदिर से।

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥2- 31॥

अपने खुद के धर्म से तुम्हें हिलना नहीं चाहिये क्योंकि न्याय के लिये किये गये युद्ध से बढ़कर एक क्षत्रिय के लिये कुछ नहीं है||

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥2- 38॥

सुख दुख को, लाभ हानि को, जय और हार को एक सा देखते हुए ही युद्ध करो। एसा करते हुए तुम्हें पाप नहीं मिलेगा||

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥2- 33॥

लेकिन यदि तुम यह न्याय युद्ध नहीं करोगे, तो अपने धर्म और यश की हानि करोगे और पाप प्राप्त करोगे||

इसलिए बाकी सब चिंतन छोङकर, निस्संकोच योग्य एवं सक्षम नेतृत्व को ही चुनें, यही इस धर्मयुद्ध में आप सभी का आसन्न धर्म है , तथा इसी में राष्ट्र हित एवं धर्म हित सन्निहित है।

साभार

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जय हो योगेश्वर श्री कृष्ण महाराज आपकी लीला अपरंपार है
अभिमन्यु को मारा तो साथ महारथियों ने था लेकिन जब वह जमीन पर गिर गए तो जय रथ ने उसका अपमान करते हुए सर पर पीछे से वार किया यही वह बात थी की अर्जुन ने प्रतिज्ञा की राधे राधे

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बहुत ज्ञान वर्धक सनातन इतिहास का वर्णन किया है धन्यवाद। लेकिन मुझे लगता है कि जयद्रथ को शिव जी के वरदान का भी पूरा लाभ मिला होगा। माना कि अर्जुन के सिवा दूसरे पांडवों को भी चक्रव्यूह का ज्ञान नहीं था, लेकिन दूसरी और द्रोणाचार्य के अलावा कौरवों में जरासंध आदि को भी चक्रव्यूह का ज्ञान नहीं था। पांडवों में केवल बीर अभिमन्यु ही चक्रव्यूह को भेद कर अंदर जा पाया, लेकिन बाकी पांडव महारथियों को पता था कि अभिमन्यु अभी बालक है और इस स्थिति में खास करके भीम चाहे चक्रव्यूह में अंदर नहीं जा सका लेकिन यदि सीधे तौर पर जयद्रथ से मुकाबला हुआ तो भीम उसे मार सकते थे, क्योंकि द्रोणाचार्य दुर्योधन, कर्ण,  आदि तो सब योद्धा चक्रव्यूह के आठवें द्वार के केंद्र में थे, कृपाचार्य, शल्य, अश्वत्थामा आदी भी भीतर थे, तो इस स्थिति में भीम ने अपना सारा बल मुख्य द्वार पर खड़े महारथियों पर लगाना था, लेकिन किसी भी कौरव का वध नहीं हो सका इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि शायद महादेव के वरदान से ही जयद्रथ उस दिन जीवित रहा होगा।
जय श्री राधे कृष्ण।