Posted in राजनीति भारत की - Rajniti Bharat ki

50 साल पुराना हिसाब… और जवाब ऐसा कि दुनिया देखती रह गई।

दोस्तों, ये कोई साधारण कूटनीतिक घटना नहीं है,

ये उस अपमान की कहानी है

जो भारत ने दशकों तक याद रखा…

और सही वक्त आने पर सूद समेत चुकाया।

ज़रा पीछे चलिए—साल था 1969।

भारत की प्रधानमंत्री थीं इंदिरा गांधी।

उन्होंने अपने सबसे भरोसेमंद सहयोगी

फखरुद्दीन अली अहमद को

OIC की बैठक में विशेष दूत बनाकर भेजा।

47 देशों का संगठन,

जिसमें 40 से ज़्यादा मुस्लिम बहुल राष्ट्र थे।

भारत को आमंत्रण मिला—

लेकिन वो आमंत्रण मंज़िल तक पहुँचा ही नहीं।

पाकिस्तान ने दबाव बनाया…

और पूरी इस्लामिक दुनिया झुक गई।

भारत का न्योता रद्द हुआ।

और फखरुद्दीन साहब

खाली हाथ, खामोश लौट आए।

ये सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं,

उस दौर के भारत की बेइज्जती थी।

दुनिया ने देखा—

भारत बोल रहा था,

लेकिन सुना कोई नहीं।

अब तस्वीर बदलती है।

इतिहास ने करवट ली…

साल आया 2019।

प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी।

और भारत की रीढ़ सीधी खड़ी थी।

वही OIC—

इस बार खुद भारत से आग्रह करता है।

विदेश मंत्रियों की बैठक में।

सिर्फ बुलाया नहीं गया…

सम्मान के साथ बुलाया गया।

पाकिस्तान फिर तड़पा।

फिर विरोध किया।

फिर धमकियाँ दीं।

लेकिन इस बार—

कोई नहीं झुका।

OIC ने पाकिस्तान को अनसुना किया।

और भारत को मंच के केंद्र में बैठाया।

अब असली मास्टरस्ट्रोक देखिए।

मोदी जी ने वहाँ भेजा

सुषमा स्वराज को—

एक नेता नहीं,

एक विचार…

एक आत्मविश्वास।

सुषमा जी ने भाषण दिया,

और वो भाषण नहीं था—

भारत की आत्मा थी।

ऋग्वेद के श्लोक गूंजे।

स्वामी विवेकानंद के विचार चमके।

गुरु नानक देव जी की शिक्षाएँ बही।

हिंदू…

मुस्लिम…

सिख—

तीनों का संदेश एक था—

शांति, संवाद और सम्मान।

नतीजा?

57 देशों के प्रतिनिधि

खड़े होकर ताली बजा रहे थे।

स्टैंडिंग ओवेशन।

पूरी सभा गूंज रही थी।

वही OIC

जो 50 साल पहले

पाकिस्तान के इशारे पर

भारत को बाहर कर चुकी थी…

आज उसी पाकिस्तान को

कोने में खड़ा देख रही थी।

भारत सिर्फ शामिल नहीं हुआ—

भारत छा गया।

यही फर्क होता है।

कमज़ोर नेतृत्व अपमान सहता है।

मज़बूत नेतृत्व

इतिहास का हिसाब चुकाता है।

आज भारत की आवाज़

सिर्फ सुनी नहीं जाती—

सम्मान से सुनी जाती है।

अब आप बताइए👇

👉 क्या इसे बदला कहेंगे या न्याय?

👉 क्या आज का भारत 1969 वाला भारत है?

👉 क्या यही आत्मसम्मान नहीं है जिसकी हमें तलाश थी?

लिखिए, खुलकर लिखिए।

सहमति हो या असहमति—

कमेंट में बताइए।

और अगर सीना चौड़ा हुआ हो…

तो शेयर कीजिए।

जय हिंद 🇮🇳

जय भारत ✊

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक दिन मैं तोते का बच्चा खरीद कर घर ले आया. उस के खानेपीने के लिए 2 कटोरियां पिंजरे में रख दीं. नयानया कैदी था इसलिए अकसर चुप ही रहता था. हां, कभीकभी टें…टें की आवाज में चीखने लगता.

घर के लोग कभीकभी उस निर्दोष कैदी को छेड़ कर आनंद ले लेते. लेकिन खाने के वक्त उसे भी खाना और पानी बड़े प्यार से देते थे. वह 1-2 कौर कुटकुटा कर बाकी छोड़ देता और टें…टें शुरू कर देता. फिर चुपचाप सीखचों से बाहर देखता रहता.

उसे रोज इनसानी भाषा बोलने का अभ्यास कराया जाता. पहले तो वह ‘हं…हं’ कहता था जिस से उस की समझ में न आने और आश्चर्य का भाव जाहिर होता पर धीरेधीरे वह आमाम…आमाम कहने लगा.

अब वह रोज के समय पर खाना या पानी न मिलने पर कटोरी मुंह से गिरा कर संकेत भी करने लगा, फिर भी कभीकभी वह बड़ा उदास बैठा रहता और छेड़ने पर भी ऐसा प्रतिरोध करता जैसे चिंतन में बाधा पड़ने पर कोई मनीषी क्रोध जाहिर कर फिर चिंतन में लीन हो जाता है.

एक दिन तोतों का एक बड़ा झुंड हमारे आंगन के पेड़ों पर आ बैठा, उन की टें…टें से सारा आंगन गूंज उठा. मैं ने देखा कि उन की आवाज सुनते ही पिंजरे में मानो भूचाल आ गया. पंखों की निरंतर फड़फड़ाहट, टें…टें की चीखों और चोंच के क्रुद्ध आघातों से वह पिंजरे के सीखचों को जैसे उखाड़ फेंकना चाहता था. उस के पंखों के टुकड़े हवा में बिखर रहे थे. चोंच लहूलुहान हो गई थी. फिर भी वह उस कैद से किसी तरह मुक्त होना चाहता था. झुंड के तोते भी उसे आवाज दे कर प्रोत्साहित करते से लग रहे थे.

झुंड के जाने के बाद उस का उफान कुछ शांत जरूर हो गया था लेकिन क्षतविक्षत उस कैदी की आंखों में गुस्से की लाल धारियां बहुत देर तक दिखाई देती रहीं. उस की इस बेचारगी ने घर के लोगों को भी विचलित कर दिया और वे उसे मुक्त करने की बात करने लगे, लेकिन बाद में बात आईगई हो गई.

कुछ दिनों बाद की बात है. एक दिन मैं ने इस अनुमान से उस का पिंजरा खोल दिया कि शायद वह उड़ना भूल गया होगा, द्वार खुला. वह धीरेधीरे पिंजरे से बाहर आया. एक क्षण रुक कर उस ने फुरकी ली और आंगन की मुंडेर पर जा बैठा. उस के पंखों और पैरों में लड़खड़ाहट थी. फिर भी वह अपनी स्वाभाविक टें…टें के साथ एक डाल से दूसरी डाल पर फुदकता जा रहा था. उस के बाद वह पहाड़ी, सीढ़ीदार खेतों पर बैठताउड़ता हुआ घर से दूर होने लगा.

अपनी भूल पर पछताता मैं, और गांव भर के बच्चे, तोते के पीछेपीछे उसे पुचकार कर बुलाते जा रहे थे और वह हम से दूर होता जा रहा था. मैं ने गौर किया कि उस की उड़ान में और तोतों जैसी फुरती नहीं थी. उस की इस कमी को लक्ष्य कर के मुझे शंका होने लगी कि अगर वह लौटा नहीं तो न तो अपने साथियों के साथ खुले आकाश में उड़ पाएगा और न ही अपना दाना जुटा पाएगा.

तोते को भी जैसे अपनी लड़खड़ाहट का एहसास हो चुका था. इसीलिए कुछ दूर जाने पर वह एक पेड़ की डाल पर बैठा ही रह गया और उसे पुचकारते हए मैं उस के पास पहुंचा तो उस ने भी डरतेझिझकते अपनेआप को मेरे हवाले कर दिया.

काश, उस ने अपनी लड़खड़ाहट को अपनी कमजोरी न मान लिया होता तो वह उसी दिन नीलगगन का उन्मुक्त पंछी होता. मगर वह अपनी लड़खड़ाहट से घबरा कर हिम्मत हार बैठा और फिर से पिंजरे का पंछी हो कर रह गया.

करीब साल भर के बाद, एक दिन फिर उस के उड़ने की जांच हुई. अब की बार खुले में पिंजरा खोलने का जोखिम नहीं लिया गया. घर की बैठक में 2 बड़ी जालीदार खिड़कियों को छोड़ कर बाकी रास्ते बंद कर दिए गए. पिंजरा खोला गया. कुछ दूर खड़े हो कर हम सबउसे ही देखने लगे. पहले वह खुले द्वार की ओर बढ़ा. फिर रुक कर गौर से उसे देखने लगा.

उस ने एक फुरकी ली लेकिन द्वार की ओर नहीं बढ़ा. हमें लगा कि हमारे डर से वह बाहर नहीं आ रहा है. हम सब ओट में हो कर उसे देखने लगे. लेकिन वह दरवाजे की तरफ फिर भी नहीं बढ़ा. कुछ देर बाद वह दरवाजे की ओर बढ़ा जरूर लेकिन एक निगाह बाहर डाल कर फिर पिंजरे में मुड़ गया. फिर पिंजरे से निकल कर बाहर आया. हम सब उत्सुकता से उसे ही देख रहे थे. उस ने एक लंबी फुरकी ली, जैसे उड़ने से पहले पंखों को तोल रहा हो. वह पहली मुक्ति के समय की अपनी बेबसी को शायद भूल गया था.

उस ने 2-3 जगह अपने पंखों को चोंच से खुजलाया और झटके से पंखों को फैलाया कि एक ही उड़ान में वहां से फुर्र हो जाए लेकिन पंख केवल फड़फड़ा कर रह गए. वह चकित था. उस ने एक उड़ान भर कर पास के पीढ़े तक पहुंचना चाहा, लेकिन किनारे तक पहुंचने से पहले ही जमीन पर गिर पड़ा और फड़फड़ाने लगा. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि उसे हो क्या गया है. वह बारबार उड़ने की कोशिश करता और हर बार मुंह की खाता.

अंत में, थकाहारा, पिंजरे की परिक्रमा करने के बाद वह द्वार पर आ रुका. उस ने एक निराश नजर अपने चारों ओर डाली और सिर झुका कर धीरेधीरे पिंजरे के अंदर चला गया. मुड़ कर एक बार फिर ललचाई नजरों से उस ने पिंजरे के खुले द्वार को निहारा और हताशा से मुंह फेर लिया. पिंजरे में अपनी चोंच को पंखों के बीच छिपा कर आंख मूंद खामोश बैठ गया. अब चाह कर भी वह उस दिन पिंजरे को छोड़ कर नहीं जा सकता था.

वह शायद पछता रहा था कि मैं ने उस दिन उड़ जाने का मौका क्यों खो दिया. काश, उस दिन थोड़ी हिम्मत कर के मैं उड़ गया होता तो फिर चाहे मेरा जो होता, इस गुलामी से लाख गुना बेहतर होता, पर अब क्या करूं? उस ने मान लिया कि मुक्त उड़ान का, खुले आकाश का, बागों और खेतों की सैर का, प्रकृति की ममतामयी गोद का और नन्हे से अपने घोंसले का उस का सपना भी उसी की तरह इस पिंजरे में कैद हो कर रह जाएगा और एक दिन शायद उसी के साथ दफन भी हो जाएगा.

मुझे लगा जैसे आज उस का रोमरोम रो रहा है और वह पूरी मानव जाति को कोसते हुए कह रहा है:

‘यह आदमी नामक प्राणी कितना स्वार्थी है. खुद तो आजाद रहना चाहता है पर आजाद पंछियों को कैद कर के रखता है. ऊपर से हुक्म चलाता है, यह जताने के लिए कि कोई ऐसा भी है जो उस के इशारों पर नाचता है. मुझे कैद कर दिया पिंजरे में. ऊपर से हुक्म देता है, यह बोलो, वह बोलो. बोल दिया तो ‘शाबाश’ कहेगा, लाल फल खाने को देगा. न बोलो तो डांट पिलाएगा.

‘मुझे नहीं सीखनी इनसान की भाषा. खुद तो बोलबोल कर इनसानों ने इनसानियत का सत्यानाश कर रखा है. और हमें उन के बोल बोलने की सीख देते हैं. कहां बोलना है, कैसे बोलना है और कितना बोलना है यह इनसान अभी तक समझ नहीं पाया. इसे इनसान समझ लेता तो बहुत से दंगेफसाद, झगड़े और उपद्रव खत्म हो जाते.

‘चला है मुझे सिखाने, मेरी चुप्पी से ही कुछ सीख लेता कि दर्द अकेले ही सहना पड़ता है. फिर चीखपुकार क्यों? इतना भी इनसान की समझ में नहीं आता. बहुत श्रेष्ठ समझता है अपनेआप को. शौक के नाम पर पशुपक्षियों को कैद कर के उन पर हुक्म चलाता है और कहता है ‘पाल’ रखा है.

‘कुत्तेबिल्ली इसलिए पालता है कि उन पर धौंस जमा सके. दुनिया को दिखाना चाहता है कि देखो, ये कैसे मेरा हुक्म बजा लाते हैं. कैसे मेरे इशारों पर जीतेमरते हैं. हुक्म चलाने की, शासन करने की, अपनी आदम इच्छा को आदमी न जाने कब काबू कर पाएगा? इसीलिए तो निरंकुश घूम रहा है सारी सृष्टि में.

‘इनसान मिलजुल कर क्या खाक रहेगा, जबकि इसे दूसरा कोई ऐसा चाहिए जिस पर यह हुक्म चलाए. जब तक लोग हैं तो लोगों पर राज करता है. लोग न मिलें तो हम पशुपक्षियों पर रौब गांठता है. जब लोगों ने हुक्म मानने से यह कहते हुए मना कर दिया कि जैसे तुम, वैसे हम. तो फिर तुम कौन होते हो हम पर राज करने वाले? तब शामत हम सीधेसादे पशुपक्षियों पर आई. किसी ने मेरी बिरादरी को पिंजरे में डाला तो किसी ने प्यारी मैना को. किसी ने बंदर को धर पकड़ा तो किसी ने रीछ की नाक में नकेल डाल दी.

‘इनसान है कि हमें अपने इशारों पर नचाए जा रहा है. हमें नाचना है. हमारी मजबूरी है कि हम इनसान से कमजोर हैं. हमारे पास इनसान जैसा शरीर नहीं. हमारे पास आदमी जैसा फितरती दिमाग नहीं. आदमी जैसा सख्त दिल नहीं. हम आदमी जैसे मुंहजोर नहीं. इसीलिए हम बेबस हैं, लाचार हैं और इनसान हम पर अत्याचार करता चला आ रहा है.

काश, इनसान में यह चेतना आ जाए कि वह किसी को गुलाम बनाए ही क्यों? खुद भी आजाद रहे और दूसरे प्राणियों को भी आजाद रहने दे. जैसेजैसे ऐसा होता जाएगा वैसेवैसे यह दुनिया सुघड़ होती जाएगी, सुंदर होती जाएगी, सरस होती जाएगी. जब आदमी के ऊपर न तो किसी का शासन होगा और न ही आदमी किसी पर शासन करेगा तब उस की समझ में आएगा कि आजाद रहने और आजाद रहने देने का आनंद क्या है. बंद आकाश और खुले आकाश का अंतर क्या है? तब आदमी महसूस करेगा कि जब वह हम पशुपक्षियों को अपना गुलाम बनाता है तो हम पर और हमारे दिल पर क्या गुजरती है.’

तोते की टें…टें की आवाज ने मेरी तंद्रा भंग कर दी. मैं झटके से उठा. खूंटी पर से तोते का पिंजरा उतारा और चल पड़ा झुरमुट वाले खेतों की ओर.

खेत शुरू हो गए थे. पकी फसल की बालियां खाने के लिए हरे चिकने तोते झुरमुट से खेतों तक उड़ान भरते और चोंच में अनाज की बाली लिए लौटते. झुरमुट और खेत दोनों में उन के टें…टें के स्वर छाए थे. पिंजरे का तोता भी अब चहकने लगा था.

मैं रुक गया और पिंजरे को अपने चेहरे के सामने ले आया और ‘पट्टूपट्टू’ पुकारने लगा. वह पिंजरे में इधर से उधर, उधर से इधर व्याकुलता से घूमता जा रहा था. बीचबीच में पंख भी फड़फड़ाता जाता. उस में अप्रत्याशित चपलता आ गई थी. शायद यह दूसरे तोतों की आवाज का करिश्मा था जो वह मुक्ति के लिए आतुर हो रहा था.

मैं ने ज्यादा देर करना ठीक नहीं समझा. पिंजरे का द्वार झुरमुटों की तरफ कर के खोला और प्यार से बोला, ‘‘जा, उड़ जा. जा, शाबाश, जा.’’

वह सतर्क सा द्वार तक आया. गरदन बाहर निकाल कर जाने क्या सूंघा, पंख फड़फड़ाए और उड़ गया. एक छोटी सी उड़ान. वह सामने के पत्थर पर जा टिका. एक क्षण वहां रुक कर पंख फड़फड़ाए और फिर उडान ली. यह उड़ान, पहली उड़ान से कुछ लंबी थी.

अब वह एक झाड़ी पर जा बैठा. उस के बाद उड़ा तो एक जवान पेड़ की लचकदार डाल पर जा बैठा. उस के बैठते ही डाल झूलने लगी. उस ने 1-2 झूले खाए और फिर यह जा, वह जा, तोतों के झुंड में शामिल हो गया.

मैं ने संतोष की सांस ली.

लौटने लगा तो हाथ में खाली पिंजरे की तरफ ध्यान गया. एक पल पिंजरे को देखा और विचार कौंधा कि सारे खुराफात की जड़ तो यह पिंजरा ही है. यह रहेगा, तो न जाने कब किस पक्षी को कैद करने का लालच मन में आ जाए.

मैं ने घाटी की ओर एक सरसरी नजर डाली और पिंजरे को टांगने वाले हुक से पकड़ कर हाथ में तोलते हुए एक ही झटके से उसे घाटी की तरफ उछाल दिया. पहाड़ी ढलान पर शोर से लुढ़कता पिंजरा जल्दी ही मेरी आंखों से ओझल हो गया.

घर लौटते समय मैं खुद को ऐसा हलका महसूस कर रहा था जैसे मेरे भी पंख उग आए हों. 

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#मुल्लानसरुद्दीन: “हमारे पास कितने गुर्दे हैं?”
#जाटबुद्धि:  “चार!”।

#मुल्लानसरुद्दीन: “चार? हाहा,😁😁😁

“मुल्ला उन लोगों में से एक थे, जिन्हे अपने साथियों की गलतियों को उठाकर और उनका मनोबल गिराने में आनंद आता है।
#मुल्लानसरुद्दीन: (जाट बुद्धि को target करके, दूसरे साथी से बोला) “घास का एक बंडल लाओ, क्योंकि हमारे पास कमरे में एक गधा है,”

#जाटबुद्धि: “और मेरे लिए एक कॉफी!”, 

जाटबुद्धि ने कहकर मानो थप्पड़ मार दिया। ….मुल्ला गुस्से से उबल पड़ा….

कक्ष से बाहर निकलते समय, जाट बुद्धि में अभी भी अहंकारी मुल्ला को ठीक करने का पर्याप्त दुस्साहस था:…वह समझाते हुए बोला

#जाटबुद्धि: “तुमने मुझसे पूछा, कि हमारे पास कितने गुर्दे हैं। हमारे पास चार हैं: दो मेरे और दो तेरे। ‘”हमारे पास” यह वाक्यांश ही बहुवचन के लिए प्रयुक्त होता है। पर तेरी समझ दाढ़ी के बोझ में दब गई….इसलिए घास का आनंद लें।”

जीवन ज्ञान से कहीं अधिक समझ की मांग करता है। कभी-कभी अहंकारी लोग, थोड़ा अधिक पढ़ लिखकर मद में फूल जाते हैं। क्योंकि उनके पास थोड़ा अधिक डाटा और इनफॉर्मेशन है, तो उन्हें लगता है,  कि उन्हें दूसरों को कम आंकने का अधिकार है।

मनुष्य का सबसे उत्तम मित्र तर्क है। इसे हमेशा जिंदा रखें।

(उपरोक्त कहानी में उपयोग किए गए किरदारों के नाम की संप्रदाय के द्योतक नहीं हैं, अपितु कथानक मात्र हैं।)

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सनातन गोस्वामी जी मथुरा में एक चौबे के घर मधुकरी के लिए जाया करते थे। उस चौबे की पत्नी परम भक्त थी और श्री मदन मोहन जी की अनन्य उपासिका थी। उनके घर में बाल-भाव से मदन मोहन भगवान स्वयं विराजमान थे। वास्तव में, सनातन जी प्रतिदिन मधुकरी के बहाने उन्हीं मदन मोहन जी के दर्शन करने जाया करते थे।
मदन मोहन जी तो ग्वार ग्वाले की तरह सरल थे — उन्हें आचार-विचार की औपचारिकता का क्या ज्ञान! वे चौबे के पुत्र के साथ ही एक ही पात्र में भोजन कर लेते थे। यह देखकर सनातन जी को बड़ा आश्चर्य हुआ — “यह मदन मोहन तो बड़े ही विचित्र हैं!”
एक दिन सनातन जी ने आग्रहपूर्वक मधुकरी में मदन मोहन जी का उच्छिष्ट (झूठा) अन्न माँगा। चौबे की पत्नी ने प्रेम से स्वीकार कर उन्हें वह प्रसाद दे दिया। बस फिर क्या था — उस माखन-चोर की लपलपाती जिह्वा से स्पर्शित अन्न का स्वाद उन्हें ऐसा भाया कि वे नित्य उसी प्रसाद को लेने आने लगे।
एक दिन मदन मोहन जी ने स्वप्न में दर्शन देकर कहा, “बाबा! तुम रोज इतनी दूर से आते हो। इस मथुरा नगर में हमें अब ऊब सी लगने लगी है। तुम चौबे से हमें माँग कर अपने साथ जंगल ले चलो — हम भी तुम्हारे साथ रहना चाहते हैं।”
उसी रात चौबे को भी स्वप्न हुआ कि वे मदन मोहन जी को सनातन बाबा को दान कर दें।
अगले दिन सनातन जी चौबे के घर पहुँचे और बोले, “मदन मोहन अब मेरे साथ जंगल में रहना चाहते हैं, आपकी क्या आज्ञा है?”
चौबे की पत्नी ने प्रेमयुक्त रोष में कहा, “इसकी तो आदत ही ऐसी है — जो अपनी सगी माँ का न हुआ, वह मेरा क्या होगा!” इतना कहकर, आँखों में आँसू भर, उन्होंने ठाकुर जी को सनातन जी को सौंप दिया।
सनातन जी मदन मोहन जी को लेकर यमुना किनारे सूर्यघाट के पास एक रमणीय टीले पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने फूस की एक झोपड़ी बनाकर ठाकुर जी को स्थापित किया और पूजा आरंभ की। वे घर-घर से चुटकी-चुटकी आटा माँगकर लाते और उसी से बिना नमक की सूखी बाटी बनाकर भोग लगाते।
एक दिन मदन मोहन जी ने मुँह बनाकर कहा, “बाबा! यह रोज-रोज बिना नमक की बाटी हमारे गले से नहीं उतरती — थोड़ा नमक भी लाया करो।”
सनातन जी झुँझलाकर बोले, “यह इल्लत मुझसे मत लगाओ! खानी हो तो ऐसी ही खाओ, नहीं तो अपने घर का रास्ता पकड़ो।”
मदन मोहन हँसकर बोले, “अरे, एक कंकड़ी नमक के लिए कौन मना करेगा!”
तब से सनातन जी आटे के साथ थोड़ा नमक भी लाने लगे।
कुछ दिन बाद मदन मोहन जी ने फिर निवेदन किया, “बाबा, ये सूखे टिक्कड़ रोज नहीं खाए जाते — थोड़ा माखन या घी भी लाया करो।”
इस बार सनातन जी ने डाँटते हुए कहा, “मेरे पास तो यही सूखा अन्न है। तुम्हें माखन-मिश्री की चट है तो किसी धनी सेठ के घर जाओ। मैं भिखारी साधु हूँ — घी-बूरा माँगने नहीं जाऊँगा। चाहो तो यमुना जल के साथ सटक लो — मिट्टी भी तो सटकते थे!”
बेचारे मदन मोहन जी मुँह बनाकर चुप हो गए।
अगले दिन एक धनिक व्यापारी वहाँ आया। उसने सनातन जी को दण्डवत प्रणाम कर कहा, “महात्मा जी! मेरा जहाज यमुना जी में अटक गया है। कृपा कर आशीर्वाद दें।”
सनातन जी बोले, “भाई, मैं कुछ नहीं जानता — इस झोपड़ी में जो बैठे हैं, उन्हीं से कहो।”
व्यापारी ने जाकर मदन मोहन जी से प्रार्थना की, और उनकी कृपा से जहाज तुरंत निकल गया।
व्यापारी अत्यंत कृतज्ञ हुआ। उसने हजारों रुपये व्यय कर वहीं मदन मोहन जी का भव्य मंदिर बनवाया और उनकी सेवा के लिए अनेक सेवक, रसोइए और व्यवस्था कर दी।
वह पावन मंदिर आज भी वृंदावन में स्थित है — जहाँ भक्तगण श्रद्धा से श्री मदन मोहन जी के दर्शन करते हैं।

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भारत का संविधान बनाने में संविधान सभा में 23 सदस्य ऐसे थे जो 1946 में पाकिस्तान बनाने के लिए मुस्लिम लीग के टिकट पर जीते थे।

लेकिन जब इन्होंने पाकिस्तान बना लिया तो उसके बाद यह बड़ी होशियारी से पाकिस्तान नहीं गए और फिर नेहरू गांधी ने इनको भारत के संविधान बनाने का ही जिम्मा दे दिया है, इन सब ने भी अपना संविधान बनाया है।

यह सिर्फ भारत में नेहरू और गांधी ही कर सकते थे कि जिनको गद्दारी का चार्ज लगाकर जेल में डालना था उनको सीधे संविधान बनाने की जिम्मेदारी दे दी। इनमें से कुछ नाम है। यह सब बाद में बहुत सारे लोग केंद्र और राज्यो में मंत्री अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के चांसलर तक बने।

मद्रास से:
१. मुहम्मद इस्माइल साहिब
२. केटीएम अहमद इब्राहिम
३. महबूब अली बेग साहिब बहादुर
४. बी. पोकर साहिब बहादुर, मुम्बई से
५. अब्दुल कादिर मोहम्मद शेख
६. अब्दुल कादिर अब्दुल अजीज खान, असम से
७. मोहम्मद सादुल्ला,
८. अब्दुर रौफ, उत्तर प्रदेश से
९ बेगम क़ुदसिया ऐज़ाज़ रसूल नवाब, हरदोई से
१० सैयद फजल-उल-हसन हसरत मोहानी, AMU से
११ नवाब इस्माइल खान, मेरठ से जो बाद में AMU के चांसलर बने
१२. जेडएच लारी, बिहार से
१३. हुसैन इमाम, गया से
१४. सैयद जफर इमाम
१५. लतिफुर रहमान
१६. मोहम्मद ताहिर

आज इनके वंशज बड़े बड़े नेता बनकर बोल रहे हैं कि हमारा भी खून शामिल है इस देश में।

सबसे बड़ा आश्चर्य तो तब हुआ जब पूरा खोजा कि इनका नाम मिल जाए तो किसी भी वेबसाइट पर किसी भी हिंदूवादी पार्टी या संगठन ने इनका नाम तक गूगल पर नहीं डाला है। खोज खोज कर नाम ढूढे हैं। हम हिंदू वादियों को विचारधारा के स्तर पर अभी बहुत काम करने की जरूरत है।मुस्लिम हमसे इस मामले में हजार गुना आगे हैं कि इन सब करतूतों के बाद भी देश में इतने बड़े देश भक्त की भी इमेज बनाये हुए है। कांग्रेस पार्टी पाकिस्तान को मुस्लिम देश बनाने के बाद भारत को भी मुस्लिम लोगों का देश बनाने की पूरी कोशिश कर रही है। अल्पसंख्यक आयोग वक्फ बोर्ड मदरसा शिक्षा मुस्लिम पर्सनल लॉ सभी कांग्रेस पार्टी की देन है।

“राष्ट्रहित सर्वोपरि” 💪💪

जय श्री राम 🙏

हर हर महादेव 🔱🙏🚩

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मगध के दरबार में चाणक्य कोई राजा नहीं थे। एक साधारण ब्राह्मण थे, लेकिन उनका दिमाग असाधारण था। जब वे धनानंद के पास देश की सुरक्षा की चिंता लेकर पहुँचे, तो उन्हें सम्मान नहीं मिला। उल्टा उन्हें बालों से पकड़कर दरबार से बाहर फेंक दिया गया।

दरबार में लोग हँस रहे थे। चाणक्य ज़मीन पर गिर पड़े। उनकी शिखा खुल गई। उस समय यह केवल अपमान नहीं था, यह मृत्यु से भी बड़ा तिरस्कार माना जाता था।

लेकिन चाणक्य ने वहाँ रोना नहीं चुना। उन्होंने अपनी बिखरी हुई शिखा को देखा और एक भयानक प्रतिज्ञा ली। जब तक नंद वंश का विनाश नहीं कर दूँगा, तब तक अपने बाल नहीं बाँधूँगा।

उन्होंने किसी सेना का इंतज़ार नहीं किया। उन्होंने किसी राजकुमार को नहीं चुना। उन्होंने एक साधारण बालक को चुना, जिसका नाम था चंद्रगुप्त।

यह कोई कहानी या फिल्म नहीं थी। यह वर्षों की कठोर साधना और प्रशिक्षण था। चाणक्य ने उस बच्चे को सिखाया कि राजनीति धर्म से नहीं, नियम से चलती है। उन्होंने उसे बताया कि शत्रु को केवल हराना काफी नहीं होता, उसे जड़ से उखाड़ना पड़ता है ताकि वह फिर सिर न उठा सके।

उन्होंने विषकन्याओं का प्रयोग किया। छल और रणनीति अपनाई। ज़हर को भी हथियार बनाया। क्योंकि वे जानते थे कि एक कमज़ोर राजा से बेहतर एक कठोर और अनुशासित व्यवस्था होती है। उनके लिए लक्ष्य भावनाओं से बड़ा था। उनका उद्देश्य था एक ऐसा राज्य खड़ा करना जो बाहरी आक्रमणों और अंदरूनी भ्रष्टाचार से बच सके।

धीरे-धीरे मगध बदलने लगा। नंद वंश गिरा और मौर्य साम्राज्य खड़ा हुआ। एक ऐसा साम्राज्य जिसने पूरे उत्तर भारत को एक ध्वज के नीचे जोड़ दिया।

लेकिन चाणक्य ने अपने लिए कोई महल नहीं माँगा। वे दरबार के बाहर एक छोटी-सी कुटिया में रहते रहे। सत्ता उनके हाथ में थी, लेकिन उन्होंने ऐश्वर्य को कभी अपना लक्ष्य नहीं बनाया।

इसी समय उन्होंने अर्थशास्त्र की रचना की।

यह पुस्तक उन लोगों के लिए नहीं थी जो महान दिखना चाहते हैं। यह उनके लिए थी जो राज्य को बचाना चाहते हैं। उन्होंने साफ लिखा कि राजा का कोई स्थायी मित्र नहीं होता। आवश्यकता पड़ने पर अपनों का भी त्याग करना पड़ता है। उन्होंने राजनीति को नैतिकता से अलग कर दिया।

उनका मानना था कि शांति तभी संभव है जब डर और अनुशासन की एक मज़बूत व्यवस्था नीचे से ऊपर तक खड़ी हो। आदर्शों से नहीं, शक्ति से स्थिरता आती है। यह उनकी कठोर लेकिन व्यावहारिक सोच थी।

चाणक्य की मृत्यु भी किसी विजय उत्सव की तरह नहीं हुई। उनके विरुद्ध साज़िश रची गई। अपने ही लोगों ने उन्हें संदेह के घेरे में ला दिया। वे नगर छोड़कर चले गए और अंत में भूख से अपने प्राण त्याग दिए।

जिस व्यक्ति ने अखंड भारत का सपना देखा, वह स्वयं अकेले मरा।

चाणक्य ने दुनिया को यह नहीं सिखाया कि अच्छा कैसे बना जाए। उन्होंने सिखाया कि प्रभावशाली कैसे बना जाए।

दुनिया उन्हीं का सम्मान करती है जो जीतना जानते हैं। कड़वी सच्चाई यह है कि लोग आपके चरित्र के बारे में तभी पूछते हैं जब आपके पास शक्ति होती है। बिना शक्ति के सच भी कमज़ोरी बन जाता है।

उन्होंने अपनी शिखा तब बाँधी, जब उनका शत्रु समाप्त हो चुका था।

यह बदला नहीं था।
यह हिसाब था।

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एक महात्माजी रात्रि के समय में ‘श्रीराम’ नाम का जाप करते हुए अपनी मस्ती में चले जा रहे थे। जाप करते हुए वे एक गहन जंगल से गुजर रहे थे। विरक्त होने के कारण वे महात्मा बार-बार देशाटन करते रहते थे। वे किसी एक स्थान में अधिक समय नहीं रहते थे। वे ईश्वर नाम प्रेमी थे। इसलिये दिन-रात उनके मुख से राम नाम जप चलता रहता था। स्वयं राम नाम का जाप करते तथा औरों को भी उसी मार्ग पर चलाते।
          महात्माजी गहन जंगल में मार्ग भूल गये थे पर अपनी मस्ती में चले जा रहे थे कि जहाँ राम ले चले वहाँ। दूर अँधेरे के बीच में बहुत सी दीपमालाएँ प्रकाशित थीं। महात्माजी उसी दिशा की ओर चलने लगे।  निकट पहुँचते ही देखा कि वटवृक्ष के पास अनेक प्रकार के वाद्ययंत्र बज रहे हैं, नाच -गान और शराब की महफ़िल जमी है। कई स्त्री पुरुष साथ में नाचते-कूदते-हँसते तथा औरों को हँसा रहे हैं। उन्हें महसूस हुआ कि वे मनुष्य नहीं प्रेतात्मा हैं।
          महात्माजी को देखकर एक प्रेत ने उनका हाथ पकड़कर कहाः ओ मनुष्य ! हमारे राजा तुझे बुलाते हैं, चल। वे मस्तभाव से राजा के पास गये जो सिंहासन पर बैठा था। वहाँ राजा के इर्द-गिर्द कुछ प्रेत खड़े थे।
          प्रेतराज ने कहाः तुम इस ओर क्यों आये ? हमारी मंडली आज मदमस्त हुई है, इस बात का तुमने विचार नहीं किया ? तुम्हें मौत का डर नहीं है ?
          अट्टहास करते हुए महात्माजी बोलेः मौत का डर ? और मुझे ? राजन् ! जिसे जीने का मोह हो उसे मौत का डर होता हैं। हम साधु लोग तो मौत को आनंद का विषय मानते हैं। यह तो देहपरिवर्तन हैं जो प्रारब्धकर्म के बिना किसी से हो नहीं सकता।
          प्रेतराजः तुम जानते हो हम कौन हैं ?
          महात्माजीः मैं अनुमान करता हूँ कि आप प्रेतात्मा हो।
          प्रेतराजः तुम जानते हो, लोग समाज हमारे नाम से काँपता हैं।
          महात्माजीः प्रेतराज ! मुझे मनुष्य में गिनने की गलती मत करना। हम जिन्दा दिखते हुए भी जीने की इच्छा से रहित, मृततुल्य हैं। यदि जिन्दा मानो तो भी आप हमें मार नहीं सकते। जीवन-मरण कर्माधीन हैं। मैं एक प्रश्न पूछ सकता हूँ ?
          महात्माजी की निर्भयता देखकर प्रेतों के राजा को आश्चर्य हुआ कि प्रेत का नाम सुनते ही मर जाने वाले मनुष्यों में एक इतनी निर्भयता से बात कर रहा हैं। सचमुच, ऐसे मनुष्य से बात करने में कोई हर्ज नहीं।
          प्रेतराज बोलाः पूछो, क्या प्रश्न है ?
          महात्माजीः प्रेतराज ! आज यहाँ आनंदोत्सव क्यों मनाया जा रहा है ?
          प्रेतराजः मेरी इकलौती कन्या, योग्य पति न मिलने के कारण अब तक कुँवारी हैं। लेकिन अब योग्य जमाई मिलने की संभावना हैं। कल उसकी शादी हैं इसलिए यह उत्सव मनाया जा रहा हैं।
          महात्माजी (हँसते हुए): “तुम्हारा जमाई कहाँ है ? मैं उसे देखना चाहता हूँ।”
          प्रेतराजः जीने की इच्छा के मोह के त्याग करने वाले महात्मा ! अभी तो वह हमारे पद (प्रेतयोनी) को प्राप्त नहीं हुआ हैं। वह इस जंगल के किनारे एक गाँव के श्रीमंत (धनवान) का पुत्र है। महादुराचारी होने के कारण वह इस समय भयानक रोग से पीड़ित है। कल संध्या के पहले उसकी मौत होगी। फिर उसकी शादी मेरी कन्या से होगी। इस लिये रात भर गीत-नृत्य और मद्यपान करके हम आनंदोत्सव मनायेंगे।
          महात्माजी वहाँ से विदा होकर श्रीराम नाम का अजपाजाप करते हुए जंगल के किनारे के गाँव में पहुँचे। उस समय सुबह हो चुकी थी। एक ग्रामीण से महात्मा नें पूछा “इस गाँव में कोई श्रीमान् का बेटा बीमार हैं ?”
          ग्रामीणः हाँ, महाराज ! नवलशा सेठ का बेटा सांकलचंद एक वर्ष से रोगग्रस्त हैं। बहुत उपचार किये पर उसका रोग ठीक नहीं होता।
          महात्माजी नवलशा सेठ के घर पहुँचे सांकलचंद की हालत गंभीर थी। अन्तिम घड़ियाँ थीं फिर भी महात्माजी को देखकर माता-पिता को आशा की किरण दिखी। उन्होंने महात्मा का स्वागत किया।
          सेठपुत्र के पलंग के निकट आकर महात्माजी रामनाम की माला जपने लगे। दोपहर होते-होते लोगों का आना-जाना बढ़ने लगा।
          महात्मा: क्यों, सांकलचंद ! अब तो ठीक हो ?
          सांकलचंद ने आँखें खोलते ही अपने सामने एक प्रतापी सन्त को देखा तो रो पड़ा। बोला “बाबाजी ! आप मेरा अंत सुधारने के लिए पधारे हो। मैंने बहुत पाप किये हैं। भगवान के दरबार में क्या मुँह दिखाऊँगा ? फिर भी आप जैसे सन्त के दर्शन हुए हैं, यह मेरे लिए शुभ संकेत हैं।” इतना बोलते ही उसकी साँस फूलने लगी, वह खाँसने लगा।
          “बेटा ! निराश न हो भगवान राम पतित पावन है। तेरी यह अन्तिम घड़ी है। अब काल से डरने का कोई कारण नहीं। खूब शांति से चित्तवृत्ति के तमाम वेग को रोककर श्रीराम नाम के जप में मन को लगा दे। जाप में लग जा। शास्त्र कहते हैं-

           चरितम्  रघुनाथस्य  शतकोटिम्  प्रविस्तरम्।
           एकैकम् अक्षरम् पूण्या महापातक नाशनम्।।

          अर्थातः सौ करोड़ शब्दों में भगवान राम के गुण गाये गये हैं। उसका एक-एक अक्षर ब्रह्महत्या आदि महापापों का नाश करने में समर्थ हैं।
          दिन ढलते ही सांकलचंद की बीमारी बढ़ने लगी। वैद्य-हकीम बुलाये गये। हीरा भस्म आदि कीमती औषधियाँ दी गयीं। किन्तु अंतिम समय आ गया यह जानकर महात्माजी ने थोड़ा नीचे झुककर उसके कान में रामनाम लेने की याद दिलायी।
          राम बोलते ही उसके प्राण पखेरू उड़ गये। लोगों ने रोना शुरु कर दिया। शमशान यात्रा की तैयारियाँ होने लगीं। मौका पाकर महात्माजी वहाँ से चल दिये। नदी तट पर आकर स्नान करके नामस्मरण करते हुए वहाँ से रवाना हुए। शाम ढल चुकी थी। फिर वे मध्यरात्रि के समय जंगल में उसी वटवृक्ष के पास पहुँचे। प्रेत समाज उपस्थित था।
          प्रेतराज सिंहासन पर हताश होकर बैठे थे। आज गीत, नृत्य, हास्य कुछ न था। चारों ओर करुण आक्रंद हो रहा था, सब प्रेत रो रहे थे।
          महात्मा ने पूछा “प्रेतराज ! कल तो यहाँ आनंदोत्सव था, आज शोक-समुद्र लहरा रहा हैं। क्या कुछ अहित हुआ हैं ?”
          प्रेतराजः हाँ भाई ! इसीलिए रो रहे हैं। हमारा सत्यानाश हो गया। मेरी बेटी की आज शादी होने वाली थी। अब वह कुँवारी रह जायेगी।
          महात्मा: प्रेतराज ! तुम्हारा जमाई तो आज मर गया हैं। फिर तुम्हारी बेटी कुँवारी क्यों रही ?
          प्रेतराज ने चिढ़कर कहाः तेरे पाप से ! मैं ही मूर्ख हूँ कि मैंने कल तुझे सब बता दिया। तूने हमारा सत्यानाश कर दिया।
          महात्मा ने नम्रभाव से कहाः मैंने आपका अहित किया यह मुझे समझ में नहीं आता। क्षमा करना, मुझे मेरी भूल बताओगे तो मैं दुबारा नहीं करूँगा।
          प्रेतराज ने जलते हृदय से कहाः यहाँ से जाकर तूने मरने वाले को नाम स्मरण का मार्ग बताया और अंत समय भी राम नाम कहलवाया। इससे उसका उद्धार हो गया और मेरी बेटी कुँवारी रह गयी।
          महात्माजीः क्या ? केवल एक बार नाम जप लेने से वह प्रेतयोनि से छूट गया ? आप सच कहते हो ?
          प्रेतराजः हाँ भाई ! जो मनुष्य राम नामजप करता हैं वह राम नामजप के प्रताप से कभी हमारी योनि को प्राप्त नहीं होता। भगवन्नाम जप में नरकोद्धारिणी शक्ति हैं।
          प्रेत के द्वारा रामनाम का यह प्रताप सुनकर महात्माजी प्रेमाश्रु बहाते हुए भाव समाधि में लीन हो गये। उनकी आँखे खुलीं तब वहाँ प्रेत-समाज नहीं था, बाल सूर्य की सुनहरी किरणें वटवृक्ष को शोभायमान कर रही थीं।

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एक चीनी डॉक्टर अमेरिका चला गया और उसे किसी अस्पताल में नौकरी नहीं मिली ! इसलिए उसने एक छोटा सा क्लिनिक खोला और एक बड़ा बोर्ड लगा दिया जिस पर लिखा था !

“20 डॉलर में इलाज – अगर ठीक नहीं हुए, तो 100 डॉलर वापस पाएँ!”

एक दिन, एक चतुर अमेरिकी वकील ने वह बोर्ड देखा ! उसने सोचा, “यह तो कोई घोटाला लग रहा है, लेकिन शायद मैं जल्दी से 100 डॉलर कमा लूँ!” वह आत्मविश्वास से भरा हुआ अंदर गया !

वकील: “डॉक्टर, टेस्ट की ताक़त चली गई है।”

डॉक्टर: “नर्स, डिब्बा 22 – उसके मुँह में तीन बूँदें।”

वकील: “उफ़! यह तो केरोसिन है!”

डॉक्टर: “बहुत बढ़िया ! आपके जुबान का टेस्ट वापस आ गया है ! इसकी कीमत 20 डॉलर होगी!”

कुछ दिनों बाद, वकील वापस आया !

वकील: “डॉक्टर, मेरी याददाश्त चली गई है ! मुझे कुछ भी याद नहीं आ रहा!”

डॉक्टर: “नर्स, डिब्बा 22 – तीन बूँदें!”

वकील: “रुको ! यह फिर से मिट्टी का तेल है!”

डॉक्टर: “वाह ! आपकी याददाश्त वापस आ गई है ! इसकी कीमत 20 डॉलर है!”

पक्के इरादे के साथ, वकील ने आखिरी बार कोशिश की !

वकील: “डॉक्टर, मेरी नज़र कमज़ोर हो रही है ! मुझे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है!”

डॉक्टर: “अरे, माफ़ करना – इसका कोई इलाज नहीं है ! यह लीजिए आपके 100 डॉलर!”

डॉक्टर ने उसे… 20 डॉलर दिए !

वकील (आँखें सिकोड़ते हुए): “अरे, ज़रा रुको – यह सिर्फ़ 20 डॉलर है!”

डॉक्टर: “वाह! आपकी नज़र वापस आ गई है ! इसकी कीमत 20 डॉलर होगी!”

वकील अहंकार लेकर आया था ! डॉक्टर व्यवस्थाओं के साथ आया था !
एक आदमी चतुराई पर निर्भर था ! दूसरा अपने बनाए ढाँचे पर !

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पहली बार जब चिड़िया उड़ने की कोशिश करती है,,तो उसे अपने पंखों पर बड़ा अभिमान होता है,,,

जिस वृक्ष की डालियों पर बैठकर उसने अपना संतुलन बनाना सीखा,,,

वही उस चिड़िया का पहला सहारा था, उसी वृक्ष ने उसे गिरकर संभलना सिखाया, उसी वृक्ष ने उसे हवा का सामना करना सिखाया,,,,

लेकिन जैसे-जैसे चिड़िया आसमान में ऊँची उड़ान भरने लगती है, नीचे खड़ा अपना पालनहार वही वृक्ष उसे छोटा दिखाई देने लगता है,,,

और वो गलत फहमी का शिकार हो जाती है उसे लगता है कि अब उसे किसी के सहारे की जरूरत नहीं, वह अपने दम पर अब कुछ भी कर सकती है,,

लेकिन जैसे जैसे समय बीतता है, उड़ान और ज्यादा लंबी होती है, और साथ साथ थकान भी बढ़ती है,, समय के साथ साथ मौसम भी बदलते है,,

तब उस चिड़िया का हकीकत से सामना होता है,,

उसे एहसास होता है की आसमान में सिर्फ उड़ान ही है और कहीं ठहराव नजर नही आता,,

उसे थकान दूर करने के लिए और सुरक्षित रहने के लिए,, फिर उसे किसी वृक्ष की जरूरत पड़ती ही है,,

मगर जब वह लौटती है,, तो ज्यादातर कहानियों मे अक्सर परिस्थितियाँ बदल चुकी होती है,,

इसलिए जड़ों को भूल जाना बेशक आसान है,इसमे कोई शक नही पर उनकी आवश्यकता कभी समाप्त नहीं होती,,

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रामायण की भूली हुई तपस्विनी : भरत की पत्नी माण्डवी

रामायण में जब भी त्याग की बात होती है,
हम राम को स्मरण करते हैं।
भ्रातृ-प्रेम की बात हो, तो भरत का नाम लिया जाता है।
पर क्या कभी किसी ने उस स्त्री को याद किया
जिसने भरत के साथ नहीं, भरत के त्याग के साथ जीवन बिताया?

वह थीं — माण्डवी।



कौन थीं माण्डवी?

माण्डवी, मिथिला के राजा जनक के भाई कुशध्वज की पुत्री थीं।
सीता की छोटी बहन, और भरत की पत्नी।

राजकुमारी होते हुए भी
उनका जीवन राजसी नहीं था —
वह संयम, प्रतीक्षा और मौन का जीवन था।


भरत का त्याग — और माण्डवी का मौन

जब राम वन गए,
भरत ने राजसिंहासन ठुकरा दिया।
उन्होंने राम की खड़ाऊँ को ही राजा मान लिया।

इतिहास भरत के इस निर्णय को पूजता है।
पर इतिहास यह भूल जाता है कि—

👉 इस निर्णय की पहली साक्षी और सहभागी माण्डवी थीं।
• वह चाहतीं तो रानी बन सकती थीं
• चाहतीं तो प्रश्न कर सकती थीं
• चाहतीं तो कह सकती थीं —
“यह मेरा भी जीवन है”

पर उन्होंने कुछ नहीं कहा।


राजमहल में नहीं, प्रतीक्षा में जीवन

माण्डवी ने न तो वनवास लिया,
न ही सिंहासन।

उन्होंने चुना —
• तपस्विनी का जीवन
• प्रतीक्षा का जीवन
• ऐसा जीवन जिसमें कोई उत्सव नहीं,
कोई विजय नहीं,
केवल मर्यादा थी।

जब भरत नंदीग्राम में कुटिया बनाकर रहते थे,
माण्डवी भी उसी जीवन को अपनाती रहीं।

उनका त्याग दृश्य नहीं था,
इसलिए वह इतिहास में दर्ज नहीं हुआ।


स्त्री का त्याग — जो शोर नहीं करता

रामायण की स्त्रियाँ रोती नहीं,
वे जलती हैं — भीतर।

सीता का दुःख दिखा,
उर्मिला का दुःख धीरे-धीरे पहचाना गया,
पर माण्डवी का दुःख?

वह तो इतना शांत था
कि किसी को सुनाई ही नहीं दिया।


किसी ग्रंथ में उनका विलाप नहीं

रामायण में माण्डवी का कोई बड़ा संवाद नहीं।
कोई आक्रोश नहीं।
कोई शिकायत नहीं।

और शायद यही कारण है कि—

इतिहास ने उन्हें महत्व नहीं दिया।

क्योंकि इतिहास अक्सर
उन्हीं को याद रखता है
जो बोलते हैं,
न कि उन्हें
जो सहते हैं।


माण्डवी — त्याग की अदृश्य धुरी

यदि भरत मर्यादा पुरुष थे,
तो माण्डवी मर्यादा की छाया थीं।

यदि भरत का त्याग आदर्श था,
तो माण्डवी का मौन आत्मबल था।

उनके बिना
भरत का निर्णय संभव नहीं था।


आज भी कोई दीप नहीं जलता उनके नाम

आज भी—
• उनके नाम पर कोई पर्व नहीं
• कोई कथा नहीं
• कोई स्मृति-दिवस नहीं

फिर भी, रामायण अधूरी है
यदि माण्डवी को भुला दिया जाए।


समापन

“इतिहास ने राजाओं को याद रखा,
पर धर्म को जीवित रखने वाली स्त्रियों को नहीं।”

माण्डवी न रोईं,
न लड़ीं,
न प्रश्न उठाए।

उन्होंने बस
धर्म को टूटने नहीं दिया।

और शायद यही सबसे बड़ा बलिदान है।

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