











सुलोचना वासुकी नाग की पुत्री और लंका के राजा रावण के पुत्र मेघनाद की पत्नी थी। लक्ष्मण के साथ हुए एक भयंकर युद्ध में मेघनाद का वध हुआ। उसके कटे हुए शीश को भगवान श्रीराम के शिविर में लाया गया था।
अपने पति की मृत्यु का समाचार पाकर सुलोचना ने अपने ससुर रावण से राम के पास जा कर पति का शीश लाने की प्रार्थना की। किंतु रावण इसके लिए तैयार नहीं हुआ। उसने सुलोचना से कहा – कि वह स्वयं राम के पास जाकर मेघनाद का शीश ले आये। क्योंकि राम पुरुषोत्तम हैं, इसीलिए उनके पास जाने में तुम्हें किसी भी प्रकार का भय नहीं करना चाहिए।
रावण के महापराक्रमी पुत्र इन्द्रजीत (मेघनाद) का वध करने की प्रतिज्ञा लेकर लक्ष्मण जिस समय युद्ध भूमि में जाने के लिये प्रस्तुत हुए, तब राम उनसे कहते हैं – “लक्ष्मण! रण में जाकर तुम अपनी वीरता और रणकौशल से रावण-पुत्र मेघनाद का वध कर दोगे, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है।
परंतु एक बात का विशेष ध्यान रखना कि मेघनाद का मस्तक भूमि पर किसी भी प्रकार न गिरे। क्योंकि मेघनाद एक नारी-व्रत का पालक है और उसकी पत्नी परम पतिव्रता है।
ऐसी साध्वी के पति का मस्तक अगर पृथ्वी पर गिर पड़ा तो हमारी सारी सेना का ध्वंस हो जाएगा और हमें युद्ध में विजय की आशा त्याग देनी पड़ेगी। लक्ष्मण अपनी सेना लेकर चल पड़े। समरभूमि में उन्होंने वैसा ही किया। युद्ध में अपने बाणों से उन्होंने मेघनाद का मस्तक उतार लिया, पर उसे पृथ्वी पर नहीं गिरने दिया। हनुमान उस मस्तक को रघुनंदन के पास ले आये।
मेघनाद की दाहिनी भुजा आकाश में उड़ती हुई उसकी पत्नी सुलोचना के पास जाकर गिरी। सुलोचना चकित हो गयी। दूसरे ही क्षण अन्यंत दु:ख से कातर होकर विलाप करने लगी। पर उसने भुजा को स्पर्श नहीं किया। उसने सोचा, सम्भव है यह भुजा किसी अन्य व्यक्ति की हो।
ऐसी दशा में पर-पुरुष के स्पर्श का दोष मुझे लगेगा। निर्णय करने के लिये उसने भुजा से कहा – “यदि तू मेरे स्वामी की भुजा है, तो मेरे पतिव्रत की शक्ति से युद्ध का सारा वृत्तांत लिख दे। भुजा को दासी ने लेखनी पकड़ा दी। लेखिनी ने लिख दिया – “प्राणप्रिये! यह भुजा मेरी ही है।
युद्ध भूमि में श्रीराम के भाई लक्ष्मण से मेरा युद्ध हुआ। लक्ष्मण ने कई वर्षों से पत्नी, अन्न और निद्रा छोड़ रखी है। वह तेजस्वी तथा समस्त दैवी गुणों से सम्पन्न है। संग्राम में उनके साथ मेरी एक नहीं चली। अन्त में उन्हीं के बाणों से विद्ध होने से मेरा प्राणान्त हो गया। मेरा शीश श्रीराम के पास है।
पति की भुजा-लिखित पंक्तियां पढ़ते ही सुलोचना व्याकुल हो गयी। पुत्र-वधु के विलाप को सुनकर लंकापति रावण ने आकर कहा – ‘शोक न कर पुत्री।
प्रात: होते ही सहस्त्रों मस्तक मेरे बाणों से कट-कट कर पृथ्वी पर लोट जाऐंगे। मैं रक्त की नदियां बहा दूंगा। करुण चीत्कार करती हुई सुलोचना बोली – “पर इससे मेरा क्या लाभ होगा, पिताजी। सहस्त्रों नहीं करोड़ों शीश भी मेरे स्वामी के शीश के अभाव की पूर्ती नहीं कर सकेंगे। सुलोचना ने निश्चय किया कि ‘मुझे अब सती हो जाना चाहिए।’
किंतु पति का शव तो राम-दल में पड़ा हुआ था। फिर वह कैसे सती होती? जब अपने ससुर रावण से उसने अपना अभिप्राय कहकर अपने पति का शव मँगवाने के लिए कहा, तब रावण ने उत्तर दिया- “देवी! तुम स्वयं ही राम-दल में जाकर अपने पति का शव प्राप्त करो।
जिस समाज में बालब्रह्मचारी हनुमान, परम जितेन्द्रिय लक्ष्मण तथा एक पत्नी व्रती भगवान श्रीराम विद्यमान हैं, उस समाज में तुम्हें जाने से डरना नहीं चाहिए। मुझे विश्वास है कि इन स्तुत्य महापुरुषों के द्वारा तुम निराश नहीं लौटायी जाओगी।”
सुलोचना के आने का समाचार सुनते ही श्रीराम खड़े हो गये और स्वयं चलकर सुलोचना के पास आये और बोले – “देवी! तुम्हारे पति विश्व के अन्यतम योद्धा और पराक्रमी थे। उनमें बहुत-से सदगुण थे। किंतु विधि की लिखी को कौन बदल सकता है। आज तुम्हें इस तरह देखकर मेरे मन में पीड़ा हो रही है।
श्रीराम ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा – “देवी! मुझे लज्जित न करो। पतिव्रता की महिमा अपार है, उसकी शक्ति की तुलना नहीं है। मैं जानता हूँ कि तुम परम सती हो। तुम्हारे सतित्व से तो विश्व भी थर्राता है। अपने स्वयं यहाँ आने का कारण बताओ, बताओ कि मैं तुम्हारी किस प्रकार सहायता कर सकता हूँ?
सुलोचना ने अश्रुपूरित नयनों से प्रभु की ओर देखा और बोली – “राघवेन्द्र! मैं सती होने के लिये अपने पति का मस्तक लेने के लिये यहाँ पर आई हूँ। श्रीराम ने शीघ्र ही ससम्मान मेघनाद का शीश मंगवाया और सुलोचना को दे दिया।
पति का छिन्न शीश देखते ही सुलोचना का हृदय अत्यधिक द्रवित हो गया। उसकी आंखें बड़े जोरों से बरसने लगीं। रोते-रोते उसने पास खड़े लक्ष्मण की ओर देखा और कहा – “सुमित्रानन्दन! तुम भूलकर भी गर्व मत करना कि मेघनाथ का वध मैंने किया है। मेघनाद को धराशायी करने की शक्ति विश्व में किसी के पास नहीं थी।
यह तो दो पतिव्रता नारियों का भाग्य था। आपकी पत्नी भी पतिव्रता हैं और मैं भी पति चरणों में अनुरक्ती रखने वाली उनकी अनन्य उपसिका हूँ। पर मेरे पति देव पतिव्रता नारी का अपहरण करने वाले पिता का अन्न खाते थे और उन्हीं के लिये युद्ध में उतरे थे, इसी से मेरे जीवन धन परलोक सिधारे।
सभी योद्धा सुलोचना को राम शिविर में देखकर चकित थे। वह यह नहीं समझ पा रहे थे कि सुलोचना को यह कैसे पता चला कि उसके पति का शीश भगवान राम के पास है।
जिज्ञासा शान्त करने के लिये सुग्रीव ने पूछ ही लिया कि यह बात उन्हें कैसे ज्ञात हुई कि मेघनाद का शीश श्रीराम के शिविर में है। सुलोचना ने स्पष्टता से बता दिया – “मेरे पति की भुजा युद्ध भूमि से उड़ती हुई मेरे पास चली गयी थी। उसी ने लिखकर मुझे बता दिया।
व्यंग्य भरे शब्दों में सुग्रीव बोल उठे – “निष्प्राण भुजा यदि लिख सकती है फिर तो यह कटा हुआ सिर भी हंस सकता है। श्रीराम ने कहा – “व्यर्थ बातें मत करो मित्र। पतिव्रता के महाम्तय को तुम नहीं जानते। यदि वह चाहे तो यह कटा हुआ सिर भी हंस सकता है।
श्रीराम की मुखकृति देखकर सुलोचना उनके भावों को समझ गयी। उसने कहा – “यदि मैं मन, वचन और कर्म से पति को देवता मानती हूँ, तो मेरे पति का यह निर्जीव मस्तक हंस उठे। सुलोचना की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि कटा हुआ मस्तक जोरों से हंसने लगा।
यह देखकर सभी दंग रह गये। सभी ने पतिव्रता सुलोचना को प्रणाम किया। सभी पतिव्रता की महिमा से परिचित हो गये थे। चलते!समय सुलोचना ने श्रीराम से प्रार्थना की- “भगवन, आज मेरे पति की अन्त्येष्टि क्रिया है और मैं उनकी सहचरी उनसे मिलने जा रही हूँ।
अत: आज युद्ध बंद रहे। श्रीराम ने सुलोचना की प्रार्थना स्वीकार कर ली। सुलोचना पति का सिर लेकर वापस लंका आ गई। लंका में समुद्र के तट पर एक चंदन की चिता तैयार की गयी। पति का शीश गोद में लेकर सुलोचना चिता पर बैठी और धधकती हुई अग्नि में कुछ ही क्षणों में सती हो गई…
रावण की बेटी सुवर्णमत्स्या
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रावण की बेटी का उल्लेख थाईलैंड की रामकियेन रामायण और कंबोडिया की रामकेर रामायण में किया गया है, जबकि वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास के रामचरित मानस में इसका उल्लेख नहीं किया गया है।
रामकियेन और रामकेर रामायण के मुताबिक, रावण के तीन पत्नियों से 7 बेटे थे। इनमें पहली पत्नी मंदोदरी से दो बेटे मेघनाद और अक्षय कुमार थे। वहीं, दूसरी पत्नी धन्यमालिनी से अतिकाय और त्रिशिरा नाम के दो बेटे थे। तीसरी पत्नी से प्रहस्थ, नरांतक और देवांतक नाम के तीन बेटे थे। दोनों रामायण में बताया गया है कि सात बेटों के अलावा रावण की एक बेटी भी थी, जिसका नाम सुवर्णमछा या सुवर्णमत्स्य था। कहा जाता है कि सुवर्णमत्स्य देखने में बहुत सुंदर थी। उसे स्वर्ण जलपरी भी कहा जाता है। एक अन्य रामायण ‘अद्भुत रामायण’ में राम जी की पत्नी सीता जी को भी रावण की बेटी बताया गया है।
दशानन रावण की बेटी सुवर्णमत्स्य का शरीर सोने की तरह दमकता था। इसीलिए उसको सुवर्णमछा भी कहा जाता था। इसका शाब्दिक अर्थ होता है, सोने की मछली। इसीलिए थाईलैंड और कंबोडिया में सुनहरी मछली को ठीक उसी तरह से पूजा जाता है, जैसे चीन में ड्रैगन की पूजा होती है
राम जी ने लंका पर विजय अभियान के दौरान समुद्र पार करने के लिए नल और नील को सेतु बनाने का काम सौंपा। राम जी के आदेश पर जब नल और नील लंका तक समुद्र पर सेतु बना रहे थे, तब रावण ने अपनी बेटी सुवर्णमत्स्य को ही ये योजना नाकाम करने का काम सौंपा था। पिता की आज्ञा पाकर सुवर्णमछा ने वानरसेना की ओर से समुद्र में फेंके जाने वाले पत्थरों और चट्टानों को गायब करना शुरू कर दिया। उसने इस काम के लिए समुद्र में रहने वाले अपने पूरे दल की मदद ली।
रामकियेन और रामकेर रामायण में लिखा गया है कि जब वानरसेना की ओर से डाले जाने वाले पत्थर गायब होने लगे तो हनुमानजी ने समुद्र में उतरकर देखा कि आखिर ये चट्टानें जा कहां रही हैं? उन्होंने देखा कि पानी के अंदर रहने वाले लोग पत्थर और चट्टानें उठाकर कहीं ले जा रहे हैं। उन्होंने उनका पीछा किया तो देखा कि एक मत्स्य कन्या उनको इस कार्य के लिए निर्देश दे रही है। कथा में कहा गया है कि सुवर्णमछा ने जैसे ही हनुमानजी को देखा, उनसे प्रेम हो गया। हनुमानजी उसके मन की स्थिति भांप लेते हैं और समुद्रतल पर ले जाकर पूछते हैं कि आप कौन हैं देवी ? वह बताती हैं कि मैं रावण की बेटी हूं। फिर हनुमान जी उसे समझाते हैं कि रावण क्या गलत कार्य कर रहा है। हनुमानजी के समझाने पर सुवर्णमछा सभी चट्टानें लौटा देती हैं, तब रामसेतु के निर्माण का कार्य पूरा हो पाता है। थाई रामायण रामकियेन के अनुसार महाबली हनुमान जी के आशीर्वाद से स्वर्णमछा को एक पुत्र की प्राप्ति भी हुई थी जिसका नाम मैकचनू (मछानु) था।
धन्यवाद।🙏
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रावण की बेटी सुवर्णमत्स्या
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रावण की बेटी का उल्लेख थाईलैंड की रामकियेन रामायण और कंबोडिया की रामकेर रामायण में किया गया है, जबकि वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास के रामचरित मानस में इसका उल्लेख नहीं किया गया है।
रामकियेन और रामकेर रामायण के मुताबिक, रावण के तीन पत्नियों से 7 बेटे थे। इनमें पहली पत्नी मंदोदरी से दो बेटे मेघनाद और अक्षय कुमार थे। वहीं, दूसरी पत्नी धन्यमालिनी से अतिकाय और त्रिशिरा नाम के दो बेटे थे। तीसरी पत्नी से प्रहस्थ, नरांतक और देवांतक नाम के तीन बेटे थे। दोनों रामायण में बताया गया है कि सात बेटों के अलावा रावण की एक बेटी भी थी, जिसका नाम सुवर्णमछा या सुवर्णमत्स्य था। कहा जाता है कि सुवर्णमत्स्य देखने में बहुत सुंदर थी। उसे स्वर्ण जलपरी भी कहा जाता है। एक अन्य रामायण ‘अद्भुत रामायण’ में राम जी की पत्नी सीता जी को भी रावण की बेटी बताया गया है।
दशानन रावण की बेटी सुवर्णमत्स्य का शरीर सोने की तरह दमकता था। इसीलिए उसको सुवर्णमछा भी कहा जाता था। इसका शाब्दिक अर्थ होता है, सोने की मछली। इसीलिए थाईलैंड और कंबोडिया में सुनहरी मछली को ठीक उसी तरह से पूजा जाता है, जैसे चीन में ड्रैगन की पूजा होती है
राम जी ने लंका पर विजय अभियान के दौरान समुद्र पार करने के लिए नल और नील को सेतु बनाने का काम सौंपा। राम जी के आदेश पर जब नल और नील लंका तक समुद्र पर सेतु बना रहे थे, तब रावण ने अपनी बेटी सुवर्णमत्स्य को ही ये योजना नाकाम करने का काम सौंपा था। पिता की आज्ञा पाकर सुवर्णमछा ने वानरसेना की ओर से समुद्र में फेंके जाने वाले पत्थरों और चट्टानों को गायब करना शुरू कर दिया। उसने इस काम के लिए समुद्र में रहने वाले अपने पूरे दल की मदद ली।
रामकियेन और रामकेर रामायण में लिखा गया है कि जब वानरसेना की ओर से डाले जाने वाले पत्थर गायब होने लगे तो हनुमानजी ने समुद्र में उतरकर देखा कि आखिर ये चट्टानें जा कहां रही हैं? उन्होंने देखा कि पानी के अंदर रहने वाले लोग पत्थर और चट्टानें उठाकर कहीं ले जा रहे हैं। उन्होंने उनका पीछा किया तो देखा कि एक मत्स्य कन्या उनको इस कार्य के लिए निर्देश दे रही है। कथा में कहा गया है कि सुवर्णमछा ने जैसे ही हनुमानजी को देखा, उनसे प्रेम हो गया। हनुमानजी उसके मन की स्थिति भांप लेते हैं और समुद्रतल पर ले जाकर पूछते हैं कि आप कौन हैं देवी ? वह बताती हैं कि मैं रावण की बेटी हूं। फिर हनुमान जी उसे समझाते हैं कि रावण क्या गलत कार्य कर रहा है। हनुमानजी के समझाने पर सुवर्णमछा सभी चट्टानें लौटा देती हैं, तब रामसेतु के निर्माण का कार्य पूरा हो पाता है। थाई रामायण रामकियेन के अनुसार महाबली हनुमान जी के आशीर्वाद से स्वर्णमछा को एक पुत्र की प्राप्ति भी हुई थी जिसका नाम मैकचनू (मछानु) था।
धन्यवाद।🙏
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बुद्ध को वैराग्य उत्पन्न होने की जो बड़ी कीमती घटना है, वह मैं आपसे कहूं।
बुद्ध के पिता ने बुद्ध के महल में उस राज्य की सब सुंदर स्त्रियां इकट्ठी कर दी थीं।
रात देर तक गीत चलता, गान चलता, मदिरा बहती, संगीत होता और बुद्ध को सुलाकर ही वे सुंदरियां नाचते-नाचते सो जातीं।
एक रात बुद्ध की नींद चार बजे टूट गई। एर्नाल्ड ने अपने लाइट आफ एशिया में बड़ा प्रीतिकर, पूरा वर्णन किया है।
चार बजे नींद खुल गई। पूरे चांद की रात थी। कमरे में चांद की किरणें भरी थीं।
जिन स्त्रियों को बुद्ध प्रेम करते थे, जो उनके आस-पास नाचती थीं और स्वर्ग का दृश्य बना देती थीं, उनमें से कोई अर्धनग्न पड़ी थी; किसी का वस्त्र उलट गया था; किसी के मुंह से घुर्राटे की आवाज आ रही थी; किसी की नाक बह रही थी; किसी की आंख से आंसू टपक रहे थे; किसी की आंख पर कीचड़ इकट्ठा हो गया था।
बुद्ध एक-एक चेहरे के पास गए और वही रात बुद्ध के लिए घर से भागने की रात हो गई। क्योंकि इन चेहरों को उन्होंने देखा था; ऐसा नहीं देखा था। लेकिन ये चेहरे असलियत के ज्यादा करीब थे। जिन चेहरों को देखा था, वे मेकअप से तैयार किए गए चेहरे थे, तैयार चेहरे थे। ये चेहरे असलियत के ज्यादा करीब थे। यह शरीर की असलियत है।
जीवन के जो चेहरे हमें दिखाई पड़ते हैं, वे असलियत नहीं हैं। इसलिए बुद्ध अपने भिक्षुओं से कहते थे, जब तुम्हें कोई चेहरा सुंदर दिखाई पड़े, तो आंख बंद करके स्मरण करना, ध्यान करना, चमड़ी के नीचे क्या है? मांस। मांस के नीचे क्या है? हड्डियां। हड्डियों के नीचे क्या है?
उस सब को तुम जरा गौर से देख लेना। एक्सरे मेडिटेशन, कहना चाहिए उसका नाम। बुद्ध ने ऐसा नाम नहीं दिया। मैं कहता हूं, एक्सरे मेडिटेशन! एक्सरे कर लेना, जब मन में कोई चमड़ी बहुत प्रीतिकर लगे, तो दूर भीतर तक। तो भीतर जो दिखाई पड़ेगा, वह बहुत घबड़ाने वाला है।
जैसी शरीर की असलियत है, वैसे ही सभी सुखों की असलियत है। और एक-एक सुख को जो एक्सरे मेडिटेशन करे, एक-एक सुख पर एक्सरे की किरणें लगा दे, ध्यान की, और एक-एक सुख को गौर से देखे, तो आखिर में पाएगा कि हाथ में सिवाय दुख के कुछ बच नहीं रहता। और जब आपको एक सुख की व्यर्थता में समस्त सुखों की व्यर्थता दिखाई पड़ जाए, और जब एक सुख के डिसइलूजनमेंट में आपके लिए समस्त सुखों की कामना क्षीण हो जाए, तो आपकी जो स्थिति बनती है, उसका नाम वैराग्य है।
वैराग्य का अर्थ है, अब मुझे कुछ भी आकर्षित नहीं करता। वैराग्य का अर्थ है, अब ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसके लिए मैं कल जीना चाहूं। वैराग्य का अर्थ है, ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसके लिए मैं कल जीना चाहूं। ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे पाए बिना मेरा जीवन व्यर्थ है।
वैराग्य का अर्थ है, वस्तुओं के लिए नहीं, पर के लिए नहीं, दूसरे के लिए नहीं, अब मेरा आकर्षण अगर है, तो स्वयं के लिए है। अब मैं उसे जान लेना चाहता हूं, जो सुख पाना चाहता है। क्योंकि जिन-जिन से सुख पाना चाहा, उनसे तो दुख ही मिला। अब एक दिशा और बाकी रह गई कि मैं उसको ही खोज लूं, जो सुख पाना चाहता है। पता नहीं, वहां शायद सुख मिल जाए। मैंने बहुत खोजा, कहीं नहीं मिला; अब मैं उसे खोज लूं, जो खोजता था। उसे और पहचान लूं, उसे और देख लूं। वैराग्य का अर्थ है, विषय से मुक्ति और स्वयं की तरफ यात्रा।
— ओशो
🙏 मकरसंक्रांति या उतरायण पतंग उडाने के लिए नही है ये व्यापारी ओ के लिए है
👉असल में ये रुतु परीवर्तन का खगोलीय दो ज्ञान है
उत्तरायण आकाश में सूर्य की स्थिति को दर्शाता है। उत्तरायण के दिन सूर्य ठीक सिर के ऊपर, दक्षिण दिशा की ओर होता है। उत्तरायण (उत्तर + अयन) का शाब्दिक अर्थ है उत्तर की ओर गति करना। जब दिन के समय सूर्य ठीक सिर के ऊपर होता है, तो ऐसा प्रतीत होता है कि वह प्रतिदिन उत्तर की ओर गति कर रहा है। उत्तरायण के समय सूर्य पृथ्वी के चारों ओर अपनी घूर्णन दिशा बदलता है और धीरे-धीरे उत्तर दिशा की ओर बढ़ता है। इसलिए, जिस दिन से सूर्य उत्तर की ओर गति करना शुरू करता है, उस दिन को उत्तरायण कहते हैं। उत्तरायण 21 से 22 दिसंबर तक रहता है।
अवधि: 46 सेकंड।0:46
सूर्य का उत्तर दिशा की ओर गति करना एक घटना है।
सूर्य के उत्तर की ओर खिसकने के प्रभाव।
उत्तरायण के दिन भारत में साल की सबसे लंबी रात 13:12 बजे की होती है और दिन 10:48 बजे का होता है। वहीं, 21 जून को दक्षिणायन के दिन स्थिति ठीक उलट होती है। साल में दो दिन ऐसे होते हैं, 21 दिसंबर, जो सबसे लंबी रात होती है, और 21 जून, जो सबसे लंबा दिन होता है। चूंकि सूर्य की किरणें दक्षिणी गोलार्ध पर सीधी पड़ती हैं, इसलिए उत्तरी गोलार्ध में लंबी रातें होती हैं। इस समय को उत्तरायण भी कहा जाता है। 22 दिसंबर से 21 जून तक दिन लंबा होता जाता है। 21 जून को दिन सबसे लंबा और रात सबसे छोटी होती है। इस दिन को दक्षिणायन कहते हैं।
मकर संक्रांति उत्तरायण से भिन्न है। सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करने के समय को संक्रांति कहते हैं।
मकर संक्रान्ति अब 15 जनवरी को क्यों हो रही है?
वर्ष 2008 से 2080 तक मकर संक्राति 15 जनवरी को होगी।
विगत 72 वर्षों से (1935 से) प्रति वर्ष मकर संक्रांति 14 जनवरी को ही पड़ती रही है।
2081 से आगे 72 वर्षों तक अर्थात 2153 तक यह 16 जनवरी को रहेगी।
ज्ञातव्य रहे, कि पृथिवी के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश (संक्रमण) का दिन मकर संक्रांति के रूप में जाना जाता है। इस दिवस से, मिथुन राशि में बने रहने पर सूर्य उत्तरायण का तथा कर्क से धनु राशि तक में पृथिवी के बने रहने पर इसे दक्षिणायन का माना जाता है।
पृथिवी का धनु से मकर राशि में संक्रमण प्रति वर्ष लगभग 20 मिनिट विलम्ब से होता है। स्थूल गणना के आधार पर तीन वर्षों में यह अंतर एक घंटे का तथा 72 वर्षो में पूरे 24 घंटे का हो जाता है।
यही कारण है, कि अंग्रेजी तारीखों के मान से, मकर-संक्रांति का पर्व, 72 वषों के अंतराल के बाद एक तारीख आगे बढ़ता रहता है।
विशेष:- यह धारणा पूर्णतः भ्रामक है कि मकर संक्रांति का पर्व 14 जनवरी को आता है।
स्वामी विवेकानन्द का जन्म मकर संक्रांति को हुआ था, उस दिन 12 जनवरी थी।
मकर ♑
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अन्तरिक्ष को भी समुद्र कहा गया है। समुद्र में जलजीवों का वास होता है, जलजीव , पोत, नाव आदि की कल्पना आकाश के तारों में भी की गई।
मकर राशि का उल्लेख महाभारत में स्पष्टतया किया गया है। (कुछ लोग यह अवश्य कहेंगे कि अमुक अमुक छापाखाना में छपी, अमुक की टीका में यह उल्लेख नहीं प्राप्त होता।
ऐसे व्यक्तियों से प्रश्न है कि क्या उनमें ‘शतसाहस्री संहिता’ सञ्ज्ञा को सार्थक करने हेतु एक लाख श्लोक हैं? क्या किसी टीकाकार को यह सौभाग्य प्राप्त हुआ कि वह पूरे एक लाख श्लोकों की टीका पूर्ण कर पाता? किसी प्रेस को प्राप्त सामग्री ही अन्तिम नहीं होती)
अनेक पाण्डुलिपियों में ये श्लोक हैं और ये महाभारतकार ने नहीं लिखे ऐसा अकाट्य साक्ष्य किसी के पास नहीं है।
झषानां मकरश्चास्मि । श्रीमद्भगवद्गीता
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अयनं चैव मासश्च ऋतुः पक्षस्तथा तिथिः ।
करणं च मुहूर्तं च लग्नसंपत्तथैव च ॥
विवाहस्य विशालाक्षि प्रशस्तं चोत्तरायणम् ।
वैशाखश्चैव मासानां पक्षाणां शुक्ल एव च ॥
नक्षत्राणां तथा हस्तस्तृतीया च तिथिष्वपि ।
लग्नो हि मकरः श्रेष्ठः करणानां बवस्तथा ॥
मैत्रो मुहूर्तो वैवाह्य आवयोः शुभकर्मणि ।
सर्वसंपदियं भद्रे अद्य रात्रौ भविष्यति ॥
{ महाभारत आदिपर्व }
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‘झष’ शब्द शतपथब्राह्मण में भी है।
अन्य समुद्री जीवों के नाम एकत्र ही प्राप्त होते हैं देखें ब्राह्मण ग्रन्थ और अथर्ववेद।
✍🏻अत्रि विक्रमार्क
मकर संक्रांति का महत्व
मकर संक्रांति का भारतीय जन जीवन में जितना महत्वपूर्ण स्थान है, वह बनते-बनते हजारों सालों का वक्त लगा है। एक मिथक है कि आदमी की आंखों को आसमान पर लगे-लगे कई दिन हो गए। आंखें देखती रही कि सूरज बर्फ को पिघलाकर बहते जल को देखते देखते समंदर तक जाता है… जब भाप बनती है तो बादलों का खोल ओढे फिर अपनी जगह लौटता है मगर पानी उसे फिर समंदर की ओर लेकर जाता है…।
याद कीजिएगा कि इसी से उत्तरायण और दक्षिणायन की धारणा बनी। अयन माने रास्ता, जैसा कि छांदोग्योपनिषद (4, 15, 5) में आया है, यही अर्थ ऋग्वेद (3, 33, 7) में मिलता है। संक्रमण से मतलब है रास्ते को लांघना। इधर का उधर होना अयन माना गया, यह छह-छह महीने का वक्त है। जब आदमी ने बारह महीनों को जान लिया तो इस संक्रमण को भी बारह तरह से जाना गया। इसमें दो अयन की संक्रांतियां मानी गई जिनका नाम राशियों के आधार पर रखा गया, जो कि अनेकों के अनुसार मेसोपोटामियां की उपज बताई गई हैं और भारत में यहां के नामों से ख्यात हुईं।
अयन की संक्रांतियां मकर (उत्तरायण) और कर्क (दक्षिणायन) के नाम से जानी गई। दो संक्रांतियां जब दिन और रात बराबर होते हैं, विषुव के नाम से जानी गई, मेष् और तुला की। अन्य चार के नाम षडशीति हैं जब मिथुन, कन्या, धनु और मीन राशियां होती हैं और चार वे जो विष्णुपदी हैं, वृषभ, सिंह, वृश्चिक और कुंभ राशि वाली हैं।
छह-छह मासों का विवरण शतपथ ब्राह्मण में संक्षेप में आया है, किंतु तब तक राशियां अनजान ही थीं। सूर्य का धनु से मकर पर आना बहुत पहले से शुभ मान लिया गया था। इस घटना को धरतीवासी पत्थर के तीन चक्र एक दूसरे पर जमाकर गेंद से नीचे गिराते हुए देखते दिखाते अपना बल बताते थे।
यही खेल ‘सतोलिया’ का बना, खासकर पश्चिम भारत में यह खेल शुरु हुआ, यह आज भी है और संयोग से संक्रांति पर खेला भी जाता है। पहाडी प्रदेशों में पेडों की लकडियो से गेंद् को घुडाते हुए पारे या सीमा को लांघने का खेल विकसित हुआ। यह आज भी गीडा डोट के नाम से ख्यात है।
सुनाया जाता है कि फाहयान के साथ जो अन्य लोग इधर आए, पतंग जैसा खेल लेकर आए। पतंग से आशय सूर्य होता है, जिसके नाम से पश्चिम भारत वाले भली भांति परिचित थे। ये खेल आज भी इधर लोकप्रिय हैं…। रही बात दान-पुण्य की वह तो उपज निपज के कारण कृषि प्रधान समाज में था ही, जलीय प्रदेशों में यह स्नान के पर्व के रूप में ख्यात हुआ और इस तरह एक मिला जुला पर्व बना मकर संक्रांति।
मध्यकाल में, खासकर 10वीं सदी के आसपास सक्रांति को देवी का रूप मान लिया गया और उसके बनाव, शृंगार सहित खान-पान, देखने, चलने आदि की क्रियाओं पर विचार करके मौसम और साल भर के लेखा जोखा पर विचार हुआ और फिर संहिता तथा मुहूर्त ग्रंथों में उन सबको लिखा गया और लिखा ही जाता रहा। लगभग तीन सौ सालों तक, भविष्यपुराण भी इससे न्यारा नहीं है।
*
अभी तो आपके शब्दों में मकर मंगलम…
*
पौषमासे मकरे च यदा सूर्यायनं भवेत् |
चत्वारिंशद्घटिका वै पुण्यकालो विशेषतः||
दानस्नानार्चनाद्यं तु कर्तव्यं तिललड्डुकाः|
मिष्टान्नानि च देयानि ह्यनाथेभ्यो विशेषतः|
गवां ग्रासादि देयं च श्राद्धं पुण्यप्रदं तथा||
जय जय।
✍🏻श्रीकृष्ण जुगनू
साल में बारह संक्रातियाँ पड़ती हैं किन्तु मकर संक्रांति का इतना महत्व क्यों है !
अभी मकर रेखा पर यानी ऑस्ट्रेलिया और आर्जेंटीना आदि में भगवान भास्कर एकदम बीचोबीच आकाश में सिर के ऊपर चमक रहे होंगे । मकर संक्रांति के बाद धीरे धीरे सूर्योदय उत्तर की ओर खिसकेगा और वहाँ आदमी की परछाईं तिरछी होती जायेगी । सूर्य की सीधी खड़ी किरणें अपने साथ गर्मी का मौसम लेकर चलती हैं । अब मकर रेखा से सूर्य की यात्रा उत्तर में अर्थात् भारत में कर्क रेखा की ओर चल पड़ी है ।
भारत के लिये सूर्य का उत्तरायण में आना बहुत ही महत्वपूर्ण घटना होती है । भारतीय प्रायद्वीप की विशिष्ट भौगोलिक स्थिति के कारण सूर्य की यात्रा जब कर्क रेखा के आस पास पहुँच कर अपनी सीधी किरणों से पूरे प्रायद्वीप को तप्त कर देती है तब हिंद महासागर से तेज़ हवायें अपने साथ वर्षाजल से भरे मेघों को लेकर भारतभूमि को तृप्त करने निकल पड़ती हैं । इस दक्षिण पश्चिमी मानसून का एक भाग पश्चिमी घाट के सहारे केरल से गुजरात तक पश्चिम भारत को भिगोता है तो दूसरा भाग बंगाल खाड़ी पार करता हुआ हिमालय के दक्षिण में भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी भाग को जीवन प्रदान करता है ।
हिमालय के बर्फ से भरे हुये हिमनद , उत्तर भारत की सदानीरा नदियाँ और प्रायद्वीप का फसल चक्र सब सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा करते हैं और इन्हीं सब पर भारतीय सभ्यता टिकी है । इसीलिये प्राचीन काल से ही मकर संक्राति का भारत में अत्यधिक महत्व रहा है । उत्तराखंड में तो उत्तरायणी एक महोत्सव के रूप में मनाया जाता है । देश भर में कहीं पोंगल कहीं बिहू कहीं लोहड़ी कहीं खिचड़ी के रूप में इस संक्रांति का जोर शोर से स्वागत होता है । भारत में सूर्य की गति का इतना महत्व होने के कारण ही सौर वर्ष के आधार पर पंचांग और संवत्सर आदि विकसित हुए । यूँ तो मॉनसूनी वर्षा पश्चिम अफ्रीका, मेक्सिको और दक्षिण पूर्व एशिया में भी होती है लेकिन भारत में मॉनसून और हिमालय मिल कर एक विशेष जलवायु को जन्म देते हैं । और यह सब संभव होता है खरमास की शीतलता से निकल कर सूर्य के पुन: देदीप्यमान हो कर कर्क राशि को संचरण के कारण ।
ॐ विश्वानि देव सवितुर्दुरितानि परासुव ।
यद् भद्रं तन्न आ सुव ॥
मकर संक्रांति की आप सभी को ढेरों शुभकामनायें
✍🏻राजकमल गोस्वामी
संस्कृत प्रार्थना के अनुसार “हे सूर्यदेव, आपका दण्डवत प्रणाम, आप ही इस जगत की आँखें हो। आप सारे संसार के आरम्भ का मूल हो, उसके जीवन व नाश का कारण भी आप ही हो।” सूर्य का प्रकाश जीवन का प्रतीक है। चन्द्रमा भी सूर्य के प्रकाश से आलोकित है। वैदिक युग में सूर्योपासना दिन में तीन बार की जाती थी। पितामह भीष्म ने भी सूर्य के उत्तरायण होने पर ही अपना प्राणत्याग किया था। हमारे मनीषी इस समय को बहुत ही श्रेष्ठ मानते हैं। इस अवसर पर लोग पवित्र नदियों एवं तीर्थस्थलों पर स्नान कर आदिदेव भगवान सूर्य से जीवन में सुख व समृद्धि हेतु प्रार्थना व याचना करते हैं।
रंग-बिरंगा त्योहार मकर संक्रान्ति प्रत्येक वर्ष जनवरी महीने में समस्त भारत में मनाया जाता है। इस दिन से सूर्य उत्तरायण होता है, जब उत्तरी गोलार्ध सूर्य की ओर मुड़ जाता है। परम्परा से यह विश्वास किया जाता है कि इसी दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। यह वैदिक उत्सव है। इस दिन खिचड़ी खाई जाती है। गुड़–तिल, रेवड़ी, गजक का प्रसाद बांटा जाता है।
माघ मास के कृष्णपक्ष की प्रतिपदा को ‘मकर संक्रान्ति’ पर्व मनाया जाता है। जितने समय में पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एक चक्कर लगाती है, उस अवधि को “सौर वर्ष” कहते हैं। पृथ्वी का गोलाई में सूर्य के चारों ओर घूमना “क्रान्तिचक्र” कहलाता है। इस “परिधि चक्र” को बाँटकर बारह राशियाँ बनी हैं। सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना “संक्रान्ति” कहलाता है। इसी प्रकार सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने को “मकरसंक्रान्ति” कहते हैं।
सूर्य का मकर रेखा से उत्तरी कर्क रेखा की ओर जाना उत्तरायण तथा कर्क रेखा से दक्षिणी मकर रेखा की ओर जाना दक्षिणायन है। उत्तरायण में दिन बड़े हो जाते हैं तथा रातें छोटी होने लगती हैं। दक्षिणायन में ठीक इसके विपरीत होता है। शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन देवताओं की रात होती है। वैदिक काल में उत्तरायण को देवयान तथा दक्षिणायन को पितृयान कहा जाता था । इसलिए यह आलोक का अवसर माना जाता है। इस दिन पुण्य, दान, जप तथा धार्मिक अनुष्ठानों का अनन्य महत्व है और सौ गुणा फलदायी होकर प्राप्त होता है। मकर संक्रान्ति प्रत्येक वर्ष प्रायः 14 जनवरी को पड़ती है।
आभार प्रकट करने का दिन
पंजाब, बिहार व तमिलनाडु में यह समय फ़सल काटने का होता है। कृषक मकर संक्रान्ति को आभार दिवस के रूप में मनाते हैं। पके हुए गेहूँ और धान को स्वर्णिम आभा उनके अथक मेहनत और प्रयास का ही फल होती है और यह सम्भव होता है, भगवान व प्रकृति के आशीर्वाद से। विभिन्न परम्पराओं व रीति–रिवाज़ों के अनुरूप पंजाब एवं जम्मू–कश्मीर में “लोहड़ी” नाम से “मकर संक्रान्ति” पर्व मनाया जाता है। सिन्धी समाज एक दिन पूर्व ही मकर संक्रान्ति को “लाल लोही” के रूप में मनाता है। तमिलनाडु में मकर संक्रान्ति पोंगल के नाम से मनाया जाता है, तो उत्तर प्रदेश और बिहार में खिचड़ी के नाम से मकर संक्रान्ति मनाया जाता है। इस दिन कहीं खिचड़ी तो कहीं चूड़ादही का भोजन किया जाता है तथा तिल के लड्डु बनाये जाते हैं। ये लड्डू मित्र व सगे सम्बन्धियों में बाँटें भी जाते हैं।
खिचड़ी संक्रान्ति
चावल व मूंग की दाल को पकाकर खिचड़ी बनाई जाती है। इस दिन खिचड़ी खाने का प्रचलन व विधान है। घी व मसालों में पकी खिचड़ी स्वादिष्ट, पाचक व ऊर्जा से भरपूर होती है। इस दिन से शरद ऋतु क्षीण होनी प्रारम्भ हो जाती है। बसन्त के आगमन से स्वास्थ्य का विकास होना प्रारम्भ होता है।
पंजाब में लो़ढ़ी
मकर संक्रान्ति भारत के अन्य क्षेत्रों में भी धार्मिक उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। पंजाब में इसे लो़ढ़ी कहते हैं जो ग्रामीण क्षेत्रों में नई फ़सल की कटाई के अवसर पर मनाया जाता है। पुरुष और स्त्रियाँ गाँव के चौक पर उत्सवाग्नि के चारों ओर परम्परागत वेशभूषा में लोकप्रिय नृत्य भांगड़ा का प्रदर्शन करते हैं। स्त्रियाँ इस अवसर पर अपनी हथेलियों और पाँवों पर आकर्षक आकृतियों में मेहन्दी रचती हैं।
बंगाल में मकर-सक्रांति
पश्चिम बंगाल में मकर सक्रांति के दिन देश भर के तीर्थयात्री गंगासागर द्वीप पर एकत्र होते हैं , जहाँ गंगा बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। एक धार्मिक मेला, जिसे गंगासागर मेला कहते हैं, इस समारोह की महत्त्वपूर्ण विशेषता है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि इस संगम पर डुबकी लगाने से सारा पाप धुल जाता है।
कर्नाटक में मकर-सक्रांति
कर्नाटक में भी फ़सल का त्योहार शान से मनाया जाता है। बैलों और गायों को सुसज्जित कर उनकी शोभा यात्रा निकाली जाती है। नये परिधान में सजे नर-नारी, ईख, सूखा नारियल और भुने चने के साथ एक दूसरे का अभिवादन करते हैं। पंतगबाज़ी इस अवसर का लोकप्रिय परम्परागत खेल है।
गुजरात में मकर-सक्रांति
गुजरात का क्षितिज भी संक्रान्ति के अवसर पर रंगबिरंगी पंतगों से भर जाता है। गुजराती लोग संक्रान्ति को एक शुभ दिवस मानते हैं और इस अवसर पर छात्रों को छात्रवृतियाँ और पुरस्कार बाँटते हैं।
केरल में मकर-सक्रांति
केरल में भगवान अयप्पा की निवास स्थली सबरीमाला की वार्षिक तीर्थयात्रा की अवधि मकर संक्रान्ति के दिन ही समाप्त होती है, जब सुदूर पर्वतों के क्षितिज पर एक दिव्य आभा ‘मकर ज्योति’ दिखाई पड़ती है।
बरकतुल्लाह खान (Barkatullah Khan) राजस्थान का छठा मुख्यमंत्री था और राजस्थान का पहला और अब तक का एकमात्र मुस्लिम मुख्यमंत्री रहा, जिसने 9 जुलाई, 1971 से 11 अक्टूबर, 1973 (अपने निधन तक) तक पद संभाला था। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का नेता था, और उसकी मृत्यु हार्ट अटैक से पद पर रहते हुए हुई थी, उसे प्यार से ‘प्यारे मियां’ भी कहते थे।
कहानी थोड़ी पुरानी है…
भारत आज़ाद नहीं हुआ था… तब लखनऊ में पढ़ाई लिखाई को राजस्थान से एक युवा आया…
पढ़ाई लिखाई जो थी सो थी पर लफं&गई फुल थी…
इनको रहने को आसरा दिया एक परिवार ने जिसमें एक ऊषा नाम की एक बच्ची भी थी
और ये महानुभाव थे ऊषा से उम्र में 15 साल बड़े…
पर ऊषा पर आशिक हो गए…
खैर परिवार ने पिंड छुड़ाया पर कुछ बिगाड़ न पाया…. काहे कि तब भी भारत के सबसे ताक़तवर परिवार के दामाद फ़िरोज़ मिया का चमचा था वो..
समय बीता…. आज़ाद भारत में कांग्रेस की सत्ता आयी और बड़े नामों के बीच इस व्यक्ति को भी आका के राजदार होने के सदके राजस्थान में मंत्री की कुर्सी मिली…
मंत्री बनने के बाद साहब ने तब 17 साल की उस लड़की से निकाह किया दबाव बना… और उसका धर्म परिवर्तन करवाया…
ये आज़ाद भारत का हाई प्रोफाइल लव ज°हा°द का मामला था…
आगे चलकर आका की राजदारी के सदके आका के मरने के बाद भी इसे राजस्थान का CM बनाया गया….
जहाँ पहला काम इसने वहाँ के राजपूत रजवाड़ों की पेंशन बंद करवाने का प्रस्ताव केंद्र को भेजने का किया…
आगे जिससे व्यापक विवाद हुआ… कुछ हिंसा भी!
बर्क़तुल्लाह उर्फ़ प्यारे खां जब 53 की उम्र में मरे उसकी बेग़म ऊषा मेहता उर्फ़ ऊषी खां महज़ 38 की थीं
ऊषा बर्कतुल्लाह पर कहा जाता है दौनो क्लासमेट थे….
पर सवाल है क़िस क्लास में खुद से 15 साल छोटी लड़की इनके साथ पढ़ी होगी
पैदायशी हरामजादे होते हैं ये सब। जिस थाली में खाए उसी में छेद करते हैं
ये वो हिन्दू नही समझेंगे जो अपने घर मे इन सूअर को अंदर ले जायेंगे
लेकिन कोई दलित समुदाय से आ गया तो समझो
धर्म भ्रष्ट
जिस दिन सनातनी एक हो गए
आधे भी
ये देश
सनातन का होगा
मै जाटव
या चमार जो भी बोलो
लेकिन देश पहले
गीता का उपदेश याद करो

#मकर_संक्रांति का महत्व:
मकर संक्रांति भारत के प्रमुख सूर्य पर्वों में से एक है। यह पर्व हर वर्ष लगभग 14 जनवरी को मनाया जाता है और इसका आधार खगोलीय है। इस दिन सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, जिसे मकर संक्रांति कहा जाता है। इसी के साथ सूर्य की उत्तरायण गति प्रारंभ होती है, जिसे अत्यंत शुभ माना गया है।
#धार्मिक महत्व:
– मकर संक्रांति से उत्तरायण की शुरुआत होती है। हिंदू धर्म में उत्तरायण को देवताओं का दिन कहा गया है।
– महाभारत में भीष्म पितामह ने इसी काल में देह त्याग किया था, इसलिए इस समय को मोक्षदायी माना जाता है।
– इस दिन गंगा स्नान, दान और पुण्यकर्म का विशेष महत्व है। माना जाता है कि इस दिन किया गया दान अनेक गुना फल देता है।
– तिल, गुड़, खिचड़ी, चावल, वस्त्र आदि का दान शुभ माना गया है।
#सांस्कृतिक महत्व:
– मकर संक्रांति पूरे भारत में अलग–अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाई जाती है:
– उत्तर भारत में मकर संक्रांति
– गुजरात और राजस्थान में उत्तरायण (पतंग उत्सव)
– पंजाब में लोहड़ी
– तमिलनाडु में पोंगल
– आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में संक्रांति
– बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में खिचड़ी पर्व
इन सभी रूपों में पर्व का मूल भाव प्रकृति, कृषि और सूर्य उपासना से जुड़ा है।
#सामाजिक और #वैज्ञानिक महत्व:
– यह पर्व ऋतु परिवर्तन का प्रतीक है। शीत ऋतु धीरे-धीरे समाप्त होकर बसंत की ओर बढ़ती है।
– किसान के लिए यह पर्व नई फसल के आगमन का संकेत है, इसलिए यह कृषि उत्सव भी है।
– तिल और गुड़ जैसे खाद्य पदार्थ शरीर को ऊर्जा और गर्मी प्रदान करते हैं, जो शीत ऋतु के लिए उपयोगी हैं।
#संदेश :
मकर संक्रांति हमें यह संदेश देती है कि जैसे सूर्य उत्तर दिशा की ओर बढ़ता है, वैसे ही हमें भी अंधकार से प्रकाश, निराशा से आशा और आलस्य से कर्म की ओर अग्रसर होना चाहिए। यह पर्व सामाजिक समरसता, दान, संयम और सकारात्मकता का प्रतीक है।
मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि जीवन में नई दिशा और नई ऊर्जा का उत्सव है।
आप सभी को मकर संक्रांति पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं 💐
मकर संक्रांति पर्व का महत्व
* डॉ. श्रीकृष्ण “जुगनू”
मकर संक्रांति का भारतीय जन जीवन में जितना महत्वपूर्ण स्थान है, वह बनते-बनते हजारों सालों का समय लगा है। एक मिथक है कि आदमी की आंखों को आसमान पर लगे-लगे कई दिन हो गए। आंखें देखती रही कि सूरज बर्फ को पिघलाकर बहते जल को देखते देखते समंदर तक जाता है… जब भाप बनती है तो बादलों का खोल ओढे फिर अपनी जगह लौटता है मगर पानी उसे फिर समंदर की ओर लेकर जाता है…।
याद कीजिएगा कि इसी से उत्तरायण और दक्षिणायन की धारणा बनी। अयन माने रास्ता, जैसा कि छांदोग्योपनिषद (4, 15, 5) में आया है, यही अर्थ ऋग्वेद (3, 33, 7) में मिलता है। संक्रमण से मतलब है रास्ते को लांघना। इधर का उधर होना अयन माना गया, यह छह-छह महीने का वक्त है। जब आदमी ने बारह महीनों को जान लिया तो इस संक्रमण को भी बारह तरह से जाना गया। इसमें दो अयन की संक्रांतियां मानी गई जिनका नाम राशियों के आधार पर रखा गया, जो कि अनेकों के अनुसार मेसोपोटामियां की उपज बताई गई हैं और भारत में यहां के नामों से ख्यात हुईं।
अयन के लिए रेखाओं की कल्पना कहां हुई? कब और कहां से कर्क, विषुवत और मकर रेखाओं निर्धारण हुआ? अंश ( डिग्री) का पहला प्रयोग कहां और किसने किया? ये खगोल विद्या के प्रश्न हैं और हमारे पास सबसे अधिक खगोलीय ग्रंथ हैं लेकिन उनमें उत्तर नहीं!
अयन की संक्रांतियां मकर (उत्तरायण) और कर्क (दक्षिणायन) के नाम से जानी गई। दो संक्रांतियां जब दिन और रात बराबर होते हैं, विषुव के नाम से जानी गई, मेष् और तुला की। अन्य चार के नाम षडशीति हैं जब मिथुन, कन्या, धनु और मीन राशियां होती हैं और चार वे जो विष्णुपदी हैं, वृषभ, सिंह, वृश्चिक और कुंभ राशि वाली हैं।
छह-छह मासों का विवरण शतपथ ब्राह्मण में संक्षेप में आया है, किंतु तब तक राशियां अनजान ही थीं। सूर्य का धनु से मकर पर आना बहुत पहले से शुभ मान लिया गया था। इस घटना को धरतीवासी पत्थर के तीन चक्र एक दूसरे पर जमाकर गेंद से नीचे गिराते हुए देखते दिखाते अपना बल बताते थे।
यही खेल ‘सतोलिया’ का बना, खासकर पश्चिम भारत में यह खेल शुरु हुआ, यह आज भी है और संयोग से संक्रांति पर खेला भी जाता है। पहाडी प्रदेशों में पेडों की लकडियो से गेंद् को घुडाते हुए पारे या सीमा को लांघने का खेल विकसित हुआ। यह आज भी गीडा डोट के नाम से ख्यात है।
कई बार सुनाया जाता है कि फाहयान के साथ जो अन्य लोग इधर आए, गुड़ी या पतंग जैसा खेल लेकर आए। पतंग से आशय सूर्य होता है, जिसके नाम से पश्चिम भारत वाले भली भांति परिचित थे। ये खेल आज भी इधर लोकप्रिय हैं…। रही बात दान-पुण्य की वह तो उपज निपज के कारण कृषि प्रधान समाज में था ही, जलीय प्रदेशों में यह स्नान के पर्व के रूप में ख्यात हुआ और इस तरह एक मिला जुला पर्व बना मकर संक्रांति।
मध्यकाल में, खासकर 10वीं सदी के आसपास सक्रांति को देवी का रूप मान लिया गया और उसके बनाव, शृंगार सहित खान-पान, देखने, चलने आदि की क्रियाओं पर विचार करके मौसम और साल भर के लेखा जोखा पर विचार हुआ और फिर संहिता तथा मुहूर्त ग्रंथों में उन सबको लिखा गया और लिखा ही जाता रहा। लगभग तीन सौ सालों तक, भविष्यपुराण भी इससे न्यारा नहीं है। क्या आप जानते हैं कि भविष्यपुराण में कई भविष्यपुराण हैं!
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अभी तो आपके शब्दों में मकर मंगलम् …
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पौषमासे मकरे च यदा सूर्यायनं भवेत् |
चत्वारिंशद्घटिका वै पुण्यकालो विशेषतः||
दानस्नानार्चनाद्यं तु कर्तव्यं तिललड्डुकाः|
मिष्टान्नानि च देयानि ह्यनाथेभ्यो विशेषतः|
गवां ग्रासादि देयं च श्राद्धं पुण्यप्रदं तथा||
जय जय।
( अल्प संशोधन के बाद पुन: पोस्ट)
*चित्र सौजन्य : (स्व.) डॉ. दलजीत कौर और फेसबुक