Posted in राजनीति भारत की - Rajniti Bharat ki

वेनेजुएला के राष्ट्राध्यक्ष को अमरीका उठा कर ले आयी, और तख्ता-पलट की योजना बन रही है। डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ऐसी क्षमता किसी अन्य देश में नहीं। इससे एक कहानी याद आयी, जो भारत से जुड़ी है, और सकारात्मक रूप में जुड़ी है

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अगर एक नाम आप नेपाल में कई स्थानों पर पाएँगे, तो वह है- त्रिभुवन।

त्रिभुवन हवाई अड्डा। त्रिभुवन विश्वविद्यालय। त्रिभुवन स्टेडियम। त्रिभुवन चौक। त्रिभुवन नगर। आधुनिक नेपाल के पहले शाह हुए त्रिभुवन शाह। राजपरिवार को गोली मारी गयी त्रिभुवन सदन में।

यूँ तो त्रिभुवन शाह 1911 में ही राजा बन गए थे, लेकिन तब उनकी उम्र महज पाँच वर्ष थी। असल सत्ता राणा के हाथ में थी। जब त्रिभुवन युवा हुए, तो राजपरिवार के मन में स्वाभाविक रूप से सत्ता की आशा जगी। जनता की एक प्रजा परिषद भी राणा के विरोध में आंदोलन कर रही थी। ब्रिटिश सरकार राणा के साथ थी, क्योंकि गुरखा विश्व युद्ध में लड़ रहे थे। इसलिए राणा के लिए इन जन-आंदोलनों को दबाना मुश्किल न था।

मामला तब उलझ गया, जब ब्रिटिश भारत छोड़ कर चले गए। अब भारत की बागडोर पंडित जवाहरलाल नेहरू के हाथ थी। वह नेपाल में किसका साथ दें? राजा त्रिभुवन का या प्रधानमंत्री मोहन शमशेर राणा का?

फरवरी 1950 में प्रधानमंत्री मोहन राणा जब नेहरू से मिलने दिल्ली आए तो उन्हें इक्कीस तोपों को सलामी दी गयी। उनसे चीन में हुई माओ क्रांति के बाद नेपाल की स्थिति पर विमर्श हुआ। उसके बाद की घटनाओं पर कुछ ठीक-ठीक कहना कठिन है कि भारत सरकार आखिर क्या चाहती थी। मैं पहले वर्णित घटना लिख देता हूँ।

‘6 नवंबर 1950 को राजा त्रिभुवन शाह ने नागार्जुन अभयारण्य जाने की आज्ञा मांगी, और सपरिवार राजमहल से निकल पड़े। उनके साथ उनके पुत्र महेंद्र और बड़े पोते वीरेंद्र थे (छोटे पोते ज्ञानेंद्र साथ नहीं थे)। जैसे ही उनका क़ाफ़िला महाराजगंज के भारतीय दूतावास के निकट पहुँचा, वह चिंतित मुद्रा में बायीं तरफ़ देखने लगे। दूतावास से सी. पी. एन. सिंह ने इशारा किया, गाड़ी दूतावास में घुस गयी और झट से दरवाजे बंद कर दिए गए। शाही सेना बाहर ही रुक गयी।’

नेपाल राजपरिवार को भारत ने उनकी ही मर्जी से हाइजैक कर लिया था।

1950 में नेपाल के राजपरिवार को कड़ी सुरक्षा के बीच से उठा कर दिल्ली ले आना कोई साधारण बात नहीं थी। इसमें कोई दो राय नहीं कि यह सब लंबी प्लानिंग के बाद ही हुआ होगा। इसके कई क़िस्से हैं, जिस पर पूरी वेबसीरीज़ ही बन जाएगी।

पटियाला महाराज ने एक जर्मन महिला फिजियोथेरापिस्ट एरिका को काठमांडू राजमहल भेजा। उनसे राजा त्रिभुवन को प्रेम हो गया, और वह नियमित मिलने लगी। भारत ने पटियाला के ही सरदार सुरजीत सिंह को पहला राजदूत बना कर काठमांडू भेजा, जो एरिका के पुराने परिचित थे। धीरे-धीरे मिठाई के डब्बों में संदेश जाने लगे। आखिर एक फार्महाउस पर किसान के भेष में राजा त्रिभुवन की सरदार जी से मुलाकात हुई।

उसके बाद सरदार सुरजीत सिंह का कार्य खत्म हुआ, क्योंकि आगे की योजना के लिए किसी शातिर बुद्धि की ज़रूरत थी। इसके लिए पटेल और नेहरू ने पटना विश्वविद्यालय के कुलपति चंडेश्वर प्रताप नारायण सिंह को चुना। वह नेपाल के राजदूत बन कर गए और राजपरिवार को भगा लाने में सफल हुए।

नेपाल के प्रधानमंत्री मोहन बहादुर राणा ने सभा बुलायी और कहा,

“भाई भरदार, संत महंत, साहू महाजन रा सरकारी कर्मचारी! महाराज त्रिभुवन, राजकुमार महेंद्र और उनके पुत्र राजकुमार वीरेंद्र भारत सरकार की शरण में चले गए हैं। ऐसी स्थिति में आप लोगों की सहमति से राजकुमार ज्ञानेंद्र को महाराज बनाने का प्रस्ताव रखता हूँ”

ज्ञानेंद्र विक्रम शाह उस समय चार वर्ष के बालक थे। उन्हें जब राजसिंहासन पर बिठाया गया, वह बच्चों की तरह उत्साहित थे। अगले महीनों में मोहन राणा ने भारत पर आरोप लगाया कि वह मधेश (बिहार सीमा के निकट) के रास्ते हिंसक गृह-युद्ध को बढ़ावा दे रही है। ऐसी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

इस आखिरी प्रोजेक्ट के बाद दिसंबर 1950 में सरदार वल्लभभाई पटेल का देहांत हो गया। दो महीने बाद फरवरी में राजा त्रिभुवन शाह का नेपाल में शाही स्वागत हुआ। एक सदी से चली आ रही राणा की सत्ता समाप्त हुई।

[इसी पेज पर पूर्व प्रकाशित नेपाल डायरी से एक अंश]

Posted in हिन्दू पतन

अफ्रीका में एक देश है गाम्बिया . बेहद गरीब और पिछड़े क्षेत्रों में आता है , कभी ये इलाका बेहद हरा भरा हुआ करता था और यहाँ धरती ही माँ बन कर यहाँ के निवासियों का भरण पोषण किया करती थी लेकिन अचानक ही उस पर अंग्रेजों की नजर गयी और विश्व विजय बनने के उन्मादी अंग्रेजों ने वहां धीरे धीरे जड़ें जमानी शुरू की . आख़िरकार अंग्रेज इसमें सफल भी रहे और उन्होंने जाम्बिया को जीत लिया और अपना गुलाम बना लिया. उन्हें यहाँ के बलिष्ठ लोग अपने लिए एक सस्ते गुलाम के रूप में दिखने लगे और धीरे धीरे सारा गाम्बिया उनकी गिरफ्त में आ गया .
लेकिन जहाँ दमन होता है वहां क्रान्ति जरूर होती है और गाम्बिया में भी कुछ ऐसा ही हुआ . गाम्बिया में जनजातियाँ थी और उन्होंने अंग्रेजों से लोहा लेना शुरू किया . चरखे और बिना खड्ग बिना ढाल नहीं बल्कि सीधे सीधे तीर और तलवारों से . आख़िरकार काफी लम्बे संघर्ष के बाद वहां के लोगों ने स्वतंत्र गाम्बिया के दर्शन 1965 में किये . जाते जाते अंग्रेज गाम्बिया में भी धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत थोप कर चले गये और गाम्बिया के मूल लोग 1965 से खुद को धर्मनिरपेक्षता के रंग में रंग लिए, इस आशा के साथ कि उनके साथ सभी लोग धर्म निरपेक्ष हैं …
लेकिन वहां मुस्लिम आबादी धीरे धीरे बढती गयी .. कुछ लोगों के धर्मांतरण हुए तो दूसरी तरफ जनसंख्या वृद्धि में अन्य काफी पिछड़ गये और धीरे धीरे वहां मुस्लिम आबादी बढ़ कर इस हालत में आ गयी की वहां इस्लामिक कानून की मांग और शरिया आदि की चर्चाएँ शुरू हो गयी . यद्दपि बाकी अन्य इस बात को ले कर खुश थे कि वहां का सिद्धांत और कानून धर्म निरपेक्ष है और वो वहां बना रहेगा . लेकिन धीरे धीरे जब वहां मुस्लिम आबादी 90% पार हो गयी तो अचानक ही 2015 में धर्मनिरपेक्षता के सभी सिद्धांत अचानक ही टूट गये और राष्ट्रपति के तौर पर इस्लामिक चेहरा याहया ने पद सम्भाला ..आबादी 90% हो जाने के कारण उन्हें प्रचंड जीत मिली और विपक्षी धर्मनिरपेक्ष की जमानत जब्त होने की नौबत आ गयी और वो नाम मात्र के विपक्ष बन कर रह गये .
अचानक ही वहां के राष्ट्रपति ने 11 दिसम्बर 2015 को विधिवत घोषणा कर दी कि अब गाम्बिया कोई सेकुलर मुल्क नहीं बल्कि एक इस्लामिक देश है और सभी को वहां के नियम और कायदे पालन करने होंगे . जो भी इस नियम और कायदे को पालन करेगा उसको उस देश में रहने का अधिकार है . इस फैसले से अचानक ही धर्मनिरपेक्ष बन कर जीने वालों के पैरों तले जमीन खिसक गयी और उन्होंने खुद को ठगा सा पाया . लेकिन तब तक संसद , सरकार . अदालत , फ़ौज . पुलिस सब कुछ राष्ट्रपति के अधीनस्थ था और वहां के लोगों को इस कानून को मानने पर बाध्य होंगा पड़ा .
आज वहां के अल्पसंख्यक हो चुके गैर इस्लामिक लोग मात्र दोयम दर्जे के नागरिक बन कर रह गये हैं जिनका शायद ही कोई ध्यान रखने वाला हो . गाम्बिया के राष्ट्रपति याहया को इस फैसले के लिए किसी भी मानवाधिकार , अन्तराष्ट्रीय अदालत , संयुक्त राष्ट्र , नाटो आदि की सहमित लेने की जरूरत नहीं हुई और अब गाम्बिया एक शुद्ध इस्लामिक मुल्क बन चुका है जहाँ धर्म निरपेक्षता की बात भी करना गुनाह के समान है . जागो और जगाओ
कुछ वर्षों के बाद भारत मे भी ऐसा ही होने वाला है ।।
*छद्म धर्म निरपेक्षता*

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મેવાડના મહારાણા શંભુસિંહ અને 1868નો ભીષણ દુકાળ
ઈ.સ. 1868માં જ્યારે મેવાડમાં ભીષણ દુકાળ પડ્યો, ત્યારે મહારાણા શંભુસિંહે તે જમાનામાં લાખો રૂપિયા ખર્ચીને બહારથી અનાજ મંગાવ્યું હતું. રિયાસતી (રાજ્યના) રેકોર્ડ મુજબ, આ દુકાળ દરમિયાન ઉદયપુરમાં 11 લાખ 63 હજાર લોકોને ભોજન કરાવવામાં આવ્યું હતું. (આ ભોજન લેવા માટે ઉદયપુર બહારથી પણ મોટી સંખ્યામાં લોકો આવ્યા હતા).
દુકાળની સાથે સાથે કોલેરા જેવી બીમારી પણ ફેલાવા લાગી, જેના કારણે અનેક લોકોના મૃત્યુ થવા લાગ્યા. તે સમયે ઉદયપુરમાં માત્ર પિછોલા તળાવમાં જ થોડું પાણી બાકી રહ્યું હતું. આ ગંભીર પરિસ્થિતિ જોઈને મંત્રીઓએ મહારાણાને વિનંતી કરી કે, “આપ સુરક્ષા ખાતર અહીંથી થોડા ગાઉ દૂર ચાલ્યા જાવ.” પરંતુ મહારાણાએ મક્કમતાથી જવાબ આપ્યો કે:
“આવી વિપત્તિના સમયે જે શાસક પોતાની પ્રજાના કામમાં ન આવી શકે, તે શાસક કહેવડાવવાને લાયક નથી.”

મહારાણા શંભુસિંહે જનતાને આદેશ આપ્યો કે, મૃતકોના અંતિમ સંસ્કાર પછી સ્નાન કરવા માટે અને તરસ્યા લોકોને પાણી મળી રહે તે માટે લોકોએ પિછોલા તળાવની આસપાસ જ આવી જવું જોઈએ. આ રીતે મહારાણાના સત્કર્મો અને સૂઝબૂઝથી હજારો લોકોના જીવ બચી ગયા.
(આ ફોટો મહારાણા શંભુસિંહજીનો છે. તેઓ મેવાડના એવા પ્રથમ મહારાણા હતા જેમનો ફોટો કેમેરા દ્વારા લેવામાં આવ્યો હતો.)
જય રાજપુતાના 🚩
લેખક: તનવીર સિંહ સારંગદેવોત