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एक बालक मदरसे से पढकर आया और अपनी अम्मी से पूछा, ‘अम्मी मैंने सुना है कि मुझे नवजात अवस्था में किसी काफिर औरत ने अपना दूध पिलाया था।’’
‘‘हां मेरे लाल।’’
‘‘मैं उसे देखना चाहता हूं, आजकल कहां रहती हैं।’’
‘मगर क्यों?’’
‘दूध का कर्ज अदा करना है।’’
‘‘अच्छी बात है।’’ उस औरत ने दायी का पता बता दिया। उस बालक ने जाकर उस औरत से कहा कि ‘मैंने सुना है कि तुमने मुझे अपना दूध पिलाया है, इसका कर्ज मुझे चुकाना है, इसलिए आप इस्लाम कबूल करें।’
उस औरत ने इस्लाम कबूलने से मना कर दिया तो उस बालक ने उस औरत के स्तन काटकर उसकी हत्या करते हुए कहा,‘हरामजादी मुझे अपना दूध पिलाकर काफिरों के प्रति मेरे दिल में हमदर्दी भरना चाहती थी। भला हो उस्ताद का कि उसने मुझे अल्लाह का सही रास्ता बता दिया उसके बाद उसने अपनी अम्मी का सिर भी कलम किया और कहा, ‘बुढिया अपना दूध नहीं पिला सकी और काफिर का दूध मेरी नसों में भरवा दिया, मैंने गुनाह करने वाले और करवाने वाले दोनों को ही मार दिया, अब दुनिया के काफिरों का खात्मा करने के लिए मेरे हाथ नहीं कांपेंगे।’’
इस घटना के वर्षो बाद वह लुटेरा और आतंकवादी बन गया और कई राजाओं को मारकर अपनी तानाशाही स्थापित की और इस्लाम की तरक्की में जी जान से जुटकर काफिरों का कत्लेआम करने लगा।
एक बार एक नगर में उसके सामने बहुत सारे हिन्दु बंदी पकड़ कर लाये गए। तानाशाह को उनके जीवन का फैसला करना था। उन बंदियों में तुर्किस्तान का मशहूर कवि अहमदी भी था।
तानाशाह ने दो गुलामों कि ओर इशारा करके अहमदी से पूछा – “मैंने सुना है कि कवि लोग आदमियों के बड़े पारखी होते हैं। क्या तुम मेरे इन दो गुलामों की ठीक-ठीक कीमत बता सकते हो?”
अहमदी बहुत निर्भीक और स्वाभिमानी कवि थे। उन्होंने गुलामों को एक नज़र देखकर निश्छल भाव से कहा“इनमें से कोई भी गुलाम पांच सौ अशर्फियों से ज्यादा कीमत का नहीं है।”
“बहुत खूब”– तानाशाह ने कहा – “और मेरी कीमत क्या होनी चाहिए?”
अहमदी ने फ़ौरन उत्तर दिया -“पच्चीस अशर्फियाँ”।
यह सुनकर तानाशाह की आँखों में खून उतर आया। वह तिलमिलाकर बोला – “इन तुच्छ गुलामों की कीमत पांच सौ अशर्फी और मेरी कीमत सिर्फ पच्चीस अशर्फियाँ! इतने की तो मेरी टोपी है!”
अहमदी ने चट से कहा “बस, वही तो सब कुछ है! इसीलिए मैंने तुम्हारी ठीक कीमत लगाई है”।
जानते है ये तानाशाह कौन था…….?
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आतंकवादी तैमूर लंगड़ा ।

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सोचिए कांग्रेसी कुत्ते कितने नीच होते हैं

आज इन कांग्रेसी कुत्तों के पेट में दर्द है कि मोदी ने शेख  हसीना को भारत में क्यों शरण दिए हैं

लेकिन इन कांग्रेसी कुत्तों की अम्मा इंदिरा गांधी ने शेख हसीना के लिए क्या किया आप सुनकर दंग रह जाएंगे

1971 में शेख मुजीबुर रहमान पाकिस्तान की कैद में थे तब बांग्लादेश में पाकिस्तानी सैनिकों ने उनके पूरे परिवार को कैद किया था और उनका सामूहिक कत्लेआम करने का प्लानिंग था

तब इंदिरा गांधी ने भारतीय सेना को कहा था कि आप शेख मुजीबुर रहमान के परिवार को किसी तरह भारत लाइए

और कर्नल अशोक तारा को यह जिम्मेदारी दी गई कि वो शेख मुजीबुर रहमान के पूरे परिवार को बचाकर भारत लाएं

कर्नल अशोक तारा अपनी जान की बाजी लगाकर पाकिस्तानी सैनिकों से भिड़े और उन्होंने शेख मुजीबुर रहमान के परिवार को जिसमें शेख हसीना बाजी शेख रिहाना वासी शेख मुजीबुर रहमान के तीनों बेटे उनकी पत्नी को पाकिस्तानी सैनिकों के चंगुल से मुक्त किया

एक तस्वीर में मोदी जी और कर्नल अशोक तारा है जब भी शेख हसीना भारत आती थी तो उनसे जरूर मिलती थी

बाद में 1975 में शेख मुजीबुर रहमान, उनकी पत्नी उनके तीनों बेटे यहां तक कि उनका 10 साल का बेटा उनकी दोनों पुत्रवधू  और बड़े बेटे का 4 साल के बच्चे को यानी सब को बांग्लादेश की सेना द्वारा क़त्ल कर दिया गया

फिर कत्लेआम करने वाला बांग्लादेशी सेना का कर्नल खंडेकर मुस्ताक अहमद ने जब घर के नौकर से पूछा कि शेख मुजीबुर रहमान की दोनों बेटियां कहां है तब पता चला कि उनकी दोनों बेटियां पेरिस जाने के लिए निकल गई और यह सुनकर कत्लेआम की साजिश रचने वाले सैन्य अधिकारियों को बहुत अफसोस हुआ कि उनकी दो बेटियां बच गई है

शेख मुजीबुर रहमान की दोनों बेटियां शेख हसीना वाजेद अपने पति परमाणु वैज्ञानिक डॉक्टर वाजेद और शेख रेहाना पेरिस जा रही थी उस वक्त ढाका से पेरिस की डायरेक्ट लाइट नहीं थी इसलिए वह ब्रुसेल्स   में रुककर कुछ दिन बाद पेरिस जाने वाले थी

और वह ब्रुसेल्स  स्थित बांग्लादेश के दूतावास गई  4 घंटे बाद पता चला कि बांग्लादेश में तख्तापलट हो गया है तब बांग्लादेश के दूतावास ने उन्हें दूतावास में रुकने  से रोक दिया

फिर जैसे ही खबर ब्रेक हुई कि शेख मुजीबुर रहमान और उनके पूरे परिवार की हत्या हो गई है और उनकी दोनों बेटियां विदेश में है उसके बाद इंदिरा गांधी ने उन्हें भारत बुलाने का पूरा इंतजाम किया

ब्रुसेल्स में भारतीय राजदूत ने ही कार की व्यवस्था किया और उन्हें जर्मनी भेजा फिर जर्मनी में भारतीय राजदूत वाई के पूरी ने दोनों बहनों यानी शेख हसीना वाजेद और शेख  रेहना तथा शेख हसीना वाजिद के पति डॉक्टर वाजेद को सरकारी आवास में रखा

इंदिरा गांधी ने भारत के दूतावास को कहा कि इनको बहुत सिक्योरिटी में रखो क्योकि  उस वक्त जो बांग्लादेश का  तानाशाह कर्नल खन्दकार मोशताक अहमद सत्ता पलट कर के राष्ट्रपति बना था वह हर कीमत पर इन दोनों बहनों का कत्ल करना चाहता था

इंदिरा गांधी ने फिर  एयर इंडिया का विशेष विमान से उन्हें गुपचुप तरीके से दिल्ली लाया

उसके बाद उनकी सुरक्षा की विशेष व्यवस्था की गई क्योंकि बांग्लादेश की मिलिट्री  सरकार इन दोनों बहनों का किसी भी कीमत पर खात्मा करना चाहती थी

शेख़ हसीना को इंडिया गेट के पास पंडारा पार्क के सी ब्लाक में एक बंगला आवंटित कर दिया गया.

दो बंगाली अधिकारियों को उनकी घर की सुरक्षा में तैनात किया गया ताकि वह बांग्ला में उनसे बातचीत कर सकें

एक थे कर्नल सत्तो घोष और दूसरे थे 1950 बैच के आईपीएस अधिकारी IG  पी के सेन.  ये दोनों अधिकारी साए की तरह हसीना के साथ रहते थे.”

हसीना के पति डाक्टर वाज़ेद को भी परमाणु ऊर्जा विभाग में फ़ेलोशिप प्रदान कर दी गई. और उन्हें परमाणु ऊर्जा विभाग में एक अच्छी नौकरी भी दे दी गई

6 सालों तक शेख हसीना  के पूरे परिवार को भारत सरकार ने अपने शरण में और बेहद चुस्त सरकारी व्यवस्था में रखा जिसका पूरा खर्चा भारत सरकार उठा रही थी

शेख हसीना की छोटी बहन शेख रेहाना कोलकाता स्थित शांति निकेतन में पढ़ना चाहती थी भारत सरकार ने उनका दाखिला वहां करवाया लेकिन जब IB को भनक लगी बांग्लादेश सरकार शेख रिहाना के कत्ल की साजिश रच रही है तब उन्हें  दिल्ली लाया गया

24 जुलाई, 1976 को शेख़ रेहाना ने  लंदन में अपने दोस्त  शफ़ीक सिद्दीकी से शादी किया शादी करने का पूरा खर्चा भी भारत सरकार ने उठाया था और शेख रेहाना को दिल्ली से लंदन एक विशेष विमान में भेजा गया था

इस तरह कुल 6 साल  8 महीने  भारत में सरकारी खर्चे पर शेख हसीना उनकी बहन रेहाना अपने परिवार के साथ रहे।
   ताकि सनद रहे

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एक बार की बात है एक गाँव में एक खड़ूस बुढ़िया के यहाँ एक कुत्ता पला हुआ था कालू….
अब कालू की हालात बड़ी पतली…. रोटी दो मिलती तो लातें दो सौ…
जब दिल करता बुढ़िया कालू को लतिया देती…. बेचारा रोता कांय कांय करता भागता….. कभी डंडा पड़ जाता तो महीनों लंगड़ाता घूमता….
पेट भरने को इधर उधर मुंह मारता…. लेकिन साँझ ढलते ही मालकिन क़ी ड्योढ़ी पर पहरे पर बैठ जाता… जो द्वार से गुजरे उसपर भोंकता….
कालू की वफादारी देख अड़ोस पड़ोस के कई परिवारों ने उसे रोटी फैकी….. हड्डी भी डाली के कालू सायद उनके द्वार बैठे….. कालू के भी दिन फिरें और उनको भी वफादार कुत्ता मिले…… पर कालू टस से मस न हुआ…
कालू के दोस्तों ने उससे पूछा रे भाई कालू जे बता इतनी बेज्जती मार के बाद भी तू बुढ़िया क़ी पालतूगीरी काहे न छोड़ता….. कोई और द्वार देख ले…
तब कालू ने राज खोला “भाई जे बात तो सही है के बड़ी बेज़्ज़ती है…. मार पडती है…. पेट भी न भरता… पर जब भी इस बुढ़िया क़ी इसकी सुन्दर जवान लोंड़िया से लड़ाई होती है ये उसे कहती है तेरा ब्याह तो इस कालू से करुँगी….. तो भाई उम्मीद पर जी रहा हूँ…. क्या पता कर ही दे”
कांग्रेस के हर नेता का हाल कालू वाला है… देश भर की गा•ली खा… लानते झेल और सच जानते समझते हुए भी ये इसी उम्मीद में जी रहे हैं… पड़े
हैं…
क्या पता कल को पप्पू PM बन जाये…. हमें फिर घोटाले करने… लुट मचाने… देश बेचने का मौका मिले…
क्या पता बुढ़िया लौंडिया का ब्याह कालू से कर ही दे😁

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ऋषिकेश में गङ्गा किनारे चार दिन की सड़ी हुई एक लाश मिली थी। भीड़ इकट्ठी हो गयी, पुलिस बुला ली गयी। सबने लाश से बार बार पूछा- “लाश! कौन हो तुम?”

लाश का मुँह सड़ गया था। वह कुछ बोल नहीं पा रही थी। भारत में पुलिस के आगे जिन्दे लोग नहीं बोल पाते, वह तो फिर भी लाश थी। हाँ, उसके कपड़ों ने बताया- वह एक बूढ़ी बंगालन स्त्री थी।

किसी ने कहा कि मुक्ति मिल गयी। किसी ने परिजनों के लिए धिक्कार की गालियां गढ़ीं। पुलिस ने चौकीदारों से लाश को तिरपाल में लपेटवाया और ले गयी। चौकीदारों ने मन ही मन गालियां दी- “ऐसी नौकरी तो साली दुश्मन को भी न मिले…”

पुलिस मुख्यालय में अधिकारी महीनों तक लाश से उसका परिचय पूछते रहे। बीच बीच में कुछ पत्रकारों ने भी पूछा, शहर की समाजसेवी संस्थाओं के लोगों ने पूछा, उस इलाके के नेताओं ने पूछा, पर कोई उत्तर नहीं मिला।

इन सबने मिल कर महीनों तक कड़ियां जोड़ीं। जाँच हुई, गायब हुए लोगों का पता किया गया,अंदाजे लगाए गए। अब लाश बोलने लायक हुई। लाश जानती थी कि यह जादुई यथार्थवाद का युग है, सो उसने बोलने के अनुरोध को स्वीकार कर लिया। इंस्पेक्टर ने अबकी पूछा तो लाश सुगबुगाई। पुलिस को बल मिला, इंस्पेक्टर ने पूछा- “बुढ़िया बता! किसकी लाश है तू?”
लाश बोली- “बीना दास (वीणा) को जानते हो दारोगा साहब?”
“कौन बीना दास? मैं नहीं जानता किसी बीना वीणा को…”
“पद्मश्री बीना दास! सुभाष चन्द्र बोस के गुरु बेनीमाधव दास और समाजसेवी कमला देवी की पुत्री बीना दास। वही बीना, जिसे अंग्रेज गवर्नर को गोली मारने के कारण कालापानी की सजा हुई थी। जिसने सेलुलर जेल में दस वर्ष काटे थे।”
“हैं?? यह कौन सी कथा है रे बुढ़िया? मैंने तो कभी नाम तक नहीं सुना…” इंस्पेक्टर झुंझला गया था।
लाश ठहाके लगा कर हँसने लगी। कुछ देर बाद बोली- “कोई बात नहीं साहब! आजाद भारत क्यों याद रखे स्वतन्त्रता संग्राम को? सुख के दिनों में दुख की कथाएँ कौन गाये…”
“अच्छा तो तू ही बता दे उनके बारे में…” सब एक साथ चीखे।
लाश हँसी। बोली, ” सुनो! बीना के पिता बंगाल के क्रांतिकारियों में प्रतिष्ठित और पूज्य थे। उसकी माँ लड़कियों के लिए विद्यालय चलाती थी। बचपन से ही उसने सुभाष बाबू को अपने घर आते देखा था और उनसे बहुत प्रभावित रहती थी।”

सबकी निगाह लाश पर जम गई थी। वह बोलती गयी, “कलकत्ता विश्वविद्यालय से उसने बीए की परीक्षा पास की थी। दीक्षांत समारोह के दिन ही उसने अपने जीवन को सार्थक करने का मन बनाया था। इस काम में उसके पिता और मां दोनों उसके साथ थे। माँ ने जाने कहाँ से ला कर उसे भरी हुई पिस्तौल दी थी।

विश्वविद्यालय में डिग्री बांटने के लिए गवर्नर स्टैनली जैक्शन आया था। वह जैसे ही मंच पर खड़ा हुआ, वीणा उठ कर आगे बढ़ी, और फायर झोंक दिया। गोली गवर्नर की कनपट्टी को छूती हुई निकक गयी। वह दूसरा फायर करती तबतक इंस्पेक्टर सोहरावर्दी ने एक हाथ से उसका गला पकड़ लिया, और दूसरे हाथ से उसके पिस्तौल वाले हाथों को ऊपर उठा दिया। वह फिर भी फायर करती रही। उसके पांचों फायर बेकार गए…”

सबके चेहरे पर आश्चर्य पसरा हुआ था। वे सन्न पड़े चुपचाप सुन रहे थे। लाश ने कहा, ” उसके बाद केस चला, दस साल की सजा हुई। सन 1939 तक सजा काटी। छूटने के बाद फिर आंदोलनों में सक्रिय हो गयी। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी जेल गयी…”
“फिर?”
“फिर 1947 में देश आजाद हुआ तो बीना ने विवाह कर लिया। आयु 36 की हो गयी थी, पर सोचा कि अब सुखी जीवन जीने के दिन हैं… पर शायद ईश्वर को मंजूर नहीं था। पति का देहांत हुआ और फिर आगे पीछे कोई न दिखा! बीना ऋषिकेश आ गयी। एक स्कूल में पढ़ाती, उसी से खर्च चल जाता।”
“फिर?”
“फिर क्या? एक दिन आया जब उम्र देह पर भारी पड़ने लगी। पढ़ाने की शक्ति नहीं रही। कुछ दिन इधर उधर से मांग कर पेट भर लिया… और एक दिन सड़क पर चलते चलते ठोकर लगी,ऐसी गिरी कि उठ न सकी… वहीं से निकल ली।”
“ओह… हे भगवान! तुम.. आप वही हैं?”
” हाँ जी! पर दुखी मत होवो आपलोग! जब मैं दुखी नहीं तो तुमलोग क्यों हो रहे हो? मुझे मेरा देश बहुत प्रिय है। मैं यहाँ मर कर भी बहुत प्रसन्न हूँ।”
“लेकिन सरकार को तो आपकी व्यवस्था करनी चाहिये थी। इतनी बुरी मृत्यु… उफ्फ!”
“सरकार तो सरकार ही होती है जी, वह अंग्रेजों की हो या भारतीयों की हो… कुछ नहीं बदलता! जिसे देश की जनता भूल जाय उसे सरकारें क्या याद रखेंगी।”

भीड़ छंटने लगी। सब अपने अपने काम में लगे। लाश भी जला दी गयी। पर इंस्पेक्टर के साथ कुछ गड़बड़ हो गया। वह जब भी अपने कार्यालय में टंगा भारत का नक्शा देखता तो उसे उसमें लाश की तस्वीर दिखती, और तब उसकी आँखों में केवल लज्जा होती थी।

Sarvesh Kumar Tiwari के लेख में थोड़ी एडिटिंग के बाद

#स्मृति_ताकि_हम_भूलें_न
#Smriti_lest_we_forget
#UnsungHeroine
#पुण्यतिथि

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भगवान का शुक्र है कि उस दौर में सोशल मीडिया नहीं था नहीं तो राहुल गांधी से भी बड़े थे राजीव गांधी।

आज कुछ किस्से मै आपको बताने जा रहा हूं जिसे पढ़कर आप दंग रह जाएंगे कि राजीव गांधी जैसे लोग इतने बड़े देश के प्रधानमंत्री भी थे..?

उनके पास सिर्फ एक ही योग्यता थी कि वो फिरोज गांधी के बेटे थे… उफ्फ माफ करना… वो पंडित नेहरू के नाती (नवासे) थे।

पूरा लेख कमेंट में है अंत तक पढ़िए….

5-7 मिनट लगेगा… पर आज राजीव गांधी के बारे में ऐसी बातें जानेंगे कि जो आपको पहले से पता नहीं होगीं..

राजीव गांधी कोई पढ़ाई लिखाई में अच्छे नहीं थे 5 सितारा दून स्कूल से स्कूलिंग के बाद 1961 में उन्हें इंजियनीरिंग पढ़ने लन्दन के ट्रिनिटी कॉलेज कैब्रिज भेजा गया,

यहीं पर राजीव से एडवीज अंतोनियो अल्बिना माइनो जिन्हें आज हम सोनिया गांधी के नाम से जानते हैं के सम्पर्क में आये,

1965 तक वो प्यार में डूबे रहे निरंतर फेल होते रहे और पास नहीं हो सके जिसके बाद कॉलेज ने राजीव को निकाल दिया,

फिर राजीव ने 1966 में लन्दन स्थित इम्पीरियल कॉलेज में मैकेनिकल इंजीनियरिंग में दाखिला लिया, किन्तु वहां भी फेल हुए,

उसी वर्ष राजीव की मां इंदिरा प्रधानमंत्री बनी और राजीव भारत आ गए, 1966 में दिल्ली फ्लाइंग क्लब ज्वाइन किया और प्लेन उड़ाना सीखा…

अब 1970 में प्रधानमंत्री इंदिरा ने जुगाड़ लगवा कर राजीव को सरकारी एयरलाइंस एयर इंडिया में कमर्शियल पायलट के तौर पर नौकरी में लगवा दिया,

1971 में भारत पाक युद्ध हुआ भारतीय सेना व् वायु सेना को लाजिस्टिक स्पोर्ट के लिए पायलट्स की आवश्यकता थी और एयर इंडिया के कमर्शियल पायलट्स को रसद व् हथियार एयर ड्राप करने हेतु बुलाया गया,

सारे के सारे पायलट्स तुरन्त युद्ध क्षेत्र में सेवाएं देने को आ गये सिवाय एक के और वो राजीव गांधी थे

जो डर के मारे सोनिया गांधी संग व् इटली के दूतावास में जा छिपे थे,

1980 में संजय गांधी की मृत्यु के बाद राजीव राजनीती में आये…

1984 में इंदिरा गांधी को उनके अंगरक्षकों ने दोपहर में गोली मार दी, राजीव गांधी ने भावनाओं से ऊपर उठकर शोक संताप में समय लगाने के बजाय उसी दिन शाम को भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर अपनी तशरीफ़ रख दी,

और कांग्रेसियों को सिखों का नरसंहार करने का आदेश दे डाला, कांग्रेसियों ने स्कूलों के रजिस्टरों और वोटर लिस्ट निकाल निकाल कर सिखों के घर खोजे और घरों में घुसकर हजारों सिखों को काटा.. 😭

महिलाओं से दुष्कर्म किया.. 😭

कई गर्भवती महिलाओं को जीवित ही जला दिया,

कांग्रेस नेताओं के पेट्रोल पंपों से तेल सप्पलाई किया गया सिखों को उनके बच्चो को उनकी सम्पत्तियों को फूंकने हेतु, सड़क चलते सिखों के गले में टायर डालकर जला दिया गया,

यहाँ तक की राष्ट्रपति जैल सिंह को भी नहीं बख्शा गया और जब वो गाड़ी में थे तो उनपर भी कांग्रेसियों ने हमला किया,

गाड़ी के कांच तोड़ दिए गए,

दिल्ली में कांग्रेसियों का हिंसा का तांडव शुरू हुआ और शीघ्र ही ये देश के कोने कोने में फ़ैल गया

और राजीव गांधी ने देश भर में हजारों निर्दोष सिखों को मौत के घाट उतरवाकर इंदिरा की मृत्यु का बदला लिया,

और बाद में राजीव गांधी ने उसे “बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है” वाला ब्यान देकर उसे न्यायोचित ठहरा दिया,

खैर अगले चुनाव हुए और जनता ने राजीव द्वारा करवाये सिख नरसंहार को महत्व दिए बिना राजीव को इंदिरा की सहानुभूति के नाम पर 411 सीटें देकर असीम शक्ति दे दी..

और राजीव ने निरंकुश होकर उस बहुमत का दुरूपयोग किया,

1985 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा शाहबानो को न्याय देकर मुस्लिम महिलाओं के लिए तीन तलाक से बचने और गुजारे भत्ते का जो मार्ग खोला था उसपर आतातायी राजीव ने अपनी अक्ल पर पड़ा बड़ा वाला भीमकाय पत्थर दे मारा..

और अपुर्व बहुमत का प्रयोग कर मुस्लिम तुष्टिकरण का नया अध्याय लिखा और सुप्रीम कोर्ट का निर्णय पलटकर मुस्लिम महिलाओं को पुनः गुलाम बना दिया

भोपाल गैस कांड हुआ हजारों निर्दोष लोगों के हत्यारे यूनियन कार्बाइड के मालिक वारेन एंडरसन को राजीव ने अमेरिकी सरकार से सौदेबाजी कर सुरक्षित अमरीका भेज दिया,

राजीव में न वैश्विक कूटनीति की समझ थी न सैन्य शक्ति के सदुपयोग की अतः अपनी सिमित विवेक क्षमता से ग्रस्त राजीव गांधी ने श्रीलंका में LTTE से लड़ने भारतीय फोर्सेज जबर्दस्ती भेज दीं

और इंडियन पीस कीपिंग फोर्सेस के 1400 सैनिक मरवाये और 3000 सैनिक घायल करवाये

हलांकि बाद में राजीव को थूककर चाटना पड़ा

और सैनिकों को वापस बुलाना पड़ा,

राजीव को अपनी उस गलती के कारण ही श्रीलंका दौरे पर श्रीलंकाई सैनिक द्वारा हमला किया गया था,

और वो पहले व् एकमात्र प्रधानमंत्री बने जिन्हें विदेशी धरती पर विदेशी सैनिक द्वारा अपमानित होना पडा!

1989 में बोफोर्स का घोटाला खुला

जिसमे पता चला की राजीव गांधी ने सोनिया के “करीबी मित्र” जिसे सोनिया अपने संग इटली से दहेज़ में लायी थी और जो सोनिया राजीव के घर में ही रहता था

उस ओटावियो कवात्रोची के द्वारा बोफोर्स सौदे में राजीव ने दलाली खायी थी,

राजनितिक नौटँकियां करने में भी राजीव किसी से पीछे न थे,

टीवी पर आने वाले रामायण सीरियल में राम का पात्र निभाने वाले अरुण गोविल को लेकर राजनितिक यात्राएं शुरू की

हिंदुओं को मुर्ख बनाकर उन्हें उनकी आस्था द्वारा विवश कर उनका वोट हथियाने हेतु,

1991 में Schweizer Illustrierte नामक स्विस मैगज़ीन ने काले धन वाले उन लोगों के नाम का खुलासा किया जिनका अवैध धन स्विट्ज़रलैंड के बैंकों में जमा था

और उसमें राजीव गांधी का भी नाम था…

मैगज़ीन ने खुलासा किया कि राजीव गांधी के 2.5 बिलियन स्विस फ्रैंक स्विट्ज़रलैंड के बैंक के एक अकाउंट में जमा हैं

1992 में टाइम्स ऑफ़ इंडिया और द हिन्दू ने खबरें छापीं की राजीव गांधी को सोवियत ख़ुफ़िया एजेंसी KGB से निरंतर धन मिलता था,

और रूस ने इस खबर की पुष्टि भी की थी और सफाई में कहा था कि सोवियत विचारधारा के हितों की रक्षा हेतु ये पैसे दिए जाते रहे हैं,

1994 में येवगिनिया अल्बट्स और कैथरीन फिट्ज़पेट्रिक ने KGB प्रमुख विक्टोर चेब्रिकोव के हस्ताक्षर युक्त पत्र प्रस्तुत कर ये खुलासा किया कि राजीव के बाद राजीव के परिवार सोनिया और राहुल को KGB की ओर से धन उपलब्ध करवाया जाता रहा है

और KGB गांधी परिवार से निरन्तर कॉन्टैक्ट में रहती है,

अब यदि आप पूरा आकलन करें तो पाएंगे कि राजीव एक औसत से कम समझदार वो व्यक्ति थे जिसने निर्दोष सिख मरवाये,

भोपाल गैस कांड में हजारों निर्दोषों के हत्यारे को भगाया,

मुस्लिमों महिलाओं का जीवन नर्क बनाया,

रक्षा सौदों में दलाली खायी,

KGB जैसी एजेंसी के वो खुद एजेंट थे और उससे पैसे लेते थे, कूटनीति की समझ नहीं थी

और मूर्खतावश श्रीलंका में 1400 भारतीय सैनिकों की बलि चढ़वाई और देश का नाम कलंकित किया,,
अविनाश पाण्डेय,,,,,

Posted in खान्ग्रेस

अब अगर कोई कांग्रेसी चमचा यह कहे की इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए थे

तो उस कांग्रेसी चमचे के गाल पर कांग्रेस का चुनाव निशान छापते हुए पूछियेगा कि इससे भारत को क्या फायदा हुआ ??

बांग्लादेश को बनाने में हमारे सेना के 435 जवान और अधिकारी शहीद हुए

हमारे 36 से ज्यादा हंटर और जगुआर तथा मिग विमान दुर्घटनाग्रस्त हुए

और सबसे बड़ी दुर्घटना हुई थी दीव के समुद्र तट पर जब पाकिस्तान की नेवी ने तारपीडो द्वारा INS खुकरी पर भीषण हमला करके उसे नष्ट कर दिया जिसमें 136 नौ सैनिक मारे गए थे

और उसमें एडमिरल महेंद्र नाथ मुला भी वीरगति को प्राप्त हुए थे

विश्व इतिहास में नेवी की सबसे बड़ी अटैक थी जिसमें भारत ने अपना शानदार युद्धपोत अपने कमांडर और सभी स्टाफ सहित खो दिया था

इसके अलावा पाकिस्तान की जेल में हमारे 56 अधिकारी और सैनिक कैद रहे जिन्हें इंदिरा गांधी कभी वापस ही नहीं लाई

इसके अलावा पाकिस्तान ने गुजरात के कांग्रेसी मुख्यमंत्री बलवंत राय मेहता और उनकी पत्नी सहित 12 लोगों के विमान पर हमला करके मार डाला था

यानी हमने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री को भी उस युद्ध में खो दिया था

बांग्लादेश को बनाने के लिए हम भारतीयों ने बहुत बड़ी कुर्बानी दी है

सबसे बड़ी कुर्बानी यह है की इन बांग्लादेशी सपोलो को पालने के लिए हर भारतीय का घरेलू खर्च उस जमाने में 30% इंदिरा गांधी ने बढ़ा दिया था

सिनेमा हॉल के टिकट पर एक रुपए 20 पैसे अलग से लगा दिए गए थे ट्रेन के टिकट में 75 पैसे की वृद्धि की गई थी सभी राज्यों में बसों के टिकट को एक रुपए से ₹4 तक बढ़ा दिया गया था

यहां तक की पूरे भारत में जितनी भी अनाज मंडी थी उस अनाज मंडी पर ₹1.20 पैसे प्रति क्विंटल सरकार बांग्लादेशी सपोलों को पालने के लिए वसूलते थी

उसके अलावा 400 करोड़ के शरणार्थी बांग्लादेशी शरणार्थी डाक टिकट छापे गए

अगर आपको सैलरी लेनी है तो यह टिकट खरीद कर इस पर दस्तखत करने होते थे ₹100 से ज्यादा के लेनदेन पर यह टिकट चिपका कर उस पर सिग्नेचर करना जरूरी कर दिया गया था जैसे आज रेवेन्यू टिकट है उसी की तरह यह टिकट चलता था

जमीन की रजिस्ट्री हो या कोई भी कोर्ट का काम हो आपको कम से कम ₹5 का बांग्लादेशी शरणार्थी टिकट जरूर चिपकाना होता था

और कहीं भी लेनदेन में आपको इसको खरीदना पड़ता था और इससे जो कमाई होती थी वह बांग्लादेश को जाती थी

इसके अलावा ढाका के इस्कॉन मंदिर ने बीटल्स के जार्ज हैरिसन और रविशंकर जी के साथ मिलकर अमेरिका यूरोप में कई कंसर्ट आयोजित किया ताकि इन भूखे बांग्लादेशियों को खाना दिया जा सके और उस जमाने में इस्कॉन संस्था ने एक करोड़ 40 लाख डॉलर इकट्ठा करके बांग्लादेश को दिया था

और लगभग 5 सालों तक बांग्लादेश के भूखे नंगे लोग इस्कॉन मंदिर में खाना खाते थे

और अब क्या हुआ ?

बांग्लादेशियों ने कुछ साल पहले ढाका के इस इस्कॉन मंदिर को जलाकर नष्ट कर दिया जिस मंदिर ने उन्हें खाना खिलाकर पाला पोषा था

अब वह सपोले भारत का एहसान भूल गए जिस भारत ने उन्हें पाकिस्तान के अत्याचार और दमन से मुक्ति दिलाई आप गूगल पर सर्च करेगा विश्व इतिहास का सबसे बड़ा सामूहिक बलात्कार पूर्वी पाकिस्तान में हुआ था

जनरल टिक्का खान जिसे बांग्लादेश का कसाई यानी बुचर ऑफ बांग्लादेश कहा जाता है उसने मंच से ऐलान किया कि हम इन काले नाटे बंगालियों की नस्ल बदल देंगे और अपने सैनिकों से कहा जहां अभी बंगाली महिला मिले उसके पेट में अपना बच्चा डालो और 2 लाख बंगाली महिलाओं का बलात्कार हुआ था हालांकि बाद में जब पाकिस्तान ने इसकी जांच के लिए एक हमिदुर रहमान कमेटी बनाई तो उसे कमेटी ने कहा कि सिर्फ 45000 महिलाओं का ही बलात्कार हुआ है मतलब उनके लिए 45000 महिलाओं का बलात्कार एक सिर्फ वाली बात थी स्थिति इतनी भयानक थी कि भारत इटली अमेरिका कनाडा ब्रिटेन ने हजारों गाइनेकोलॉजिस्ट बांग्लादेश में भेजे थे पाकिस्तान बंगालियों पर इतना अत्याचार करता था कि पाकिस्तान की आर्मी में कई बंगाली सैन्य अधिकारियों को आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ा था

लेकिन आज यह बांग्लादेशी कौम उसी पाकिस्तान की गोद में बैठकर उस भारत को गालियां दे रही है जिस भारत की वजह से यह जिंदा बचे और जिस का पूरा खर्चा हमने उठाया।

🖋️  जेपी बाबा गोरखपुर वाले

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक बार नेपोलियन अपने सैनिकों से बिछुड़कर एक गांव में पहुंच गया। तभी उसे अपनी ओर आते रूसी सैनिक नजर आए। वह जान बचाने के लिए एक दर्जी की दुकान में घुस गया। दर्जी ने नेपोलियन को एक कालीन में लपेट दिया। रूसी सैनिक दुकान में घुस कर नेपोलियन को तलाश करने लगे। एक सैनिक ने तो अपनी तलवार ही कालीन में घुसेड़ दी। सैनिकों चले गए तो दर्जी ने नेपोलियन को सही-सलामत पाने पर चैन की सांस ली।
नेपोलियन दर्जी से बोला, ‘मैं फ्रांस का सम्राट हूं और तुम्हारी मदद के प्रति कृतज्ञ हूं। तुम्हारी तीन इच्छाएं पूरी करूंगा।’ दर्जी बोला, ‘महाराज, मेरी छत टपकती है, आप मरम्मत करा दें।’ नेपोलियन बोला, ‘दूसरी इच्छा।’ दर्जी बोला, ‘पड़ोस में एक और दर्जी है, उसे आप कहीं और चले जाने के लिए सहमत कर दें।’ नेपोलियन बोला, ‘तुम मुझसे कुछ भी मांग सकते हो। फिर ये छोटी इच्छाएं पूरी करने को क्यों कह रहे हो?’ दर्जी साहस कर बोला, ‘मैं जानना चाहता हूं कि जब रूसी सैनिक की तलवार कालीन में आपके सामने गुजरी तो आपको कैसा लगा?’ तभी नेपोलियन के सैनिक वहां आ पहुंचे। उन्हें देखते ही नेपोलियन बोला, ‘इस दर्जी को मौत के घाट उतार दो।’ और खुद वह घोड़े पर सवार होकर चला गया। सैनिक दर्जी पर गोली चलाने ही वाले थे कि नेपोलियन का सेनापति दौड़ते हुए आया और बोला, ‘सम्राट ने इसे क्षमा कर दिया है।’
दर्जी भागने ही वाला था कि सेनापति ने उसे एक कागज के साथ मोहरों से भरी थैली देकर कहा, ‘सम्राट ने तुम्हारे लिए भिजवाई है।’ कागज पर लिखा था, ‘अब तुम्हें पता चल गया होगा कि मुझे तब कैसा लगा था?’

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જીસસ નામનો કોઈ વ્યક્તિ હતો? અને હોય તો પણ ભારતને શું લેવા દેવા? આ ધરતી પર રામ રામ, કૃષ્ણ, બુદ્ધ, મહાવીર અવતર્યા. તો પછી બહારથી કોઈને આયાત કરવાની જરૂર શું?

શાં માટે શાળાવાળા આ તહેવાર ઉજવે છે? એવી શાળાઓ જેના સંચાલકો હિંદુ, એમાં ભણનારા બાળકો પણ હિંદુ, તો પછી તમારે શાં માટે વિદેશી તહેવાર ઊજવવો છે?

અને અપનાવવી હોય તો સારી વાતો અપનાવાય. ઝાડને તોડીને નિકંદન કાઢવું, બકરા, મરઘાં ઝાપટીને ઉપરથી ખંભા પીયને ટૂન્ન થઈ જવું આ સંસ્કૃતિ નહીં, વિકૃતિ છે.

આપણે લોકો ગરમાગરમ રોટલી, ભાખરી, રોટલાં ખાતા હતા અને તંદુરસ્ત હતાં. આ યીસ્ટ ફૂગ નાખેલી બ્રેડ આવી પછી બધાં બ્રેડ જેવા ઢોલકા જેવા થઈ ગયાં. મારા એક મિત્ર આયુર્વેદિક ડોક્ટર છે, એ મજાકમાં બોલે કે બ્રેડ ખાય એ બ્રેડ જેવા થાય.

જે આપણાં દેશની પ્રકૃતિ સાથે મેચ ન થાય એ વસ્તુ નકામી, પુજા પદ્ધત્તિ અને દેવતાઓ સહિત બધું.

સૌથી પહેલાં તો હિંદુ સંચાલકો અંગ્રેજી આવડતું હોય એવા કોન્વેન્ટ માં ભણાવતા શિક્ષકો ભરતી કરે ત્યાંથી જ મગજમારી છે. આવા શિક્ષકો જ આખી સમસ્યાનુઁ મૂળ છે.

ઘણાં શિક્ષકો મૂલનિવાસી થીયરી ચલાવી બાળકોનું બ્રેઈનવોશિંગ કરે. એને માટે રામ કૃષ્ણ વિદેશી છે પણ જીસસ તારણહાર છે.

આવા અજમેરી લોટા જેવા લોકો ભણ્યા પછીય અક્કલ નથી આવતી કે આપણા દેશનું જે છે એ ગૌરવ છે.

ટૂંકમાં શિક્ષકોને સુધારો અને યોગ્ય શિક્ષણ વ્યવસ્થા હોય તો દેશ સુધરી જાય. બાકી મદ્રેસા અને કોન્વેન્ટ ચલાવીને હિંદુ ધર્મને જ તમે ખતમ કરવાના છો.

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સદભાવના પણ ચેપી હોય છે….


સદભાવના પણ ચેપી હોય છે….

૩૫ વર્ષનો એક યુવાન દરરોજ પોતાની મોટરબાઈક લઈને એક રેસ્ટોરન્ટ પાસે આવતો અને આસપાસ ઊભેલા પાંચ ભિખારીઓને ભોજન માટે ટિફિન બંધાવી આપતો.

એક વખત એ રેસ્ટોરન્ટના માલિકે વાતવાતમાં પૂછ્યું તો યુવાને કહ્યું,

‘મારા પિતાજી કહેતા હતા કે કોઈકને જમાડયા પછી જમવાથી ભોજન પ્રસાદ બની જાય છે અને એ બહુ મીઠું લાગે છે.

હું નાનો હતો ત્યારથી પિતાજીની સાથે આ રીતે ગરીબોને ટિફિન અપાવવા જતો હતો. હવે પિતાજી નથી, પણ એમનું કામ મેં ચાલુ રાખ્યું છે. મને મજા આવે છે.’

એ યુવાન રોજ નિયમિત રીતે રેસ્ટોરન્ટ પાસે આવતો. પાંચ ભિખારીઓને ટિફિન અપાવતો. કાઉન્ટર પર પેમેન્ટ કરીને ચુપચાપ ચાલી જતો.

રેસ્ટોરન્ટનો માલિક અને કેટલાક ભિખારીઓ પણ એ યુવાનને ઓળખી ગયા હતા.

એક વખત એવું બન્યું કે પેલો યુવાન રેસ્ટોરન્ટ પર આવ્યો જ નહીં.
બે-ચાર ભિખારીઓ એની રાહ જોતા રેસ્ટોરન્ટની બહાર ઊભા હતા, તે થોડીક વાર એની રાહ જોયા પછી પાછા ચાલ્યા ગયા. બીજા દિવસે પણ એવું જ બન્યું. ત્રણ-ચાર દિવસ સુધી યુવાન દેખાયો જ નહિ.

એવામાં એક વખત એક જૂના ભિખારીએ આવીને રેસ્ટોરન્ટ પરથી બીજા એક ભિખારીને ટિફિન અપાવ્યું અને એનું પેમેન્ટ કર્યું.

રેસ્ટોરન્ટના માલિકે નવાઈ અનુભવતાં એને પૂછ્યું તો એ ભિખારીએ જવાબ આપ્યો,

‘અમને જે યુવાન દરરોજ ટિફિન અપાવતો હતો એનું એક અકસ્માતમાં અવસાન થયું છે.

અમે બે-ચાર મિત્રોએ ભેગા મળીને એ યુવાનને શ્રદ્ધાંજલિ આપવા રૂપે, અમને દરરોજ ભીખમાં જે રકમ મળી હોય એમાંથી એક વ્યક્તિને ટિફિન અપનાવવાનું નક્કી કર્યું છે !’

ભિખારીની વાત સાંભળીને રેસ્ટોરન્ટના માલિકને શું બોલવું તે ન સૂઝયું, પણ શું કરવું એ એને તરત સૂઝયું.

એણે કહ્યું,

‘ભાઈ ! હવે પેલા યુવાને શરૂ કરેલી ટિફિનસેવા મારા તરફથી ચાલુ રહેશે. તમારે એ માટે પૈસા ખર્ચવાની જરૂર નથી.’

ત્યારે પેલો ભિખારી બોલ્યો,

‘સાહેબ ! સાચું કહું ?
અમે બહુ નાના માણસ છીએ, સમાજસેવા અને લોકસેવાનાં બહુ મોટાં કામ કરવાની અમારામાં ત્રેવડ નથી. બહુબહુ તો અમે હળીમળીને એકબીજાને આવી સાવ મામૂલી મદદ કરી શકીએ ! પેલા યુવાન પાસેથી અમને આવી પ્રેરણા મળી છે અને એ પ્રેરણાનો દીવો ઝળહળતો રહે એ માટે અમે એક ટિફિનની સેવા તો હવે અમારા છેલ્લા શ્વાસ સુધી ચાલુ રાખીશું…!’

રેસ્ટોરન્ટનો માલિક બોલ્યો,

‘એ યુવાનને શ્રદ્ધાંજલિ આપવા માટે તમે જે દીવો ઝળહળતો રાખ્યો છે, એમાં મારે પણ થોડુંક તેલ પુરાવવું છે. હવેથી હું પણ લાઈફટાઈમ નિયમિત રૂપે દરરોજ પાંચ ગરીબોને મફત ટિફિન આપીશ !

સંસારમાં બીમારીઓના ચેપ તો ઘણા લાગે છે, થોડાક ચેપ આવાં સત્કાર્યોના પણ લાગતા રહેવા જોઈએ !’

આપણી લાઇફમાં આપણને આવા કોઈ એક સારા કામનો ચેપ ન લાગે તો સમજી લેવું કે આપણો ભવનો ફેરો ફોગટ ગયો છે …
-અજ્ઞાત

Posted in स्वाध्याय

આ ૧૯૬૩/૬૪ની ઘટના છે. તે સમયે શ્રી મોહન મંગેશ ખટાવ નામના વ્યક્તિ નેવીમાં હતા. વીર સાવરકરે લખેલ “માઝી જન્મઠેપ” નામનું પુસ્તક વાંચ્યા પછી તેઓ તે જેલમાં ગયા જ્યાં વીર સાવરકરને કેદ કરવામાં આવ્યા હતા. મોહનભાઈ તે અંદામાન સેન્ટ્રલ જેલમાં ગયા, જ્યાં સાવરકરને કેદ રાખવામાં આવ્યા હતા. તે સેલમાં જઈને તેઓ ખૂબ રડ્યા. “આપણા સ્વાતંત્ર્યવીરોએ કેટલું દુઃખ અને કઠિનાઈઓ સહન કરી છે” એ વિચાર કરીને તેઓ ખૂબ વ્યથિત થયા. તેમને વિચાર આવ્યો કે સાવરકરજીના દર્શન કરવા જોઈએ.

અંદામાનથી તેઓ મુંબઈ આવ્યા અને પછી રત્નાગિરી પહોંચી સાવરકરના ઘરે ગયા. એ ૧૯૬૪નું વર્ષ હતું. સાવરકર તબિયતમાં ખૂબ નબળા હતા. તેમના પગમાં માથું મૂકી તેઓ ખૂબ રડ્યા. કહ્યું, “તાત્યા, તમે આપણારે માટે કેટલી યાતનાઓ સહન કરી, તમારી માતૃભૂમિ માટે કેટલા કેટલા અમાનુષિક જુલમ અને અત્યાચાર ખમ્યા?”

સાવરકર કંઈ પણ કહેવાની સ્થિતિમાં ન હતા, તબિયત એટલી નાજુક હતી.

મોહનભાઈ પાસે ભગવદ્ગીતાનું પુસ્તક હતું. તેના પર તેઓએ સાવરકરના હસ્તાક્ષર માંગ્યા, પરંતુ નબળાઈના કારણે સાવરકર હસ્તાક્ષર કરી શકતા ન હતા. તેમણે માઈ સાવરકરને હસ્તાક્ષર કરવા બોલાવ્યાં. અને મોહનભાઈને કહ્યું, “જો તમને ભગવદ્ગીતાનો સાચો અર્થ જાણવાની ઇચ્છા છે, તો પાંડુરંગ શાસ્ત્રીજીના પ્રવચન સાંભળવા જાઓ.”

અને મોહનભાઈ સ્વાધ્યાયમાં જોડાયા. આજે ૮૦ વર્ષની ઉંમરે પણ તેઓ સક્રિય છે.

સાવરકરની આ વાત તેમણે “અભિ ગીતા સંધાન”ની ભાવફેરી દરમિયાન જણાવી છે.