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देश के प्रति गाँधी के अपराध (भाग 4)

हत्या करने के लिए उकसाते गाँधी

1920 में भारत की अधिकतर मस्जिदों से दो पुस्तकें वितरित की जा रही थीं- ‘कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी’ और ‘उन्नीसवीं सदी का लंपट महर्षि’। ये दोनों पुस्तकें ‘अनाम’ थीं, इनमें किसी लेखक या प्रकाशक का नाम नहीं था, और इन दोनों पुस्तकों में भगवान श्री कृष्ण, हिंदू धर्म इत्यादि पर बहुत अश्लील, अत्यन्त घिनौनी बातें लिखी गई थीं और इनमें अनेक देवी-देवताओं के बहुत अश्लील रेखाचित्र भी बनाए गए थे। यह बात जब गांधी तक पहुंची, तो उन्होंने इसे ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ की बात बताकर उपेक्षित कर दिया और कहा कि भारत में सबको अपनी बात रखने का अधिकार है।

लेकिन इन दोनों पुस्तकों से, भारत का हिन्दू जनमानस बहुत उबल रहा था। इसलिए 1923 में लाहौर स्थित ‘राजपाल प्रकाशन’ के मालिक महाशय राजपाल ने एक पुस्तक प्रकाशित की, जिसका नाम था- “रंगीला रसूल”। इसमें कटासुरों के पैगम्बर मोहम्मद के जीवन के बारे में बहुत सी बातें थीं। इसमें भी लेखक का नाम गुप्त रखा गया था, हालांकि उसके लेखक पंडित चमूपति थे, जो इस्लाम के जाने-माने आर्यसमाजी विद्वान थे। इस पुस्तक में कहीं कोई झूठ नहीं था, बल्कि अनेक सबूतों के साथ आयत नंबर, हदीस नंबर इत्यादि देकर लिखी गई थीं।

डेढ़ वर्षों तक ‘रंगीला रसूल’ बिकती रही, पूरे भारत में कहीं कोई बवाल नहीं हुआ। लेकिन एक दिन अचानक 28 मई 1924 को गांधी ने अपने समाचारपत्र ‘यंग इंडिया’ में एक लंबा-चौड़ा लेख लिखकर “रंगीला रसूल“ पुस्तक की खूब निंदा की, और अंत में लिखा- “मुसलमानों को स्वयं ऐसी पुस्तक लिखने वालों को सजा देनी चाहिए।”

गांधी का यह लेख पढ़कर, पूरे भारत के मुसलमान भड़क गए और महाशय राजपाल जी के ऊपर 3 वर्षों में 5 बार हमले हुए, लेकिन गांधी ने एक बार भी किसी हमले की निंदा नहीं की।

कुछ मुस्लिम विद्वानों ने उस पुस्तक ‘रंगीला रसूल’ के प्रकाशक पर लाहौर उच्च न्यायालय (हाई कोर्ट) में वाद दायर किया। हाईकोर्ट ने चार इस्लामिक विद्वानों को न्यायालय में खड़ा करके उनसे पूछा कि इस पुस्तक की कौन सी पंक्ति सही नहीं है, आप वह बता दीजिए। सभी ने माना कि इस पुस्तक में कोई गलत बात नहीं लिखी गई है। इसलिए लाहौर उच्च न्यायालय ने महाशय राजपाल पर मुकदमा खारिज कर दिया और उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया।

उसके बाद, 3 अगस्त 1924 को गांधी ने अपने ‘यंग इंडिया’ समाचारपत्र में एक और भड़काने वाला लेख लिखा। इस लेख में उन्होंने इशारों में लिखा था कि “जब व्यक्ति को न्यायालयों से न्याय नहीं मिले, तब उसे अपनेआप प्रयास करके न्याय ले लेना चाहिए।” दूसरे शब्दों में गाँधी कटासुरों को महाशय राजपाल की हत्या करने के लिए उकसा रहे थे।

उसके बाद महाशय राजपाल के ऊपर दो बार और हमले के प्रयास हुए और अंत में 6 अप्रैल 1929 का हमला जानलेवा साबित हुआ, जिसमें मोहम्मद इल्मदीन नामक युवक ने, गदा से महाशय राजपाल के ऊपर कई वार किए, जिनसे उनकी जान चली गई।

जिस दिन उनकी हत्या हुई, उसके 4 दिन बाद गांधी लाहौर में आये थे, लेकिन वे महाशय राजपाल के घर पर शोक प्रकट करने नहीं गये और न ही अपने किसी संपादकीय में उनकी हत्या की निंदा की।

इस हत्या से देश में पूरा हिंदू समाज उबल उठा था, और अंग्रेजों को लगा कि यदि उन्होंने हत्यारे को जल्दी फांसी नहीं दी, तो अंग्रेजी शासन को भी खतरा हो सकता है। अतः अंग्रेजों ने मुकदमा चलाकर महाशय राजपाल के हत्यारे मो. इल्मदीन को फांसी की सजा सुना दी। इस पर 4 जून 1929 को गांधी ने अंग्रेज वायसराय को चिट्ठी लिखकर महाशय राजपाल के हत्यारे की फांसी की सजा को माफ करने का अनुरोध किया था।

उसके अगले दिन, अपने समाचारपत्र ‘यंग इंडिया’ में गाँधी ने एक लेख लिखा था, जिसमें उसमें यह साबित करने का प्रयत्न किया था कि यह हत्यारा तो निर्दाेष है, नादान है, क्योंकि उसे अपने धर्म का अपमान सहन नहीं हुआ और उसने गुस्से में आकर यह हत्या करने का निर्णय लिया।

लेकिन अंग्रेजों ने 31 अक्टूबर 1929 को महाशय राजपाल के हत्यारे मोहम्मद इल्मदीन को लाहौर जेल में फांसी पर चढ़ा दिया। तब 2 नवंबर 1929 को गांधी ने ‘यंग इंडिया’ में इल्मदीन को फांसी देने को इतिहास का काला दिन लिखा था। यह थी गाँधी की अहिंसा। मेरे विचार से हत्या करने के लिए उकसाने के आरोप में गाँधी पर भी केस चलना चाहिए था और उनको कठोर दंड मिलना चाहिए था।

— डॉ. विजय कुमार सिंघल
पौष शु. 8, सं. 2082 वि. (28 दिसम्बर, 2025)

#gandhi_ke_apradh

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साध्वी प्रज्ञा सिंह और कर्नल पुरोहित को कोर्ट ने बाइज्जत बरी किया।

“कुत्ती” , “कमीनी” , “वेश्या” , “कुलटा  ” बोल इस भगवा में किसकी रखैल है तू ?
“अब तक कितनों के बिस्तर पर गई‎ है,,,?”
“किसके इशारे पर सब कर रही है ?”
“जिंदगी प्यारी है तो जो मैं कहता हूँ कबुल कर ले बाकी जिंदगी आराम से कटेगी”
यह शब्द सुनकर आपकी त्योरियां जरुर चढ़ गई‎ होगी
मेरी भी चढ़ गई थी,,,।

ऐसे घृणित शब्दों से किसी और को नहीं,,,,
बल्कि भगवा वस्त्र धारिणी निष्कलंक साध्वी प्रज्ञा सिंह को कलंकित “कांग्रेस”‎ के इशारे पर  मुम्बई ATS चीफ  हेमंत करकरे के सामने मुम्बई पुलिस व ATS ने कहलवाया था.

जिस हेमंत  करकरे को आज शहीद मान कर सम्मान दिया जाता है एक नम्बर का नी#,ch आदमी था. उस निर्दोष हिंदू साध्वी का श्राप लगा और आज हेमंत करकरे के परिवार में कोई दीपक जलाने वाला भी जीवित नहीं बचा है ।

मैं साध्वी प्रज्ञा जी का एक साक्षात्कार देख रहा था।
ऐसे घृणित शब्दों को इशारे में बताया।
बताते हुए उनके नेत्र सजल हो गये.
साक्षात्कार देखते हुए क्रोधाग्नि से धधक रहे मेरे आँखो से भी अश्रु की धारा फूट पड़ी।
“साध्वी प्रज्ञा” ने मर्माहत शब्दों में वृत्तान्त सुनाया कि
मेरे शरीर का कोई‎ ऐसा अंग नही जिसे चोटिल ना किया गया हो।
जब पत्रकार ने पुछा कि
मारने के कारण ही आपके रीढ़ की हट्टी टूट गई‎ थी ??
साध्वी प्रज्ञा ने कहा,
“नहीं, मारने से नहीं,
एक जन हमारा हाथ पकड़ते थे एक जन पांव और झूलाकर दीवार की तरफ फेंक देते थे,
ऐसा प्राय: रोजाना होता था दीवार से सर टकराकर सुन्न हो जाता था।
कमर में भयानक दर्द होता था। ऐसा करते करते एक दिन रीढ़ की हड्डी टूट गई तब अस्पताल में भर्ती कराया गया।”
साध्वी प्रज्ञा ने बताया,
“एक दिन तो ऐसा हुआ कि
मारते मारते एक पुलिस वाला थक गया तो
दूसरा मारने लगा।
उस दौरान मेरे फेफड़े की झिल्ली फट गई‎ फिर भी विधर्मी निर्दयता से मारता रहा.”.
साध्वी प्रज्ञा ने बताया,
“रीढ़ की हड्डी टूटने के बाद मैं बेहोश हो गई‎ थी।
जब होश आया तो देखा कि
मेरे शरीर से सारा भगवा वस्त्र उतार लिया गया गया था.
मुझे एक फ्राक पहनाया गया था।”
साध्वी दीदी ने बताया,
“मेरे साथ मेरे एक शिष्य को भी गिरफ्तार किया गया था ।
उसे मेरे सामने लाकर उसे चौड़ा वाला बेल्ट दिया और कहा मार!! अपने गुरु को इस साली को!!”
.”शिष्य, सकुचाने लगा तो मैं बोली मारो मुझे !!
शिष्य ने मजबुरी में मारा तो जरुर मुझे
लेकिन नरमी से।
तब एक पुलिस वाले ने शिष्य से बेल्ट छीन कर शिष्य को बुरी तरह पीटने लगा और बोला ऐसे मारा जाता है.
“साध्वी प्रज्ञा ने बताया कि
एक दिन कुछ पुरुष‎ कैदियों के साथ मुझे खड़ी करके अश्लील आडियो सुनाया जा रहा था.
मेरे शरीर पर इतनी मार पड़ी थी कि
मेरे लिए खड़ी रहना मुश्किल था. मैं बोली कि बैठ जाऊँ वो बोले साली शादी मे आई है क्या कि बैठ जायेगी!!
मेरी आँख बंद होने लगी मैं अचेत हो गई।
साध्वी प्रज्ञा ने बताया,
“मेरे दोनों हाथों को सामने फैलवाकर एक चौड़े बेल्ट से मारते थे,
मेरा दोनो हाथ सूज जाता था।
अँगुलियां भी काम नही करती थी,
तब गुनगुना पानी लाया जाता था। मैं अपने हाथ उसमें डालती,
कुछ आराम होता तब अंगलुियां हिलने डुलने लगती थी,
तो फिर से वही क्रिया मेरे पर मार पड़ती थी।
साध्वी प्रज्ञा जी ने बताया कि
मुझे तोड़ने के लिए मेरे चरित्र पर लांछन लगाया।
क्योंकि लोग जानते हैं कि
किसी औरत को तोड़ना है तो उसके चरित्र पर दाग लगाओ !
मेरे जेल जाने के बाद यह सदमा मेरे पिताजी बर्दास्त नहीं कर पाये और इस दुनियां से चल बसे. साध्वी जी राहत की सांस लेते हुए कहती हैं मेरे अन्दर रहते ही,
एक दुर्बुद्धि दुराचारी हेमंत करकरे को तो सजा मिल गई‎ मिल गई अभी बहुत लोग बाकी है।
साध्वी ने बताया,
“नौ साल जेल में थी,
सिर्फ एक दिन एक महिला ने एक डंडा मारा था,
बाकी हर रोज पुरुष ही निर्दयता से हमें पीटते थे.”
पत्रकार ने पूछा,
“आपको समझ में तो आ गया होगा कि क्यों आपको इतने बेरहमी से तड़पाया जा रहा था?”
साध्वी जी ने कहा,
“हां, भगवा के प्रति उनका द्वेश था।
फूटी आंख भी भगवा को नही देखना चाहते थे।
भगवा को बदनाम करने का कांग्रेस ने एक सुनियोजित षडयंत्र तैयार किया था.”
साध्वी ने बताया कि
एक बार कांग्रेस का गुलाम, स्वामी अग्निवेष मुझसे मिलने जेल में आया और बोला,
“आप सब कबुल कर लो कि
हां! यह सब RSS के कहने पर हुआ है।
इसमें यूपी के सांसद योगी आदित्य नाथ और संघ के इंद्रेश कुमार का नाम ले लो ।
सरकारी गवाह बन जाओ।
चिदम्बरम और दिग्विजय हमारे मित्र हैं।
मै आपको छुड़वा दुंगा”
साध्वी जी ने कहा,
“अगर आपकी उनसे घनिष्ठता है और सच में हमें छुड़ाना चाहते हो,
तो चिदम्बरम से जाकर बोलो की इमानदारी से जांच करवा ले, क्योंकि मैंने ऐसा कुछ किया ही नही है ।”
हिन्दुओं सबसे ख़ास बात ये कि साध्वी पर ये अत्याचार किसी इस्लामिक काल में नही हुआ है

इसके आगे आपको सोचना है कि काँग्रेसियों के मन मे हिन्दुओं के लिए कितना प्रेम है।

काँग्रेस का चुनाव घोषणा पत्र आपने पढ लिया होगा।

अब आपको निर्णय करना है कि आपको कैसा भारत चाहिये ,
और यदि अंतरात्मा ,स्वधर्म गौरव और स्वाभिमान  नाम की कोई चीज है हिंदुओं के जेहन में तो तुम हिंदुओं को कसम है अयोध्या में विराजमान तुम्हारे आराध्य राम की,  शहीद रामभक्तों और शहीदों के खून से लाल हुयी सरयू नदी की,  इस सपा+ कांग्रेस को जीवन में कभी भी वोट मत देना।

हिन्दू आतंकवाद शब्द गढ़ने का कांग्रेस ने गंदा प्रयास किया लेकिन आज कोर्ट ने इनके झूठ की पोल खोल दी है।

ऐतिहासिक फैसला,,!

16 साल बाद, #NIA कोर्ट ने 2008 के मालेगांव मामले में साध्वी प्रज्ञा, लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित और अन्य को क्लीन चिट दे दी है।

सभी कांग्रेस  के द्वारा बनाए गए कथित आरोपीयो को बरी किया गया।

तथाकथित “भगवा आतंकवाद” का मिथक ध्वस्त हो गया है।

कांग्रेस की राजनीतिक प्रतिशोध की भावना उजागर हुई है। यह सिर्फ़ एक फैसला नहीं है, बल्कि वोट बैंक की राजनीति के लिए संतों और सैनिकों को बदनाम करने वालों के मुँह पर तमाचा है।

सत्यमेव जयते,,,,
दोस्तों  जानकारी अच्छी लगे तो कृपया पेज को फॉलो और पोस्ट को शेयर जरूर करें,,,,,
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एक महान संत नागार्जुन के बारे में एक सुंदर कहानी कही जाती है।
वे एक अर्ध-नग्न संत थे, लेकिन सभी सच्चे साधकों के लिए गहन आदरणीय थे।

एक रानी भी संत नागार्जुन का बहुत सम्मान करती थीं। उन्होंने एक दिन उनसे निवेदन किया कि वे राजमहल में आकर अतिथि बनें। नागार्जुन उनके निमंत्रण को स्वीकार कर महल पहुँचे।
रानी ने उनसे एक निवेदन किया।

नागार्जुन ने पूछा, “आपको क्या चाहिए?”
रानी ने कहा, “मुझे आपका भिक्षा पात्र चाहिए।”

नागार्जुन ने अपना भिक्षा पात्र दे दिया – जो उनके पास मात्र एकमात्र वस्तु थी।
रानी ने इसके बदले में एक स्वर्णिम भिक्षा पात्र, हीरों से जड़ा हुआ, नागार्जुन को भेंट किया और कहा,
“आप इस पात्र को रखें। मैं आपके पुराने भिक्षा पात्र को पूज्य मानकर पूजूँगी। यह आपके पवित्र कंपन से भरा हुआ है। एक संत के लिए साधारण भिक्षा पात्र उचित नहीं। यह विशेष रूप से आपके लिए बनाया गया है।”

नागार्जुन ने इसे स्वीकार कर लिया क्योंकि उनके लिए ये दोनों ही समान थे।

जब वे महल से बाहर निकले, एक चोर ने उन्हें देखा।
चोर को विश्वास नहीं हुआ कि एक अर्ध-नग्न व्यक्ति इतना कीमती पात्र लेकर जा रहा है।
उसने सोचा, “यह कितनी देर तक इसे बचा पाएगा?”

चोर ने उनका पीछा किया। नागार्जुन एक खंडहर मंदिर में रुके, जिसमें न दरवाजे थे, न खिड़कियाँ।
चोर ने सोचा, “रात में जब नागार्जुन सो जाएंगे, तो यह पात्र आसानी से मिल जाएगा।”

लेकिन नागार्जुन ने चोर को देख लिया था। उन्होंने पात्र उठाकर मंदिर के बाहर फेंक दिया।
चोर चकित रह गया।

नागार्जुन ने सोचा, “वह पात्र के लिए आया है, मेरे लिए नहीं। तो क्यों न इसे दे दिया जाए, ताकि वह चला जाए और मैं भी आराम कर सकूं।”

चोर ने पात्र उठाया, लेकिन बिना धन्यवाद कहे वह जा नहीं सका।
वह बोला, “आप एक अद्भुत इंसान हैं। मेरी ज़िंदगी बर्बाद हो रही है। मैं एक चोर हूँ। क्या मैं आपके चरण छू सकता हूँ?”

नागार्जुन हँसे और बोले, “इसीलिए मैंने पात्र बाहर फेंका, ताकि तुम अंदर आ सको।”

चोर ने उनके चरण छुए, और उसी क्षण उसने दिव्यता का अनुभव किया।
उसने पूछा, “मुझे आप जैसा बनने में कितने जन्म लगेंगे?”

नागार्जुन बोले, “कितने जन्म? यह अभी हो सकता है, अभी!”
चोर ने कहा, “आप मजाक कर रहे होंगे। मैं एक कुख्यात चोर हूँ। यह कैसे संभव है?”

नागार्जुन ने कहा,
“यदि एक पुराने घर में सदियों से अंधेरा हो, और कोई दीपक जलाए, तो क्या अंधेरा कहेगा, ‘मैं यहाँ सदियों से हूँ, मैं नहीं जाऊँगा’?”
चोर ने तर्क को समझा।

उसने पूछा, “क्या मुझे चोरी छोड़नी होगी?”
नागार्जुन बोले, “यह तुम्हारा निर्णय है। मैं केवल तुम्हें ध्यान का उपाय बता सकता हूँ। बस अपनी साँस को देखो – अंदर आती, बाहर जाती। चाहे चोरी करते समय ही क्यों न हो, बस अपनी साँस को देखते रहो।”

चोर ने कहा, “यह तो सरल है। और कुछ नियम या नैतिकता नहीं?”
नागार्जुन ने कहा, “कुछ भी नहीं – केवल अपनी साँस को देखो।”

पंद्रह दिनों बाद, चोर लौटकर आया, परंतु अब वह पूरी तरह बदल चुका था। उसने कहा, “मैं फँस गया। मैं चोरी नहीं कर सकता, क्योंकि ध्यान के साथ चुराना संभव नहीं।”

नागार्जुन ने कहा, “अब तुम्हारे लिए निर्णय का समय है। यदि तुम्हें आंतरिक शांति चाहिए, तो इसे चुनो। अगर तुम्हें धन चाहिए, तो उसे चुनो।”

चोर बोला, “मैं अचेतन नहीं हो सकता। मुझे अपना शिष्य बना लें।”

नागार्जुन ने कहा, “मैंने तुम्हें पहले ही दीक्षा दे दी है।”

ध्यान नैतिकता या चरित्र पर नहीं, बल्कि आंतरिक जागरूकता पर आधारित है।

ओशो

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સરોવરના કિનારા પાસે એક નાનુ બાળક રમી રહ્યુ હતુ. થોડે દુર બેઠેલી એની માં આ બાળકને જોઇ રહી હતી. અચાનક એક મગર બહાર આવી, બાળક તો એની મસ્તીમાં રમી રહ્યુ હતું મગરે બાળકનો પગ પકડ્યો.

દુર બેઠેલી માં નું ધ્યાન જ હતું એણે કુદકો મારીને બાળકના હાથ પકડી લીધા. એક બાજુ મગર અને બીજી બાજું માં……પેલી સ્ત્રીએ પોતાની તમામ તાકાત લગાવીને બાળકને મગરના સકંજામાંથી મુક્ત કર્યું. પરંતું આ ખેંચતાણમાં પેલી સ્ત્રીના તિક્ષ્ણ નખ બાળકના હાથમાં લાગી જવાથી એના હાથમાંથી લોહી નીકળતું હતું. નાના બાળકને એ નહોતું સમજાતું કે એક માં મને કઇ રીતે લોહી-લુહાણ કરી શકે? મારી માને મારો જરા પણ વિચાર નહી આવ્યો હોય ?

બાળકની આંખમાં પ્રશ્ન વાંચી ગયેલી માતાએ કહ્યુ કે બેટા મને ખ્યાલ છે કે તું મારા પર ગુસ્સે છે, મારા મોટા નખથી તારા હાથની ચામડી ઉતરી ગઇ છે અને તને ખુબ પીડા થાય છે એ પણ હુ સમજી શકું છું. પણ બેટા તને કદાચ અત્યારે નહી સમજાય તું બહું નાનો છે હજુ . મારે તને બચાવવો હતો અને મારી પાસે આ માટે બીજો કોઇ વિકલ્પ જ નહોતો.

આપણા જીવનમાં પણ ઘણી એવી ઘટનાઓ બને છે ત્યારે આપણે પણ પરમાત્મા પ્રત્યે નારાજ થઇ જઇએ છીએ. આપણને એવું લાગે છે કે ભગવાન તે કંઇ આવા હોતા હશે જે મને આવું દુખ અને પીડા આપે છે? આપણું પણ પેલા નાના બાળક જેવું જ છે . હાથ પર પડેલા વિખોળીયાને યાદ કરીને રડ્યા કરીએ છીએ એ તો સાવ ભુલી જ જઇએ છીએ કે આ નાની એવી પીડાના બદલામાં હું બચી ગયો છું

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“મારું બહારવટું હાલે કે ના હાલે, પણ આ દીકરીનો વિશ્વાસ ન તૂટે…” : નવરાત્રીના પાવન પર્વે જોગીદાસ ખુમાણને સ્મરણાંજલિ

નવરાત્રી એટલે શક્તિની આરાધનાનું પર્વ. જ્યારે નવ-નવ રાત સુધી જગદંબાના ગરબા ગવાતા હોય, ત્યારે સૌરાષ્ટ્રની ધરતીના ઇતિહાસના પાનાઓમાંથી એક એવા વીર પુરુષનું સ્મરણ કરવું પડે, જેમના માત્ર નામથી બહેન-દીકરીઓ વગડામાં પણ નિર્ભય બનીને ફરી શકતી હતી. એ વીર એટલે આપા જોગીદાસ ખુમાણ.

ધણહેરના વગડાનો એ પ્રસંગ
વાત છે એ સમયની જ્યારે જોગીદાસ ખુમાણનું બહારવટું ચાલતું હતું. ભાવનગર રાજ્ય સામે એમનો સંઘર્ષ હતો, પણ પ્રજા માટે તો તેઓ માવતર સમાન હતા.

એક દિવસ જોગીદાસ ખુમાણ એકલા ઘોડા પર સવાર થઈને કોઈ નિર્જન ‘ધણહેર’ (ગીચ વગડા/જંગલ) માંથી પસાર થઈ રહ્યા હતા. ત્યાં તેમની નજર એક ૧૮-૨૦ વર્ષની દીકરી પર પડી જે એકલી ભેંસો ચરાવી રહી હતી.

એ અવાવરુ જગ્યાએ જુવાન દીકરીને એકલી જોઈને જોગીદાસ ખુમાણે પોતાની ઓળખ આપ્યા વગર પૂછ્યું: “બેટા, તું અહીં સાવ એકલી છે? તારું કોઈ સગું-વહાલું આજુબાજુમાં નથી?”

દીકરીએ નિર્દોષભાવે જવાબ આપ્યો: “ના બાપુ, મારા મા-બાપ તો નાનપણમાં ગુજરી ગયા છે. હું મારા મામાને ત્યાં મોટી થઈ છું અને અહીં ઢોર ચરાવું છું.”

જોગીદાસે ફરી પૂછ્યું: “બેટા, હું એમ નથી કહેતો, પણ આટલા મોટા વગડામાં તું એકલી ફરે છે, તને બીક નથી લાગતી? તારી આબરૂ કે તારા શીયળની તને ચિંતા નથી થતી?”

ત્યારે એ દીકરીના મુખમાંથી જે શબ્દો નીકળ્યા, એ સાંભળીને ખુદ કાળનો પણ કાળ ગણાતા જોગીદાસ ખુમાણ સ્તબ્ધ થઈ ગયા. દીકરી બોલી:

> “બાપુ, બીક શેની? અમારા આ વિસ્તારમાં ‘આપા જોગીદાસ ખુમાણ’ નું બહારવટું હાલે છે. જ્યાં સુધી જોગીદાસ જીવે છે ને, ત્યાં સુધી કોની તાકાત છે કે મારી સામે ઊંચી આંખ કરીને પણ જોઈ શકે?”
>
તે દીકરીને ખબર નહોતી કે જેની સામે તે આ વાત કરી રહી છે, એ જ સાક્ષાત જોગીદાસ ખુમાણ છે.

એક અજાણી દીકરીનો પોતાના પર આટલો અતૂટ વિશ્વાસ જોઈને જોગીદાસ ખુમાણની છાતી ગજગજ ફૂલી ગઈ અને આંખમાં ઝળઝળિયાં આવી ગયા.

સુરજ સામે જોગીદાસની પ્રતિજ્ઞા

એ જ પળે, તે બહારવટિયાએ આકાશમાં તપતા સૂર્યનારાયણ સામે બે હાથ જોડ્યા અને એક અદભુત પ્રાર્થના કરી:

“ભલે ઉગ્યા ભાણ, ભાણ તિહારા ભામણા,
મરણ જીવણ લગ માણ, રાખજે કશ્યપ રાવ!”

જોગીદાસે કહ્યું: “હે કશ્યપના પુત્ર સૂર્યનારાયણ! મારું ગરાસ પાછું મળે કે ન મળે, મારું બહારવટું સફળ થાય કે ન થાય, એની મને પરવા નથી. પણ આ ૧૮ વર્ષની દીકરીએ મારા પર જે વિશ્વાસ મૂક્યો છે ને, એ વિશ્વાસ તૂટવા ન દેતો બાપ! હું જીવું ત્યાં સુધી આ પંથકની દીકરીઓની લાજ પર આંચ ન આવવી જોઈએ.”

આજના યુવાનો માટે બોધપાઠ
આ પ્રસંગ આજે યાદ કરવાનો હેતુ માત્ર ઇતિહાસ વાગોળવાનો નથી, પણ વર્તમાનમાં આપણી જવાબદારી સમજવાનો છે.

આજે નવરાત્રીમાં આપણી સોસાયટી, શેરી કે ગામમાં હજારો બહેન-દીકરીઓ રાતે ગરબા રમવા નીકળે છે. એ દીકરીઓ જ્યારે મોડી રાતે રસ્તા પરથી પસાર થાય, ત્યારે તેમને પણ એવો જ વિશ્વાસ હોવો જોઈએ કે “અહીં મારા ભાઈઓ બેઠા છે, મારે ડરવાની કોઈ જરૂર નથી.”

દરેક યુવાને આજે જોગીદાસ ખુમાણના એ આદર્શોને હૃદયમાં ઉતારવાની જરૂર છે. જ્યારે કોઈ એકલી દીકરીને જુઓ, ત્યારે એની સુરક્ષાનું કવચ બનજો, એના ડરનું કારણ નહીં. આપણી ભારતીય સંસ્કૃતિ અને સભ્યતા ત્યારે જ શોભશે જ્યારે આપણી બહેન-દીકરીઓ નિર્ભય બનીને જીવી શકશે.

જય માતાજી… જય સોરઠ!

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एक बालक मदरसे से पढकर आया और अपनी अम्मी से पूछा, ‘अम्मी मैंने सुना है कि मुझे नवजात अवस्था में किसी काफिर औरत ने अपना दूध पिलाया था।’’
‘‘हां मेरे लाल।’’
‘‘मैं उसे देखना चाहता हूं, आजकल कहां रहती हैं।’’
‘मगर क्यों?’’
‘दूध का कर्ज अदा करना है।’’
‘‘अच्छी बात है।’’ उस औरत ने दायी का पता बता दिया। उस बालक ने जाकर उस औरत से कहा कि ‘मैंने सुना है कि तुमने मुझे अपना दूध पिलाया है, इसका कर्ज मुझे चुकाना है, इसलिए आप इस्लाम कबूल करें।’
उस औरत ने इस्लाम कबूलने से मना कर दिया तो उस बालक ने उस औरत के स्तन काटकर उसकी हत्या करते हुए कहा,‘हरामजादी मुझे अपना दूध पिलाकर काफिरों के प्रति मेरे दिल में हमदर्दी भरना चाहती थी। भला हो उस्ताद का कि उसने मुझे अल्लाह का सही रास्ता बता दिया उसके बाद उसने अपनी अम्मी का सिर भी कलम किया और कहा, ‘बुढिया अपना दूध नहीं पिला सकी और काफिर का दूध मेरी नसों में भरवा दिया, मैंने गुनाह करने वाले और करवाने वाले दोनों को ही मार दिया, अब दुनिया के काफिरों का खात्मा करने के लिए मेरे हाथ नहीं कांपेंगे।’’
इस घटना के वर्षो बाद वह लुटेरा और आतंकवादी बन गया और कई राजाओं को मारकर अपनी तानाशाही स्थापित की और इस्लाम की तरक्की में जी जान से जुटकर काफिरों का कत्लेआम करने लगा।
एक बार एक नगर में उसके सामने बहुत सारे हिन्दु बंदी पकड़ कर लाये गए। तानाशाह को उनके जीवन का फैसला करना था। उन बंदियों में तुर्किस्तान का मशहूर कवि अहमदी भी था।
तानाशाह ने दो गुलामों कि ओर इशारा करके अहमदी से पूछा – “मैंने सुना है कि कवि लोग आदमियों के बड़े पारखी होते हैं। क्या तुम मेरे इन दो गुलामों की ठीक-ठीक कीमत बता सकते हो?”
अहमदी बहुत निर्भीक और स्वाभिमानी कवि थे। उन्होंने गुलामों को एक नज़र देखकर निश्छल भाव से कहा“इनमें से कोई भी गुलाम पांच सौ अशर्फियों से ज्यादा कीमत का नहीं है।”
“बहुत खूब”– तानाशाह ने कहा – “और मेरी कीमत क्या होनी चाहिए?”
अहमदी ने फ़ौरन उत्तर दिया -“पच्चीस अशर्फियाँ”।
यह सुनकर तानाशाह की आँखों में खून उतर आया। वह तिलमिलाकर बोला – “इन तुच्छ गुलामों की कीमत पांच सौ अशर्फी और मेरी कीमत सिर्फ पच्चीस अशर्फियाँ! इतने की तो मेरी टोपी है!”
अहमदी ने चट से कहा “बस, वही तो सब कुछ है! इसीलिए मैंने तुम्हारी ठीक कीमत लगाई है”।
जानते है ये तानाशाह कौन था…….?
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आतंकवादी तैमूर लंगड़ा ।

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सोचिए कांग्रेसी कुत्ते कितने नीच होते हैं

आज इन कांग्रेसी कुत्तों के पेट में दर्द है कि मोदी ने शेख  हसीना को भारत में क्यों शरण दिए हैं

लेकिन इन कांग्रेसी कुत्तों की अम्मा इंदिरा गांधी ने शेख हसीना के लिए क्या किया आप सुनकर दंग रह जाएंगे

1971 में शेख मुजीबुर रहमान पाकिस्तान की कैद में थे तब बांग्लादेश में पाकिस्तानी सैनिकों ने उनके पूरे परिवार को कैद किया था और उनका सामूहिक कत्लेआम करने का प्लानिंग था

तब इंदिरा गांधी ने भारतीय सेना को कहा था कि आप शेख मुजीबुर रहमान के परिवार को किसी तरह भारत लाइए

और कर्नल अशोक तारा को यह जिम्मेदारी दी गई कि वो शेख मुजीबुर रहमान के पूरे परिवार को बचाकर भारत लाएं

कर्नल अशोक तारा अपनी जान की बाजी लगाकर पाकिस्तानी सैनिकों से भिड़े और उन्होंने शेख मुजीबुर रहमान के परिवार को जिसमें शेख हसीना बाजी शेख रिहाना वासी शेख मुजीबुर रहमान के तीनों बेटे उनकी पत्नी को पाकिस्तानी सैनिकों के चंगुल से मुक्त किया

एक तस्वीर में मोदी जी और कर्नल अशोक तारा है जब भी शेख हसीना भारत आती थी तो उनसे जरूर मिलती थी

बाद में 1975 में शेख मुजीबुर रहमान, उनकी पत्नी उनके तीनों बेटे यहां तक कि उनका 10 साल का बेटा उनकी दोनों पुत्रवधू  और बड़े बेटे का 4 साल के बच्चे को यानी सब को बांग्लादेश की सेना द्वारा क़त्ल कर दिया गया

फिर कत्लेआम करने वाला बांग्लादेशी सेना का कर्नल खंडेकर मुस्ताक अहमद ने जब घर के नौकर से पूछा कि शेख मुजीबुर रहमान की दोनों बेटियां कहां है तब पता चला कि उनकी दोनों बेटियां पेरिस जाने के लिए निकल गई और यह सुनकर कत्लेआम की साजिश रचने वाले सैन्य अधिकारियों को बहुत अफसोस हुआ कि उनकी दो बेटियां बच गई है

शेख मुजीबुर रहमान की दोनों बेटियां शेख हसीना वाजेद अपने पति परमाणु वैज्ञानिक डॉक्टर वाजेद और शेख रेहाना पेरिस जा रही थी उस वक्त ढाका से पेरिस की डायरेक्ट लाइट नहीं थी इसलिए वह ब्रुसेल्स   में रुककर कुछ दिन बाद पेरिस जाने वाले थी

और वह ब्रुसेल्स  स्थित बांग्लादेश के दूतावास गई  4 घंटे बाद पता चला कि बांग्लादेश में तख्तापलट हो गया है तब बांग्लादेश के दूतावास ने उन्हें दूतावास में रुकने  से रोक दिया

फिर जैसे ही खबर ब्रेक हुई कि शेख मुजीबुर रहमान और उनके पूरे परिवार की हत्या हो गई है और उनकी दोनों बेटियां विदेश में है उसके बाद इंदिरा गांधी ने उन्हें भारत बुलाने का पूरा इंतजाम किया

ब्रुसेल्स में भारतीय राजदूत ने ही कार की व्यवस्था किया और उन्हें जर्मनी भेजा फिर जर्मनी में भारतीय राजदूत वाई के पूरी ने दोनों बहनों यानी शेख हसीना वाजेद और शेख  रेहना तथा शेख हसीना वाजिद के पति डॉक्टर वाजेद को सरकारी आवास में रखा

इंदिरा गांधी ने भारत के दूतावास को कहा कि इनको बहुत सिक्योरिटी में रखो क्योकि  उस वक्त जो बांग्लादेश का  तानाशाह कर्नल खन्दकार मोशताक अहमद सत्ता पलट कर के राष्ट्रपति बना था वह हर कीमत पर इन दोनों बहनों का कत्ल करना चाहता था

इंदिरा गांधी ने फिर  एयर इंडिया का विशेष विमान से उन्हें गुपचुप तरीके से दिल्ली लाया

उसके बाद उनकी सुरक्षा की विशेष व्यवस्था की गई क्योंकि बांग्लादेश की मिलिट्री  सरकार इन दोनों बहनों का किसी भी कीमत पर खात्मा करना चाहती थी

शेख़ हसीना को इंडिया गेट के पास पंडारा पार्क के सी ब्लाक में एक बंगला आवंटित कर दिया गया.

दो बंगाली अधिकारियों को उनकी घर की सुरक्षा में तैनात किया गया ताकि वह बांग्ला में उनसे बातचीत कर सकें

एक थे कर्नल सत्तो घोष और दूसरे थे 1950 बैच के आईपीएस अधिकारी IG  पी के सेन.  ये दोनों अधिकारी साए की तरह हसीना के साथ रहते थे.”

हसीना के पति डाक्टर वाज़ेद को भी परमाणु ऊर्जा विभाग में फ़ेलोशिप प्रदान कर दी गई. और उन्हें परमाणु ऊर्जा विभाग में एक अच्छी नौकरी भी दे दी गई

6 सालों तक शेख हसीना  के पूरे परिवार को भारत सरकार ने अपने शरण में और बेहद चुस्त सरकारी व्यवस्था में रखा जिसका पूरा खर्चा भारत सरकार उठा रही थी

शेख हसीना की छोटी बहन शेख रेहाना कोलकाता स्थित शांति निकेतन में पढ़ना चाहती थी भारत सरकार ने उनका दाखिला वहां करवाया लेकिन जब IB को भनक लगी बांग्लादेश सरकार शेख रिहाना के कत्ल की साजिश रच रही है तब उन्हें  दिल्ली लाया गया

24 जुलाई, 1976 को शेख़ रेहाना ने  लंदन में अपने दोस्त  शफ़ीक सिद्दीकी से शादी किया शादी करने का पूरा खर्चा भी भारत सरकार ने उठाया था और शेख रेहाना को दिल्ली से लंदन एक विशेष विमान में भेजा गया था

इस तरह कुल 6 साल  8 महीने  भारत में सरकारी खर्चे पर शेख हसीना उनकी बहन रेहाना अपने परिवार के साथ रहे।
   ताकि सनद रहे