Posted in खान्ग्रेस

एक वकील साहब थे,काँग्रेस मे आ गए, काँग्रेस संगठन मे उनको बहुत सारे पद मिले…इँदिरा गाँधी के करीबी हो गए।
इँदिरा गाँधी ने उनको राज्यसभा भेज दिया। दो बार राज्यसभा मे पहुँचे फिर अचानक एक दिन राज्यसभा से इँदिरा जी के कहने पर इस्तीफा दे दिया।

इँदिरा जी ने कहा बेटा तुम जहाज पकड़ो और अब असम पहुँचो। इँदिरा जी से वकील साहब ने पुछा क्या? इँदिरा जी ने वकील साहब कहा तुम असम पहुँचो वह सब पता चल जायेगा, जो एयरपोर्ट पर लेने आयेगा वही बतायेगा।

वकील साहब झोरी झंडी लेकर असम पहुँचे वहा उनको पता चला की उन्हे हाईकोर्ट का जज बनना है। अब काँग्रेसी वकील साहब जज हो गए उसके बाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश होकर रिटायर भी हो गए।

अब मजे की बात अभी और सुनिए इससे पहले जान लिजिए की देश मे यह इकलौता केस है जहा रिटायर्ड होने के बाद किसी उच्च न्यायालय के रिटायर्ड मुख्य न्यायाधीश को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया हो। तो वकील साहब सुप्रीम कोर्ट के जज भी इँदिरा जी की कृपा से बन गए।

रि-अपाईंटमेंट आफ जजेट नही होता है, सो न इससे पहले कभी हुआ न इसके बाद कभी हुआ, एक मात्र डिक्टेटर केस है। कोई भी जज सर्विस के दौरान ही सुप्रीम कोर्ट मे जज बनाये जा सकते है और उनकी नियुक्ति कार्यकाल के दौरान ही हो सकती है लेकिन वकील साहब तो महान थे, खास थे। सो कृपा बरस पड़ी।

उनकी महानता का किस्सा नही जानेंगे तो न तो बात पुरी होगी और नही तो इस देश के एक महापुरुष की कहानी अधूरी रहेगी, यह देश गाँधी परिवार का कर्जदार रह जायेगा, आजादी की लड़ाई की भूमिका मे नेहरू गाँधी परिवार के साथ न्याय नही हो पायेगा। तो इसलिए वह किस्सा जानना निहायत ही जरूरी है।

तो किस्सा कुछ यु है की एक काँग्रेस के नेता थे उनका मामला सुप्रीम कोर्ट मे था। नेता जी का नाम जगन्नाथ मिश्रा था और मामला भ्रष्टाचार का था।यह काँग्रेस के मुख्यमंत्री ललित नारायण मिश्र के भाई थे। जो बिहार मे काँग्रेस के आखिरी मुख्यमंत्री थे।

उनके मामले को लेकर वकील साहब जज बनकर फैसला दिये और सुबह उठकर चाय पी और सुप्रीम कोर्ट से इस्थिपा दे दिया।फैसला बताने की जरूरत नही पड़नी चाहिए। इँदिरा जी ने कहा इधर आ जा गुड्ड, वकील साहब ने कहा जी मैडम। अगली सुबह हुई फिर वकील साहब राज्यसभा चले गये।

आप सोचिए फैसले दिलाने के लिए जजो की नियुक्ति होती थी आज उसी इँदिरा गाँधी का पोता मुख्य चुनाव आयुक्त के चयन पर ज्ञान बाँटते हुए इमान की बात करके जब नियुक्ति पर अपने राजनैतिक हिस्सेदारी की बात करके सत्ता के बराबर हिस्सेदारी की बात कर रहा है। तो कहावत याद आ रही है।

“बाप मरे अंधेरे मे बेटा का नाम पावर हाउस”

अब वकील साहब का नाम नही जानेंगे तो काम नही चलेगा बात कांग्रेस नेता बहरूल इस्लाम की हो रही है और अपने मुख्यमंत्री को बचाने के लिए इँदिरा गाँधी आजादी की यह लड़ाई लड़ रही थी और फिर शहीद भी हो गई तो इस आजादी के संघर्ष की इस कहानी को भी इतिहास याद रखे।
‘मैं खून से नहाता हूं या नकद देखे बिना मैं दांत नहीं मांजता।’ जगन्नाथ मिश्रा

Posted in हिन्दू पतन

** साल 1914 में यूएन मुखर्जी ने एक छोटी सी पुस्तक लिखी,
नाम था…
#हिन्दू – एक मरती हुई नस्ल’!!!

** सोचिए 108 साल पहले,
उन्हें पता था!!

** 1911 की जनगणना को देखकर ही 1914 में मुखर्जी ने पाकिस्तान बनने की भविष्यवाणी कर दी।

** उस समय संघ नहीं था,
सावरकर नहीं थे,हिन्दू महासभा नहीं थी।

** तब भी मुखर्जी ने वो देख लिया जो पिछले 100 सालों में एक दर्जन नरसंहार और एक तिहाई भूमि से हिन्दू विलुप्त करा देने के बाद भी राजनैतिक विचारधारा  वाले सेक्युलर हिन्दू नहीं देख पा रहे।

** इस किताब के छपते ही सुप्तावस्था से कुछ हिन्दू जगे।
अगले साल 1915 में पं मदन मोहन मालवीय जी के नेतृत्व में हिन्दू महासभा का गठन हुआ।
आर्य समाज ने शुद्धि आंदोलन शुरू किया जो…..
   एक मुस्लिम द्वारा स्वामी श्रद्धानंद की हत्या के साथ समाप्त हो गया।

** 1925 में हिन्दुओं को संगठित करने के उद्देश्य से संघ बना।

** लेकिन ये सारे मिलकर भी वो नहीं रोक पाए जो यूएन मुखर्जी 1915 में ही देख लिया था।

** गांधीवादी अहिंसा ने इस्लामिक कट्टरवाद के साथ मिलकर मानव इतिहास के सबसे बड़े नरसंहार को जन्म दिया और काबुल से लेकर ढाका तक हिन्दू शरीयत के राज में समाप्त हो गए।
     

** जो बची भूमि हिन्दुओं को मिली वो हिन्दुओं के लिए मॉडर्न संविधान के आधार पर थी और मुसलमानों के लिए…..
  शरीयत की छूट,
  धर्मांतरण की छूट,
  चार शादी की छूट,
  अलग पर्सनल लॉ की छूट,
  हिन्दू तीर्थों पर कब्जे की छूट,
सब कुछ स्टैंड बाय में है।

** हिन्दू एक बच्चे पर आ गए हैं,
वहां आज भी आबादी बढ़ाना शरीयत है।

** जो लोग इसे केवल राजनीति समझते हैं उन्हें एक बार इस स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लगाना चाहिए 2022 में 1915 से क्या बदला है?

** आज भी साल के अंत में वो अपना नफा गिनते हैं,
हम अपना नुकसान।

** हमें आज भी अपने भविष्य के संदर्भ में कोई जानकारी नहीं है।

** आज भी संयुक्त इस्लामिक जगत हम पर दबाव बनाए हुए हैं कि हम अपने तीर्थों पर कब्जा सहन करें, लेकिन उपहास और अपमान की स्थिति में उसी भाषा में पलटकर जवाब भी न दें।

** मराठों ने बीच में आकर 100-200 साल के लिए स्थिति को रोक दिया जिससे हमें थोड़ा और समय मिल गया है लेकिन ये संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है।

** अपने बच्चों को देखिए आप उन्हें कैसा भविष्य देना चाहते हैं।
मरती हुई हिन्दू नस्ल जैसा कि 1915 में यूएन मुखर्जी लिख गए थे।

** अपने समय का एक समय,
अपनी कमाई का एक हिस्सा,
बिना किसी स्वार्थ के हिन्दू जनजागरण में लगाइये,
अगर ये कोई भी दूसरा नहीं कर रहा तो खुद करिए।

** नहीं तो…. आपके बच्चे अरबी मानसिकता के गुलाम, चौथी बीवी या  फिदायन हमलावर बनेंगे और इसके लिए सिर्फ आप जिम्मेदार होंगे।

#Hindu dying race नहीं है,
हम सनातन हैं।

** और ये आखिरी सदी है,
जब हम लड़ सकते हैं।
इसके बाद हमारे पास भागने के लिए कोई जगह नहीं है।

** बेशर्मी और निर्लज्जता की हद देखिए…..

** एक हिन्दू महिला ( नुपुर शर्मा ) के विरुद्ध लगातार आग उगल रहे हैं, जान से मारने के फतवे दे रहे हैं, बलात्कार की धमकी दे रहे हैं और ये हाल तब है जब ये मात्र 25% है **

** गम्भीरता से सोचिए……
आपके सामने आपकी महिला को कट्टरपंथी खुलेआम गर्दन काटने, बलात्कार की धमकी दे रहे हैं, पोस्टर चिपका रहे हैं, जहां आप बाहुल्य समाज हैं.

** उनका दुस्साहस देखिए आपके इलाके में जाकर आपकी महिला के विरुद्ध प्रदर्शन में आपकी दुकानें बंद करवाने पहुंच गए. नही माने तो पत्थरबाज़ी कर दंगा कर दिया। **

** ये हाल तब है जब वे 20 दिनों से लगातार फव्वारा चिल्ला रहे हैं।

** यहां मसला केवल एक महिला का नही बल्कि गर्दन काटने को उतारू उस कट्टरपंथ मानसिकता का है, जिसका प्रतिकार बहुत आवश्यक है।

** समय रहते इसे बढ़ने से रोकना बहुत आवश्यक है, वरना देश जंगलराज हो जाएगा।

** इसे यही रोकिये, हल्के में मत लीजिए। **

** मानवता वाली भूमि को रेगिस्तान बनने से रोक लीजिए….

** आप घिर चुके हैं……

** ठीक उसी प्रकार जैसे….
   शतरंज मे राजा को प्यादे,
   जंगल मे शेर को भेड़िए,
   और चक्रव्यूह में अभिमन्यु…….

** शरजील इमाम ने “चिकेन नेक” की बात की, आप जानते हैं हर शहर का एक चिकन नेक होता है! हर बाजार का एक चिकेन नेक होता है, और सभी चिकन नेक पर उनका कब्जा है।

** आप अपने शहर के मार्केट निकल जाइए अपना लैपटाप बनवाने मोबाईल बनवाने या कपड़े सिलवाने आप को अंदाजा नही है कि चुपचाप *”बिजनेस जिहाद”* कितना हावी हो चुका है।

** गुजरात का जामनगर हो, लखनऊ का हजरतगंज, मुम्बई का हाजी अली, गोरखपुर का हिंदी बाजार या दिल्ली का करोलबाग “चेक मेट” हो चुके हैं,
अब हर जगह इनका कब्जा हो चुका है!

** उतने जमीन पर आप के मंदिर नही हैं जितनी जमीनें उनके पास “कब्रिस्तान” के नाम पर रसूल की हो चुकी हैं!

  एक दर्जी की दुकान पर सिलाई करने वाले सभी उनके हम-मजहब है, चैन से लगायत बटन तक के सप्लायर नमाजी हैं! ढाबे उनके, होटल उनके, ट्रांसपोर्ट का बड़ा कारोबार हो या ओला उबर का ड्राइवर सब जुमा वाले हैं।

** आप शहर में चंदन जनेऊ ढूढते रहिए नहीं पाएंगे, वहीं हर चौराहे पर एक कसाई बैठा है।

** घिर चुके हैं आप !

** उपाय इसका इतना आसान नही है, गहराई से काम करना होगा, अपनी दुकानें बनानी होंगी, अपना भाई हर जगह बैठाना होगा।

*वरना #गजवा_ए_हिंद चुपचाप पसार चुका है अपना पांव, बस घोषणा होनी बाकी है।*

** शेर दहाड़ते ही रह गया, भेड़िए जंगल पर कब्ज़ा बना कर बैठ चुके हैं।

** आँखे बंद करिए और ध्यान दीजिए हर जगह आप को नारा ए तकबील “अल्लाहु अकबर”!! सुनाई देगा……

** और अगर नहीं सुनाई दे रहा है तो मुगालते मे हैं आप।

** बस एक जवाब लिख दीजिए… और बता दीजिए कि “कब जागेंगे आप”??
कब तक सेकुलर का चोला ओढ़े रहेंगे..?

**हिंदू एक मरती नस्ल **
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सभी हिन्दू अपने मित्रो को अधिक से अधिक यथाशीघ्र शेयर  कीजिए।।

#We_support_hindutava_unity

Posted in PM Narendra Modi

जि राम जि


एक तीर से दो शिकार तो खैर हमलोग बचपन से ही सुनते आ रहे हैं..
लेकिन, आज मोदी सरकार ने एक तीर से 3 शिकार करके दिखा दिया.

क्योंकि, आज मोदी सरकार द्वारा पारित नई रोजगार योजना “जी राम जी” न सिर्फ मनरेगा के भ्रष्टाचार पर प्रहार है बल्कि इसके निहितार्थ कुछ और भी हैं.

असल में आजकल विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा फ्री की रेवड़ियाँ बांटने का चलन जोरों पर है.
और, मनरेगा के 90% फंड केंद्र सरकार द्वारा दिये जाते थे.

इसीलिए, विभिन्न राज्य सरकारें पात्र-कुपात्र आदि सभी को मनरेगा से जोड़कर “मनरेगा नाम का लूट है, लूट सके सो लूट” का तराना गाते हुए लूट में लगी हुई थी.

अब चूँकि, मनरेगा में राज्य सरकारों का पैसा लगना नहीं था इसीलिए मनरेगा में लूट मचा कर वे अपने अवैध घुसपैठियों के वोट बैंक की तुष्टिकरण करते रहती थी.

लेकिन, अब जी राम जी योजना में केंद्र की सिर्फ 60% की भागीदारी रहेगी और राज्य सरकारों को 40% अपनी तरफ से देना होगा.

और, जाहिर सी बात है कि… दूसरों का पैसा तो सब लूटना चाहते हैं लेकिन अपनी पॉकेट का चवन्नी भी गिर जाए तो कलेजा फटने लगता है.

इसीलिए, अब नई योजना में नहीं के बराबर लूट की संभवाना है…

क्योंकि, ये पूरी तरह से डिजिटल होगा और बायोमेट्रिक से जुड़ा होगा.

बाकी, मोदी सरकार ने नाम से ही स्पष्ट कर दिया है कि…. जिन्हें राम नाम से आपत्ति हो वो चाहें तो भाड़ में जा सकते हैं..

क्योंकि, इस योजना के जरिए मोदी सरकार ने ऑफिशियल रूप से इस बात पर मुहर लगा दी है कि….
“जो राम का नहीं, वो किसी काम का नहीं”

बाकी, इस योजना को गांडी नाम को तेलांडा में भेजने के लिए तो जाना ही जाएगा..!

मतलब कि… एक तीर से तीन शिकार…!!

यूँ ही दुनिया भर में मोदी और शाह के नाम का भोकाल थोड़े न है…!!

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

એક મુસાફર એક મઠની મુલાકાતે જાય છે. ત્યાંના લોકો તેને રહેવા માટે જગ્યા અને ખાવા-પીવાની સુવિધા આપે છે.પણ દરરોજ સાંજે તેને એક વિચિત્ર અવાજ સંભળાય છે.
જ્યારે તે એક સાધુને આ અવાજ વિશે પૂછે છે, ત્યારે સાધુ કહે છે: “હું તમને આ અવાજનું કારણ નહીં જણાવી શકું, કારણ કે તમે સાધુ નથી.”
મુસાફરને આ જાણવાની ખૂબ જ ઉત્સુકતા જાગે છે, તેથી તે શરૂઆતમાં મઠમાં ત્રણ વર્ષ વિતાવે છે, લાકડા કાપે છે અને પાણી ભરે છે. અને સેવા કરે છે ત્યારબાદ તે ફરીથી સાધુઓને અવાજ વિશે પૂછે છે.
સાધુઓ કહે છે: “અમે તમને નહીં જણાવી શકીએ, કારણ કે તમે સાધુ નથી.”
તેથી મુસાફર એક શિષ્ય તરીકે બીજા ત્રણ વર્ષ વિતાવે છે, છોડને પાણી પાય છે અને રસોઈ બનાવે છે. ફરીથી તે સાધુઓને અવાજ વિશે પૂછે છે.
સાધુઓ કહે છે: “અમે તમને નહીં જણાવી શકીએ, કારણ કે તમે સાધુ નથી.”
એટલે મુસાફર હવે ધાર્મિક ગ્રંથોનો અભ્યાસ કરવા લાગે છે અને  બીજા ત્રણ વર્ષ વિતાવે છે, પછી તે ફરી સાધુઓને અવાજ વિશે પૂછે છે.
સાધુઓ કહે છે: “અમે તમને નહીં જણાવી શકીએ, કારણ કે તમે સાધુ નથી.”
મુસાફર ધ્યાન અને પ્રાર્થના કરવામાં બીજા ત્રણ વર્ષ વિતાવે છે.
છેવટે, એક સમારોહ યોજવામાં આવે છે જેમાં મુસાફરને ‘સાધુ’ જાહેર કરવામાં આવે છે.
હવે તે એક સાધુને અવાજના ઉદ્ગમ વિશે પૂછે છે.
સાધુ કહે છે: “હવે તો તું પોતે જ એક સાધુ છે, જા અને જાતે જ જોઈ લે.”
સાધુ તે નવા બનેલા સાધુ (મુસાફર) ને એક માર્ગ તરફ લઈ જાય છે.
એ માર્ગ એક મોટા ઓરડા તરફ જાય છે.
એ ઓરડો બીજા એક માર્ગ તરફ જાય છે.
એ માર્ગ એક નાના ઓરડા તરફ જાય છે.
ત્યાં, મુસાફર અંતે જુએ છે કે “તે વિચિત્ર અવાજનું કારણ શું છે.”
પણ… હું તમને નહીં જણાવી શકું કે તે શું છે, કારણ કે તમે સાધુ નથી!

અસ્તુ…

Posted in खान्ग्रेस, हिन्दू पतन

वह मस्जिद से बाहर निकला था और सरदार पटेल पर हमला किया था।

हमें सिखाया गया कि महात्मा गांधी की हत्या नाथूराम गोडसे ने की थी,

लेकिन हमें कभी नहीं सिखाया गया कि 14 मई 1939 को भावनगर में सरदार वल्लभभाई पटेल पर किसने हमला किया,

किसने उनकी हत्या करने की कोशिश की, और अदालत ने कितने आरोपियों को फांसी या आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई।

भावनगर में 14 और 15 मई 1939 को भावनगर राज्य प्रजा परिषद का पाँचवाँ अधिवेशन आयोजित होना था, जिसकी अध्यक्षता सरदार वल्लभभाई पटेल करने वाले थे।

जब सरदार पटेल भावनगर पहुँचे, तो रेलवे स्टेशन से एक भव्य शोभायात्रा निकाली गई।

सरदार पटेल एक खुली जीप में बैठे हुए थे, दोनों ओर खड़ी जनता का अभिवादन स्वीकार कर रहे थे।

जब जुलूस खार गेट चौक पहुँचा, तो नगीना मस्जिद में छिपे हुए 57 तथाकथित शांतिप्रिय लोग तलवारें, चाकू और भाले लेकर जीप की ओर दौड़ पड़े।

दो युवकों — बच्छुभाई पटेल और जाधवभाई मोदी — ने यह दृश्य देखा।

उन्होंने तुरंत सरदार पटेल को चारों ओर से घेर लिया ताकि उन्हें बचा सकें, और अपनी जान की परवाह किए बिना, वे उन वारों को अपने ऊपर ले लिए जो सरदार पटेल के लिए किए गए थे।

उन्होंने सरदार पटेल की ढाल बनकर अपने प्राणों की आहुति दे दी।

हमलावरों ने दोनों युवकों पर तलवार से कई वार किए — बच्छुभाई पटेल वहीं शहीद हो गए, जबकि जाधवभाई मोदी ने अस्पताल में दम तोड़ दिया।

आज भी उन वीर युवकों की प्रतिमाएँ उसी स्थान पर स्थापित हैं जहाँ उन्होंने अपने प्राण न्योछावर किए थे।

तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने इस घटना की गहन जांच की और एक विशेष न्यायालय गठित किया।

57 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से:

• आजाद अली

• रुस्तम अली सिपाही — को फांसी की सज़ा सुनाई गई।

निम्नलिखित 15 अपराधियों को आजीवन कारावास की सज़ा दी गई:

• कासिम दोसा घांची

• लतीफ मियां काज़ी

• मोहम्मद करीम सैनिक

• सैयद हुसैन

• चंद्र गुलाब सैनिक

• हाशिम सुमरा ताह

• लुहार मूसा अब्दुल्ला

• अली मियां अहमद मियां सैयद

• अली मामद सुलेमान

• मोहम्मद सुलेमान कुम्भार

• अबू बकर अब्दुल्ला

• लुहार अहमदिया

• मोहम्मद मियां काज़ी

उन्होंने अदालत में कहा कि सरदार वल्लभभाई पटेल ने कोलकाता में मुस्लिम लीग के खिलाफ भाषण दिया था,

जिसके कारण उनकी हत्या की साजिश रची गई।

यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरदार पटेल की मृत्यु के बाद, नेहरू सरकार ने इस ऐतिहासिक घटना को इतिहास की पुस्तकों से मिटा दिया,

ताकि आने वाली पीढ़ियाँ यह न जान सकें कि सरदार पटेल पर भी एक घातक हमला और हत्या का षड्यंत्र हुआ था।
#forest #birdlife #wellness #army #viratkohli #temperature #love #hinduism #history #fbcreator #fblifestylechallenge

Posted in खान्ग्रेस

नेहरु का ये मानना था की देश की सेना को सँभालने के लिए भारतीयों के पास काबिलियत और अनुभव नहीं है इसलिए भारतीय सेना का अध्यक्ष कोई विदेशी होना चाहिए क्योकि अंग्रेजो की सेना में भारतीय निचले तबके पर ही रहे और उन्होंने आजाद भारत की सेना का पहला अध्यक्ष बनाया एक अंग्रेज जनरल रॉब लॉकहार्ट को ।

1948 के अंत में रॉब लोकहार्ट ने इस्तीफा दे दिया क्योकि वो इंग्लैंड में ही रहना चाहते थे और सेना अध्यक्ष का पद खाली हो गया एक नए अंग्रेज सेना अध्यक्ष को नियुक्त करने के लिए नेहरु ने मंत्रिमंडल की मीटिंग बुलाई , उस मीटिंग में कुछ भारतीय लेफ्टिनेंट रैंक के ऑफिसर भी थे ।

नेहरु ने बोलना शुरू किया , क्योकि भारतीयों के पास सेना सँभालने का अनुभव नहीं है इसलिए इन नामो में से आपको कौन सा विदेशी जनरल ठीक लगता है पर अपनी राय दे ।

इस पर कर्नल नाथू सिंह राठोर खड़े हुए और नेहरु से बोले … “किसी भारतीयों को प्रधानमंत्री होने का भी अनुभव नहीं है,तो आप यहाँ क्यों बैठे है इस पद पर भी किसी अंग्रज को बिठाइये, दुनिया में एसा कौन सा देश है जो अपनी सेना का अध्यक्ष विदेशी को बनाता है” ।

ये सुनते ही नेहरु तिलमिला गए और उनको बाहर कर दिया । रक्षा मंत्री बलदेव सिंह, नाथू सिंह के इस साहस से खुश हुए और उन्होंने उनके पुरे रिकॉर्ड मंगवाए , तो पता चला नाथू सिंह बर्मा में और विश्व युद्ध में सेना की टुकड़ी का सफल नेतृत्व कर चुके थे और उन्होंने नेहरु को नाथू सिंह को ही सेना अध्यक्ष बनाने की शिफारिश कर दी ।
पर क्योकि नेहरु नाराज थे उन्हें नहीं बनाया गया लेकिन दुसरे भारतीय सीएम्_करिअप्पा को सेना अध्यक्ष बनाया ।

ये नाथू सिंह राठोर उन्ही महाराणा प्रताप की धरती से थे, जिन्हें मुग़ल कभी हरा नहीं पाए ।

जय हिन्द,,जय भारत,,,..
#temperature #forest #wellness #birdlife #viratkohli #tudaybestphoto #fblifestylechallenge #fbcreator #army

Posted in यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

તમારા ડોક્ટરને 20 વર્ષ પછી ખબર પડે કે તે સમયે ઓપરેશન ખોટું કર્યું હતું તો?

એક અમેરિકન લેખિકા Betty Friedan એ પોતાની આજુબાજુની કેટલીક મહિલાઓનો સર્વે કરીને એવું તારણ કાઢ્યું કે “આ તમામ મહિલાઓનો પરિવાર છે, બાળકો છે અને મોટા ભાગે સંપન્ન છે. છતાં તેમનામાં એક અલગ જ પ્રકારનો અજંપો ( અસંતોષ અને મુંજવણની સ્થિતિ ) છે. પણ એ લોકોને ખબર જ નથી કે આ અજંપો શેનો છે?”

આ લેખિકાએ આ વસ્તુનો આધાર લઈને આ અસંતોષને નામ આપ્યું “The Problem That Has No Name” અર્થાત કે એવી સમસ્યા જેનું નામ નથી. આ બાબતને આધાર બનાવીને ઈ.સ. 1961 માં એક પુસ્તક લખ્યું ‘The Feminine Mystique‘

આ પુસ્તકમાં લેખિકાએ કહ્યું કે પરિવાર, પતિ અને બાળકોથી સ્ત્રીની ઓળખ ન જ હોવી જોઈએ. માટે તમામ સ્ત્રીઓએ આ બંધનમાંથી મુક્ત થઈને પોતાની ઓળખ ઉભી કરવી જોઈએ અને ઓળખ ઉભી કરવામાં કઈ પણ વચ્ચે આવે તે ત્યાગી મુકો.

આ પુસ્તક વીજળીવેગે આખા અમેરિકા અને યુરોપનાં દેશમાં ફેલાઈ ગયું અને લાખો કોપી વેચાઈ અને વંચાઈ. ફક્ત વચવા પૂરતી જ નહીં લાખો સ્ત્રીઓએ આ પુસ્તકને આઝાદીનો મેનુફેસ્ટો બનાવીને જીવવા લાગી. આ પુસ્તકનાં કારણે આખા યુરોપ અને અમેરિકામાં ફેમિનિસ્ટની લહેર આવી ગઈ.

આજે તમને ભારતમાં જે પણ ફેમિનિસ્ટ ઝમકુડીઓ કૂદાકૂદ કરતી જોવા મળે, એ લોકોનાં મૂળવાઓ પ્રત્યક્ષ અને અપ્રત્યક્ષ રીતે તમને Betty Friedan અને તેમના પુસ્તક સાથે જોવા મળે.

આ પુસ્તક પૂરતા મર્યાદિત ન રહેતા Betty Friedan એ એક સંસ્થા બનાવી NOW ( National Organization for Women ) તેની અધ્યક્ષ બનીને ફેમિનિસ્ટ વિચારધારાને આગળ વધારવા માટે અભિયાન ચલાવ્યું.

પણ, ધીરે ધીરે આ અભિયાનની આડ અસરો જોવા મળી, મહિલાઓ આ પુસ્તક વાંચીને આઝાદીનાં નામ પર પરિવારનો ત્યાગ કરવા લાગી, મરજી મુજબ કોઈ સાથે જોડાવું અને તેને છોડવું. આ પુસ્તકથી અગણિત મહિલાઓએ છુટાછેડા લીધા અને અનેક ઘરો તૂટ્યો કેટલાય બાળકો રઝળી પડ્યા કેયલાય પુરુષોનું જીવન બરબાદ થઇ ગયું. આખા યુરોપમાં કુટુંબ વ્યવસ્થા પર પ્રશ્નાર્થ ચિન્હ ઉભો થઇ ગયો. મહિલાઓ પરિવાર, બાળકો અને લગનને પછાત હોવાની નિશાની માનવા લાગી. ધીરે ધીરે કેટલાક પ્રબુદ્ધ લોકો આગળ આવ્યા અને આનો વિરોધ કર્યો.

અંતે Betty Friedan ને પણ અહેસાસ થયો કે આતો ‘બકરું કાઢતા ઊંટ પેસી ગયો’ છે. પરિવારો તૂટ્યા એ તો ઠીક પણ જે મહિલાઓએ આ નિર્ણય લીધા હતા એ પણ હવે એકલી પાડવા લાગી અને ડિપ્રેશનનો શિકાર થવા લાગી હતી. અને એનો જવાબ લેખિકા પાસે હતો જ નહીં.

માટે, પ્રથમ પુસ્તકનાં 20 વર્ષ બાદ ઈ.સ. 1981 માં Betty Friedan એ પોતાનું એક નવું પુસ્તક લખ્યું ‘The Second Stage‘ આશ્ચર્ય સાથે આ પુસ્તકમાં તેમણે ફેમિનિસ્ટનો વિરોધ કર્યો અને તેમણે સ્પષ્ટ કહ્યું કે મારાં વિચારોને મહિલાઓએ અલગ રીતે અને કટ્ટરતા પૂર્વક લઇ લીધા છે. આઝાદીની મુહિમ ક્યારે પુરુષ અને પરિવાર વિરોધમાં રૂપાંતર થઇ ગઈ એ દુઃખદ છે.

તેમણે સ્પષ્ટ કહ્યું કે “સમાનતાનો અર્થ એ નથી કે મહિલા પરિવાર અને સમાજથી દૂર થઇ જાય”. વધુમાં કહેવું પડ્યું કે કેરિયર અને ઓળખ સાથે સાથે પરિવાર અને બાળકોની ભાવનાત્મક જરૂરિયાત પણ એટલી જ અગત્યની છે, આમ મહિલાઓએ બેલેન્સ કરવું જરૂરી છે.

કહેવાય છે કે ‘હાથનાં કર્યા હૈયે વાગે‘ એમ તમામ નારિવાદીઓએ Friedan નો વિરોધ કર્યો અને આરોપ લગાવ્યો કે તમે ફેમિનીઝમની લડાઈને નબળી પાડી રહ્યા છો અને આતો તમારા મૂળ વિચારની વિપરીત વાત છે.

આમ ઘણી વાત આપણને ટૂંકા ગાળા માટે સારી લાગતી હોય પણ લાંબા ગાળે તેની આડ અસર જોવાની આપણામાં દીર્ઘદ્રષ્ટિ ન હોય તો કોઈ દિવસ સામાજિક ઉપદેશ આપવા માટે આગળ ન આવવું જોઈએ. Friedan દ્વારા બીજું પુસ્તક લખવામાં આવ્યું તે 20 વર્ષ દરમિયાન બરબાદ થયેલા પરિવારનો હિસાબ કોણ આપશે?

બસ, આપણે ત્યાં પણ આવી ઘણી નકલી ફેમિનિસ્ટ ઝમકુંડીઓ છે જેની ટૂંકી દ્રષ્ટિથી લોકોને માર્ગદર્શન આપીને લોકોને ઉશકેરવા નીકળી પડે છે. પણ એ લોકોને જ ખ્યાલ નથી કે એ લોકોનો હેતુ શું છે? અથવા કે પામવા માટે એ લોકો આહવાન કરે છે તેના બદલામાં શું ઘુમાવવું પડે તેનો હિસાબ છે?

ભારતમાં કુટુંબ વ્યવસ્થાને જાળવી રાખનાર તમામ નારીશક્તિઓને નમન 🙏

નોટ: ફરીથી કહું છું “ઝાડથી અલગ થઈને ઝાડ આઝાદ નથી થતું પણ ધારાશયી થાય છે.

– મહેશ પુરોહિત, નવસારી
( ફેમિનિસ્ટ રોગનાં નિષ્ણાંત )