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जब इंदिरा गांधी ने अपने तुच्छ राजनीतिक स्वार्थ के लिए सेना के बहादुर और जांबाज मेजर जनरल को बागी बना दिया था और जिसकी वजह से वह बागी जनरल भिंडरावाला के साथ शामिल होकर अपनी ही भारतीय सेना को नाकों चने चबा दिए थे।

भारतीय सेना के जांबाज़ मेजर जनरल शाबेग सिंह को इंदिरा गांधी ने रिटायरमेंट के मात्र 1 दिन पहले यह कहकर निलंबित कर दिया कि उन्होंने अपना घर बनवाने के लिए सेना के ट्रक का इस्तेमाल किया था।

उन्हें निलंबित करने के लिए ना तो पूरी प्रक्रिया का पालन किया गया ना ही कोई कोर्ट ऑफ इंक्वायरी बनी जबकि इतने बड़े पद पर बैठे व्यक्ति को निलंबित करने के लिए पूरी प्रक्रिया का पालन करना जरूरी होता है।

इस घोर अपमान को मेजर जनरल शाबेग सिंह बर्दाश्त नहीं कर सके और खालिस्तान भिंडरावाला के साथ शामिल हो गए।

आपरेशन ब्लूस्टार में दोनों तरफ से लड़ने वालों का नेतृत्व भारतीय सेना के अधिकारी ही कर रहे थे। भारतीय सैनिकों की कमान उस वक्त डिविजन कमांडर केएस बरार के हाथों में थी। वहीं खालिस्तानी आतंकवादियों का नेतृत्व सेना से निष्कासित मेजर जनरल शाबेग सिंह ने किया था।

ये मेजर जनरल शाबेग सिंह की घेराबंदी ही थी, जिसके कारण भारतीय सेना को अकाल तख्त में छिपे आतंकियों को निकालने के लिए 6 से ज्यादा विजयंत टैंकों का सहारा लेना पड़ा था।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एन एच 15 पर गुजरात बॉर्डर से पहले एक गाँव पड़ता है धोरीमन्ना।
वहाँ 40 बरस पहले मुख्य मार्ग के दोनों तरफ की दुकानें लोकल हिन्दुओं की ही थी।
फिर एक दो शांतिदूतों की एंट्री होती है।
धीरे धीरे दस पन्द्रह वर्षों में एक एक कर सारी दुकानें उनकी होती चली गई।
जब मार्केट उनका हुआ तो फिर वहाँ गरीब ठेले रेहड़ी वालों तक का खड़े रहना कठिन हो गया। आस पास की बस्ती पर भी असर हुआ, और भी बहुत सारी बातें हुईं।

लगभग आधा किलोमीटर का मार्केट, दोनों तरफ एक ही जैसे लोगों का बोलबाला और हाईवे!!

जब तक बात समझ आती बहुत देर हो चुकी थी। लोकल लोगों को मन मसोस कर अपनी ही जन्मभूमि पर विवश और लाचार अनुभव किया जा सकता था।
आप समझ सकते हैं, उसके इफेक्ट्स कितने महत्वपूर्ण रहे होंगे!!

आरएसएस के एक जिला स्तर के अधिकारी का अक्सर वहाँ संघ कार्य से प्रवास होता था।
वे जब भी कोई प्रोग्रामिंग लेकर जाते, जैसे कोई जुलूस, धर्मसभा या ऐसा ही कोई अभियान, बाजार की बहुत जरूरत रहती है, लेकिन यहाँ पर अब यह बाधा हर समय आड़े आती।
वे ठहरे बनिया आदमी!!
दिमाग लगाया, पता किया कि यहाँ से एक डेढ़ किलोमीटर आगे पीछे हाइवे के किनारे किसी हिन्दू का खेत है क्या?
यहाँ बाड़मेर में जाट विश्नोईयों के पास बड़े बड़े खेत हैं।
सम्पर्क किया गया।
योजना बनी।
गाँव से थोड़ा आगे ही आमने सामने दो खेतों का चयन कर भूमि कन्वर्ट करवा कर प्लॉट काटे गए और इस बार चुन चुन कर पूरी योजना से, शपथ पूर्वक लोकल लोगों को खरीदवा दिए गए।
मात्र एक वर्ष में ही पहले से भी बड़ा, #एक_भव्य_सुव्यवस्थित नया मार्किट खड़ा हो गया।
पुराना मार्केट वैसे भी गन्दा और अस्तव्यस्त हो चुका था। लोग भी सयाने हो चुके थे।
90% इकोनॉमी वापस इधर शिफ्ट हो गई और कई नई, सक्षम, सबल पार्टियां खड़ी हो गई।
शांतिदूतों ने यहाँ भी सेंध मारने की कोशिश की लेकिन इस बार सभी सजग थे और भूमि के स्वामी ने एक कमिटमेंट से सबको बांध रखा था। तो कोई दाल नहीं गली और जिस किसी ने भी सुना, उनके लिए भी एक नई शिक्षा बनकर, वहाँ वहाँ के निवासियों के लिए भी इस अनुभव को दोहराने के प्रयत्न किए गए।
कई बार समाधान हमारे आस पास ही होते हैं, हम वहाँ ध्यान देने की बजाय इधर उधर भटकते रहते हैं।

पोस्ट साभार
#ks_कुमार
हनुमानचंद जैन जी

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भारत के पूरे विपक्ष को इंदिरा गांधी ने फर्जी केस लगाकर कई खतरनाक धाराओं में जेल में बंद कर दिया था

लोकनायक जयप्रकाश नारायण को लेड मिला हुआ पानी पिला दिया गया जिससे उनके दोनों गुर्दे जेल में खराब हो गए और उनका निधन हो गया था

जॉर्ज फर्नांडिस को फसाने के लिए उनके ऊपर डायनामाइट के द्वारा भारत में ब्लास्ट करने का आरोप लगाया गया जिसे बड़ोदरा डायनामाइट केस कहते हैं आप लोग गूगल पर सर्च करिए

और उन्हें न सिर्फ हथकड़ी बल्कि पूरे शरीर में 80 किलो की बेड़ियों में जकड़ दिया गया था

एक आईकॉनिक फोटो बहुत पॉपुलर हुई थी जब उन्होंने कैदी वाहन  से उतरते समय हाथ ऊपर उठकर इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाया था

और दहशत ऐसी थी कि कोई भी वकील जार्ज फर्नांडिस का मुकदमा लड़ने को तैयार नहीं था

तब ऐसे में एक 23 साल की युवा लड़की वकील जॉर्ज फर्नांडिस का मुकदमा लड़ी और उन्हें बाइज्जत  बरी कराया ।

और वह 23 साल की लड़की थी सुषमा स्वराज जो आगे चलकर बीजेपी की कद्दावर  नेता बनी भारत की विदेश मंत्री बनी

इंदिरा गांधी के इतने अत्याचार के बाद भी भारत के किसी भी विपक्षी नेता ने यह नारा नहीं दिया कि इंदिरा तेरी कब्र खुदेगी इंदिरा तू ताबूत में जाएगी मर जा इंदिरा आदि

मतलब उस वक्त अटल बिहारी वाजपेयी लालकृष्ण आडवाणी जॉर्ज फर्नांडिस यहां तक की मुलायम और लालू प्रसाद यादव जो जेल में थे उन लोगों ने राजनीति के स्तर को इतना मेंटेन रखा की राजनीतिक दुश्मनी को कभी निजी दुश्मनी नहीं बनाया कभी इंदिरा गांधी के मरने की कामना नहीं किया
कभी अपने मंच पर इस तरह के घटिया नारे नहीं लगवाये
लेकिन आज 10 सालों से सत्ता में दूर रहने के बाद यह गांधी परिवार उस तरह से तड़प रहा है जैसे खून चूसने को  न मिलने पर कोई पिस्सू  तड़पता है
और यह सत्ता के लिए इतने बेचैन हो गए यह नारे लगवा रहे हैं मोदी तेरी कब्र खुदेगी मोदी तू ताबूत में जाएगा मोदी तू मरेगा
सोचिए यह नीच खानदान ने आज राजनीति का स्तर कितना नीचे गिरा दिया है
और अगर यह दोगले सोच रहे हैं कि इन नारों से यह चुनाव जीतेंगे तो यह इन दोगलो  की भूल है भारत की जनता कभी भी इस तरह की बेशर्मी और बदतमीजी नहीं स्वीकार करती

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जोगेंद्र नाथ मंडल


दलित – मुस्लिम गठजोड़ के पैरोकारों को पाकिस्तान के प्रथम कानून मंत्री जोगेंद्रनाथ मंडल के वे खत जरूर पढ़ लेने चाहिए जो उन्होने अपनी ही सरकार को लिखे थे.

पाकिस्तान बन जाने के कुछ ही दिनों बाद वहां मुस्लिम लीग के कारिन्दों द्वारा गैर-मुस्लिमों को निशाना बनाया जाने लगा था. हिन्दुओं के साथ लूट-मार और बलात्कार की घटनाएं सामने आने लगीं. मंडल ने इस विषय पर सरकार को कई खत लिखे, लेकिन पाकिस्तानी सरकार ने उनकी एक न सुनी, उल्टे योगेन्द्रनाथ मंडल को ही मंत्रिमण्डल से बाहर करने के लिए उनकी देशभक्ति पर संदेह किया जाने लगा. मंडल को इस बात का एहसास हुआ कि जिस पाकिस्तान को उन्होंने अपना घर समझा था, वह उनके रहने लायक नहीं है. मंडल बहुत आहत हुए. उन्हें विश्वास था कि पाकिस्तान में दलित-हिन्दुओं के साथ अन्याय नहीं होगा. किन्तु, करीबन दो सालों में ही दलित-मुस्लिम एकता का उनका ख्वाब टूट गया. अत: जिन्ना की मौत के बाद मंडल 8 अक्टूबर, 1950 को लियाकत अली खां के मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देकर भारत आ गए. योगेन्द्रनाथ मंडल ने अपने खत में मुस्लिम लीग से जुड़ने और अपने इस्तीफे की वजह को स्पष्ट किया है. उसके कुछ अंश आप भी पढ़िए उसके बाद नागरिक संशोधन विधेयक को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचिएगा.

मंडल ने लियाकत अली खां को भेजे अपने खत में लिखा था, “बंगाल में मुस्लिम और दलितों की एक जैसी हालात थी. दोनों ही पिछड़े और अशिक्षित थे. मुझे आश्वस्त किया गया था कि लीग के साथ मेरे सहयोग से ऐसे कदम उठाये जाएंगे जिससे बंगाल की बड़ी आबादी का भला होगा. हम मिलकर ऐसी आधारशिला रखेंगे जिससे साम्प्रदायिक शांति और सौहार्द्र बढ़ेगा. इन्हीं कारणों से मैंने मुस्लिम लीग का साथ दिया. 1946 में पाकिस्तान के निर्माण के लिए मुस्लिम लीग ने ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ मनाया. उसके बाद बंगाल में भीषण दंगे हुए. कलकत्ता के नोआखली नरसंहार में पिछड़ी जाति समेत कई हिन्दुओं की हत्याएं हुई. सैकड़ों ने इस्लाम कबूल लिया. हिन्दू महिलाओं का बलात्कार, अपहरण किया गया. इसके बाद मैंने दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया. मैंने हिन्दुओं के भयानक दुःख देखे. जिनसे आहत हूं. फिर भी मैंने मुस्लिम लीग के साथ सहयोग की नीति को जारी रखा. 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान बनने के बाद मुझे मंत्रिमंडल में शामिल किया गया. मैंने ख्वाजा नजीमुद्दीन से बात कर ईस्ट बंगाल की कैबिनेट में दो पिछड़ी जाति के लोगों को शामिल करने का अनुरोध किया. उन्होंने मुझसे ऐसा करने का वादा किया, लेकिन इसे टाल दिया गया, जिससे मैं बहुत हताश हुआ”.

अपने खत में मंडल ने पाकिस्तान में दलितों पर हुए अत्याचार की कई घटनाओं जिक्र करते हुए लिखा है, ‘गोपालगंज के पास दीघरकुल में मुस्लिमों की झूठी शिकायत पर स्थानीय नमोशूद्राय लोगों के साथ अत्याचार किया गया. पुलिस के साथ मिलकर मुसलमानों ने नमोशूद्राय समाज के लोगों को पीटा, घरों में छापे मारे. एक गर्भवती महिला की इतनी बेरहमी से पिटाई की गयी कि उसका गर्भपात हो गया. निर्दोष हिन्दुओं विशेष रूप से पिछड़े समुदाय के लोगों पर सेना और पुलिस ने भी हिंसा को बढ़ावा दिया. हबीबगढ़ में निर्दोष पुरुषों और महिलाओं को पीटा गया. सेना ने न केवल लोगों को पीटा बल्कि हिन्दू पुरुषों को उनकी महिलाओं को सैन्य शिविरों में भेजने को मजबूर किया, ताकि वो सैनिकों की कामुक इच्छाओं को पूरा कर सकें. मैं इस मामले को आपके संज्ञान में लाया था. मुझे इस मामले में रिपोर्ट के लिए आश्वस्त किया गया, लेकिन रिपोर्ट नहीं आई. कलशैरा में सशस्त्र पुलिस, सेना और स्थानीय लोगों ने पूरे गांव पर हमला किया. कई महिलाओं का पुलिस, सेना और स्थानीय लोगों द्वारा बलात्कार किया गया. मैंने 28 फरवरी 1950 को कलशैरा और आसपास के गांवों का दौरा किया। जब मैं कलशैरा में आया तो देखा कि वह जगह उजाड़ और खंडहर में बदल गई है. करीब 350 घरों को ध्वस्त कर दिया गया. मैंने तथ्यों के साथ आपको सूचना दी. ढाका में नौ दिनों के प्रवास के दौरान में दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया. ढाका नारायणगंज और ढाका चंटगांव के बीच ट्रेनों और पटरियों पर निर्दोष हिन्दुओं की हत्याओं ने मुझे गहरा झटका दिया. मैंने ईस्ट बंगाल के मुख्यमंत्री से मुलाकात कर दंगा रोकने के लिए जरूरी कदमों को उठाने का आग्रह किया. 20 फरवरी 1950 को मैं बरिसाल पहुंचा. वहां की घटनाओं के बारे में जानकार चकित था. वहां बड़ी संख्या में हिन्दुओं को जला दिया गया था. उनकी बड़ी आबादी को खत्म कर दिया गया. मैंने जिले में लगभग सभी दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया.

पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री अपने खत में लिखते हैं, “मधापाशा में जमींदार के घर में 200 लोगों की मौत हुई और 40 घायल थे. एक जगह है मुलादी. प्रत्यक्षदर्शी ने वहां भयानक नरक देखा. वहां 300 लोगों का कत्लेआम हुआ था. वहां गांव में शवों के कंकाल भी देखे. नदी किनारे गिद्ध और कुत्ते लाशों को खा रहे थे. वहां पुरुषों की हत्या के बाद लड़कियों को आपस में बांट लिया गया. राजापुर में 60 लोग मारे गए. बाबूगंज में हिन्दुओं की दुकानों को लूटकर आग लगा दी गई. ईस्ट बंगाल के दंगे में अनुमान के मुताबिक 10,000 लोगों की हत्या हुई. अपने आसपास महिलाओं और बच्चों को विलाप करते हुए मेरा दिल पिघल गया. मैंने अपने आप से पूछा, क्या मैं इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान आया था ?”. उन्होंने लिखा है, ‘मुझे एक ऐसी सूची मिली है, जिसके अनुसार 363 मंदिरों व गुरूद्वारों को मुसलमानों ने कब्जे में ले लिया है. इनमें से कुछ को कसाईखाना व होटलों में तब्दील कर दिया है. मुझे जानकारी मिली है कि सिंध में रहने वाले दलित हिन्दुओं की बड़ी संख्या को जबरन मुसलमान बनाया गया है”.

मंडल ने अपने तत्कालीन प्रधानमंत्री को भेजे अपने खत के अंत में लिखा था, “पाकिस्तान की पूरी तस्वीर तथा उसकी शासन-व्यवस्था के निर्दयी एवं कठोर अन्याय को एक तरफ रखते हुए मेरा अपना तजुर्बा भी कुछ कम दुखदायी व पीड़ादायक नहीं है. आपने अपने प्रधानमंत्री और संसदीय पार्टी के पद का उपयोग करते हुए मुझसे एक वक्तव्य जारी करवाया था, जो मैंने 8 सितम्बर को दिया था. आप जानते हैं कि मेरी ऐसी मंशा नहीं थी कि मैं ऐसे असत्य और असत्य से भी बुरे अर्धसत्य-भरा वक्तव्य जारी करूं. जब तक मै मंत्री के रूप में आपके साथ और आपके नेतृत्व में काम कर रहा था, मेरे लिए आपके आग्रह को ठुकरा देना मुमकिन नहीं था. पर, अब मैं इससे ज्यादा झूठे दिखावे तथा असत्य के बोझ को अपनी अंतरात्मा पर नहीं लाद सकता. मैंने यह निश्चय किया कि मैं आपके मंत्री के तौर पर अपने इस्तीफे का प्रस्ताव आपको दूं, जो कि मैं आपके हाथों में थमा रहा हूं. मुझे उम्मीद है आप बिना किसी देरी के इसे स्वीकार करेंगे. आप बेशक इस्लामिक स्टेट के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए इस पद को किसी को देने के लिये स्वतंत्र हैं”.

दलित-मुस्लिम गठजोड़ और जम भीम-जय मीम का नारा देने वाले आपने कभी जोगेंद्रनाथ मंडल का नहीं लेते नहीं देखा होगा. आज हम जिन आंबेडकर को दलितों का सबसे बड़ा मसीहा के तौर पर जानते हैं मंडल उनसे भी बड़े दलित नेता थे. उन्होने ही अंबेडकर को दुनिया के समक्ष खड़ा किया था. मालूम हो कि पाकिस्तानी सरकार के मंत्रिमंडल से इस्तीफे के बाद योगेन्द्रनाथ मंडल भारत आ गये थे. कुछ वर्ष गुमनामी की जिन्दगी जीने के बाद 5 अक्टूबर, 1968 को पश्चिम बंगाल में उन्होंने अंतिम सांस ली. ऐसे में विभाजन के समय कांग्रेसी नेताओं के इस आश्वासन पर कि पाकिस्तान में किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं होगा, वहीं रह गए हिन्दुओं की भला क्या गलती है जिन्हें आज वहां न्यूनतम मानवाधिकार भी प्राप्त नहीं है.