बहुत हरामी हैं स्साले…
धुरंधर ने देश के सेक्युलरों को बहुत बुरी तरह छील दिया है और छीलने के बाद उनकी खोपड़ी पर उसी तरह प्रहार कर रही है, जैसे रहमान डकैत 10 किलो के बांट से अपने दुश्मन अरशद पप्पू के सिर को कूचता है।
ऐसा हो इसलिए रहा है क्योंकि धुरंधर या कश्मीर फाइल्स सरीखी फिल्मों के खिलाफ़ नंगे होकर नाच रहे इन धूर्तों के दोगलेपन की धज्जियां उड़ा रही है धुरंधर….
आइए देखते हैं कैसे…
भारत में 1990 से 2014 तक रिलीज़ हुईं प्रमुख फिल्में, जिनमें आतंकवाद को मुख्य थीम बनाया गया है लेकिन आतंकवादियों/उग्रवादियों की पृष्ठभूमि, उनके दर्द, उनके कारणों या मानवीय पक्ष को दिखाते हुए चित्रित किया गया है।
ऐसी ही फिल्म है 1992 में आयी Roja (1992) – मणिरत्नम निर्देशित इस फिल्म में कश्मीरी उग्रवाद पर, आतंकवादी नेता (पंकज कपूर) के मानवीय पक्ष को दिखाया गया, जहां वह कैदी के साथ संवाद करता है और अपनी विचारधारा की गहराई को बताता है। जबकि यह वही दौर है जब गिरिजा टिक्कू सरीखी अनेकों हिंदू महिलाओं के साथ सड़क पर गैंग रेप के बाद लकड़ी चीरने वाली आरा मशीन से चीर दिया गया था। लेकिन मणिरत्नमवा यह दिखाने के बजाए आतंकवादी सरगना का मानवीय पहलू दिखाने में जुटा था। लेकिन 32-33 साल बाद जब कश्मीर फाइल्स में गिरिजा टिक्कू और उनके जैसी असंख्य हिंदू महिलाओं के साथ हुई राक्षसी बर्बरता का सच दिखाया गया तो यही मणिरत्नमवा अपने कपड़े उतार कर कश्मीर फाइल्स के खिलाफ खूब झूम कर नाचा था।
Drohkaal (1994) – पुलिस और आतंकवाद के मनोवैज्ञानिक प्रभाव के नाम पर आतंक समर्थक और भारत विरोधी नजरिया बड़े जोरशोर से परोसा गया।
1996 में गुलजार निर्देशित माचिस आयी। जिसे पंजाब में आतंकवाद पर बनाया गया था, लेकिन गुलजरवा ने अपनी फिल्म में दिखाया कि पुलिस अपने अत्याचार कैसे सामान्य युवाओं को उग्रवादी बना देती हैं। पूरी फिल्म में आतंकवादियों को सहानुभूति और पुलिस को गालियों के साथ चित्रित किया था गुलज़रवे ने।
Dil Se.. (1998 में मणिरत्नम ने दिल से को निर्देशित किया। उत्तर-पूर्व के उग्रवाद पर, महिला सुसाइड बॉम्बर (मनीषा कोइराला) के दर्द, पृष्ठभूमि और भावनाओं को मानवीय रूप से दिखाया गया। मणिरत्नमवे ने एकबार फिर फिल्म में भारत विरोधी एजेंडा जोरशोर से चलाया।
2000 में विधु विनोद चोपड़ा ने Mission Kashmir बनायी, उसे निर्देशित किया। फिल्म में कश्मीर में आतंकवाद पर, एक युवा (ऋतिक रोशन) जो परिवार खोने के बाद आतंकवादी बनता है; उसके दर्द और संघर्ष को मानवीय दृष्टि से दिखाया।
2000 में ही– खालिद मोहम्मद ने Fiza को निर्देशित किया। फिल्म में दंगों के बाद लापता भाई (ऋतिक रोशन) आतंकवादी बन जाता है; उसकी तलाश और उसके मानवीय पक्ष को दिखाया गया।
इसके अलावा The Terrorist (1998).
Hu Tu Tu (1999)
Black Friday (2004)
Yahaan (2005)
Haider (2014)
सूची केवल इतनी नहीं है… बहुत लंबी सूची है. यहां केवल कुछ उदाहरण दिए हैं। ये वो फ़िल्में हैं जिनमें कश्मीर संघर्ष और आतंकवाद का सहानुभूतिपूर्ण पक्ष लेकिन सेना के पक्षों को ग्रे शेड्स में दिखाया गया।,
लेकिन अब यह मौसम बदल रहा है या बदल चुका है…
यही कारण है कि, भारत और हिंदू विरोध के अंधेरे में जीने वाले उल्लुओं को अब तेज चमकते हुए राष्ट्रवाद की चमक बिल्कुल रास नहीं आ रही है।
क्योंकि… बहुत हरामी हैं स्साले…
Satish Chandra Mishra ji