Posted in काश्मीर - Kashmir

💔 Sarvanand Koul Premi — “The Kashmir Files”

He was not a fighter.
He was not a man of power.
He was a poet, a teacher, a Gandhian — a quiet soul who believed that words could heal a land breaking under its own grief.

But hatred came to his doorstep on the night of 1 May 1990.

Armed men entered his home — not unknown outsiders, but people who lived in the same valley he had served all his life.
They dragged him out into the darkness along with his young son, Virender.
A father and a son, taken not for anything they had done… but simply for who they were: Kashmiri Pandits who refused to run.

For two days they were tortured.
Two days of cruelty that no civilized land should ever witness, no family should ever have to imagine.
And when the screams finally stopped, their bodies were dumped — broken, wounded, humiliated — as a message to an entire community.

A message that terror had replaced humanity.
A message that poets and teachers would die before militants ever felt threatened.
A message that a 74-year-old man’s pen was more dangerous than their guns.

When his lifeless body returned home, it was not just a corpse —
it was Kashmir’s conscience laid bare.

A son who would never return.
A father whose words were silenced by violence.
A family shattered beyond repair.

But what his killers never understood is this:

You can burn a manuscript, but you cannot kill an idea.
You can silence a man, but you cannot bury his truth.
They tried to erase Sarvanand Koul Premi — instead, they immortalized him.

His story is not just a tragedy —
it is a testament to what was done to a peaceful community before the world even bothered to look.

Remember his name.
Remember his suffering.
Remember that he was a man of peace — and they killed him with unspeakable brutality.

This is Sarvanand Koul Premi.
This is his truth.
This is why The Kashmir Files must never be forgotten.

Posted in खान्ग्रेस

जिन्होंने गलत इतीहास का #मैला खाया उनको सच का घी हजम नही होता

सदन में आज वंदेमातरम पर बोलते हुए प्रधानमंत्री मोदी जी ने कहा की एक वीरांगना “सरोजिनीबोस”  ने प्रण लिया था कि जब तक वंदे मातरम से प्रतिबंध नहीं हटेगा मैं चूड़ियां नहीं पहनूंगी !
और उन्होंने चूड़ी उतार दी थी,

सदन में पीछे से महुआमोइत्रा बार-बार चिल्लाती हैं नायडू सर नायडू सर ,
मतलब इन विपक्ष के कुत्तों को सिर्फ सरोजिनी नायडू के ही बारे में पता है क्योंकि कांग्रेस ने जो अपने पालतू इतिहासकार पाले थे उन्होंने सिर्फ कांग्रेस को लोगों के नाम ही स्वतंत्रता संग्राम में डालें उन्होंने  सभी क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सलाम सेनानियों के नाम भारत के इतिहास से मिटा दिए गए..!
सरोजिनी नायडू और सरोजिनी बोस  दोनों अलग अलग महिला है !
सरोजिनी बोस बंगाल की थी फिर भी महुआ मोइत्रा को सरोजिनी बोस के बारे में पता नहीं है! क्योंकि कांग्रेस के प्रायोजित और पसंदीदा ही लोग रहे हैं उनके व्यक्तव्यों में अनगिनत आजादी के देश प्रेमियों को भुला दिया गया..
यह हिस्टीरिया के मरीज की तरह सिर्फ चीखती है चिल्लाती है,
सरोजिनी बोस वही थी जिन्होंने वंदे मातरम पर जो अंग्रेजों ने प्रतिबंध लगाया था उसके विरोध में अपनी चूड़ी उतार दी थी और प्रण लिया था कि जब तक वंदे मातरम से प्रतिबंध नहीं हटेगा मैं चूड़ी नहीं पहनूंगी.!🇮🇳

जय भारत
     जय हिन्द
” वन्देमातरम ”
मेरा भारत महान ❤️

इसी तरह की राष्ट से जुड़ी पोस्ट पढ़ने के लिए हमें फॉलो जरूर करें। धन्यवाद

Posted in खान्ग्रेस

जिन्होंने गलत इतीहास का #मैला खाया उनको सच का घी हजम नही होता

सदन में आज वंदेमातरम पर बोलते हुए प्रधानमंत्री मोदी जी ने कहा की एक वीरांगना “सरोजिनीबोस”  ने प्रण लिया था कि जब तक वंदे मातरम से प्रतिबंध नहीं हटेगा मैं चूड़ियां नहीं पहनूंगी !
और उन्होंने चूड़ी उतार दी थी,

सदन में पीछे से महुआमोइत्रा बार-बार चिल्लाती हैं नायडू सर नायडू सर ,
मतलब इन विपक्ष के कुत्तों को सिर्फ सरोजिनी नायडू के ही बारे में पता है क्योंकि कांग्रेस ने जो अपने पालतू इतिहासकार पाले थे उन्होंने सिर्फ कांग्रेस को लोगों के नाम ही स्वतंत्रता संग्राम में डालें उन्होंने  सभी क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सलाम सेनानियों के नाम भारत के इतिहास से मिटा दिए गए..!
सरोजिनी नायडू और सरोजिनी बोस  दोनों अलग अलग महिला है !
सरोजिनी बोस बंगाल की थी फिर भी महुआ मोइत्रा को सरोजिनी बोस के बारे में पता नहीं है! क्योंकि कांग्रेस के प्रायोजित और पसंदीदा ही लोग रहे हैं उनके व्यक्तव्यों में अनगिनत आजादी के देश प्रेमियों को भुला दिया गया..
यह हिस्टीरिया के मरीज की तरह सिर्फ चीखती है चिल्लाती है,
सरोजिनी बोस वही थी जिन्होंने वंदे मातरम पर जो अंग्रेजों ने प्रतिबंध लगाया था उसके विरोध में अपनी चूड़ी उतार दी थी और प्रण लिया था कि जब तक वंदे मातरम से प्रतिबंध नहीं हटेगा मैं चूड़ी नहीं पहनूंगी.!🇮🇳

जय भारत
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Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक दिन एक व्यक्ति गांधी जी से मिलने आया। उसने अपने सिर पर बहुत बड़ी पगड़ी बांध रखी थी। उसने पूछा, ‘गांधी जी, मेरे मन में एक जिज्ञासा है, यदि आप आज्ञा दें तो पूछूं?’ गांधी जी बोले, ‘बिल्कुल, आप जरूर पूछें। ‘ वह व्यक्ति बोला, ‘आजकल हर जगह गांधी टोपी की बड़ी चर्चा है। हर दूसरा व्यक्ति गांधी टोपी लगाए इतरा कर कहता है कि मैंने गांधी टोपी पहनी है। पर मुझे यह बात समझ में नहीं आती कि वह टोपी भला गांधी टोपी कैसे हो गई? आप तो टोपी पहनते ही नहीं, फिर उस टोपी को सभी गांधी टोपी क्यों कहते हैं?’
गांधी जी मुस्करा कर बोले, ‘बात यह है कि मैं हर चीज का किफायत से उपयोग करने की बात कहता हूं। साथ ही मेरा यह भी मानना है कि हर वस्तु का उपयोग तब तक करना चाहिए जब तक कि वह बिल्कुल ही खराब न हो जाए। यह टोपी बहुत ही किफायती है। साथ ही इसे घर में भी बनाया जा सकता है। इसे बनाने में किसी बहुमूल्य वस्तु का उपयोग नहीं होता। इसे सीधे-सादे तरीके से बनाकर प्रयोग किया जा सकता है। मैं ऐसी वस्तुओं का हिमायती हूं। इसलिए लोगों ने इसका नाम गांधी टोपी रख दिया है।’
इस पर वह व्यक्ति बोला, ‘गांधी जी, फिर आप गांधी टोपी क्यों नहीं धारण करते?’ इस पर गांधी जी मुस्करा कर बोले, ‘दरअसल भारत में तुम जैसे अनेक लोग पगड़ी में लगभग इक्कीस बाइस टोपी बनाने लायक कपड़ा बांध लेते हो। अब उस संतुलन को भी तो पूरा करना है। इसलिए मैं गांधी टोपी का प्रयोग नहीं करता।’ गांधीजी का जवाब सुनकर वह व्यक्ति लज्जित हो गया

Posted in हिन्दू पतन

Girija Tickoo — “The Girl Who Came Back Only to Collect Her Salary”

She wasn’t a political figure.

She wasn’t a public voice.

She was simply a young Kashmiri Pandit woman, a laboratory technician who loved her work, her students, and the quiet predictability of a life built around dignity.

But history had other plans for Girija Tickoo.
By June 1990, Kashmir had collapsed into a climate of targeted terror. The exodus had already torn thousands of families from the Valley. Girija had fled too—like most Pandits—leaving behind her home, her job, and the life she had known.

And yet, like so many government employees displaced that year, she returned to Trehqam Kupwara for one simple, innocent reason:

To collect her pending salary.

Just a routine visit. Just a journey home.
No one imagined it would become her last.
She never made it back.

Somewhere on the road between her workplace and her temporary shelter, Girija Tickoo was intercepted by armed militants. Witness accounts and later testimonies confirm she was abducted—targeted not because of anything she did, but simply because of who she was:

a young Kashmiri Pandit woman who dared to return to her homeland.

The man who took her did not see a daughter, a colleague, or a woman with a future.

They saw an opportunity to send a message of terror.
Hours later, her body was found on the outskirts of Sopore. She was cut open with a Mechanical Saw.

No family should ever have to see what her family saw.

No society should ever have to narrate what happened next.

And yet, silence was the only thing that followed.
No arrests.
No investigation worthy of her name.
No justice.

Just a line in the long ledger of crimes that the world never bothered to read.

What is remembered of Girija Tickoo today is not just the brutality she endured.

It is the circumstances — the fact that she returned to Kashmir believing that dignity still existed, that her homeland still had room for her.

She came back as a citizen.
She was killed as a warning.

And she remains, even decades later, one of the most haunting examples of how violence against Kashmiri Pandits was not collateral damage —

it was intentional, systematic, and aimed precisely at the most vulnerable.

Girija Tickoo’s story is not just a tragedy.
It is a document.

A testimony.
A reminder that behind every statistic was a human life with quiet dreams.

And the hardest truth of all?

She died for no reason other than that she belonged to a community marked for elimination.

Posted in खान्ग्रेस

૧૯૮૦ના દાયકામાં, ગુજરાતના કચ્છમાં કંડલા બંદરની બહારથી મજૂરી કરવા આવેલા એક મુસ્લિમ સમુદાયના લોકોએ દરિયા કિનારે ગેરકાયદેસર ઝૂંપડાઓમાં રહેવાનું શરૂ કર્યું.

થોડા જ સમયમાં, તેઓએ ૧૦૦ એકર વેટલેન્ડ જમીન પર કબજો કરી લીધો.

તેઓએ ત્યાં મેન્ગ્રોવ જંગલો કાપી નાખ્યા અને દરિયામાં માટી નાખીને જમીન પર કબજો કરવાનું ચાલુ રાખ્યું.

આ ૧૦૦ એકર જમીન પર, તેઓએ ચાર મસ્જિદો અને બે મદરેસા બનાવ્યા, જે મૂળભૂત રીતે આખું શહેર હતું.

આ વસાહતમાં હજારો કરોડ રૂપિયાના ડ્રગ્સ ઉતાર્યા પછી, ગુજરાત સરકારને ખબર પડી કે દરિયા કિનારે આ ગેરકાયદેસર વસાહત માત્ર ગુજરાત માટે જ નહીં પરંતુ દેશની સુરક્ષા માટે ખતરો બની ગઈ છે.
આખો વિસ્તાર બૂટેલગરો માટે કુખ્યાત હતો.
આ વિસ્તાર ના ક્રાઈમ નું મૂળ અહીં નીકળતું.

૧,૦૦૦ પોલીસ કર્મચારીઓની હાજરીમાં ૨૪ કલાક સતત બુલડોઝર ઓપરેશન પછી, બધો કાટમાળ દરિયામાં ફેંકી દેવામાં આવ્યો, અને ૨૫૦ કરોડ રૂપિયાની કિંમતની ૧૦૦ એકર કિંમતી દરિયા કિનારાની વેટલેન્ડ સાફ કરવામાં આવી.

અને હવે, અહીં ફરીથી મેન્ગ્રોવ પ્લોટિંગ હાથ ધરવામાં આવશે.

ગેરકાયદેસર પ્રવૃત્તિઓ ફક્ત ભાજપ શાસિત રાજ્યોમાં અતિક્રમણ સામે કાર્યવાહી કેમ કરવામાં આવી રહી છે? વિપક્ષ શાસિત રાજ્યો ગેરકાયદેસર અતિક્રમણ કરનારાઓ સામે કાર્યવાહી કેમ નથી કરી રહ્યા?
કોંગ્રેસ આ વિસ્તાર ને બચાવવા ઉતરી પડી છે.

જીતેન્દ્ર સિંહ

Posted in खान्ग्रेस

आपने कभी सोचा है #Congress सत्ता से बाहर है, फिर भी कभी गरीब क्यों नहीं होती?

क्योंकि आज जो काला सच सामने आया है, वही उसका असली कारण है! 😡

जब से मनरेगा लॉन्च हुआ, तब से अब तक करीब 27 लाख ऐसे वर्कर मिले हैं जो अस्तित्व में ही नहीं हैं।
👉 नाम नहीं मिलते
👉 फोटो किसी और की, काम किसी और का
👉 शहर में रहने वाले लोग “गांव में काम” के पैसे ले रहे थे…
👉 कई तो मर चुके लोग भी “काम” कर रहे थे!

ये है कांग्रेस का असली घोटाला मॉडल।

हर दिन 90 करोड़ रुपये की लूट
यानी कुल 34,000 करोड़ रुपये का धंधा, वो भी आज की सरकार के आने के बाद खुल रहा है।

आज सरकार ने 27 लाख फर्जी मनरेगा वर्कर्स को डिलीट किया है क्योंकि e-KYC अनिवार्य कर दिया गया।
सोचिए, इसमें कुछ असली गरीब लोग भी हटाए गए होंगे….
क्योंकि उन्हें नहीं पता कि
👉 बायोमेट्रिक कैसे करना है,
👉 उनका नाम “मुहम्मद”, “मोहम्मद” या “इस्लाम” किस आधार कार्ड में क्या लिखा है,
👉 कई के बने हुए हैं 4–5 अलग-अलग आधार।

ये लोग सिस्टम में उलझ गए… लेकिन कांग्रेस की सालों पुरानी “घोस्ट वर्कर इंडस्ट्री” पकड़ी गई।

सरकार ने कांग्रेस की लाइफलाइन—फर्जी मनरेगा नेटवर्क—की नब्ज पकड़ ली है।
अब पूछो कांग्रेस से—
27 लाख घोस्ट वर्कर्स कौन थे?
किसने बनाए?
उनके नाम से पैसा कौन खा रहा था?

कोई जवाब नहीं।
कोई सफाई नहीं।
बस 34 हज़ार करोड़ की धांधली… और देश को लूटने की आदत।

**सरकार को इस घोटाले को पकड़ने में 11 साल क्यों लगे?

यही तो असली समस्या है!**

सच ये है कि मनरेगा कांग्रेस के समय का नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर फैले “सिस्टम माफिया” का सबसे बड़ा किला था—जिसे तोड़ने में वक्त लगना ही था।
पर वजहें साफ हैं:

कांग्रेस ने मनरेगा को बनाया ही “पेपर-बेस्ड लूट मशीन”

2014 तक पूरा सिस्टम कागज़ी था—
✔ काग़ज़ी मस्टर रोल
✔ काग़ज़ी उपस्थिति
✔ बिना फोटो, बिना पहचान, बिना ऑडिट
यानी लूट रोकने के लिए कोई डिजिटल सुरक्षा ही मौजूद नहीं थी।
इस गंदगी को साफ़ करना एक दिन का काम नहीं था।

BJP सरकार के बाद भी राज्यों पर निर्भरता — 60% मनरेगा कांग्रेस/अन्य पार्टियों वाले राज्यों में चला

केंद्र सिर्फ पैसे देता है,
वर्कर जोड़ना, नाम चढ़ाना, उपस्थिति भरना, लिस्ट बनाना—सब राज्य सरकारें करती हैं।
राज्यों में वही पुराने अफ़सर, वही पुराने ठेकेदार, वही प्रॉक्सी नेटवर्क सक्रिय रहा।
केंद्र चाहे जितना सख्त हो, राज्य चाहें तो घोटाला दबा सकते हैं।

2014–2024: सिस्टम को डिजिटल करने में समय लगा

सरकार ने धीरे-धीधे मनरेगा को टेक्नोलॉजी से जोड़ा:
✔ आधार सीडिंग
✔ जॉब कार्ड डिजिटाइजेशन
✔ जियोटैगिंग
✔ NMMS फोटो ऐप
✔ e-KYC

इनमें हर चरण में राज्यों ने विरोध, हड़ताल, कोर्ट केस, और डेटा अपडेट रोकने जैसे हथकंडे अपनाए।
इसलिए क्लीन-अप धीमा हुआ।

घोटाला इतना विशाल था कि उसे “एक झटके में पकड़ना” असंभव था

27 लाख घोस्ट वर्कर्स मतलब:
👉 ग्राम सचिव
👉 पंचायत सहायक
👉 ब्लॉक अधिकारी
👉 डेटा एंट्री ऑपरेटर
👉 स्थानीय नेता
👉 ठेकेदार
सभी की मिलीभगत।

ये पूरी घोटाला-इकोसिस्टम थी, न कि एक साधारण स्कैम।

असली क्लीन-अप तभी संभव हुआ जब e-KYC को “अनिवार्य” कर दिया गया (2023–24)

जैसे ही बायोमेट्रिक अनिवार्य हुआ—
घोस्ट वर्कर एक ही दिन में गायब हो गए।
क्योंकि
ना उनका चेहरा था
ना फिंगरप्रिंट
ना उपस्थिति
ना मोबाइल
ना आधार

इसलिए 27 लाख नाम को काटते ही पूरा खेल साफ दिख गया…

राधे – राधे 🙏🙏🙏🚩🚩🚩

Posted in PM Narendra Modi

वन्देमातरम


संसद और देश में वंदे मातरम् को लेकर चर्चा जारी है। इस बीच अब वंदे मातरम् के रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के परपोते का बयान सामने आया है। सजल चट्टोपाध्याय ने कहा कि यह बहुत पहले हो जाना चाहिए था। वंदे मातरम को राष्ट्रीय मंत्र माना जाता है। मेरे दादाजी के लिए अब तक किसी ने कुछ नहीं किया। ऐसे समय में जब अगली पीढ़ी इसे (वंदे मातरम) भूल रही है, पीएम मोदी जी ने जो किया है वह अच्छा है। मुझे गर्व है। सीएम ममता बनर्जी ने अभी तक कुछ नहीं किया है, उन्हें यह पहले ही करना चाहिए था। सजल चट्टोपाध्याय ने आगे कहा कि अगर कोई दिल्ली से आता है, अमित शाह, या कोई भी, वे हमारे बारे में पूछते हैं। वे हमें व्यक्तिगत रूप से बुलाते हैं। हम राजनीतिक लोग नहीं हैं। हम केवल सच बोलते हैं। सीएम मैडम ने हमें अभी तक आमंत्रित नहीं किया है। बंकिम बाबू ने जो लिखा, उसमें सभी हिंदू देवी-देवताओं के नाम शामिल हैं, इसलिए उस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। जिस तरह से बंकिम बाबू की उपेक्षा की गई, उसी प्रकार उनके परिवार की भी उपेक्षा की जा रही है।

#SajalChattopadhyay #BankimChandraChattopadhyay #PMModi #AmitShah #MamataBanerjee #Congress #VandeMataram #ParliamentWinterSession #India