#सुनो
#भारतविमर्श
●जब चंद्रशेखर आजाद की शव यात्रा निकली देश की जनता नंगे पैर नंगे सिर चल रही थी.
●लेकिन कांग्रेसियों ने शव यात्रा में शामिल होने से इनकार कर दिया था…
एक अंग्रेज सुप्रीटेंडेंट ने चंद्रशेखर आजाद की मौत के बाद उनकी वीरता की प्रशंसा करते हुए कहा था कि चंद्रशेखर आजाद पर तीन तरफ से गोलियां चल रही थीं… लेकिन इसके बाद भी उन्होंने जिस तरह मोर्चा संभाला और 5 अंग्रेज सिपाहियों को हताहत कर दिया था… वो अत्यंत उच्च कोटि के निशाने बाज थे… अगर मुठभेड़ की शुरुआत में ही चंद्रशेखर आजाद की जांघ में गोली नहीं लगी होती तो शायद एक भी अंग्रेज सिपाही उस दिन जिंदा नहीं बचता!
शत्रु भी जिसके शौर्य की प्रशंसा कर रहे थे। मातृभूमि के प्रति जिसके समर्पण की चर्चा पूरे देश में होती थी। जिसकी बहादुरी के किस्से हिंदुस्तान के बच्चे बच्चे की जुबान पर थे। उन महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की शव यात्रा में शामिल होने से इलाहाबाद के कांग्रेसियों ने ही इनकार कर दिया था!
उस समय के इलाहाबाद यानी आज का प्रयागराज… इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में जिस जामुन के पेड़ के पीछे से चंद्रशेखर आजाद निशाना लगा रहे थे। उस जामुन के पेड़ की मिट्टी को लोग अपने घरों में ले जाकर रखते थे। उस जामुन के पेड़ की पत्तियों को तोड़कर लोगों ने अपने सीने से लगा लेते थे। चंद्रशेखर आजाद की मृ्त्यु के बाद वो जामुन का पेड़ भी अब लोगों को प्रेरणा दे रहा था… इसीलिए अंग्रेजों ने उस जामुन के पेड़ को ही कटवा दिया… लेकिन चंद्रशेखर आजाद के प्रति समर्पण का भाव देश के आम जनमानस में कभी कट नहीं सका!
जब इलाहाबाद (आज का प्रयागराज) की जनता अपने वीर चहेते क्रांतिकारी के शव के दर्शनों के लिए भारी मात्रा में जुट रही थी… लोगों ने दुख से अपने सिर की पगड़ी उतार दी… पैरों की खड़ाऊ और चप्पलें उताकर लोग नंगें पांव चंद्रशेखर आजाद की शव यात्रा में शामिल हो रहे थे। उस समय शहर के कांग्रेसियों ने कहा कि हम अहिंसा के सिद्धांत को मानते हैं इसलिए चंद्रशेखर आजाद जैसे हिंसक व्यक्ति की शव यात्रा में शामिल नहीं होंगे!
पुरुषोत्तम दास टंडन भी उस वक्त कांग्रेस के नेता थे और चंद्रशेखर आजाद के भक्त थे। उन्होंने शहर के कांग्रेसियों को समझाया कि अब जब चंद्रशेखर आजाद की मृत्यु हो चुकी है और अब वो वीरगति को प्राप्त कर चुके हैं तो मृत्यु के बाद हिंसा और अहिंसा पर चर्चा करना ठीक नहीं है… और सभी कांग्रेसियों को अंतिम यात्रा में शामिल होना चाहिए। आखिरकार बहुत समझाने बुझाने और बाद में जनता का असीम समर्पण देखने के बाद कुछ कांग्रेसी नेता और कांग्रेसी कार्यकर्ता डरते हुए चंद्रशेखर आजाद की शव यात्रा में शामिल होने को मजबूर हुए थे!
चंद्रशेखर आजाद की मृत्यु साल 1931 में हो गई थी लेकिन उनकी मां साल 1951 तक जीवित रहीं। आजादी साल 1947 में मिल गई थी लेकिन आजादी के बाद 4 साल तक भी उनकी मां जगरानी देवी को बहुत भारी कष्ट उठाने पड़े थे। माता जगरानी देवी को भरोसा ही नहीं था कि उनके बेटे की मौत हो गई है वो लोगों की बात पर भरोसा नहीं करती थीं। इसलिए उन्होंने अपने मध्यमा अंगुली और अनामिका अंगुली को एक धागे से बांध लिया था। बाद में पता चला कि उन्होंने ये मान्यता मानी थी कि जिस दिन उनका बेटा आएगा उसी दिन वो अपनी ये दोनों अंगुली धागे से खोलेंगी लेकिन उनका बेटा कभी नहीं लौटा वो तो देश के लिए अपने शरीर से आजाद हो गया था…
आजाद के परिवार के पास संपत्ति नहीं थी गरीब ब्राह्मण परिवार में जन्म हुआ था। पिता की मृत्यु बहुत पहले ही हो चुकी थी। बेटा अंग्रेजों से लड़ता हुआ बलिदान हो चुका था। ये जानकर सीना फट जाता है कि आजाद की मां आजादी के बाद भी पड़ोस के घरों में लोगों के गेहूं साफ करके और बर्तन मांजकर किसी तरह अपना गुजारा चला रही थी!
किसी कांग्रेसी लीडर ने कभी आजाद की मां की सुध नहीं ली। जो लोग जेलों में बंद होकर किताबें लिखने का गौरव प्राप्त करते थे और बाद में प्रधानमंत्री बन गए, उन लोगों ने भी कभी चंद्रशेखर आजाद की मां के लिए कुछ नहीं किया! वो एक स्वाभिमानी बेटे की मां थीं। बेटे से भी ज्यादा स्वाभिमानी रही होंगी किसी की भीख पर जिंदा नहीं रहना चाहती थीं! लेकिन क्या हम देश के लोगों ने उनके प्रति अपना फर्ज निभाया है?
**साभार-संकलित-आंशिक-सम्पादित-नरेन्द्र**
साभार नरेन्द्रसिंह जी की वॉल से कॉपी
Day: December 5, 2025
कहानी सुनिये।
लक्स इंडस्ट्रीज के मालिक हैं अशोक तोदी। उनकी एक बेटी प्रियंका तोदी। बड़े बाप की पढ़ी लिखी मॉडर्न लड़की। प्रियंका तोड़ी कोलकाता के एक प्राइवेट अकेडमी में कम्प्यूटर ग्राफिक्स पढ़ने जाती थी। प्रियंका की आयु रही होगी अठारह- उन्नीस वर्ष! वही मासूमियत वाला समय, जब सबकुछ अच्छा-अच्छा लगता है।
प्रियंका के कोचिंग में पढ़ाता था एक लड़का, नाम था रिजवान। रिजवान और प्रियंका टीचर-स्टूडेंट हो गए, सो क्लास की वजह से रोज ही मिलते थे। रिजवान ने देखा एक अच्छे परिवार की उन्नीस वर्ष की लड़की को, सो मिशन में लग गया। एक दो महीने तक दिल जीतने का प्रयास, फिर प्यार… और प्यार के बाद वही भाग कर शादी…
लड़की ने न घर से पूछा, न अपना भविष्य सोचा, सीधे महल से निकल कर झुग्गियों में रहने लगी। कच्ची उम्र का भरोसा था, प्रेम का नशा था, ” मैं तुम्हारे प्यार के बल पर ही जी लूंगी” जैसे वादे थे, और “रिजवान से ज्यादा प्यार करने वाला लड़का तुम्हे पूरी दुनिया मे नहीं मिलेगा” जैसे झूठे दावों की रस्सी में बांध लेने वाला एक धूर्त परिवार था। लड़की झुग्गियों में ही टिक गयी।
पर साहब! नशा शराब का हो, अफीम का हो या मोहब्बत का, उतरता जरूर है। प्रेम के बल पर जिंदगी नहीं कटती साहब! एक दिन लड़की पिता से मिलने घर आई और घर पर ही रुक गयी। और कुछ दिनों बाद रिजवान की लाश रेलवे ट्रैक पर मिली… साफ सुथरे चमकदार कपड़ों में… बस सर पर एक चोट थी। मामला आत्महत्या सा दिख रहा था, कानूनी प्रक्रिया पूरी हुई… मामला लगभग खत्म…
पर बात खत्म नहीं हुई। हल्ला हुआ, कैंडल मार्च निकला, अशोक तोड़ी पर हत्या का मुकदमा चलाने की मांग हुई, खूब बवाल हुआ। ममता बनर्जी को बंगाल में स्थापित करने में इस आन्दोलन की भी बड़ी भूमिका रही। पर अशोक तोड़ी बड़े पूंजीपति थे साहब। सरकार वामपंथियों की थी तो क्या हुआ, पूंजी के आगे सब झुकते हैं। ममता उधर थीं तो कामरेड भट्टाचार्य इधर दिख रहे थे। घुइयां न हुआ… प्रियंका जी ने बयान दिया कि रिजवान अपने परिवार और भाई के कारण परेशान था, सो उसी के कारण उसने आत्महत्या की होगी…
खैर! जो हुआ सो हुआ, मामला खत्म हो गया। रिजवान साहब भी दो तीन लाख के लालच में उसकी बेटी को ठगने निकल पड़े थे जो खरबों में था… चन्द रुपयों और मजहब के नशे में अंधे हो कर मासूम लड़कियों का जीवन नरक बना देने वालों को ईश्वर सजा दे या मनुष्य, बात बराबर ही है।
मामला 2007 का है, सो अब किसी को याद भी नहीं। प्रियंका तोदी अब लक्स इंडस्ट्रीज का विज्ञापन डिपार्टमेंट संभालती हैं। और आज 2021 में उन्ही प्रियंका जी का डिपार्टमेंट लक्स कोजी का विज्ञापन निकालता है जिसमें लक्स का अंडरवियर पहले लड़के को देख कर कामुक हो उठी लड़की की साड़ी उठने लगती है। विज्ञापन यह दिखा रहा है कि लक्स कोजी का अंडरवियर पहनने वाले लड़कों पर लड़कियां यूँ ही टूट कर पड़ती हैं।
वर्तमान में दिख रही हर असभ्य घटना के बीज इतिहास में होते हैं पार्थ! जिसका वर्तमान नंगा है, उसका इतिहास भी नंगा ही रहा होगा…
एक बात और! यदि आप धन कमाने के लिए अनैतिक तरीके अपनाएंगे, तो उसका दण्ड आपको भी भुगतना होगा। दूसरों के बच्चों को बिगडेंगे तो आपके भी बिगड़ेंगे। इसे कोई नहीं रोक सकता…
राधे – राधे 🙏🙏🙏🚩🚩🚩

हताहत इंदौरी ने नर्क से गजल भेजी है😁
यहां यमदूत कोड़े मार रहे हैं, जन्नत इसका नाम थोड़ी है👺 चित्रगुप्त हिसाब कर रहे हैं, किसी हूर का निजाम थोड़ी है,,👻ओसामा है, कसाब है और अफजल भी है यहां,
यह कोई खुदा या फरिश्तों का मुकाम थोड़ी है,🦥
घूमते हैं यहां हर तरफ कीचड़ से सने सूअर,
बहत्तर हूरों का जाम थोड़ी है,,
भरे पड़े हैं यहां तमाम भारत के गद्दार मेरे ही जैसे यहां,😭
किसी मुल्क का शरीफ अवाम थोड़ी है,,
मुल्क के गद्दारी पे सौ – सौ बार मुझको “लानत” है,
उसी की सजा मिली है,खिदमत का इनाम थोड़ी है..हताहत इन्दौरी 🥳
अंग्रेज़ों ने गंगा जी को गैन्जेज क्यों कहा ?
एक गोरा है , जो अभी 90 वर्ष से ऊपर का है , वह भारत में ही पैदा हुआ था और 1947 के पहले लगभग पन्द्रह वर्ष की उम्र तक भारत में ही रहा था । उसका पिता भी भारत में ही पैदा हुआ था । वह भारत के बारे में अंग्रेजों तथा अंग्रेज इतिहासकारों से भिन्न विचार रखता है ।
वह हिन्दी भी बहुत अच्छा बोल लेता है । मेरी उससे बहुत से विषयों पर चर्चा होती रहती है । एक दिन मैंने उससे पूछा कि तुमलोग गंगा जी को गैन्जेज क्यों बोलते हो ? गैंगा भी तो बोल सकते हो ?
उसने कहा कि तुम हिन्दू इतने मूर्ख और सेक्युलर हो गए हो , तो उसमें अंग्रेजों की क्या गलती ?
मैंने पूछा – क्या अर्थ है तुम्हारी बात का ?
उसने कहा कि अंग्रेजों ने वही नाम रखा , जो वे उच्चारित कर पाये ।
18वीं सदी में जब अंग्रेज भारत में थे , तो कोई भी हिन्दू “गंगा” नहीं कहता था , सब के सब “गंगा जी” कहते थे । अंग्रेजों को लगा कि इस नदी का नाम ही गंगा जी है और वे “गान्जेज” बोलने लगे । हमने तो आज भी जी लगाया हुआ है गंगा में ; पर तुम लोग सेक्युलर बन कर “जी” हटा चुके हो ।
विश्व भर में अंग्रेज़ों ने शासन किया , पर नदी के नाम के साथ “जी” लगाकर बोलने वाली सभ्यता उन्हें कहीं दिखी ही नहीं ।
अपने पूर्वजों को नमन करें , जो हर विषम परिस्थिति में “गंगा जी” को “गंगा जी” ही बोलते रहे ।
गौ , गौरी , गंगा , गायत्री , ग्रंथ , गीता , गोपाल , गुरु , गणेश की जय हो । 🙏
🙏🌷🙏
Rajshekher Tiwari ji
1959 जवाहर लाल नेहरू अफगानिस्तान गए…
उनकी आधिकारिक यात्रा में तय कार्यक्रम न होने के वावज़ूद नेहरू बाबर की क़ब्र पर गए…
जबकि बाबर को अफगानिस्तान वाले भी कोई अपना राष्ट्रपुरुष जैसा कुछ न मानते… अब्दाली जैसा
1968 में नेहरू की बेटी इंदिरा अफगानिस्तान गयी….. फिर वही कहानी दोहराई गयी…
इंदिरा भी बाबर की क़ब्र पर खिराज ए अक़ीदत पेश कर आयी
आधिकारिक यात्रा पर तो नहीं पर बताते हैं गुप्त रूप से दिसंबर 1987 में रूस की सहायता से अफगानिस्तान के तब के राष्टपति से कुछ घंटे की मुलाक़ात को राजीव गाँधी भी काबुल गए और इस छोटी यात्रा में भी बाबर की क़ब्र पर सज़दा करना न भूले…
अगस्त 2005 में राहुल गाँधी अफगानिस्तान गए…. और कुछ और नहीं किया सिर्फ काबुल में बाबर की क़ब्र पर सज़दा कर लौट आये
आखिर क्या वजह होगी जो पूरा का पूरा कुनबा अफगानिस्तान जाकर बाबर की क़ब्र पर तो सज़दा करता है….
पर आज तक कोई बच्चा अयोध्या जाकर राम मंदिर में सर झुका नहीं आया…
देश राम का….. औलादे बाबर की
ई न चोलबे!!!
મુસ્લિમ ધર્મમાં શિબલી નામના એક સુફી સંત થઇ ગયા. એક દિવસ શિબલી પોતાના હાથમાં સળગતા લાકડા લઇને ભરબજારમાંથી પસાર થયા. બજારમાં રહેલા બધા લોકોને આશ્વર્ય થયુ કારણકે એમણે આ સંતને કાયમ ઉપદેશ આપતા જોયા હતા આજે કોઇ જુદા જ વેશમાં હતા.
લોકોએ એમને પુછ્યુ , “ ફકીરબાબા , હાથમાં આ સળગતા લાકડા લઇને ક્યાં જાવ છો ?”
શિબલીએ લોકોને જવાબ આપતા કહ્યુ , “ મારે જન્નત ( સ્વર્ગ) અને જહન્ન્મ ( નરક) બંનેને સળગાવી દેવા છે એટલે હું આ સળગતા લાકડા લઇને નિકળ્યો છું.”
લોકોને લાગ્યુ કે આનું છટકી ગયુ લાગે છે એટલે આવી પાગલ જેવી વાતો કરે છે. એક વિદ્વાનને થયુ કે આવા મોટા ઓલિયા ફકિરની હરકત કોઇ હેતુ વગરની ના હોઇ શકે નક્કી આની પાછળનો કંઇક ઉદેશ હશે. આ વિદ્વાને શિબલીને પુછ્યુ , “ તમે સ્વર્ગ અને નરકને શા માટે સળગાવી દેવા માંગો છો ?”
શિબલીએ કહ્યુ , “ મારે સ્વર્ગ અને નરકને એટલા માટે સળગાવી દેવા છે કારણ કે હું ઇચ્છુ છુ કે લોકો પ્રભુને યાદ કરે તો કોઇ લાલચથી કે કોઇ બાબતના ડરથી ન કરે પણ પ્રેમથી યાદ કરે.”
આપણે બધા મોટાભાગે કોઇ લાલચથી ભગવાનના ચરણે માથુ નમાવિએ છીએ અથવા કોઇ ડરથી ભગવાનને પ્રાર્થનાઓ કરીએ છીએ. કોઇપણ જાતની લાલચ કે ડર વગર આપણે એ પરમપિતાને ક્યારે બોલાવ્યા એ યાદ છે ?
એક સત્ય પણ કરૂણ કથની…
એક સ્નેહીની વિદાય બાદ એક વૃદ્ધાશ્રમમાં બુંદી ગાંઠિયા આપવા મને સાથે લઈ ગયેલ.સંચાલકશ્રી એ કહ્યું કે તમે સ્વતંત્ર રીતે બધાને રૂમમાં જઇ આપી આવો તથા અમારા વહીવટ સામે એ લોકોએ કહેવાનું હોયતો પૂછજો.
બધાએ સંસ્થાથી સંતોષ હોવાનું કહ્યું.અમે પાછા ઓફિસમાં આવ્યા. ત્યારે મેં પૂછ્યું કે તમને કોઈ કડવો અનુભવ થયો હોય તો વાંધો ન હોય તો કહો.
તેમને વાત કરી કે””મુંબઈના વાલકેશ્વરમાં રહેતા બે વેપારી ભાઈઓ હીરાના વેપારી તેમના માતુશ્રી ને મૂકી ગયેલ.
એક દિવસ માજી પડી ગયા તથા પગમાં ફ્રેક્ચઉર થયું.અમે મુંબઇ સમાચાર આપ્યા તો જવાબ મળ્યો કે અમે નીકળી શકીએ તેમ નથી. ઓપરેશન નો ખર્ચ મોકલી આપશું.
ત્યાર બાદ દોઢ વર્ષ બાદ માજીનું અવસાન થયું. અમે તરત સંપર્ક કર્યો તો જવાબ મળ્યો કે નાનો ભાઈ બેલ્જીયમ ગયેલ, હું નીકળી નહીં શકું.આપ અંતિમવિધિ કરી ખર્ચ જણાવજો.
અમે તેમના જ્ઞાતિ રિવાજ પ્રમાણે બધી વિધિ કરી.ખર્ચ મોકલવાનો કોઈ પ્રશ્નજ નહતો.
ત્યારબાદ ત્રણેક મહિના બાદ એક ટેક્ષી આવી તેમાંથી બે ભાઈઓ તેમના પત્ની તથા બાળકો ઉતર્યા.
ઓફિસમાં આવ્યા બાદ આભાર માન્યો.પછી તરતજ બંને વહુવોએ પૂછ્યું “”બાના ગળામાં એક ચંદન હાર, હીરાના બુટીયા તથા ચાર બંગડી હતી. તે યાદ આવ્યું એટલે આવ્યા છીએ.
સંચાલકે સાચવીને રાખેલ ઉપરની વસ્તુઓ પાછી આપી અને કહ્યું “આ ઉપરાંત તેમણે પહેરેલા ઝાંઝર તથા નાકની હીરાની વાળી પણ તમે સંભાળી લ્યો તથા વહેલી તકે આશ્રમની બહાર નીકળી જાઓ…
નહીંતર અહીં રહેલા પૂછશે કે”કોણ હતું” તો અમારે ન છૂટકે કહેવું પડશે કે”કમનસીબ માઁ ના સ્વાર્થી કુટુંબીઓ”,
નામ નથી લખ્યા પણ હકીકત સત્ય છે.
લેખક-જગતકિશોર ઢેબર
एक बड़ी प्रसिद्ध हंगेरियन कहानी है कि एक आदमी का विवाह हुआ। झगडैल प्रकृति का था, जैसे कि आदमी सामान्यत: होते हैं। मां—बाप ने यह सोचकर कि शायद शादी हो जाए तो यह थोड़ा कम क्रोधी हो जाए, थोड़ा प्रेम में लग जाए, जीवन में उलझ जाए तो इतना उपद्रव न करे, शादी कर दी।
शादी तो हो गई। और आदमी झगडैल होते हैं, उससे ज्यादा झगडैल स्त्रियां होती हैं। झगडैल होना ही स्त्री का पूरा शास्त्र है, जिससे वह जीती है। मां—बाप लड़की के भी यही सोचते थे कि विवाह हो जाए, घर—गृहस्थी बने, बच्चा पैदा हो, सुविधा हो जाएगी। उलझ जाएगी, तो झगड़ा कम हो जाएगा।
लेकिन जहां दो झगडैल व्यक्ति मिल जाएं, वहां झगड़ा कम नहीं होता; दो गुना भी नहीं होता; अनंत गुना हो जाता है। जब दो झगड़ैल व्यक्ति मिलते हैं, तो जोड़ नहीं होता गणित का; दो और दो चार, ऐसा नहीं होता, गुणनफल हो जाता है।
पहली ही रात, सुहागरात, पहला ही—भेंट में जो चीजें आई थीं, उनको खोलने को दोनों उत्सुक थे—पहला डब्बा हाथ में लिया; बड़े ढंग से पैक किया गया था। पति ने कहा कि रुको, यह रस्सी ऐसे न खुलेगी। मैं अभी चाकू ले आता हूं। पत्नी ने कहा कि ठहरो, मेरे घर में भी बहुत भेंटें आती रहीं। हम भी बहुत भेंटें देते रहे हैं। तुमने मुझे कोई नंगे—लुच्चो के घर से आया हुआ समझा है? ऐसे सुंदर फीते चाकुओं से नहीं काटे जाते, कैंची से काटे जाते हैं।
झगड़ा भयंकर हो गया कि फीता चाकू से कटे कि कैंची से कटे। दोनों की इज्जत का सवाल था। बात इतनी बढ़ गई कि डब्बा उस रात तो काटा ही न जा सका, सुहागरात भी नष्ट हो गई उसी झगड़े में। और विवाद, क्योंकि प्रतिष्ठा का सवाल था, दोनों के परिवार दाव पर लगे थे कि कौन सुसंस्कृत है!
वह बात इतनी बढ़ गई कि वर्षों तक झगड़ा चलता रहा। फिर तो बात ऐसी सुनिश्चित हो गई कि जब भी झगडे की हालत आए, तो पति को इतना ही कह देना काफी था, चाकू! और पत्नी उसी वक्त चिल्लाकर कहती, कैंची! वे प्रतीक हो गए।
वर्षों खराब हो गए। आखिर पति के बरदाश्त के बाहर हो गया। और डब्बा अनखुला रखा है। क्योंकि जब तक यही तय न हो कि कैंची या चाकु तब तक वह खोला कैसे जाए। कौन खोलने की हिम्मत करे?
एक दिन बात बहुत बढ़ गई, तो पति समझा—बुझाकर झील के किनारे ले गया पत्नी को। नाव में बैठा, दूर जहां गहरा पानी था, वहा ले गया, और वहा जाकर बोला कि अब तय हो जाए। यह पतवार देखती है, इसको तेरी खोपड़ी में मारकर पानी में गिरा दूंगा। तैरना तू जानती नहीं है, मरेगी। अब क्या बोलती है? चाकू या कैंची? पत्नी ने कहा, कैंची।
जान चली जाए, लेकिन आन थोड़े ही छोड़ी जा सकती है! रघुकुल रीत सदा चली आई, जान जाय पर वचन न जाई।
पति भी उस दिन तय ही कर लिया था कि कुछ निपटारा कर ही लेना है। यह तो जिंदगी बरबाद हो गई। और चाकू—कैंची पर बरबाद हो गई!
लेकिन वह यही देखता है कि पत्नी बरबाद करवा रही है। यह नहीं देखता कि मैं भी चाकू पर ही अटका हुआ हूं अगर वह कैंची पर अटकी है। तो दोनों कुछ बहुत भिन्न नहीं हैं। पर खुद का दोष तो युद्ध के क्षण में, विरोध के क्षण में, क्रोध के क्षण में दिखाई नहीं पड़ता। उसने पतवार जोर से मारी, पत्नी नीचे गिर गई। उसने कहा, अभी भी बोल दे! तो भी उसने डूबते हुए आवाज दी, कैंची। एक डुबकी खाई, मुंह—नाक में पानी चला गया। फिर ऊपर आई। फिर भी पति ने कहा, अभी भी जिंदा है। अभी भी मैं तुझे बचा सकता हूं? बोल! उसने कहा, कैंची। अब पूरी आवाज भी नहीं निकली, क्योंकि मुंह में पानी भर गया। तीसरी डुबकी खाई, ऊपर आई। पति ने कहा, अभी भी कह दे, क्योंकि यह आखिरी मौका है! अब वह बोल भी नहीं सकती थी। डूब गई। लेकिन उसका एक हाथ उठा रहा और दोनों अंगुलियों से कैंची चलती रही। दोनों अंगुलियों से वह कैंची बताती रही—डूबते—डूबते, आखिरी क्षण में।
महाभारत के लिए कोई कुरुक्षेत्र नहीं चाहिए; महाभारत तुम्हारे मन में है। क्षुद्र पर तुम लड़ रहे हो। तुम्हें लड़ने के क्षण में दिखाई भी नहीं पड़ता कि किस क्षुद्रता के लिए तुमने आग्रह खड़ा कर लिया है। और जब तक तुम्हारा अज्ञान गहन है, अंधकार गहन है, अहंकार सघन है, तब तक तुम देख भी न पाओगे कि तुम्हारा पूरा जीवन एक कलह है। जन्म से लेकर मृत्यु तक, तुम जीते नहीं, सिर्फ लड़ते हो। कभी—कभी तुम दिखलाई पड़ते हो कि लड़ नहीं रहे हो, वे लड़ने की तैयारी के क्षण होते हैं; जब तुम तैयारी करते हो।
गीता दर्शन–भाग–8
प्रवचन 11. मन का महाभारत
* अगर यह संदेश आपको झूठा लगे तो गूगल सर्च करके देख लेना *
* कांग्रेस में घुसे हिन्दू जो उसके चमचे है वह भी जाग जाओ एक वोट का दो वोट माना जाने वाला वह नियम *
असुद्दीन ओवैसी हर एक सभा में सच्चर आयोग की रिपोर्ट को लागू करने की मांग बार-बार क्यों करता है,,,?
क्या किसी ने कभी इसके पीछे की वजह के बारे में गहराई से सोचा है,,,,?
कितने लोगों को पता है कि अगर भाजपा ने इसका विरोध नहीं किया होता तो सच्चर आयोग की रिपोर्ट पहले ही लागू हो चुकी होती,,,?
ये सच्चर आयोग क्या है,,,?
“अगर एक मुस्लिम एक वोट डाले तो उसे दो वोटों के बराबर माना जाए” — यही सच्चर आयोग की मांग का सार है,,,!
सच्चर आयोग क्या है जिसे 2005 में सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की सरकार ने शुरू किया,,,?
2005 में सोनिया गांधी ने भारत में मुसलमानों की आर्थिक स्थिति की समीक्षा के लिए सच्चर आयोग बनाने का आदेश दिया,,,
सीधे शब्दों में कहें तो कांग्रेस ने 2005 में सच्चर आयोग की स्थापना भारत को तालिबान जैसा राज्य बनाने के लिए की,,,!
सोनिया गांधी के निर्देश पर सच्चर आयोग ने एक फर्जी रिपोर्ट पेश की जिसमें यह झूठा दावा किया गया कि भारत में मुसलमानों की हालत दलितों और आदिवासियों से भी खराब है,,,
इसके बाद आयोग ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को मुसलमानों की स्थिति सुधारने के लिए 10 प्रमुख सिफारिशें दीं,,,, उसमें ये 10 मुख्य मांगें:
,,,,,,,1. मुसलमानों को उनकी आबादी के अनुसार दोहरे अधिकार दिए जाएं — यानी अगर एक मुसलमान एक वोट डाले तो उसे दो वोटों के बराबर गिना जाए,,,
2. मुसलमानों को ओबीसी आरक्षण का पूरा लाभ मिले, और एससी-एसटी कोटे में भी हिस्सा मिले,,,
3. अगर कोई मुसलमान किसी बैंक से ऋण लेता है तो उसका आधा ऋण केंद्र और राज्य सरकार चुकाएं और भारत के कुल बजट का 20 % मुसलमानों के लिए आरक्षित किया जाए,,,
4. मुसलमानों को अल्प संख्यक मामलों के मंत्रालय के तहत मुफ्त शिक्षा मिले — IIT, IIM, और MBBS जैसे क्षेत्रों में भी,,,
5. मदरसे की डिग्री को IAS, IPS, PCS और जज की नियुक्ति के लिए मान्यता दी जाए,,,
6. लोकसभा की 30 % और हर राज्य की विधानसभा की 40 % सीटें मुसलमानों के लिए आरक्षित की जाएं,,,
7. सभी राज्य सरकार के बोर्डों निगमों और सरकारी नौकरियों में 50 % सीटें मुसलमानों के लिए आरक्षित की जाएं,,
8. हर राज्य में मुसलमानों के लिए विशेष औद्योगिक क्षेत्र हों — मुफ्त बिजली मुफ्त जमीन और ब्याज मुक्त ऋण के साथ,,,
9. मुस्लिम लड़कियों को केंद्र सरकार से ₹ 5 लाख और राज्य सरकार से ₹ 2 लाख मिलें और मुस्लिम लड़कों को स्वरोजगार के लिए ₹ 10 लाख दिए जाएं,,,
10. जिन गांवों और कस्बों शहरों या जिलों में मुसलमानों की आबादी 25 % से अधिक हो वहां केवल मुस्लिम उम्मीदवारों के लिए ही चुनाव क्षेत्र आरक्षित किए जाएं,,,
इन सबकी पूरी जानकारी आपको Google और YouTube पर सर्च करके आसानी से मिल जाएगी,,,!
भाजपा के कड़े विरोध के कारण सच्चर आयोग लागू नहीं हो सका वरना एक हिंदू के वोट के मुकाबले दो मुस्लिम वोट गिने जाते और भारत की राजनीति व राष्ट्रीय संसाधन पूरी तरह से मुस्लिम समाज को सौंप दिए जाते,,,
कांग्रेस की इस खतरनाक हरकत को उजागर करना और फैलाना अब ज़रूरी है,,,! कांग्रेस अंग्रेजो का बनाया हुआ इसायत इस्लामिक आतंकवादी संगठन जिसने भारत के तीन टुकड़े किये वो खानदान महान पढ़ाया और बताया गया 🙏 वाह रे टुच्ची राजनीती 🙏
कृपया इस पोस्ट को 10 बार पढ़ें और 1 अरब हिंदुओं तक पहुंचाएं हमारे हिंदू भाइयों को कब जागरूकता आएगी…?
लुटियंस के वफादार: वे परिवार जिन्होंने #जलियांवाला का साथ दिया और भगत सिंह के विरुद्ध खड़े हुए!
भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल विदेशी अत्याचार के विरुद्ध नहीं था—यह उन भारतीयों के विरुद्ध भी था, जिन्होंने सत्ता के लोभ में अपने ही देश की पीड़ा को भुला दिया। इतिहास में ऐसे कई नाम दर्ज हैं जिन्होंने अंग्रेज़ों की नीतियों का खुलकर समर्थन किया, चाहे उनकी नीतियाँ कितनी भी क्रूर और अमानवीय क्यों न हों।
इन्हीं घटनाओं में से एक थी जलियांवाला बाग हत्याकांड, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। जनरल रेजीनाल्ड डायर के आदेश पर हुई अंधाधुंध गोलीबारी में 1000 से अधिक लोग मारे गए और 1500 से अधिक घायल हुए। दुनिया भर में इस घटना की निंदा हुई—विंस्टन चर्चिल ने इसे “एक भयावह और अमानवीय घटना” कहा।
लेकिन दूसरी तरफ कुछ ब्रिटिश बुद्धिजीवी और भारत के कुछ धनाढ्य परिवारों ने डायर को नायक के रूप में पेश किया। कवि रुडयार्ड किपलिंग ने तो “जनरल डायर फंड” भी चलाया, जिसके लिए कई भारतीयों ने भी पैसा दिया।
जब भारतीय ही बने डायर के समर्थक
ब्रिटिश शासन की नीतियों का समर्थन करने वालों में प्रमुख नाम था—
दीवान बहादुर कुंज बिहारी ठाकुर (थापर)
लाहौर के रहने वाले कुंज बिहारी थापर उस समय नई दौलत कमाने वाले व्यापारी परिवारों में से थे। वे प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश भारतीय सेना के प्रमुख आपूर्तिकर्ता बने और धीरे-धीरे ब्रिटिश प्रशासन के विश्वस्त बन गए।
डायर द्वारा किए गए नरसंहार के बाद भी थापर ने उसका समर्थन किया। इतना ही नहीं, स्वर्ण मंदिर के तत्कालीन प्रबंधकों ने डायर को kirpan और siropa भेंट किया, और इस सम्मान समारोह में लगने वाले 1.75 लाख रुपये में प्रमुख योगदान कुंज बिहारी थापर और उनके कुछ सहयोगियों का था।
ब्रिटिश सरकार ने उनकी ‘निष्ठा’ के पुरस्कार स्वरूप 1920 में उन्हें Order of the British Empire सम्मान से नवाज़ा।
थापर परिवार: राजनीति, अकादमिक और सत्ता से गहरा संबंध
कुंज बिहारी थापर के तीन बेटे थे —
दयाराम थापर
प्रेमनाथ थापर
प्रणनाथ थापर
इन तीनों की आने वाली पीढ़ियाँ बाद में भारत के मीडिया, राजनीति, सेना और शिक्षा जगत में महत्वपूर्ण पदों तक पहुँचीं।
दयाराम थापर की वंश परंपरा
दयाराम थापर ब्रिटिश शासनकाल में भारतीय सशस्त्र बल चिकित्सा सेवाओं में ऊँचे पद पर पहुँचे।
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