40 साल पहले जब कांग्रेस की सरकार थी, तो सरपंच से लेकर प्रधानमंत्री तक, *केंद्र में इंदिरा गांधी और महाराष्ट्र में अब्दुल रहमान अंतुले* एक हाथ में सत्ता में थे…
*फिर एक चाल चली गई, जिसे ‘हिंदू भूल गए’ उस समय सरकार ने शहीद नौसेना सैनिकों की विधवाओं के लिए एक NGO ट्रस्ट शुरू किया। जिसमें अब्दुल अंतुले की सलाह पर सायरा बानो को मानद सदस्य बनाया गया। बाद में ‘सायरा बानो बेगम’ को भी संगठन का प्रमुख बनाया गया। बाद में सारी पावर इस बेगम के पति, एक्टिंग बादशाह ((?)) ‘यूसुफ खान’ के हाथ में आ गई, जिन्हें हिंदू दिलीप कुमार कहा जाता है… दो साल में ऑडिट के बाद पता चला कि शहीद सैनिकों की विधवाओं के लिए सरकार की तरफ से जमा किए गए ‘140 करोड़ रुपये’ का कोई हिसाब नहीं था…. और यह रकम ट्रस्ट के हेड के पति यूसुफ खान (दिलीप कुमार) के अकाउंट में जमा कर दी गई थी।* जैसे ही यह खबर अखबार में लीक हुई, *अगले दिन चीफ ऑडिट ऑफिसर की अचानक मौत हो गई*। जिस तरह कांग्रेस के राज में कई देशभक्त नागरिकों को मारा गया… इससे सबको यूसुफ खान उर्फ दिलीप कुमार की….शानदार एक्टिंग याद आ गई!! 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध से पहले, उसी यूसुफ-सायरा बंगले के बेसमेंट से एक हाई फ्रीक्वेंसी रेडियो ट्रांसमीटर जब्त किया गया था। यूसुफ खान उर्फ दिलीप कुमार ने अपनी मौत के समय वक्फ बोर्ड को कुल 98 करोड़ रुपये कैश – अचल संपत्ति और चल संपत्ति दी थी। *खैर;….* *हिंदुओं, सिर्फ़ प्याज़ – सब्ज़ी – पेट्रोल के बढ़ते दामों पर ध्यान दो।*
Month: December 2025
यह पोस्ट कुछ लम्बी तो है..पर सच के करीब है..अच्छी लगी तो सोचा आप भी इसे पढ़ें…
मेरी मां गलती से असली संत के पास चली गई और मेरी बीवी की शिकायत करने लगी. कहा – बहू ने बेटे को बस में कर रखा है, कुछ खिला-पिला दिया है, इल्म जानती है, उसकी काट चाहिये।
तब असली संत ने कहा – माताजी आप बूढ़ी हो गई हैं. भगवान के भजन कीजिए. बेटा जिंदगी भर आपके पल्लू से बंधा रहा. अब उसे जो चाहिए, वो कुदरतन उसकी बीवी के पास है. आपकी बहू कोई इल्म नहीं जानती. अगर आपको बेटे से वाकई मुहब्बत है, तो जो औरत उसे खुश रख रही है, उससे आप भी खुश रहिए।
मेरी मां आकर उस असली बाबा को कोस रही है क्योंकि उसने हकीकत बयान कर दी. मेरी मां चाहती थी कि बाबा कहे हां तुम्हारी बहू टोना टोटका जानती है. फिर बाबा उसे टोना तोड़ने का उपाय बताते और पैसा लेते. मेरी मां पैसा लेकर गई थी, मगर बाबा ने पैसा नहीं लिया।
कहा – तुम्हारी बहू को कुछ बनवा दो इससे।
मेरी मां और जल-भुन गई. मेरी मां को नकली बाबा चाहिए, असली नहीं।
मेरी बीवी भी असली बाबा के पास चली गई. कहने लगी – सास ने ऐसा कुछ कर रखा है कि मेरा पति मुझसे ज्यादा अपनी मां की सुनता है।
असली बाबा ने कहा – बेटी तुम तो कल की आई हुई हो,अगर तुम्हारा पति मां की इज्जत करता है, मां की बात मानता है, तो फख्र करो कि तुम श्रेष्ठ पुरुष की बीवी हो. तुम पतिदेव से ज्यादा सेवा अपनी सास की किया करो, तुमसे भी भगवान खुश होगा।
मेरी बीवी भी उस असली बाबा को कोस रही है. वो चाहती थी कि बाबा उसे कोई ताबीज दें, या कोई मन्त्र लिख कर दे दें, जिसे वो मुझे घोलकर पिला दे. मगर असली बाबा ने उसे ही नसीहत दे डाली. उसे भी असली नहीं, नकली बाबा चाहिए था।
मेरे एक रिश्तेदार कंजूस हैं. उन्हें केंसर हुआ और वे भी असली बाबा के पास पहुंच गए. असली बाबा से केंसर का इलाज पूछने लगे।
बाबा ने उसे डांट कर कहा – भाई इलाज कराओ, भभूत से भी कहीं कोई बीमारी अच्छी होती है. हम रूहानी बीमारियों का इलाज करते हैं, दुआ करेंगे आपके लिए लेकिन इलाज तो कराना पड़ेगा जाओ अस्पताल जाओ।
उन्हें भी उस असली सन्त से चिढ़ हुई. कहने लगे – नकली है , कुछ जानता-वानता नहीं।
एक और रिश्तेदार चले गए असल सन्त के पास,पूछने लगे – धंधे में घाटा जा रहा है, कुछ दुआ कर दो।
सन्त ने कहा – दुआ से क्या होगा धंधे पर ध्यान दो. बाबा फकीरों के पास बैठने की बजाय दुकान पर बैठो, बाजार का जायजा लो कि क्या चल रहा है।
वे भी आकर खूब चिढ़े. वे चाह रहे थे कि बाबा कोई दुआ पढ़ दें. मगर असली सन्त इस तरह लोगों को झूठे दिलासे नहीं देते. इसीलिए लोगों को असली बाबा,असली संत, ईश्वर के असल बंदे नहीं चाहिए।
कबीर को, नानक को, रैदास को इसीलिए तकलीफें उठानी पड़ीं कि ये लोग सच बात कहते थे. किसी का लिहाज नहीं करते थे।
नकली फकीरों, और साधु संतों की हल-चल इसीलिए संसार में ज्यादा है, क्योंकि लोग झूठ सुनना चाहते हैं, झूठ पर यकीन करना चाहते हैं, झूठे दिलासों में जीना चाहते हैं. सो लाख कह दिया जाए फलाँ फर्जी है, मगर लोगो को फर्जी संत चाहिए।
जो बिमारी ठीक कर दे ताबीज बना दे और पैसा लेता रहे।
असली सन्त आपको झूठा दिलासा नही देगा बल्कि आपको सही राह बताएगा।
मन्मथनाथ गुप्त गलत नहीं लिख गए क्योंकि…
लन्दन के बकिंघम पैलेस में ब्रिटेन की महारानी/महाराजा से ‘नाइटहुड’ (सर) की उपाधि लेने की प्रक्रिया अत्यन्त अपमानजनक है। यह उपाधि लेनेवाले व्यक्ति को ब्रिटेन के प्रति वफादारी की शपथ लेनी पड़ती है और इसके पश्चात् उसे महारानी/महाराजा के समक्ष सिर झुकाकर एक कुर्सी पर अपना दायाँ घुटना टिकाना पड़ता है। ठीक इसी समय महारानी/महाराजा उपाधि लेनेवाले व्यक्ति की गरदन के पास दोनों कन्धों पर नंगी तलवार से स्पर्श करते हैं। तत्पश्चात् महारानी/महाराजा उपाधि लेनेवाले व्यक्ति को ‘नाइटहुड’ पदक देकर बधाई देते हैं।
यह प्रक्रिया सैकड़ों वर्ष पुरानी है और भारत में जिस जिसको यह उपाधि मिली वो सभी ‘सर’ इस प्रक्रिया से गुजरे थे।
ब्रिटेन अपने देश और अपने उपनिवेशों में अपने चाटुकारों को ब्रिटेन के प्रति निष्ठवान बनाने के लिए ऐसी अनेक उपाधियाँ देता रहा है। नाइटहुड (सर) की उपाधि उनमें सर्वोच्च होती थी।
गुलाम भारत में ब्रिटिश शासकों द्वारा देश के अनेक राजा-महाराजा, सेठ-साहूकार, राजनीतिज्ञ, शिक्षाविद् आदि ब्रिटेन के प्रति वफादार रहने की शपथ लेने के बाद ही ‘नाइटहुड’ से सम्मानित किए गए थे।
इतिहास बताता है कि ब्रिटिश हुकूमत उसी को नाइटहुड (सर) की सर्वोच्च उपाधि से सम्मानित करती थी जिसे वो अपना वफादार चाटूकार दलाल मुखबिर मानती थी। हालांकि औपचारिक रूप से कहा यह जाता था कि व्यक्ति को अपने कार्यक्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए यह उपाधि दी जाती है। इसीलिए कभी कभी दिखावे के लिए कुछ वैज्ञानिकों चिकित्सकों शिक्षाविदों को भी यह उपाधि दे दी जाती थी।
कुछ अपवादों को छोड़कर देश के लगभग सभी राजा महाराजा नवाब और सेठ साहूकार आदि ब्रिटिश शासकों के तलुए चाटा करते थे। यह रहस्य किसी से छुपा नहीं है।
अतः उनको दरकिनार कर के आइए जानिए तत्कालीन राजनीति से जुड़े कुछ ऐसे बड़े नामों को जिन्होंने ब्रिटेन के प्रति वफादार रहने की शपथ लेकर नाइटहुड (सर) की उपाधि ब्रिटिश दरबार में घुटना टेक कर ग्रहण की थी।
#पहला_नाम
सन 1890 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष फिरोजशाह मेहता बने थे। मेहता जी ने भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई इतने जुझारू तरीके से लड़ी थी कि 1904 में ब्रिटिश शासकों ने उनको नाइटहुड (सर) की उपाधि से सम्मानित किया था।
#दूसरा_नाम
सन 1900 में नारायण गणेश चंदावरकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना था। वह देश के प्रति कितना वफादार था और अंग्रेजों के प्रति कितना वफादार था यह इसी से स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के साल भर बाद ही अंग्रेज़ी हुकूमत ने नारायण गणेश चंदावरकर को 1901 में बॉम्बे हाईकोर्ट का जज नियुक्त कर दिया था। देश को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए बनी कांग्रेस के उस राष्ट्रीय अध्यक्ष नारायण गणेश चंदावरकर ने जज बनकर अंग्रेजों की इतनी गज़ब सेवा की कि 1910 में ब्रिटिश शासकों ने नारायण गणेश चंदावरकर को नाइटहुड (सर) की उपाधि से नवाजा था। 1913 में जज के पद से रिटायर होने के बाद यह चंदावरकर फिर कांग्रेस का बड़ा नेता बन गया था।
#तीसरा_नाम
1907 और 1908 में लगातार 2 बार अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रासबिहारी घोष ने कांग्रेस के झंडे तले अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई इतनी जोरदारी और ईमानदारी से लड़ी थी कि सन 1915 में ब्रिटिश शासकों ने रासबिहारी घोष को नाइटहुड (सर) की उपाधि से सम्मानित किया था।
#चौथा_नाम
सन 1897 में अंग्रेज़ सरकार का एडवोकेट जनरल चेत्तूर संकरन नायर कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना था। नायर ने कांग्रेस के झंडे तले देश की आज़ादी की लड़ाई इतने भीषण तरीके से लड़ी थी कि अंग्रेजों ने 1904 में उसको कम्पेनियन ऑफ इंडियन एम्पायर की तथा 1912 में नाइटहुड (सर) की उपाधि देकर समान्नित तो किया ही था साथ ही साथ 1908 में ब्रिटिश सरकार ने उसे मद्रास हाईकोर्ट का जज नियुक्त किया था। 1915 में वह उसी पद से रिटायर हुआ था।
यह👆🏼चार नाम किसी छोटे मोटे कांग्रेसी नेता के नहीं बल्कि कांग्रेस के उन राष्ट्रीय अध्यक्षों के हैं जिन्होंने ब्रिटिश दरबार में घुटने टेक कर ब्रिटेन के प्रति वफ़ादार रहने की कसम खायी थी।
अतः आज यह प्रश्न स्वाभाविक है कि पेशे से वकील इन राजनेताओं ने ऐसा कौन सा उल्लेखनीय कार्य किया था जिससे ब्रिटिश सरकार इतनी गदगद हो गयी थी कि उन्हें नाइटहुड (सर) की सर्वोच्च उपाधि से सम्मानित कर डाला था.?
अंग्रेजों के वफादार रहे कुछ और नामों के ऐसे उदाहरण भी हैं जिनको आजादी मिलने के बाद महत्वपूर्ण पद सौंप दिए गए।


પાકિસ્તાન-અધિકૃત-કાશ્મીરમાં અમૂલ્ય હિન્દુ અને બૌદ્ધ વારસાના સ્થળોનો ઇરાદાપૂર્વક અને નિર્દયતાથી નાશ કરવામાં આવી રહ્યો છે !!
ચિલાસ/હુન્ઝા/શતીયાલ વિસ્તારોમાં ૫૦૦૦૦ થી વધુ પેટ્રોગ્લિફ્સ, શિલાલેખો છે, અને તેમનો સમય ઈ .પૂ.૫૦૦૦ થી ૧૬મી સદી સુધી છે.
જેમ મેં તપેશ યાદવજી દ્વારા X પર પોસ્ટ કરાયેલી છબીઓમાં જોયું, ઘણી છબીઓનું અપમાન કરવામાં આવ્યું છે. છબીઓ ચિલાસ ખીણ વિસ્તારની છે.
દેખીતી રીતે રાજકીય કાર્યકરો અને ઇસ્લામવાદીઓ વિવિધ ધાર્મિક છબીઓને નિશાન બનાવી રહ્યા છે, તેમને સફેદ અને કાળા પર્મા-પેઇન્ટ લગાવી દેવામાં આવ્યો છે, જ્યારે કેટલીક છબીઓ પર ખંજર ફેરવ્યું છે. કેટલાક કિસ્સાઓમાં, સ્થાનિક સરકારે આ અમૂલ્ય પ્રાચીન વારસાને તેમના પર નોટિસો ચિતરાવીને અપમાનિત કર્યા છે.
છબીઓ પરથી એ સ્પષ્ટ થાય છે કે તોડફોડ ઇરાદાપૂર્વક કરવામાં આવી છે, જ્યારે થયેલા નુકસાનને ભરપાઈ ન કરી શકાય તેવું છે!
ચિલાસમાં પહેલી સદી સીઈની બલરામ અને કૃષ્ણની છબી છે. તેની નજીક આવેલા ખરોષ્ઠી શિલાલેખ પર [બાલા]રામ [ક્રિ]ષ લખેલું છે. મને આશા છે કે આ છબીનો નાશ થયો નથી!
પોસ્ટ ક્રેડિટ #TeamLostTemples
#lostheritage #indianhistory #incredibleindia #hinduism #buddhism #vandalism

अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे…
2022 में तुर्की ने भारत को 56 हजार टन गेहूं का ऑर्डर दिया.. भारत ने शिपमेंट भेज दी.. वह भी एक्सपोर्ट क्वॉलिटी के गेहूं.. जब शिपमेंट तुर्की के बंदर पर पहुंचा तो तुर्की ने बहाना बनाया कि भारत के गेहूं में इबोला वायरस है.. इस लिए हम इस शिपमेंट को नहीं लेंगे.. पूरे विश्व में भारत की शाख पर धब्बा लगा दिया तुर्की ने.. यह सोच समझ कर किया गया षडयंत्र था.. भारत ने अपनी लैब में उस गेहूं के सैंपल टेस्ट किए और बताया कि कोई वायरस नहीं है उस गेहूं में..पर तुर्की नहीं माना.. शिपमेंट कुछ दिन वही पर खड़ा रहा.. और फिर शिपमेंट वापस आना शुरू हुआ.. और रस्ते में पड़ता है भारत का मित्र इजराइल… जिसने पूरा शिपमेंट खरीद लिया… और भारत की शाख विश्वभर में बचा ली…
अब इस समय तुर्की में अकाल चल रहा है… जो गेहूं वहां उत्पन्न होता है वह उसकी आवश्यकता का 50% ही है.. अब बाकी का 50% बाहर से खरीदना है… यूक्रेन और रूस गेहूं के बड़े उत्पादक देश है, पर वह अभी युद्ध में है, तो संभव नहीं.. दूसरी और उसके पालतू टॉमी लोग है पाकिस्तान और अज़रबैजान.. वह भी इस विषय में भीखमंगे ही है.. तो अंत में वह भारत के पास आया…
इस बार भारत 2022 का वह धोखा भुला नहीं है… भारत ने विश्वगुरु बनने वाले विचार को थोड़ी देर कोने में रखा और तुर्की को 2022 वाला कांड याद दिलाया.. और मना कर दिया… बोला भाग BSD K…
#NationFirst
देश के प्रति गाँधी के अपराध (भाग 4)
हत्या करने के लिए उकसाते गाँधी
1920 में भारत की अधिकतर मस्जिदों से दो पुस्तकें वितरित की जा रही थीं- ‘कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी’ और ‘उन्नीसवीं सदी का लंपट महर्षि’। ये दोनों पुस्तकें ‘अनाम’ थीं, इनमें किसी लेखक या प्रकाशक का नाम नहीं था, और इन दोनों पुस्तकों में भगवान श्री कृष्ण, हिंदू धर्म इत्यादि पर बहुत अश्लील, अत्यन्त घिनौनी बातें लिखी गई थीं और इनमें अनेक देवी-देवताओं के बहुत अश्लील रेखाचित्र भी बनाए गए थे। यह बात जब गांधी तक पहुंची, तो उन्होंने इसे ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ की बात बताकर उपेक्षित कर दिया और कहा कि भारत में सबको अपनी बात रखने का अधिकार है।
लेकिन इन दोनों पुस्तकों से, भारत का हिन्दू जनमानस बहुत उबल रहा था। इसलिए 1923 में लाहौर स्थित ‘राजपाल प्रकाशन’ के मालिक महाशय राजपाल ने एक पुस्तक प्रकाशित की, जिसका नाम था- “रंगीला रसूल”। इसमें कटासुरों के पैगम्बर मोहम्मद के जीवन के बारे में बहुत सी बातें थीं। इसमें भी लेखक का नाम गुप्त रखा गया था, हालांकि उसके लेखक पंडित चमूपति थे, जो इस्लाम के जाने-माने आर्यसमाजी विद्वान थे। इस पुस्तक में कहीं कोई झूठ नहीं था, बल्कि अनेक सबूतों के साथ आयत नंबर, हदीस नंबर इत्यादि देकर लिखी गई थीं।
डेढ़ वर्षों तक ‘रंगीला रसूल’ बिकती रही, पूरे भारत में कहीं कोई बवाल नहीं हुआ। लेकिन एक दिन अचानक 28 मई 1924 को गांधी ने अपने समाचारपत्र ‘यंग इंडिया’ में एक लंबा-चौड़ा लेख लिखकर “रंगीला रसूल“ पुस्तक की खूब निंदा की, और अंत में लिखा- “मुसलमानों को स्वयं ऐसी पुस्तक लिखने वालों को सजा देनी चाहिए।”
गांधी का यह लेख पढ़कर, पूरे भारत के मुसलमान भड़क गए और महाशय राजपाल जी के ऊपर 3 वर्षों में 5 बार हमले हुए, लेकिन गांधी ने एक बार भी किसी हमले की निंदा नहीं की।
कुछ मुस्लिम विद्वानों ने उस पुस्तक ‘रंगीला रसूल’ के प्रकाशक पर लाहौर उच्च न्यायालय (हाई कोर्ट) में वाद दायर किया। हाईकोर्ट ने चार इस्लामिक विद्वानों को न्यायालय में खड़ा करके उनसे पूछा कि इस पुस्तक की कौन सी पंक्ति सही नहीं है, आप वह बता दीजिए। सभी ने माना कि इस पुस्तक में कोई गलत बात नहीं लिखी गई है। इसलिए लाहौर उच्च न्यायालय ने महाशय राजपाल पर मुकदमा खारिज कर दिया और उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया।
उसके बाद, 3 अगस्त 1924 को गांधी ने अपने ‘यंग इंडिया’ समाचारपत्र में एक और भड़काने वाला लेख लिखा। इस लेख में उन्होंने इशारों में लिखा था कि “जब व्यक्ति को न्यायालयों से न्याय नहीं मिले, तब उसे अपनेआप प्रयास करके न्याय ले लेना चाहिए।” दूसरे शब्दों में गाँधी कटासुरों को महाशय राजपाल की हत्या करने के लिए उकसा रहे थे।
उसके बाद महाशय राजपाल के ऊपर दो बार और हमले के प्रयास हुए और अंत में 6 अप्रैल 1929 का हमला जानलेवा साबित हुआ, जिसमें मोहम्मद इल्मदीन नामक युवक ने, गदा से महाशय राजपाल के ऊपर कई वार किए, जिनसे उनकी जान चली गई।
जिस दिन उनकी हत्या हुई, उसके 4 दिन बाद गांधी लाहौर में आये थे, लेकिन वे महाशय राजपाल के घर पर शोक प्रकट करने नहीं गये और न ही अपने किसी संपादकीय में उनकी हत्या की निंदा की।
इस हत्या से देश में पूरा हिंदू समाज उबल उठा था, और अंग्रेजों को लगा कि यदि उन्होंने हत्यारे को जल्दी फांसी नहीं दी, तो अंग्रेजी शासन को भी खतरा हो सकता है। अतः अंग्रेजों ने मुकदमा चलाकर महाशय राजपाल के हत्यारे मो. इल्मदीन को फांसी की सजा सुना दी। इस पर 4 जून 1929 को गांधी ने अंग्रेज वायसराय को चिट्ठी लिखकर महाशय राजपाल के हत्यारे की फांसी की सजा को माफ करने का अनुरोध किया था।
उसके अगले दिन, अपने समाचारपत्र ‘यंग इंडिया’ में गाँधी ने एक लेख लिखा था, जिसमें उसमें यह साबित करने का प्रयत्न किया था कि यह हत्यारा तो निर्दाेष है, नादान है, क्योंकि उसे अपने धर्म का अपमान सहन नहीं हुआ और उसने गुस्से में आकर यह हत्या करने का निर्णय लिया।
लेकिन अंग्रेजों ने 31 अक्टूबर 1929 को महाशय राजपाल के हत्यारे मोहम्मद इल्मदीन को लाहौर जेल में फांसी पर चढ़ा दिया। तब 2 नवंबर 1929 को गांधी ने ‘यंग इंडिया’ में इल्मदीन को फांसी देने को इतिहास का काला दिन लिखा था। यह थी गाँधी की अहिंसा। मेरे विचार से हत्या करने के लिए उकसाने के आरोप में गाँधी पर भी केस चलना चाहिए था और उनको कठोर दंड मिलना चाहिए था।
— डॉ. विजय कुमार सिंघल
पौष शु. 8, सं. 2082 वि. (28 दिसम्बर, 2025)
#gandhi_ke_apradh
साध्वी प्रज्ञा सिंह और कर्नल पुरोहित को कोर्ट ने बाइज्जत बरी किया।
“कुत्ती” , “कमीनी” , “वेश्या” , “कुलटा ” बोल इस भगवा में किसकी रखैल है तू ?
“अब तक कितनों के बिस्तर पर गई है,,,?”
“किसके इशारे पर सब कर रही है ?”
“जिंदगी प्यारी है तो जो मैं कहता हूँ कबुल कर ले बाकी जिंदगी आराम से कटेगी”
यह शब्द सुनकर आपकी त्योरियां जरुर चढ़ गई होगी
मेरी भी चढ़ गई थी,,,।
ऐसे घृणित शब्दों से किसी और को नहीं,,,,
बल्कि भगवा वस्त्र धारिणी निष्कलंक साध्वी प्रज्ञा सिंह को कलंकित “कांग्रेस” के इशारे पर मुम्बई ATS चीफ हेमंत करकरे के सामने मुम्बई पुलिस व ATS ने कहलवाया था.
जिस हेमंत करकरे को आज शहीद मान कर सम्मान दिया जाता है एक नम्बर का नी#,ch आदमी था. उस निर्दोष हिंदू साध्वी का श्राप लगा और आज हेमंत करकरे के परिवार में कोई दीपक जलाने वाला भी जीवित नहीं बचा है ।
मैं साध्वी प्रज्ञा जी का एक साक्षात्कार देख रहा था।
ऐसे घृणित शब्दों को इशारे में बताया।
बताते हुए उनके नेत्र सजल हो गये.
साक्षात्कार देखते हुए क्रोधाग्नि से धधक रहे मेरे आँखो से भी अश्रु की धारा फूट पड़ी।
“साध्वी प्रज्ञा” ने मर्माहत शब्दों में वृत्तान्त सुनाया कि
मेरे शरीर का कोई ऐसा अंग नही जिसे चोटिल ना किया गया हो।
जब पत्रकार ने पुछा कि
मारने के कारण ही आपके रीढ़ की हट्टी टूट गई थी ??
साध्वी प्रज्ञा ने कहा,
“नहीं, मारने से नहीं,
एक जन हमारा हाथ पकड़ते थे एक जन पांव और झूलाकर दीवार की तरफ फेंक देते थे,
ऐसा प्राय: रोजाना होता था दीवार से सर टकराकर सुन्न हो जाता था।
कमर में भयानक दर्द होता था। ऐसा करते करते एक दिन रीढ़ की हड्डी टूट गई तब अस्पताल में भर्ती कराया गया।”
साध्वी प्रज्ञा ने बताया,
“एक दिन तो ऐसा हुआ कि
मारते मारते एक पुलिस वाला थक गया तो
दूसरा मारने लगा।
उस दौरान मेरे फेफड़े की झिल्ली फट गई फिर भी विधर्मी निर्दयता से मारता रहा.”.
साध्वी प्रज्ञा ने बताया,
“रीढ़ की हड्डी टूटने के बाद मैं बेहोश हो गई थी।
जब होश आया तो देखा कि
मेरे शरीर से सारा भगवा वस्त्र उतार लिया गया गया था.
मुझे एक फ्राक पहनाया गया था।”
साध्वी दीदी ने बताया,
“मेरे साथ मेरे एक शिष्य को भी गिरफ्तार किया गया था ।
उसे मेरे सामने लाकर उसे चौड़ा वाला बेल्ट दिया और कहा मार!! अपने गुरु को इस साली को!!”
.”शिष्य, सकुचाने लगा तो मैं बोली मारो मुझे !!
शिष्य ने मजबुरी में मारा तो जरुर मुझे
लेकिन नरमी से।
तब एक पुलिस वाले ने शिष्य से बेल्ट छीन कर शिष्य को बुरी तरह पीटने लगा और बोला ऐसे मारा जाता है.
“साध्वी प्रज्ञा ने बताया कि
एक दिन कुछ पुरुष कैदियों के साथ मुझे खड़ी करके अश्लील आडियो सुनाया जा रहा था.
मेरे शरीर पर इतनी मार पड़ी थी कि
मेरे लिए खड़ी रहना मुश्किल था. मैं बोली कि बैठ जाऊँ वो बोले साली शादी मे आई है क्या कि बैठ जायेगी!!
मेरी आँख बंद होने लगी मैं अचेत हो गई।
साध्वी प्रज्ञा ने बताया,
“मेरे दोनों हाथों को सामने फैलवाकर एक चौड़े बेल्ट से मारते थे,
मेरा दोनो हाथ सूज जाता था।
अँगुलियां भी काम नही करती थी,
तब गुनगुना पानी लाया जाता था। मैं अपने हाथ उसमें डालती,
कुछ आराम होता तब अंगलुियां हिलने डुलने लगती थी,
तो फिर से वही क्रिया मेरे पर मार पड़ती थी।
साध्वी प्रज्ञा जी ने बताया कि
मुझे तोड़ने के लिए मेरे चरित्र पर लांछन लगाया।
क्योंकि लोग जानते हैं कि
किसी औरत को तोड़ना है तो उसके चरित्र पर दाग लगाओ !
मेरे जेल जाने के बाद यह सदमा मेरे पिताजी बर्दास्त नहीं कर पाये और इस दुनियां से चल बसे. साध्वी जी राहत की सांस लेते हुए कहती हैं मेरे अन्दर रहते ही,
एक दुर्बुद्धि दुराचारी हेमंत करकरे को तो सजा मिल गई मिल गई अभी बहुत लोग बाकी है।
साध्वी ने बताया,
“नौ साल जेल में थी,
सिर्फ एक दिन एक महिला ने एक डंडा मारा था,
बाकी हर रोज पुरुष ही निर्दयता से हमें पीटते थे.”
पत्रकार ने पूछा,
“आपको समझ में तो आ गया होगा कि क्यों आपको इतने बेरहमी से तड़पाया जा रहा था?”
साध्वी जी ने कहा,
“हां, भगवा के प्रति उनका द्वेश था।
फूटी आंख भी भगवा को नही देखना चाहते थे।
भगवा को बदनाम करने का कांग्रेस ने एक सुनियोजित षडयंत्र तैयार किया था.”
साध्वी ने बताया कि
एक बार कांग्रेस का गुलाम, स्वामी अग्निवेष मुझसे मिलने जेल में आया और बोला,
“आप सब कबुल कर लो कि
हां! यह सब RSS के कहने पर हुआ है।
इसमें यूपी के सांसद योगी आदित्य नाथ और संघ के इंद्रेश कुमार का नाम ले लो ।
सरकारी गवाह बन जाओ।
चिदम्बरम और दिग्विजय हमारे मित्र हैं।
मै आपको छुड़वा दुंगा”
साध्वी जी ने कहा,
“अगर आपकी उनसे घनिष्ठता है और सच में हमें छुड़ाना चाहते हो,
तो चिदम्बरम से जाकर बोलो की इमानदारी से जांच करवा ले, क्योंकि मैंने ऐसा कुछ किया ही नही है ।”
हिन्दुओं सबसे ख़ास बात ये कि साध्वी पर ये अत्याचार किसी इस्लामिक काल में नही हुआ है
इसके आगे आपको सोचना है कि काँग्रेसियों के मन मे हिन्दुओं के लिए कितना प्रेम है।
काँग्रेस का चुनाव घोषणा पत्र आपने पढ लिया होगा।
अब आपको निर्णय करना है कि आपको कैसा भारत चाहिये ,
और यदि अंतरात्मा ,स्वधर्म गौरव और स्वाभिमान नाम की कोई चीज है हिंदुओं के जेहन में तो तुम हिंदुओं को कसम है अयोध्या में विराजमान तुम्हारे आराध्य राम की, शहीद रामभक्तों और शहीदों के खून से लाल हुयी सरयू नदी की, इस सपा+ कांग्रेस को जीवन में कभी भी वोट मत देना।
हिन्दू आतंकवाद शब्द गढ़ने का कांग्रेस ने गंदा प्रयास किया लेकिन आज कोर्ट ने इनके झूठ की पोल खोल दी है।
ऐतिहासिक फैसला,,!
16 साल बाद, #NIA कोर्ट ने 2008 के मालेगांव मामले में साध्वी प्रज्ञा, लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित और अन्य को क्लीन चिट दे दी है।
सभी कांग्रेस के द्वारा बनाए गए कथित आरोपीयो को बरी किया गया।
तथाकथित “भगवा आतंकवाद” का मिथक ध्वस्त हो गया है।
कांग्रेस की राजनीतिक प्रतिशोध की भावना उजागर हुई है। यह सिर्फ़ एक फैसला नहीं है, बल्कि वोट बैंक की राजनीति के लिए संतों और सैनिकों को बदनाम करने वालों के मुँह पर तमाचा है।
सत्यमेव जयते,,,,
दोस्तों जानकारी अच्छी लगे तो कृपया पेज को फॉलो और पोस्ट को शेयर जरूर करें,,,,,
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एक महान संत नागार्जुन के बारे में एक सुंदर कहानी कही जाती है।
वे एक अर्ध-नग्न संत थे, लेकिन सभी सच्चे साधकों के लिए गहन आदरणीय थे।
एक रानी भी संत नागार्जुन का बहुत सम्मान करती थीं। उन्होंने एक दिन उनसे निवेदन किया कि वे राजमहल में आकर अतिथि बनें। नागार्जुन उनके निमंत्रण को स्वीकार कर महल पहुँचे।
रानी ने उनसे एक निवेदन किया।
नागार्जुन ने पूछा, “आपको क्या चाहिए?”
रानी ने कहा, “मुझे आपका भिक्षा पात्र चाहिए।”
नागार्जुन ने अपना भिक्षा पात्र दे दिया – जो उनके पास मात्र एकमात्र वस्तु थी।
रानी ने इसके बदले में एक स्वर्णिम भिक्षा पात्र, हीरों से जड़ा हुआ, नागार्जुन को भेंट किया और कहा,
“आप इस पात्र को रखें। मैं आपके पुराने भिक्षा पात्र को पूज्य मानकर पूजूँगी। यह आपके पवित्र कंपन से भरा हुआ है। एक संत के लिए साधारण भिक्षा पात्र उचित नहीं। यह विशेष रूप से आपके लिए बनाया गया है।”
नागार्जुन ने इसे स्वीकार कर लिया क्योंकि उनके लिए ये दोनों ही समान थे।
जब वे महल से बाहर निकले, एक चोर ने उन्हें देखा।
चोर को विश्वास नहीं हुआ कि एक अर्ध-नग्न व्यक्ति इतना कीमती पात्र लेकर जा रहा है।
उसने सोचा, “यह कितनी देर तक इसे बचा पाएगा?”
चोर ने उनका पीछा किया। नागार्जुन एक खंडहर मंदिर में रुके, जिसमें न दरवाजे थे, न खिड़कियाँ।
चोर ने सोचा, “रात में जब नागार्जुन सो जाएंगे, तो यह पात्र आसानी से मिल जाएगा।”
लेकिन नागार्जुन ने चोर को देख लिया था। उन्होंने पात्र उठाकर मंदिर के बाहर फेंक दिया।
चोर चकित रह गया।
नागार्जुन ने सोचा, “वह पात्र के लिए आया है, मेरे लिए नहीं। तो क्यों न इसे दे दिया जाए, ताकि वह चला जाए और मैं भी आराम कर सकूं।”
चोर ने पात्र उठाया, लेकिन बिना धन्यवाद कहे वह जा नहीं सका।
वह बोला, “आप एक अद्भुत इंसान हैं। मेरी ज़िंदगी बर्बाद हो रही है। मैं एक चोर हूँ। क्या मैं आपके चरण छू सकता हूँ?”
नागार्जुन हँसे और बोले, “इसीलिए मैंने पात्र बाहर फेंका, ताकि तुम अंदर आ सको।”
चोर ने उनके चरण छुए, और उसी क्षण उसने दिव्यता का अनुभव किया।
उसने पूछा, “मुझे आप जैसा बनने में कितने जन्म लगेंगे?”
नागार्जुन बोले, “कितने जन्म? यह अभी हो सकता है, अभी!”
चोर ने कहा, “आप मजाक कर रहे होंगे। मैं एक कुख्यात चोर हूँ। यह कैसे संभव है?”
नागार्जुन ने कहा,
“यदि एक पुराने घर में सदियों से अंधेरा हो, और कोई दीपक जलाए, तो क्या अंधेरा कहेगा, ‘मैं यहाँ सदियों से हूँ, मैं नहीं जाऊँगा’?”
चोर ने तर्क को समझा।
उसने पूछा, “क्या मुझे चोरी छोड़नी होगी?”
नागार्जुन बोले, “यह तुम्हारा निर्णय है। मैं केवल तुम्हें ध्यान का उपाय बता सकता हूँ। बस अपनी साँस को देखो – अंदर आती, बाहर जाती। चाहे चोरी करते समय ही क्यों न हो, बस अपनी साँस को देखते रहो।”
चोर ने कहा, “यह तो सरल है। और कुछ नियम या नैतिकता नहीं?”
नागार्जुन ने कहा, “कुछ भी नहीं – केवल अपनी साँस को देखो।”
पंद्रह दिनों बाद, चोर लौटकर आया, परंतु अब वह पूरी तरह बदल चुका था। उसने कहा, “मैं फँस गया। मैं चोरी नहीं कर सकता, क्योंकि ध्यान के साथ चुराना संभव नहीं।”
नागार्जुन ने कहा, “अब तुम्हारे लिए निर्णय का समय है। यदि तुम्हें आंतरिक शांति चाहिए, तो इसे चुनो। अगर तुम्हें धन चाहिए, तो उसे चुनो।”
चोर बोला, “मैं अचेतन नहीं हो सकता। मुझे अपना शिष्य बना लें।”
नागार्जुन ने कहा, “मैंने तुम्हें पहले ही दीक्षा दे दी है।”
ध्यान नैतिकता या चरित्र पर नहीं, बल्कि आंतरिक जागरूकता पर आधारित है।
ओशो
સરોવરના કિનારા પાસે એક નાનુ બાળક રમી રહ્યુ હતુ. થોડે દુર બેઠેલી એની માં આ બાળકને જોઇ રહી હતી. અચાનક એક મગર બહાર આવી, બાળક તો એની મસ્તીમાં રમી રહ્યુ હતું મગરે બાળકનો પગ પકડ્યો.
દુર બેઠેલી માં નું ધ્યાન જ હતું એણે કુદકો મારીને બાળકના હાથ પકડી લીધા. એક બાજુ મગર અને બીજી બાજું માં……પેલી સ્ત્રીએ પોતાની તમામ તાકાત લગાવીને બાળકને મગરના સકંજામાંથી મુક્ત કર્યું. પરંતું આ ખેંચતાણમાં પેલી સ્ત્રીના તિક્ષ્ણ નખ બાળકના હાથમાં લાગી જવાથી એના હાથમાંથી લોહી નીકળતું હતું. નાના બાળકને એ નહોતું સમજાતું કે એક માં મને કઇ રીતે લોહી-લુહાણ કરી શકે? મારી માને મારો જરા પણ વિચાર નહી આવ્યો હોય ?
બાળકની આંખમાં પ્રશ્ન વાંચી ગયેલી માતાએ કહ્યુ કે બેટા મને ખ્યાલ છે કે તું મારા પર ગુસ્સે છે, મારા મોટા નખથી તારા હાથની ચામડી ઉતરી ગઇ છે અને તને ખુબ પીડા થાય છે એ પણ હુ સમજી શકું છું. પણ બેટા તને કદાચ અત્યારે નહી સમજાય તું બહું નાનો છે હજુ . મારે તને બચાવવો હતો અને મારી પાસે આ માટે બીજો કોઇ વિકલ્પ જ નહોતો.
આપણા જીવનમાં પણ ઘણી એવી ઘટનાઓ બને છે ત્યારે આપણે પણ પરમાત્મા પ્રત્યે નારાજ થઇ જઇએ છીએ. આપણને એવું લાગે છે કે ભગવાન તે કંઇ આવા હોતા હશે જે મને આવું દુખ અને પીડા આપે છે? આપણું પણ પેલા નાના બાળક જેવું જ છે . હાથ પર પડેલા વિખોળીયાને યાદ કરીને રડ્યા કરીએ છીએ એ તો સાવ ભુલી જ જઇએ છીએ કે આ નાની એવી પીડાના બદલામાં હું બચી ગયો છું
“મારું બહારવટું હાલે કે ના હાલે, પણ આ દીકરીનો વિશ્વાસ ન તૂટે…” : નવરાત્રીના પાવન પર્વે જોગીદાસ ખુમાણને સ્મરણાંજલિ
નવરાત્રી એટલે શક્તિની આરાધનાનું પર્વ. જ્યારે નવ-નવ રાત સુધી જગદંબાના ગરબા ગવાતા હોય, ત્યારે સૌરાષ્ટ્રની ધરતીના ઇતિહાસના પાનાઓમાંથી એક એવા વીર પુરુષનું સ્મરણ કરવું પડે, જેમના માત્ર નામથી બહેન-દીકરીઓ વગડામાં પણ નિર્ભય બનીને ફરી શકતી હતી. એ વીર એટલે આપા જોગીદાસ ખુમાણ.
ધણહેરના વગડાનો એ પ્રસંગ
વાત છે એ સમયની જ્યારે જોગીદાસ ખુમાણનું બહારવટું ચાલતું હતું. ભાવનગર રાજ્ય સામે એમનો સંઘર્ષ હતો, પણ પ્રજા માટે તો તેઓ માવતર સમાન હતા.
એક દિવસ જોગીદાસ ખુમાણ એકલા ઘોડા પર સવાર થઈને કોઈ નિર્જન ‘ધણહેર’ (ગીચ વગડા/જંગલ) માંથી પસાર થઈ રહ્યા હતા. ત્યાં તેમની નજર એક ૧૮-૨૦ વર્ષની દીકરી પર પડી જે એકલી ભેંસો ચરાવી રહી હતી.
એ અવાવરુ જગ્યાએ જુવાન દીકરીને એકલી જોઈને જોગીદાસ ખુમાણે પોતાની ઓળખ આપ્યા વગર પૂછ્યું: “બેટા, તું અહીં સાવ એકલી છે? તારું કોઈ સગું-વહાલું આજુબાજુમાં નથી?”
દીકરીએ નિર્દોષભાવે જવાબ આપ્યો: “ના બાપુ, મારા મા-બાપ તો નાનપણમાં ગુજરી ગયા છે. હું મારા મામાને ત્યાં મોટી થઈ છું અને અહીં ઢોર ચરાવું છું.”
જોગીદાસે ફરી પૂછ્યું: “બેટા, હું એમ નથી કહેતો, પણ આટલા મોટા વગડામાં તું એકલી ફરે છે, તને બીક નથી લાગતી? તારી આબરૂ કે તારા શીયળની તને ચિંતા નથી થતી?”
ત્યારે એ દીકરીના મુખમાંથી જે શબ્દો નીકળ્યા, એ સાંભળીને ખુદ કાળનો પણ કાળ ગણાતા જોગીદાસ ખુમાણ સ્તબ્ધ થઈ ગયા. દીકરી બોલી:
> “બાપુ, બીક શેની? અમારા આ વિસ્તારમાં ‘આપા જોગીદાસ ખુમાણ’ નું બહારવટું હાલે છે. જ્યાં સુધી જોગીદાસ જીવે છે ને, ત્યાં સુધી કોની તાકાત છે કે મારી સામે ઊંચી આંખ કરીને પણ જોઈ શકે?”
>
તે દીકરીને ખબર નહોતી કે જેની સામે તે આ વાત કરી રહી છે, એ જ સાક્ષાત જોગીદાસ ખુમાણ છે.
એક અજાણી દીકરીનો પોતાના પર આટલો અતૂટ વિશ્વાસ જોઈને જોગીદાસ ખુમાણની છાતી ગજગજ ફૂલી ગઈ અને આંખમાં ઝળઝળિયાં આવી ગયા.
સુરજ સામે જોગીદાસની પ્રતિજ્ઞા
એ જ પળે, તે બહારવટિયાએ આકાશમાં તપતા સૂર્યનારાયણ સામે બે હાથ જોડ્યા અને એક અદભુત પ્રાર્થના કરી:
“ભલે ઉગ્યા ભાણ, ભાણ તિહારા ભામણા,
મરણ જીવણ લગ માણ, રાખજે કશ્યપ રાવ!”
જોગીદાસે કહ્યું: “હે કશ્યપના પુત્ર સૂર્યનારાયણ! મારું ગરાસ પાછું મળે કે ન મળે, મારું બહારવટું સફળ થાય કે ન થાય, એની મને પરવા નથી. પણ આ ૧૮ વર્ષની દીકરીએ મારા પર જે વિશ્વાસ મૂક્યો છે ને, એ વિશ્વાસ તૂટવા ન દેતો બાપ! હું જીવું ત્યાં સુધી આ પંથકની દીકરીઓની લાજ પર આંચ ન આવવી જોઈએ.”
આજના યુવાનો માટે બોધપાઠ
આ પ્રસંગ આજે યાદ કરવાનો હેતુ માત્ર ઇતિહાસ વાગોળવાનો નથી, પણ વર્તમાનમાં આપણી જવાબદારી સમજવાનો છે.
આજે નવરાત્રીમાં આપણી સોસાયટી, શેરી કે ગામમાં હજારો બહેન-દીકરીઓ રાતે ગરબા રમવા નીકળે છે. એ દીકરીઓ જ્યારે મોડી રાતે રસ્તા પરથી પસાર થાય, ત્યારે તેમને પણ એવો જ વિશ્વાસ હોવો જોઈએ કે “અહીં મારા ભાઈઓ બેઠા છે, મારે ડરવાની કોઈ જરૂર નથી.”
દરેક યુવાને આજે જોગીદાસ ખુમાણના એ આદર્શોને હૃદયમાં ઉતારવાની જરૂર છે. જ્યારે કોઈ એકલી દીકરીને જુઓ, ત્યારે એની સુરક્ષાનું કવચ બનજો, એના ડરનું કારણ નહીં. આપણી ભારતીય સંસ્કૃતિ અને સભ્યતા ત્યારે જ શોભશે જ્યારે આપણી બહેન-દીકરીઓ નિર્ભય બનીને જીવી શકશે.
જય માતાજી… જય સોરઠ!
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