પૂજ્ય એકનાથજી રાનડે ,જન્મ 19 નવેમ્બર 1914
પૂજ્ય એકનાથ રાનડે ભારતીય સમાજના એવા મહાન વ્યક્તિઓમાંના એક માનવામાં આવે છે જેમણે સંગઠન, સમર્પણ અને નિશ્ચયને પોતાના જીવન તરીકે સ્વીકાર્યા હતા. રાષ્ટ્રીય સ્વયંસેવક સંઘના સૌથી વરિષ્ઠ પ્રચારકોમાંના એક તરીકે, તેમણે તેમના કાર્ય દ્વારા દર્શાવ્યું કે અતૂટ શ્રદ્ધા અને ધ્યેય પ્રત્યે અતૂટ પ્રતિબદ્ધતાથી, અશક્ય લાગતા કાર્યો પણ પૂર્ણ કરી શકાય છે.
એકનાથનું સૌથી મોટું યોગદાન કન્યાકુમારીમાં વિવેકાનંદ સ્મારક નિર્માણ છે. જ્યારે સ્વામી વિવેકાનંદની યાદમાં અને તેમના તપસ્યા સ્થળને ચિહ્નિત કરવા માટે એક ભવ્ય સ્મારક બનાવવાનો વિચાર આવ્યો, ત્યારે તેમણે રાજકીય મતભેદો, વહીવટી અવરોધો, નાણાકીય અવરોધો અને સ્થાનિક વિવાદો સહિત અનેક અવરોધોનો સામનો કરવો પડ્યો. જોકે, રાનડે અવિચલ રહ્યા. તેમણે આ પ્રયાસને માત્ર બાંધકામ પ્રોજેક્ટ નહીં, પરંતુ રાષ્ટ્રીય ચેતના જાગૃત કરવાની ચળવળ માનતા હતા. તેમણે સામાન્ય લોકોનો ટેકો મેળવવા માટે દેશના દરેક ખૂણામાં પ્રવાસ કર્યો. તેમણે નાનામાં નાના નાગરિકથી લઈને દેશના સૌથી મોટા ઔદ્યોગિક ગૃહો સુધી, દરેકને આ સ્મારક સાથે જોડ્યા.
તેમના અપ્રતિમ સંગઠનાત્મક કૌશલ્ય અને મજબૂત ઇચ્છાશક્તિના પરિણામે, દેશભરના 30 મિલિયનથી વધુ લોકોએ આ કાર્યમાં પ્રત્યક્ષ કે પરોક્ષ રીતે યોગદાન આપ્યું. આ સ્મારક સમાજ રાષ્ટ્રીય વારસા માટે કેવી રીતે એક થઈ શકે છે તેનું જીવંત પ્રતીક છે.
એકનાથજી એ પોતાને સ્મારક નિર્માણ સુધી મર્યાદિત રાખ્યા નહીં. તેમણે વિવેકાનંદ કેન્દ્રની સ્થાપના કરી અને સ્વામી વિવેકાનંદના ઉપદેશોને સમાજના છેવાડાના વ્યક્તિ સુધી પહોંચાડવા માટે એક અભિયાન શરૂ કર્યું. શિક્ષણ, સેવા અને સંસ્કૃતિના ક્ષેત્રોમાં વિવેકાનંદ કેન્દ્ર દ્વારા કરવામાં આવી રહેલ કાર્ય તેમના દૂરંદેશી નેતૃત્વ અને વિચારધારાનો સીધો પુરાવો છે.
તેમનું જીવન આપણને પ્રેરણા આપે છે કે રાષ્ટ્ર નિર્માણ ઉચ્ચ હોદ્દા કે શક્તિ દ્વારા પ્રાપ્ત થતું નથી, પરંતુ નિશ્ચય, સતત મહેનત અને સંગઠનાત્મક શક્તિ દ્વારા પ્રાપ્ત થાય છે. આજે, તેમની પુણ્યતિથિ પર, ચાલો આપણે બધા તેમની સ્મૃતિમાં પ્રતિજ્ઞા લઈએ કે આપણે સ્વામી વિવેકાનંદના આદર્શો અને રાણડેજીના સમર્પણને આપણા જીવનમાં સમાવીને ભારતને વિકસિત દેશ બનાવવા માટે સતત પ્રયત્નશીલ રહીશું.
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Month: November 2025
🔥 यह है ओसामा — गैंगस्टर शहाबुद्दीन का बेटा… और दुर्भाग्य से रघुनाथपुर सीट से जीत भी गया!
रघुनाथपुर कोई मुस्लिम बहुल इलाका नहीं… यह 80% से अधिक हिंदू आबादी वाला क्षेत्र है। फिर भी जनता ने ऐसे परिवार के वारिस को चुन लिया, जिसकी कहानी खौफ से भरी है।
उसके पिता शहाबुद्दीन ने —
चंद्रकेश्वर प्रसाद के तीन बेटों का अपहरण किया — सिर्फ पैसा ऐंठने के लिए।
दो मासूमों पर इतना तेज़ाब डाला कि खाल तक गल गई। तीसरे बेटे को कोर्ट में गवाही देने से ठीक पहले गोली मारकर हत्या की ।
और आज…
उसी का वारिस विधानसभा में बैठा ताज पहन रहा है! क्योंकि समाज भूल गया — और खामोशी ने अपराधियों को सत्ता दे दी।
ये सीट हिंदू बहुल है… फिर भी जीत उस घराने की, जिसका इतिहास खून, खौफ और कानून को ठेंगा दिखाने से भरा है..! 🔥
इतिहास को भूलना, सबसे बड़ा अपराध है।
क्योंकि जब समाज भूल जाता है — अपराधी जीत जाता है..!!!!

છ મહિના પહેલાં રાજદીપ સરદેસાઈને કેન્સર ડિટેક્ટ થયું હતું. તેની સર્જરી થવાની હતી. રાજદીપ હંમેશાં કોંગ્રેસ માટે સોફ્ટ કોર્નર રાખવા માટે જાણીતો છે. તેની પત્ની સાગરિકા તૃણમૂલની સાંસદ છે અને ભાજપ અને મોદીની પ્રખર વિરોધી છે. પરંતુ આજે એક ઇન્ટરવ્યૂમાં રાજદીપ જણાવી રહ્યો છે કે તેની કેન્સરની સર્જરી થઈ છે, તે જાણ્યા પછી પીએમ મોદીએ રાજદીપ સરદેસાઈને ફોન કરી 30 મિનિટ સુધી વાત કરી અને તેને હેલ્થ ટિપ્સ આપી હતી તેમજ તેના સવારના રૂટિનને સુધારવાની વાત કરી હતી. ખુદ વડાપ્રધાન દ્વારા રાજદીપની સાથે ફોન પરની વાતો સાંભળીને રાજદીપ સરદેસાઈનાં બહેન અને દીકરો વડાપ્રધાન મોદીના ફેન બની ગયા છે, એવું રાજદીપ પોતે કહી રહ્યો છે !
બધાં જાણે જ છે કે રાજદીપ અને તેની પત્ની સાગરિકા રોજ પીએમ મોદીને ગાળો આપતા હોય છે, મોદી વિરુદ્ધ પ્રોપેગેન્ડા ચલાવીને જ આ લોકોએ પોતાની કરિયર બનાવી છે, તેમ છતાં પીએમ મોદીએ રાજદીપને ઉત્તમ સ્વાસ્થ્યની શુભેચ્છા પાઠવી હતી. આ બધી બાબતો જ પીએમ મોદીને બીજાઓથી અલગ તેમજ લોકપ્રિય બનાવે છે.
कांग्रेस रचती रही हिन्दुओं के खिलाफ एक के बाद एक साज़िश और हिन्दू बना रहा बेखबर
इस वीडियो/लेख में बताया गया है कि किस तरह 1950 से लेकर 2009 तक कांग्रेस सरकार ने हिंदुओं के अधिकार, मंदिरों की संपत्ति और धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रहार किया।
आर्टिकल 25, आर्टिकल 28, हिंदू कोड बिल, आरक्षण नीति, इमरजेंसी में सेकुलर शब्द जोड़ना, पूजास्थल कानून, अल्पसंख्यक आयोग, वक्फ बोर्ड कानून और राम सेतु एफिडेविट जैसे फैसलों के जरिए हिंदुओं को लगातार कमजोर किया गया।
जानिए कैसे संविधान और कानून का इस्तेमाल कर हिंदुओं की आस्था, इतिहास और अधिकारों पर हमला किया गया।
Article 25 Hindu Rights
Article 28 Religious Education
Hindu Code Bill 1956
HRCE Act 1951 Temples
Congress vs Hindus History
PoW Act 1991 Temples
Waqf Board Law 1995
Ram Setu Affidavit Congress
Hindu Terror Narrative 2009
Hindu Rights in India
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जो बूढ़ापा लालू और मुलायम ने देखा वो शानदार है, वैसे तो ये बूढ़ापा ईश्वर दुश्मन को भी ना दिखाए लेकिन हजारों जिंदगी उजाड़ने वाले इन दो के लिए तो बनता है, ये समाज के उन बुजुर्गो के लिए भी है जो अगली पीढ़ी को विरासत मे दौलत के साथ नफ़रत भी दे रहे है।
जिस रोहिणी आचार्य के लिए लालू ने टाटा मेडिकल वाली हेराफेरी की, जिसकी शादी के लिए पूरे पटना के शोरूम और ज्वेलर्स को लूटवा दिया, आज वही रोहिणी आचार्य उसे दुत्कार चली गयी वो भी ऐसे समय ज़ब उसकी पूरी साख बिखर चुकी है। वैसे लालू रोहिणी की ही एक किडनी पर जिन्दा है।
ऐसा कहा जाता है लालू ज़ब छोटा था तो पढ़ना चाहता था, पड़ोसी भूमिहारो से जाति का दंश सहता बढ़ा हुआ था। राजनीति मे आया तो इंदिरा गाँधी का धुर विरोधी था उसी चक्कऱ मे जेल भी गया, फिर जेल से लौटा, उलटफेर मे मुख्यमंत्री बना।
लालू के जंगलराज पर विस्तार से लिखने की कोई आवश्यकता नहीं है, कुछ ऐसा ही मुलायम के साथ था। ज़ब दोनों की अर्थी पास आयी तो जिन बच्चों के लिए पूरी दुनिया का विषपान किया उन्ही बच्चों ने ठोकर मार दी। राम मंदिर के कंटको को राम जैसी संतान तो मिलनी भी नहीं थी।
लालू मुलायम दोनों ने एक बात हमेशा कही कि वे शोषित वर्ग से है, उन्होंने बहुत कुछ खुद झेला है। लेकिन ऐसा सच मे था तो ईश्वर द्वारा दिये मौके को क्यों नहीं भुनाया।
भगवान परशुराम के माता पिता की भी हत्या की गयी थी, भगवान महावीर का भी लोगो ने अपमान किया था। मगर एक ने सशक्तिकरण से समाज को मुक्त किया तो दूसरे ने वचनो से। भगवान तक ना भी जाए तो अकेले बिहार मे कर्पूरी ठाकुर जैसा उदाहरण था।
जरूरी नहीं कि सामाजिक नफ़रत का उत्तर नफ़रत से ही दिया जाए, लालू और मुलायम के पास मौका था चाहते तो पिछडो की शिक्षा और रोजगार के लिए कुछ करते। पिछडो के लिए गाँवों मे ही अच्छे विद्यालय खोलते, उच्च शिक्षा का प्रबंध करते। दलित पढ़ लिख जाते तो कभी मज़ाक ना बनता।
लेकिन इसके विपरीत लालू मुलायम ने गुंडाराज चुना, गुंडों का विकास किया और उन गुंडों ने बिना जाति देखे नरसंहार किये। सवर्ण हाशिये पर आया और दलित जो पहले से हाशिये पर था वह जमीन मे धंस गया।
ऐसी ही पिछडी जाति से नरेंद्र मोदी और शिवराज सिंह भी आते थे, हो सकता है बचपन मे थोड़ा बहुत सहन किया हो मगर ज़ब भगवान ने शासन की संभावना दी तो नफ़रत नहीं परोसी बल्कि हर वर्ग को उपकृत किया, इसलिए आज एक प्रधानमंत्री तो दूसरा क़ृषि मंत्री है।
जबकि लालू के नाम से जनता को आज भी डराया जा रहा है, मुलायम एक मामले मे ठीक थे कि मृत्युपूर्व उन्होंने अपनी अंतर्रात्मा की सुनी। मौका 2019 चुनाव से पहले हुए सत्र का था, अपने बेटे अखिलेश द्वारा मंच पर जलील होने से मुलायम शोकग्रस्त थे।
मुलायम ने तब अपने भाषण मे प्रधानमंत्री की ओर मुंह करके कहा था कि भगवान करे आप दोबारा प्रधानमंत्री बने। एक टीस थी इस बयान के पीछे, जाते जाते एहसास हो रहा था कि जीवन मे जो किया वो गलत है और यही समय था कि डूबने से पहले लकड़ी पकड़ ली जाए। मुलायम अपने अंतिम दिनों मे सरकार को मौन समर्थन देने लगे थे।
लेकिन इसके विपरीत लालू का अहंकार आज भी ज्यो का त्यों है, लालू को आज भी खुशफहमी है कि उसका जंगलराज एक महान शासन था। हालांकि चित्रगुप्त जी कर्मो का लेखा जोखा करते है खुशफहमियों का नहीं, ईश्वर से प्रार्थना है लालू जीवित रहे और अपनी आँखों के सामने वो सब बर्बादी देखे जो उसकी वजह से हजारों घरो की हुई है।
मौत से पहले लालू पूरी तरह अपने उन सभी दुष्कर्मो, हत्याओं और अपहरणो को याद करें। कर्म कोई बांधकर नहीं ले जा सकता, सारा लेखा जोखा इसी सृष्टि मे होना है।

एक समय जीतनराम मांझी ने रामद्रोह किया था। उसके बाद जीतनराम मांझी के बुरे दिन शुरू हो गये थे। और राजनीति के नेत्थपय में चले गये थे। उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ और अयोध्या जी में राम लल्ला के आगे माफी माँगी। आज अपनी राजनीति के शिखर पर हैं।
खेसारी भी मांझी से सबक ले सकते…!
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जय श्री राम 🙏🚩


लालू प्रसाद यादव
राजद के इतिहास में ‘जंगल राज’ का वह काला अध्याय एक ऐसा धब्बा है, जिसे मिटाना असंभव-सा लगता है। यह केवल एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि बिहार की जनता की सामूहिक स्मृति में गहराई तक समाया हुआ दर्द है—अपराध, भय और अराजकता का प्रतीक।
चुनाव प्रचार की शुरुआत में तेजस्वी यादव ने कुशलता से मोर्चा संभाला। विकास, रोजगार और युवा-केंद्रित एजेंडा पर फोकस कर उन्होंने ‘जंगल राज’ के मुद्दे को बैकफुट पर धकेलने की कोशिश की। लगा भी कि शायद यह पुराना नैरेटिव इस बार फीका पड़ जाएगा।
लेकिन जैसे ही तेजस्वी ने सिवान से मोहम्मद शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शाह को टिकट थमाया, पूरे बिहार में एक झटका-सा लगा। शहाबुद्दीन—जो राजद शासन के दौरान अपराध के पर्याय थे—उनके बेटे को मैदान में उतारना किसी पुराने घाव को कुरेदने जैसा था। उस पीढ़ी की आंखों के सामने फिर से वही खौफनाक दृश्य घूमने लगे, जिसने लालू-राबड़ी राज में रातों की नींद उड़ा दी थी।
और फिर शुरू हुआ डिजिटल युद्ध।
हम जैसे लोग—सोशल मीडिया के सैनिक—मैदान में कूद पड़े। पुराने वीडियो, अखबार कटिंग्स, कोर्ट के दस्तावेज़ और पीड़ितों के बयान—सब कुछ सामने लाया गया:
– चंपा बिस्वास बलात्कार कांड (1997): एक IAS अधिकारी की पत्नी के साथ दरिंदगी, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था की पोल खोल दी।
– शहाबुद्दीन का तेज़ाब कांड (1998): छोटू और राजू नामक दो भाइयों को ड्रम में डालकर जिंदा जलाने की क्रूरता—गवाह बनने की सजा।
– शिल्पी-गौतम जैन हत्याकांड (1999): अपहरण, बलात्कार और हत्या—ऐसी वारदातें जो रोज़ की खबर बन गई थीं।
– CBI अधिकारी यू.एन. बिस्वास पर हमला (1998): अपराधियों का इतना दुस्साहस कि जांच एजेंसी तक को नहीं बख्शा।
– ललित सिन्हा हत्याकांड (1997): एक युवा व्यवसायी को दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या, सिर्फ़ इसलिए कि उसने शहाबुद्दीन के गुंडों का विरोध किया था।
– चंदन कुमार हत्याकांड (1998): पटना में एक कॉलेज छात्र की हत्या, जिसे शहाबुद्दीन के इशारे पर अंजाम दिया गया—गवाह बनने की सजा।
– गोपालगंज नरसंहार (1997): एक ही परिवार के 7 लोगों की हत्या, जिसमें बच्चे भी शामिल थे—राजद विधायक के भाई का हाथ माना गया।
– बाथानी टोला नरसंहार (1996): रणवीर सेना और राजद समर्थित गुंडों के बीच हिंसा में 21 दलितों की हत्या—न्याय आज तक अधूरा।
– लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार (1997): 58 दलितों की सामूहिक हत्या, जिसमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल—शहाबुद्दीन जैसे नेताओं पर संरक्षण का आरोप।
– पटना मेडिकल कॉलेज गोलीकांड (1998)*ल: छात्रों पर राजद कार्यकर्ताओं द्वारा फायरिंग, जिसमें एक छात्र की मौत—कैंपस में भी दहशत।
आज हर हाथ में स्मार्टफोन है, हर घर में अंबानी का Jio। इंटरनेट ने इन पुरानी यादों को वायरल कर दिया। व्हाट्सएप ग्रुप्स, फेसबुक पोस्ट्स, इंस्टाग्राम रील्स—हर तरफ ‘जंगल राज’ ट्रेंड करने लगा। यह कोई संगठित कैंपेन नहीं था, बल्कि जनता की स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया थी।
अगर तेजस्वी ने ओसामा को टिकट न दिया होता, तो शायद नुकसान इतना गहरा न होता।
और रही-सही कसर पूरी कर दी राजद की दो प्रवक्ताओं कंचना यादव और प्रियंका गौतमने। उनकी आक्रामक, असंवेदनशील और तथ्यों से परे बयानबाजी ने मध्यम वर्ग, महिलाओं और शहरी मतदाताओं को पूरी तरह अलग कर दिया।
यह चुनाव साबित करता है:
डिजिटल भारत में इतिहास को दबाया नहीं जा सकता। जनता की स्मृति अब सर्वर पर सेव है।
राजद की हार कोई आश्चर्य नहीं—यह पुराने पापों का हिसाब था, जो सोशल मीडिया के ज़रिए वसूला गया।
बिहार पतन
– नरेंद्र मोदी की खाल उधड़वा लेंगे
– सुशील मोदी को घर में घुसकर मारेंगे
– एयरपोर्ट पर ही बाबा बागेश्वर को रोक देंगे
ये कुछ बयान हैं तेज प्रताप यादव के। वही तेज प्रताप यादव जिसके लिए अचानक दक्षिणी टोले में प्रेम उमड़ा हुआ है। भावनाओं का ऐसा सैलाब उमड़ा हुआ है कि हम भूल गए इसने बिहार की एक बेटी ऐश्वर्या के साथ क्या सलूक किया। वो तो भला हो महुआ की जनता का कि वह इस झांसे में नहीं आई।
अब वही प्रेम रोहिणी आचार्य को लेकर उमड़ रहा है। भावनाओं का ज्वार उठ गया है। रोहिणी के भीतर की घृणा से उनका टाइमलाइन भरा पड़ा है।
परिवार लालू यादव का। बच्चे लालू यादव के। लालू के घोटालों के माल पर मौज करने वाले बच्चे उनके। फिर उनके बच्चों की कथित लड़ाई, हमारी-आपकी या बिहार की क्यों हो गई?
हम क्यों तेज प्रताप से लेकर रोहिणी के लिए पार्टी बने। ये सारे एक दिन फिर एक होंगे। यदि गलती से भी मौका मिल गया तो बिहार का फिर उसी तरह मान-मर्दन करेंगे।
कोई संजय यादव, कोई रमीज इस स्थिति का दोषी नहीं। जब परिवार आपकी, पार्टी आपकी तो सारा दोष भी आपका है। कर्मचारियों को तो बलि का बकरा बनाया जा रहा ताकि जनता की आंखों में धूल झोंक, उनकी भावनाओं के साथ खेला जा सके।
ये कुछ इसी तरह है कि कुछ समय पहले एक सज्जन ने कहा कि यहां कुछ चुगलखोर हैं, उनसे सावधान रहिए। पर उन्हीं सज्जन को मैं उस चुगलखोर के इनपुट पर राय बनाते भी देखता हूं। दोषी कौन है- वे सज्जन या चुगलखोर?
इसलिए लालू प्रसाद के परिवार या उनके बच्चों के लिए अपनी संवेदनाओं को जाया मत करिए। इसको बचाकर बिहार के उन बच्चों परिवारों के लिए रखिए जो इसके सच्चे हकदार हैं।
इस परिवार ने बिहार को जितने घाव दिए हैं, वह सब इनको भोगना ही होगा। यही इनका प्रारब्ध है।
उसने सिर्फ़ एक बार #गमछा क्या लहराया….
…..बिहार में कारीगरों को 5 करोड़ से अधिक के गमछों का ऑर्डर मिल गया…
इसे कहते है ट्रेंड सेटर,…
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने विभिन्न भाषणों, ‘मन की बात’ कार्यक्रमों और स्वतंत्रता दिवस संबोधनों में ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के मंत्र के तहत कई स्थानीय उत्पादों का जिक्र किया है।
यह #बिहारी_गमछे (जिसका हाल ही में बिहार चुनावी जीत के दौरान प्रतीकात्मक उपयोग किया गया, जिसमें मधुबनी आर्ट शामिल था) की तरह ही स्थानीय कारीगरी और संस्कृति को बढ़ावा देने का प्रयास है।
गमछा को उन्होंने कोविड काल में मास्क के विकल्प के रूप में भी प्रचारित किया था।
मोदी जी ने मन की बात में #खादी का बोला तो खादी फैशन सिंबल बन गई
भाषणों में दैनिक जीवन में उपयोग की अपील, जैसे खादी उत्सव 2022 में। 75वें स्वतंत्रता वर्ष तक खरीदारी का संकल्प दिया तो पूरा देश खाड़ी की ओर दौड़ पड़ा
एक बार मेघालय के #एरी_सिल्क में बारे में बताया तो उसकी अप्रत्याशित बिक्री बढ़ गई क्यों कि ये मोदी जी ने बताया तब पूरे देश को पता चला कि ये सिल्क निर्माण में कीड़ों को उबाल कर सिल्क नहीं बनाया जाता ….जिसके कारण जैन समाज में इसकी स्वीकार्यता अचानक बढ़ गई,..
एक बार उन्होंने असम की एक दुकान से #असमी_गमोसा (गमछा) क्या खरीदा पूरे असम और बंगाल में वो एक फैशन सिंबल बन गया
सिर्फ कपड़े ही नहीं उन्होंने स्थानीय उत्पाद को भी बढ़ाया
कई बार #बांस का जिक्र किया… बांस के बने उत्पाद की बिक्री बढ़ गई
पहले तो बांस को पेड़ से घास की केटेगरी में डाला जिससे इसका व्यावसायिक उत्पादन ओर बिक्री सुलभ हो देखते देखते बांस से फर्नीचर ही नहीं इथेनॉल तक बनने लगा जिससे किसानों की आय में वृद्धि हुई
(ओर कुछ तो अघोषित बांस खरीद रहे है चमचों के लिए 😄)
#मिलेट्स का जिक्र किया तो आज पूरा देश ओर सोशल मीडिया में मिलेट्स खाने ओर बनाने की रील की न सिर्फ बाढ़ आई मिलेटस की बिक्री ओर उत्पादन बढ़ गया
अभी बिहार चुनाव से पहले #मखाना बोर्ड बनाया मखाना किसानों को मखाने की खेती और बिक्री में सहायता करवाई तो आज मखाने की बिकी ओर उत्पादन बढ़ गया
असम की #शोरूमलाई साड़ी का जिक्र किया इसके बाद देश को पता चला ओर पूरे देश से इसकी डिमांड आई खादी ग्रामोद्योग के पास
यहां तक कि उसे GI टैग भी दिलवाया
#कांजीवरम सिल्क की साड़ी का जिक्र किया तो मानो महिलाओं में फिर से साड़ी का क्रेज बढ़ गया इस सिल्क के प्रति ओर बिक्री तो बढ़ना स्वाभाविक थी ही
और अब बिहारी गमछे का उपयोग कर जिस गमछे को गरीब मजदूर का पटका समझा जाता था आज वो फैशन सिंबल बन गया
सुना है कल तक बिहार के कारीगरों को करीब 5 करोड़ से अधिक का ऑर्डर मिला है
ये मोदी का करिश्माई व्यक्तित्व है और मोदी के प्रति लोगों का विश्वास और समर्पण है कि मोदी के कहे का अनुशरण करने लगते है
जिसका असर पूरे देश में कोविड काल में देखा है
🚩 Manish Soni
હરિયાણાની કોંગ્રેસ સરકારે નિયમો, કાયદા અને બંધારણમાં સુધારો કરીને, ફરિદાબાદમાં 60 એકર કિંમતી જમીન માત્ર ₹100 માં એક ઠગ અને છેતરપિંડી કરનાર જવાદ અહેમદ સિદ્દીકીને આપી દીધી, જે મધ્યપ્રદેશમાં છેતરપિંડી કરીને ભાગી ગયો હતો.
એટલું જ નહીં, હરિયાણાની કોંગ્રેસ સરકારે લઘુમતી વિકાસ યોજના હેઠળ અહીં ઇસ્લામિક યુનિવર્સિટીના નિર્માણ માટે 60 કરોડ રૂપિયા પણ ફાળવ્યા હતા.
વિચાર કરો કે , કોંગ્રેસ પાર્ટી, જે અદાણીને જમીન આપવા નાતે કાળો કકળાટ કરતી , તે આતંકવાદી ઠેકાણા બનાવવા માટે ફક્ત એક કે બે એકર નહીં પરંતુ 60 એકર જમીન આપે છે.
આ અલ ફલાહ યુનિવર્સિટીની અંદર એક વિશાળ મસ્જિદ બનેલી છે અને આતંકવાદી મુઝમ્મિલ શકીલ તે મસ્જિદના ઇમામના ઘરમાં રહેતો હતો.
પોલીસે પૂછપરછ માટે મસ્જિદના ઇમામની અટકાયત કરી છે.
મુઝમ્મિલ શકીલનો પરિવાર કહી રહ્યો છે કે ઇમામે તેના ડૉક્ટર પુત્ર ને બ્રેન વોશ કરી તેને આતંકવાદી બનાવ્યો હશે.