पाकिस्तान निर्माण के दो मुस्लिम चेहरे जिनसे जुड़ा है हिंदुत्व का भी मजबूत इतिहास।
पहले मोहम्मद अली जिन्ना उर्फ महमदअली झीणाभाई “जिन्ना” को लेता हूं जो बाद में पाकिस्तान के कायदे आज़म कहलाए।
जिन्ना गुजरात के रहने वाले थे।
इनके परदादा प्रेमजीभाई मेघजी ठक्कर और दादा पूंजाभाई ठक्कर हिंदू थे।
इनके पिता झीणाभाई पूंजा ठक्कर तथा माता मीठीबाई ठक्कर थी।
जिन्ना के पिता ने इस्लाम धर्म अपना लिया था क्योंकि वो लोहाणा जाति से थे और मछली का व्यापार करते थे।
ये जाति शाकाहारी थी इसलिए समाज ने झीनाभाई को बहिष्कृत कर दिया था जिसके कारण इन्होंने गुजरात का काठियावाड़ छोड़ना पड़ा और धर्म परिवर्तन कर सिंध प्रान्त में आ गए थे।
यहीं उन्होंने बच्चों के नाम भी बदल डाले।
झीणाभाई अब मोहम्मद अली झीणा हो गए और इंग्लैंड जाकर थोड़ा मॉडर्न दिखने के लिए जिन्ना कर दिया।
वहां से आने के बाद वकालत और राजनीति शुरू होती है।
फिर मुस्लिम लीग और द्विराष्ट्र की बातें तथा पाकिस्तान का संकल्प बनता है।
कैसे एक सामाजिक बहिष्कार से हुई यह शुरुआत देश के विभाजन का भी कारण बन गई यहां यह पहलू समझना आवश्यक है।
दूसरा चेहरा हैं पाकिस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री लियाकत अली खान।
इनकी पत्नी कुमाऊं (वर्तमान उत्तराखंड) से थी जिनका नाम शीला पंत था।
इनका परिवार लंबी धोती वाले ब्राह्मण कहे जाते हैं।
शीला पंत के दादा ब्रिटिश आर्मी में थे।
कहा जाता है कि बड़े पद की लालसा के लिए उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया था और फिर उन्हें मेजर जनरल का पद मिला भी था।
ईसाई धर्म अपनाने के चलते इन्हें भी वहां के ब्राह्मण समाज ने बहिष्कृत कर दिया था।
शीला पंत के पिता डेनियल पंत उत्तरप्रदेश सचिवालय में थे और शीला का नाम भी अब आईरीन पंत हो गया था।
वह अर्थशास्त्र और अध्यात्म की पढ़ाई कर बिशप कॉलेज में अध्यापिका हुई।
राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय होने के समय लियाकत अली से आकर्षित हुई जबकि वह पहले से ही शादीशुदा थे।
आईरीन पंत ने अब इस्लाम अपनाया और लियाकत अली खान से शादी करके राणा लियाकत अली कहलाई।
जिन्ना और मुस्लिम लीग के पाकिस्तान मूवमेंट में इन्होंने बढ़चढकर हिस्सा लिया था और बंटवारे के बाद अपने दो बेटों सहित पाकिस्तान चली गई थी। लियाकत अली पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री बने और राणा लियाकत पहली महिला मंत्री।
पाकिस्तान बनने चार वर्ष पश्चात इनके पति और प्रथम प्रधानमंत्री लियाकत अली की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
तब अनुमान लगाए जा रहे थे कि यह भागकर वापस भारत आ जाएगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इन्हें वहां तीन तलाक भी बंद करवाने सहित असंख्य कार्यों का श्रेय है।
इन्हें बाद में इटली और हॉलैंड की राजदूत भी बनाया गया था और “मादर–ए–वतन” की उपाधि भी हासिल है। हालांकि वह बाद में कुल तीन बार भारत भी आई थी लेकिन कुमाऊं कभी नहीं गई और 1990 में हृदय गति रुकने से मृत्यु हुई।
कुल मिलाकर यदि गौर करें भारत के सामाजिक ढांचे की गड़बड़ी से स्थिति कहां से कहां गई है अन्यथा शायद बातें कुछ और हो सकती थी। इतिहास की बहुत पुरानी बातों में भले ही हम अपना कोई पक्ष चुन लें लेकिन यह जग जाहिर घटनाएं हैं जिनमें असंख्य उदाहरण और भी बाकी हैं।
किसी भी धर्म, समाज और विचार का दायरा यदि संकीर्ण होगा तो उसमें भेद प्रकट होते ही रहेंगे।
इस ओर समझने की भी आवश्यकता भी है…..✍️
