Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

बिल्कुल। यहाँ वह पूरी और अद्भुत कहानी है जिसकी झलक आपने देखी:

यह कहानी है एडिथ (एवा) और लीया ग्रॉस नाम की एक हंगेरियन माँ और उसकी पाँच साल की बेटी की, और उन्हें बचाने वाले अमेरिकी सैनिकों की।

पृष्ठभूमि: अँधेरा छा रहा था

एडिथ और उसकी छोटी बेटी लीया हंगरी के एक यहूदी परिवार से ताल्लुक रखती थीं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, जब नाज़ी जर्मनी ने हंगरी पर कब्ज़ा किया, तो उन्हें भी हज़ारों अन्य यहूदियों के साथ घर से निकालकर ऑशविट्ज़-बिरकेनौ एकाग्र शिविर (Concentration Camp) भेज दिया गया। किसी तरह, वे दोनों ऑशविट्ज़ में हुई भीषण तबाही से बच गईं। हालाँकि, उनका संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ था।

वह भयानक ट्रेन यात्रा

अप्रैल 1945 में, जब मित्र देशों की सेनाएँ तेज़ी से आगे बढ़ रही थीं, नाज़ियों ने ऑशविट्ज़ और अन्य शिविरों के कैदियों को खदेड़कर (“डेथ मार्च”) दूसरे शिविरों में ले जाना शुरू कर दिया, ताकि उन्हें मुक्ति सेना के हाथ न लगने दिया जाए। एडिथ और लीया को भी एक बंद मालगाड़ी में ठूसकर एक अन्य शिविर की तरफ ले जाया जा रहा था। इस ट्रेन में लगभग 2500 कैदी थे।

यह यात्रा नरक से कम नहीं थी:

· कई दिनों तक वे उस दम घोंटू, बदबूदार और ठंडे डिब्बे में फँसी रहीं।
· न खाना था, न पानी, न शौचालय की कोई व्यवस्था।
· लोग भूख-प्यास, बीमारी और हताशा से मर रहे थे।
· एडिथ ने लीया को जिंदा रखने के लिए अपनी राशि का अधिकांश हिस्सा उसे दिया। वे दोनों डर, भूख और थकान से एक-दूसरे से चिपकी हुई थीं। हर पल यही लगता था कि शायद अब वे ज़िंदा नहीं बचेंगी।

मुक्ति का वह चमत्कारिक दिन

13 अप्रैल, 1945 का दिन था। जर्मनी के फ़ारलाउ (Farsleben) गाँव के पास वह ट्रेन रुक गई। नाज़ी गार्ड्स डरकर भाग गए। तभी, अमेरिकी सेना की 30वीं इन्फैंट्री डिवीजन की एक टोली, जिसे “ओल्ड हिकोरी” (Old Hickory) के नाम से जाना जाता था, वहाँ पहुँची। ये सैनिक आगे बढ़ रहे थे और उन्हें अचानक ही यह ट्रेन मिल गई।

जब उन्होंने ट्रेन के भारी दरवाजे खोले, तो एक दर्दनाक और हृदयविदारक दृश्य उनके सामने था। डिब्बों से मौत और बीमारी की बदबू आ रही थी। कंकाल सदृश्य लोग, जो अंधेरे में कई दिनों से जी रहे थे, अचानक रोशनी से चौंधिया गए। उनकी आँखों में डर और उम्मीद की एक झलक थी।

सैनिक हैरान और द्रवित हो गए। वे पानी, खाना और मदद लेकर आए। उन्होंने धीरे-धीरे कैदियों को बाहर निकालना शुरू किया। लीया इतनी कमज़ोर हो चुकी थी कि खड़े भी नहीं हो सकती थी। तभी एक अमेरिकी सैनिक, सार्जेंट कैरल वॉ (Sgt. Carrol Walsh), आगे बढ़े और उन्होंने नाज़ुक सी लीया को अपनी मजबूत बाँहों में उठा लिया। यह एक छोटा सा, लेकिन बहुत बड़ा मानवीय कार्य था। एडिथ डगमगाती हुई बाहर आई, उसकी आँखों में आँसू थे और होंठों पर ऐसी कृतज्ञता थी जो बिना किसी भाषा के भी समझी जा सकती थी।

गाँव बना स्वर्ग

अगले कुछ दिनों में, पास का गाँव फ़ारलाउ ही एक विशाल अस्थायी अस्पताल बन गया। अमेरिकी सैनिकों ने स्थानीय जर्मन नागरिकों की मदद से (कुछ ने मदद करने से इनकार भी किया, लेकिन कुछ ने की) बीमारों की देखभाल की, भूखों को खाना खिलाया और उन लोगों को इंसानियत और उम्मीद लौटाई, जिनकी ज़िंदगी क्रूरता की अँधेरी कैद में खो गई थी। उस दिन कैदियों को सिर्फ़ आज़ादी ही नहीं, बल्कि एक शांत चमत्कार मिला था।

मिलन की अद्भुत कहानी

यहाँ कहानी खत्म नहीं होती। दशकों बाद, लीया (अब लीया वेबर) ने अपने जीवन का उद्देश्य उन सैनिकों को ढूँढना और धन्यवाद देना बना लिया, जिन्होंने उसे और उसकी माँ को बचाया था।

उसने लंबी खोजबीन की और आखिरकार सार्जेंट कैरल वॉ और उस दिन मौजूद दूसरे सैनिक, लो टैनर (Lt. Frank W. Towers) को ढूँढ निकाला। 2000 के दशक में उनकी मुलाकात हुई। यह मिलन अविश्वसनीय रूप से भावुक कर देने वाला था। लीया ने कैरल वॉ से कहा, “आपने मुझे अपनी बाहों में उठाया था। आप मेरे हीरो हैं।” इस मित्रता ने दोनों परिवारों को जीवनभर के लिए जोड़ दिया।

निष्कर्ष

यह कहानी साबित करती है कि:

· वीरता हमेशा युद्ध जीतने में नहीं, बल्कि दया दिखाने में होती है।
· मानवता सबसे बड़ा धर्म है।
· एक छोटी सी दया की घटना किसी के जीवन पर ऐसी अमिट छाप छोड़ सकती है, जो पीढ़ियों तक याद रखी जाए।

एडिथ और लीया ग्रॉस, और उन्हें बचाने वाले सैनिकों की यह कहानी इतिहास के सबसे अंधेरे दौर में उम्मीद और मानवता की जीत का एक चमकदार उदाहरण बन गई है।

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वैदेही और इस्लाम

#23 फरवरी 1981 का दिन था वह, जब तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम में डाँ० नसरुद्दीन कमाल अपने साथियों के साथ एक दलित परिवार को बंधक बनाए हुए थे। घर के सभी लोगों ने इस्लाम कबूल लिया था, घर के लोग ही क्यों लगभग एक हजार दलित धर्मांतरण करके जबरन मुस्लिम बनाए चुके थे। इसलिए मीनाक्षीपुरम का नाम बदलकर रहमतनगर रख दिया गया था।

यह दलित गिने के घर की कहानी है। उसकी 8 वर्ष की पोत्री थी वैदेही…वह किसी भी कीमत पर मुस्लिम बनने को तैयार नहीं हुई,

‘‘मै मर जाऊंगी लेकिन कलमा नहीं पढ़ूंगी,’’ उसने अपने दादा से कहा था, ‘‘बाबा आपने ही तो मुझे गायत्री मंत्र सिखाया था ना…आपने ही तो बताया था कि यह परमेश्वर की वाणी वेदों का सबसे सुंदर मंत्र है, इससे सब मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं, फिर मैं उन लोगों का कलमा कैसे पढ़ सकती हूं, जिन्होंने मेरे सहपाठियों का कत्ल कर दिया, क्योंकि वे भी मुस्लिम नहीं बनना चाहते थे।हम ऐसे मजहब को कैसे अपना सकते हैं?, जिसे न अपनाने पर कत्ल का भय हो, मुझे तो गायत्री मंत्र प्रिय है जो मुझे निर्भय बनाता है।’’

”बेटी जीवन रहेगा तो ही धर्म रहेगा ना…जिद छोड दे और कबूल कर ले इस्लाम।” बाबा ने अंतिम प्रयास किया था।

उसने बाबा से सवाल किया था, ”बाबा आपने एक दिन बताया था कि गुरु गोबिंद सिंह के दो बच्चे दीवार में जिंदा चिनवा दिए थे, लेकिन उन्होंने इस्लाम नहीं कबूला था, क्या मैं उन सिख भाइयो की छोटी बहन नहीं? जब वे धर्म से नहीं डिगे तो मैं कैसे डिग सकती हूं?”

‘‘दो टके की लड़की, कलमा पढ़ने से इंकार करती है,’ डाँ० नसरूद्दीन कमाल के साथ खड़े मौलाना नुरूद्दीन खान ने उसके बाल पकड़ते हुए चूल्हे पर गर्म हो रहे पानी के टब में उसका मुंह डूबा दिया था। पानी भभक रहा था, इतना गर्म था कि बनती भाप धुंए के समान नजर आ रही थी। बालिका के चेहरे की चमड़ी निकल गई थी एक बार ही डुबोते, चीख पड़ी थी, ‘‘भगवान मुझे बचा लो?’’

‘‘तेरा पत्थर का भगवान तुझे बचाने नहीं आएगा, अब तो इस्लाम कबूल ले लड़की, नहीं तो इस बार तुझे इस खोलते पानी में डुबा दिया जाएगा।’’ मौलवी ने कहा था, फिर उसके दादा ने भी कहा, ‘‘कबूल कर ले बेटी इस्लाम, हम भी सब मुसलमान बन चुके, तू जिंदा रहेगी तो तेरे सहारे मेरा भी बुढ़ापा भी कट जाएगा।’’

मौलवी ने चूल्हे के पास से मिर्च पाउडर उठाकर उसकी आंखों में भरते हुए और चेहरे पर मलते हुए कहा, ‘‘दूध के दांत टूटे नहीं, और इस्लाम नहीं कबूलेगी।’’

एक बार फिर तड़प उठी थी वह मासूम, पर इस बार भी यही कह रही थी, ‘‘नहीं मैं इस्लाम नहीं कबूल करूंगी।’’
मौलवी को भी क्रोध आ गया था, इस बार तो उसका सिर जलते हुए चूल्हें में ही दे डाला था। परंतु प्राण त्यागते हुए भी उस बालिका के मुख से यही निकल रहा था, ‘‘मैं इस्लाम नहीं कबूल करूंगी।’’

अंतिम बार डाॅक्टर नसरूद्दीन कमाल की ओर आशा भरी दृष्टि से देखा था, ‘‘मेरा धर्म बचा लो…डाॅक्टर साहब…पत्थर के भगवान नहीं आएंगे, आज से मैंने तुझे भगवान मान लिया…’’

अब उसमें कुछ नहीं रहा था, वह तो मिट्टी बन चुकी थी, डाँ० नसरूद्दीन कमाल भी तो धर्मांतरण करने वाले लोगों की मंडली में ही शामिल था, लेकिन उस बालिका ने पता नहीं उसमें क्या देखा कि विधर्मी से ही धर्म बचाने की गुहार लगा बैठी थी, उस असहाय बालिका का धर्म के प्रति दृढ़ निश्चय देखकर हृदय चीत्कार कर उठा था नसरूद्दीन कमाल का, ‘‘या अल्लाह ऐसे इस्लाम के ठेकेदारों से तो मर जाना अच्छा है।’’ वह घर की ओर भाग लिया था और डाँ० नसरूद्दीन कमाल पूरे दस दिन अपने घर से नहीं निकला, कुछ खाया पीया नहीं, बस उस बालिका का ध्यान बराबर करता और आंखों में आंसू भर आते उसके…गायत्री मंत्र का अर्थ जानने के लिए उसने एक किताब खरीदी, गलती से वह नूरे हकीकत यानी सत्यार्थ प्रकाश थी। उसने उसका गहराई से अध्ययन किया और 11 नवंबर 1981 को एक जनसमूह के सामने विश्व हिन्दू परिषद और आर्य समाज के तत्वावधान में अपने पूरे परिवार के साथ वैदिक धर्म अंगीकार कर लिया।

*डाँ० नसरूद्दीन ने अब अपना नाम रखा था आचार्य मित्रजीवन, पत्नी का नाम बेगम नुसरत जहां से श्रीमती श्रद्धादेवी और तीन पुत्रियों शमीम, शबनम और शीरीन का नाम क्रमशः आम्रपाली, अर्चना और अपराजिता रखा गया।

#*15 नवंबर 1981 को आर्य समाज सांताक्रुज, मुंबई में उनका जोरदार स्वागत हुआ, जहां उन्होंने केवल एक ही बात कही, ‘‘मैं वैदेही को तो वापस नहीं ला सकता, लेकिन हिन्दू समाज से मेरी विनती है, मेरी बेटियों को वह अपनाए, वे हिन्दू परिवारों की बहू बनेंगी तो समझूंगा कि उस पाप का प्रायश्चित कर लिया, जो मेरी आंखों के सामने हुआ। हालांकि वह मैंने नहीं किया, लेकिन मैं भी दोषी था, क्योंकि मेरी आंखों के सामने एक मासूम बालिका की निर्मम हत्या कर दी गई।’’

आचार्य मित्रजीवन ने अपना शेष जीवन वेदों के प्रचार-प्रसार में लगा दिया, इसलिए उन्हें आज बहुत से लोग जानते हैं, उनकी पुस्तकें पढ़ते हैं, लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि वे जन्म से मुस्लिम थे और यह तो कोई जानता ही नहीं कि वैदेही कौन थी?

*साभार ……
वेद वृक्ष की छाया तले, पुस्तक का एक अंश
lलेखिका फरहाना ताज
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स्रोत : वैदेही के संदर्भ के लिए देखें 24 फरवरी 1981 इंडियन एक्सप्रेस
वैदिक गर्जना, मासिक पत्रिका 1982

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पाकिस्तान निर्माण के दो मुस्लिम चेहरे जिनसे जुड़ा है हिंदुत्व का भी मजबूत इतिहास।
पहले मोहम्मद अली जिन्ना उर्फ महमदअली झीणाभाई “जिन्ना” को लेता हूं जो बाद में पाकिस्तान के कायदे आज़म कहलाए।
जिन्ना गुजरात के रहने वाले थे।
इनके परदादा प्रेमजीभाई मेघजी ठक्कर और दादा पूंजाभाई ठक्कर हिंदू थे।
इनके पिता झीणाभाई पूंजा ठक्कर तथा माता मीठीबाई ठक्कर थी।

जिन्ना के पिता ने इस्लाम धर्म अपना लिया था क्योंकि वो लोहाणा जाति से थे और मछली का व्यापार करते थे।
ये जाति शाकाहारी थी इसलिए समाज ने झीनाभाई को बहिष्कृत कर दिया था जिसके कारण इन्होंने गुजरात का काठियावाड़ छोड़ना पड़ा और धर्म परिवर्तन कर सिंध प्रान्त में आ गए थे।
यहीं उन्होंने बच्चों के नाम भी बदल डाले।

झीणाभाई अब मोहम्मद अली झीणा हो गए और इंग्लैंड जाकर थोड़ा मॉडर्न दिखने के लिए जिन्ना कर दिया।
वहां से आने के बाद वकालत और राजनीति शुरू होती है।
फिर मुस्लिम लीग और द्विराष्ट्र की बातें तथा पाकिस्तान का संकल्प बनता है।
कैसे एक सामाजिक बहिष्कार से हुई यह शुरुआत देश के विभाजन का भी कारण बन गई यहां यह पहलू समझना आवश्यक है।

दूसरा चेहरा हैं पाकिस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री लियाकत अली खान।
इनकी पत्नी कुमाऊं (वर्तमान उत्तराखंड) से थी जिनका नाम शीला पंत था।
इनका परिवार लंबी धोती वाले ब्राह्मण कहे जाते हैं।
शीला पंत के दादा ब्रिटिश आर्मी में थे।
कहा जाता है कि बड़े पद की लालसा के लिए उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया था और फिर उन्हें मेजर जनरल का पद मिला भी था।

ईसाई धर्म अपनाने के चलते इन्हें भी वहां के ब्राह्मण समाज ने बहिष्कृत कर दिया था।
शीला पंत के पिता डेनियल पंत उत्तरप्रदेश सचिवालय में थे और शीला का नाम भी अब आईरीन पंत हो गया था।
वह अर्थशास्त्र और अध्यात्म की पढ़ाई कर बिशप कॉलेज में अध्यापिका हुई।
राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय होने के समय लियाकत अली से आकर्षित हुई जबकि वह पहले से ही शादीशुदा थे।

आईरीन पंत ने अब इस्लाम अपनाया और लियाकत अली खान से शादी करके राणा लियाकत अली कहलाई।
जिन्ना और मुस्लिम लीग के पाकिस्तान मूवमेंट में इन्होंने बढ़चढकर हिस्सा लिया था और बंटवारे के बाद अपने दो बेटों सहित पाकिस्तान चली गई थी। लियाकत अली पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री बने और राणा लियाकत पहली महिला मंत्री।

पाकिस्तान बनने चार वर्ष पश्चात इनके पति और प्रथम प्रधानमंत्री लियाकत अली की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
तब अनुमान लगाए जा रहे थे कि यह भागकर वापस भारत आ जाएगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इन्हें वहां तीन तलाक भी बंद करवाने सहित असंख्य कार्यों का श्रेय है।
इन्हें बाद में इटली और हॉलैंड की राजदूत भी बनाया गया था और “मादर–ए–वतन” की उपाधि भी हासिल है। हालांकि वह बाद में कुल तीन बार भारत भी आई थी लेकिन कुमाऊं कभी नहीं गई और 1990 में हृदय गति रुकने से मृत्यु हुई।

कुल मिलाकर यदि गौर करें भारत के सामाजिक ढांचे की गड़बड़ी से स्थिति कहां से कहां गई है अन्यथा शायद बातें कुछ और हो सकती थी। इतिहास की बहुत पुरानी बातों में भले ही हम अपना कोई पक्ष चुन लें लेकिन यह जग जाहिर घटनाएं हैं जिनमें असंख्य उदाहरण और भी बाकी हैं।
किसी भी धर्म, समाज और विचार का दायरा यदि संकीर्ण होगा तो उसमें भेद प्रकट होते ही रहेंगे।
इस ओर समझने की भी आवश्यकता भी है…..✍️

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उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक ऐसा मामला सामने आया है, जो ‘सांप्रदायिक सौहार्द्र’ पूरे सिद्धांत को ही ध्वस्त करके रख देती है। जिस जगह पर कभी हिंदुओं ने मुस्लिमों को तजिया रखने की अनुमति दी, उसे मुस्लिम समाज अपना बताने लगा है। इतना ही नहीं, उस जमीन पर दिवार भी खड़ी कर दी गई है।

जिस जमीन को लेकर मुस्लिम समुदाय बवाल कर रहा है, वह हिंदुओं की है। जाँच में पता चला है कि आज से 36 साल पहले भारी बारिश के कारण मुस्लिमों को तजिया रखने की जगह नहीं मिली तो हिंदुओं ने यहाँ तजिया रखने की इजाजत दी थी।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक, स्थान देने के बाद बाद से इसी जगह पर तजिया का आयोजन किया जाने लगा। अब बशीरगंज स्थित इस जमीन पर मुस्लिम पक्ष अपना दावा जताने लगा है और इसका नाम भी इमाम चौकी कर दिया है। जबकि यहाँ इमाम चौकी का कोई वजूद नहीं है।

पुलिस की जाँच में सामने आया है कि पहले ताजिया बशीरगंज पाकड़ के पेड़ के नीचे रखे जाते थे। 36 साल पहले वर्षा की वजह से वह स्थान पानी में डूब गया, तब स्वामी श्री शिव नारायण जी संत समाज गुरुद्वारा सेवा समिति ने अपने परिसर में ताजिया रखने की इजाजत दी थी।

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इतनी करारी हार के बावज़ूद यह बत्तमीज़ महिला नहीं सुधरी है।

रुबिका लियाकत ने जब रोहिणी आचार्य पर सवाल पूछा, तब ये तुरन्त जसोदाबेन पर चली गयी।

अरे मूर्ख जसोदाबेन का जब विवाह हुआ था तब वह मात्र छठी पास थीं, उन्हें किसी ने छोड़ा नहीं है।

और जब मोदी जी जो विवाह के बन्धन में नहीं बँधना चाहते थे। क्योंकि पहले बहुत कम उम्र में ज़बरदस्ती विवाह हो जाता था, और मोदी जी का भी जब विवाह हुआ था तो उस समय उनकी अवस्था मात्र 15 वर्ष थी।

मोदी जी के परिवार वालों की प्रेरणा से ही उन्होंने अपनी पढ़ायी की और M. A. M.Ed किया और गवर्नमेन्ट इन्टर कॉलेज में टीचर से प्रिंसिपल तक गयीं। और शान से अपनी नौकरी करके रिटायर हुयीं। उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि उन्हें किसी से शिकायत है या उन्हें पीड़ा है।

लेकिन यह बत्तमीज़ महिला किस तरह की बात पर यह सीधे कहाँ ले जा रही है..?

और किस तरह की बत्तमीज़ी कर रही है।

और मैं चाहती हूँ कि तेजस्वी यादव इसे प्रवक्ता बना कर रखें क्योंकि तेजस्वी यादव का विनाश सर्वनाश यही महिला करेगी।

वैसे एक बार इसने कहा था कि यह बौद्ध सम्प्रदाय को मानती है तो फिर यह गौतम बुद्ध के बारे में क्या सोचती होगी..?

गौतम बुद्ध भी अपनी पत्नी यशोधरा और इकलौते बेटे जिसकी उम्र मात्र 2 वर्ष थी राहुल उसे छोड़कर घर से चले गये थे और तो क्या यह महिला कभी इस पर भी बात करेगी..?

और फिर यह मुलायम सिंह यादव के बारे में क्या सोचती होगी। जिन्होंने अपनी पहली पत्नी के ज़िन्दा रहते हुये, किन परिस्थितियों में एक महिला मालती गुप्ता से विवाह करना पड़ा। साधना गुप्ता का तलाक करवाया गया, और विवाह के कितने दिनों के बाद प्रतीक पैदा हुआ यह सब बातें हैं। मैं लिखना नहीं चाहती हूँ यह सब बातें निज़ी होतीं लेकिन अगर यह प्रवक्ता इस तरह की हरकत करेगी तो सारे खानदान के कुकर्म सामने आयेंगे…!
👺👺👺☠️☠️☠️👹👹👹🫤🫤🫤

                            बत्तमीज़ 👹👹

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यह पानीपत में अंतिम हिन्दू सम्राट हेमाचन्द्र विकमादित्य (हेमू) की समाधि है। हाल ही में इसे अवैध रूप से दरगाह बना दिया गया है।
क्यों?
क्या हेमू एक उचित स्मारक के लायक नहीं है? खुल्दाबाद में औरंगजेब की कब्र पर करोड़ो खर्च करने वाली सरकार चुपचाप हेमू की समाधि पर ये अवैध अतिक्रमण देख रही है।
हेमू दिल्ली के सिंहासन पर चढ़ने वाले अंतिम हिंदू राजा थे और भारत के इतिहास में सबसे महान सैन्य जनरलों में से एक थे। उनका जन्म एक विनम्र किराना बेचने वाले वैश्य परिवार में हुआ था। अपनी बुद्धिमत्ता और कड़ी मेहनत से वह रैंक के माध्यम से एक वजीर बन गया।
वह 22 लड़ाइयों में लगातार जीत हासिल करके भारतीय इतिहास के सर्वश्रेष्ठ सैन्य जनरलों में से एक साबित हुए।
उनकी सबसे प्रसिद्ध जीत आगरा और दिल्ली में अकबर की मुगल सेनाओं के खिलाफ रही है। हेमू ने आगरा और दिल्ली के मुगल राज्यपालों को हराया। उन्होंने खुद को सम्राट घोषित कर दिया, “विक्रमादित्य” की उपाधि ग्रहण की और अपने ही नाम पर सिक्कों की बुनाई शुरू कर दी।
हेमू ने मुग़ल आक्रमणकारियों को भारत से स्थायी रूप से बाहर फेंकना चाहा था। दिल्ली में अपनी जीत के बाद, वह पंजाब की ओर बढ़ गया जो अभी तक अकबर के पास था। दोनों सेनाएं 5 नवंबर 1556 को पानीपत में मिली। हेमू ने मुगल सेना को हरा दिया और लगभग युद्ध जीत लिया जब उसकी आंख में गलती से तीर लग गया और बेहोश हो गया। उसकी सेना भाग गई और लड़ाई हार गई।
मुगलों ने तब “काफिर” दुश्मनों के जिस्म से खोपड़ी का पिरामिड बनाया। समाधि वह स्थान थी जहाँ पानीपत की दूसरी लड़ाई में मुगल बादशाह अकबर ने हेमू का सिर काटा था “जिहाद का इनाम पाने और गाजी की उपाधि प्राप्त करने के लिए” (काफिरों के हत्यारे) 10 एकड़ के इस पूरे हेमू समाधी स्थल को तत्कालीन सीएम ओम प्रकाश चौटाला ने 1990 में ‘वक्फ बोर्ड ऑफ हरियाणा’ में स्थानांतरित कर दिया था, जिसके अध्यक्ष, हरियाणा के मेवात क्षेत्र के एक मुस्लिम विधायक ने कुछ लोगों से पैसे वसूलने वाले अतिक्रमण की अनुमति दी थी और पक्का निर्माण की अनुमति दी थी।
स्रोत: आरसी मजूमदार का “मुग़ल एम्पायर” खंड 12, पृष्ठ 96-99

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શું ટીપુ સુલતાન ન્યાયપ્રિય શાસક હતો?
૨૦ નવેમ્બરના રોજ ટીપુ સુલતાનનો જન્મદિવસ ભારતમાં એક વિશેષ વર્ગ દ્વારા મનાવવામાં આવશે. આ વામપંથી  વર્ગ ટીપુને મહાન દેશભક્તથી લઈને મંદિરોને દાન આપનાર ન્યાયપ્રિય શાસક તરીકે રજૂ કરે છે. આ લેખ દ્વારા એ સિદ્ધ કરવામાં આવશે કે ટીપુ સુલતાન મતાંધ અને અત્યાચારી શાસક હતો. આ લેખનો મૂળ ઉદ્દેશ્ય કોઈ પણ મુસ્લિમ શાસક પ્રત્યે દ્વેષભાવના પ્રદર્શિત કરવાનો નથી, પરંતુ જેવો છે તેવો જ રજૂ કરવાનો છે. આશા છે કે આ લેખ વાંચીને હિન્દુ યુવકોને ભ્રમિત કરવાની જે કવાયત ચાલી રહી છે તે નિરર્થક અને નિષ્ફળ સાબિત થશે.
ટીપુ સુલતાન વિશે નીચેની ભ્રાંતિઓ પ્રચારિત કરવામાં આવી રહી છે:
૧. ટીપુ સુલતાનના રાજ્યમાં હિન્દુઓને સરકારી નોકરીઓમાં ભરપૂર તકો મળતી હતી. ઉદાહરણ તરીકે, ટીપુના વડાપ્રધાનનું નામ પૂર્ણીયા હતું અને તે એક બ્રાહ્મણ હતો.
૨. ટીપુ સુલતાન અનેક મંદિરોને વાર્ષિક અનુદાન આપતો હતો.
૩. ટીપુ સુલતાનના શૃંગેરી મઠના જગદ્ગુરુ શંકરાચાર્ય સાથે ગાઢ મૈત્રી સંબંધો હતા. બંને વચ્ચે પત્રવ્યવહાર પણ જોવા મળે છે.
૪. ટીપુ સુલતાન દરરોજ નાસ્તો કરતા પહેલા શ્રીરંગપટ્ટનમના કિલ્લામાં આવેલા રંગનાથજીના મંદિરે જતા હતા.
૫. ટીપુ સુલતાને ક્યારેય હિન્દુઓને પીડિત કર્યા નથી કે તેમના પર અત્યાચાર કર્યા નથી.
૬. ટીપુ સુલતાન દેશભક્ત હતો. તેણે પોતાના રાજ્યની રક્ષા માટે પોતાના પ્રાણ આપીને વીરગતિ પ્રાપ્ત કરી હતી.
ભ્રાંતિઓનું સપ્રમાણ નિરાકરણ
ભ્રાંતિ નં. ૧: ટીપુ સુલતાનના રાજ્યમાં હિન્દુઓને સરકારી નોકરીઓમાં ભરપૂર તકો મળતી હતી. ઉદાહરણ તરીકે, ટીપુના વડાપ્રધાનનું નામ પૂર્ણીયા હતું અને તે એક બ્રાહ્મણ હતો.
નિરાકરણ: ટીપુ સુલતાનની નોકરીઓમાં મુસલમાનોને પ્રાથમિકતા આપવામાં આવતી હતી. અયોગ્ય હોવા છતાં પણ મુસલમાન હોવાને કારણે મોટામાં મોટી નોકરી પર એક મુસલમાનને બેસાડવામાં આવતો હતો. આનાથી પ્રજાની દશા વધુ શોચનીય બની ગઈ. ટીપુ સુલતાનના મંત્રીઓમાં ફક્ત પૂર્ણીયા એકમાત્ર હિન્દુ હતો. મુસલમાનોને ગૃહ કર, સંપત્તિ કરમાંથી મુક્તિ હતી. જે હિન્દુ મુસલમાન બની જતો હતો, તેને પણ આ છૂટ મળતી હતી. ટીપુ સુલતાનના મૃત્યુ પછી અંગ્રેજો દ્વારા નિયુક્ત કરાયેલા મૈસૂરના ભૂ-રાજસ્વ વિભાગના અધિકારી મેકલૉઇડ પણ લખે છે કે ટીપુ સુલતાનના રાજ્યમાં બધા અધિકારીઓના ફક્ત મુસ્લિમ નામ છે જેમ કે શેખ અલી, શેર ખાન, મુહમ્મદ સૈયદ, મીર હુસૈન, સૈયદ પીર વગેરે.
ભ્રાંતિ નં. ૨: ટીપુ સુલતાન અનેક મંદિરોને વાર્ષિક અનુદાન આપતો હતો.
નિરાકરણ: વિલિયમ લોગન અને લેવિસ રાઇસ અનુસાર, ટીપુ સુલતાનના આખા રાજ્યમાં તેના મૃત્યુ સમયે ફક્ત બે મંદિરોમાં દૈનિક પૂજા થતી હતી. તેમના મતે, ટીપુ સુલતાને દક્ષિણ ભારતમાં ૮૦૦ મંદિરોનો વિનાશ કર્યો હતો. અનેક લેખકોએ પોતાના લેખો દ્વારા ટીપુ સુલતાન દ્વારા તોડી પાડવામાં આવેલા મંદિરો પર વિચાર વ્યક્ત કર્યા છે.
ટીપુ દ્વારા મંદિરોનો વિધ્વંસ
ધી મૈસૂર ગેઝેટિયર જણાવે છે કે “ટીપુએ દક્ષિણ ભારતમાં આઠસોથી વધુ મંદિરો નષ્ટ કર્યા હતા.”
કે.પી. પદ્મનાભ મેનન અને શ્રીધરન મેનન દ્વારા લિખિત પુસ્તકોમાં તે ભગ્ન, નષ્ટ કરાયેલા મંદિરોમાંના કેટલાકનું વર્ણન કરે છે-
“ચિંગમ મહિના ૯૫૨ મલયાલમ એરા તદનુસાર ઓગસ્ટ ૧૭૮૬ માં ટીપુની ફોજે પ્રસિદ્ધ પેરુમનમ મંદિરની મૂર્તિઓનો ધ્વંસ કર્યો અને ત્રિચૂર અને કરવન્નૂર નદીની વચ્ચેના બધા મંદિરોનો ધ્વંસ કરી દીધો. ઇરિનજાલાકુડા અને થિરુવાંચીકુલમ મંદિરોને પણ ટીપુની સેના દ્વારા ખંડિત કરવામાં આવ્યા અને નષ્ટ કરવામાં આવ્યા.” અન્ય પ્રસિદ્ધ મંદિરોમાંથી કેટલાક, જેમને લૂંટવામાં આવ્યા, અને નષ્ટ કરવામાં આવ્યા, તે હતા – ત્રિપ્રંગોટ, થ્રિચૈમ્બરમ, થિરુમવાયા, થિરવનનૂર, કાલીકટ થાલી, હેમંબિકા મંદિર પાલઘાટનું જૈન મંદિર, મામ્મિયૂર, પરંબાતાલી, પેમ્માયાન્દુ, થિરવનજીકુલમ, ત્રિચૂરનું બડક્કુમન્નાથન મંદિર, બેલૂર શિવા મંદિર વગેરે.
“ટીપુની વ્યક્તિગત ડાયરી અનુસાર ચિરાકુલ રાજાએ ટીપુ સેના દ્વારા સ્થાનિક મંદિરોને વિનાશથી બચાવવા માટે, ટીપુ સુલતાનને ચાર લાખ રૂપિયાનું સોનું-ચાંદી આપવાનો પ્રસ્તાવ મૂક્યો હતો. પરંતુ ટીપુએ ઉત્તર આપ્યો હતો, “જો આખી દુનિયા પણ મને આપી દેવામાં આવે તો પણ હું હિન્દુ મંદિરોને ધ્વંસ કરવાથી રોકાઈશ નહીં.”
“સૌ ચૂહે ખાકર બિલ્લી હજ કો ચલી”ની કહેવત તમે સાંભળી હશે. ટીપુ સુલતાન પર સચોટ રીતે લાગુ પડે છે.
ભ્રાંતિ નં. ૩: ટીપુ સુલતાનના શૃંગેરી મઠના જગદ્ગુરુ શંકરાચાર્ય સાથે ગાઢ મૈત્રી સંબંધો હતા. બંને વચ્ચે પત્રવ્યવહાર પણ જોવા મળે છે.
નિરાકરણ: જ્યાં સુધી શૃંગેરી મઠ સાથે સંબંધ છે, ડૉ. એમ. ગંગાધરન લખે છે કે ટીપુ સુલતાન ભૂત-પ્રેત વગેરેમાં વિશ્વાસ રાખતો હતો. તેણે શૃંગેરી મઠના આચાર્યોને ધાર્મિક અનુષ્ઠાન કરવા માટે દાન મોકલ્યું જેથી તેની સેના પર ભૂત-પ્રેત વગેરેનો કુપ્રભાવ ન પડે.
ભ્રાંતિ નં. ૪: ટીપુ સુલતાન દરરોજ નાસ્તો કરતા પહેલા રંગનાથજીના મંદિરે જતા હતા જે શ્રીરંગપટ્ટનમના કિલ્લામાં હતું.
નિરાકરણ: પી.સી.ન રાજા લખે છે કે શ્રી રંગનાથ સ્વામી મંદિરના પુજારીઓ દ્વારા ટીપુ સુલતાન માટે એક ભવિષ્યવાણી કરવામાં આવી હતી. જેના અનુસાર જો ટીપુ સુલતાન મંદિરમાં એક વિશેષ ધાર્મિક અનુષ્ઠાન કરાવતો તો તેને દક્ષિણ ભારતનો સુલતાન બનવાથી કોઈ રોકી શકતું નહીં. અંગ્રેજો સામે એકવાર યુદ્ધમાં વિજય પ્રાપ્ત થવાનો શ્રેય ટીપુએ જ્યોતિષોની તે સલાહને આપ્યો હતો. જેના કારણે તેને યુદ્ધમાં વિજય પ્રાપ્ત થયો, આ જ કારણે ટીપુએ તે જ્યોતિષીઓને અને મંદિરને ઇનામ રૂપી સહયોગ આપીને સન્માનિત કર્યા હતા. શૃંગેરી મઠ અને શ્રી રંગનાથ સ્વામી મંદિરનું નામ લઈને ટીપુને ઉદારવાદી સિદ્ધ કરવું પોતાને છેતરવા સમાન છે.
ભ્રાંતિ ૫: ટીપુ સુલતાને ક્યારેય હિન્દુઓને પીડિત કર્યા નથી. ક્યારેય હિન્દુઓ પર અત્યાચાર કર્યા નથી.
નિરાકરણ: ટીપુ સુલતાનના પત્રો અને તલવાર પર અંકિત શબ્દો વાંચીને ટીપુ સુલતાનનો અસલી ચહેરો સામે આવે છે.
ટીપુના પત્રો
ટીપુ દ્વારા લખાયેલા કેટલાક પત્રો, સંદેશાઓ, અને સૂચનાઓના કેટલાક અંશ નીચે મુજબ છે. વિખ્યાત ઇતિહાસકાર, સરદાર પાણિકર, એ લંડનની ઇન્ડિયા ઑફિસ લાઇબ્રેરીમાંથી આ સંદેશાઓ, સૂચનાઓ અને પત્રોના મૂળ શોધ્યા હતા.
(૧) અબ્દુલ કાદરને લખેલો પત્ર ૨૨ માર્ચ ૧૭૮૮
“બાર હજારથી વધુ હિન્દુઓને ઇસ્લામથી સન્માનિત કરવામાં આવ્યા (ધર્માંતરિત કરવામાં આવ્યા). આમાં અનેક નમ્બુદિરી હતા. આ ઉપલબ્ધિનો હિન્દુઓ વચ્ચે વ્યાપક પ્રચાર કરવામાં આવે. સ્થાનિક હિન્દુઓને તમારી પાસે લાવવામાં આવે, અને તેમને ઇસ્લામમાં ધર્માંતરિત કરવામાં આવે. કોઈ પણ નમ્બુદિરીને છોડવામાં ન આવે.”
(૨) કાલિકટના પોતાના સેના નાયકને લખેલો પત્ર દિનાંક ૧૪ ડિસેમ્બર ૧૭૮૮
“હું તમારી પાસે મીર હુસૈન અલી સાથે પોતાના બે અનુયાયી મોકલી રહ્યો છું. તેમની સાથે તમે બધા હિન્દુઓને બંદી બનાવી લેજો અને વધ કરી દેજો…”. મારા આદેશ છે કે વીસ વર્ષથી ઓછી ઉંમરના લોકોને કારાગૃહમાં રાખી લેજો અને શેષમાંથી પાંચ હજારનો ઝાડ પર લટકાવીને વધ કરી દેજો.”
(૩) બદરૂઝ સમાઁ ખાનને લખેલો પત્ર (દિનાંક ૧૯ જાન્યુઆરી ૧૭૯૦)
“શું તમને જ્ઞાત નથી કે નજીકના સમયમાં મેં મલબારમાં એક મોટી વિજય પ્રાપ્ત કરી છે, ચાર લાખથી વધુ હિન્દુઓને મુસલમાન બનાવી દેવામાં આવ્યા હતા. મારો હવે અતિ શીઘ્ર જ તે પાણી રમન નાયર તરફ આગળ વધવાનો નિશ્ચય છે. આ વિચાર કરીને કે કાલંતરમાં તે અને તેની પ્રજા ઇસ્લામમાં ધર્માંતરિત કરી લેવામાં આવશે, મેં શ્રીરંગપટ્ટનમ પાછા જવાનો વિચાર ત્યાગી દીધો છે.”
ટીપુએ હિન્દુઓ પ્રત્યે યાતના માટે મલબારના વિવિધ ક્ષેત્રોના પોતાના સેના નાયકોને અનેક પત્રો લખ્યા હતા.
“જિલ્લાના પ્રત્યેક હિન્દુનું ઇસ્લામમાં આદર (ધર્માંતરણ) થવું જોઈએ; તેમને તેમના છુપાયેલા સ્થાનમાં શોધવામાં આવવું જોઈએ; તેમના ઇસ્લામમાં સર્વવ્યાપી ધર્માંતરણ માટે બધા માર્ગ અને યુક્તિઓ – સત્ય અને અસત્ય, કપટ અને બળ – બધાનો ઉપયોગ કરવામાં આવવો જોઈએ.”
મૈસૂરના ત્રીજા યુદ્ધ (૧૭૯૨) પૂર્વેથી લઈને નિરંતર ૧૭૯૮ સુધી અફઘાનિસ્તાનના શાસક, અહમદશાહ અબ્દાલીના પ્રપૌત્ર, ઝમનશાહ, સાથે ટીપુએ પત્રવ્યવહાર સ્થાપિત કરી લીધો હતો. કબીર કૌસર દ્વારા લિખિત, ‘હિસ્ટ્રી ઑફ ટીપુ સુલતાન’ (પૃ. ૧૪૧-૧૪૭) માં આ પત્રવ્યવહારનો અનુવાદ થયો છે. તે પત્રવ્યવહારના કેટલાક અંશ નીચે આપવામાં આવ્યા છે.
ટીપુના ઝમનશાહ માટે પત્રો
(૧) “મહામહિમ, તમને સૂચિત કરવામાં આવ્યું હશે કે, મારી મહાન અભિલાષાનો ઉદ્દેશ્ય જિહાદ (ધર્મ યુદ્ધ) છે. આ યુક્તિનું આ ભૂમિ પર પરિણામ એ છે કે અલ્લાહ, આ ભૂમિના મધ્યે, મોહમ્મદીય વસાહતના ચિહ્નની રક્ષા કરતો રહે છે, ‘નોઆના આર્ક’ની જેમ રક્ષા કરતો રહે છે અને ત્યજી દેવાયેલા અવિશ્વાસીઓની વધેલી ભુજાઓને કાપતો રહે છે.”
(૨) “ટીપુથી ઝમનશાહને, પત્ર દિનાંક શહબાનનો સાતમો ૧૨૧૧ હિજરી (તદનુસાર ૫ ફેબ્રુઆરી ૧૭૮૯)”….આ પરિસ્થિતિઓમાં જે, પૂર્વથી લઈને પશ્ચિમ સુધી, સૂર્યના સ્વર્ગના કેન્દ્રમાં હોવાને કારણે, બધાને જ્ઞાત છે. હું વિચાર કરું છું કે અલ્લાહ અને તેના પૈગમ્બરના આદેશોથી એક મત થઈને આપણે પોતાના ધર્મના શત્રુઓ વિરુદ્ધ ધર્મ યુદ્ધ કાર્યાન્વિત કરવા માટે, સંગઠિત થઈ જવું જોઈએ. આ ક્ષેત્રના પંથના અનુયાયી, શુક્રવારના દિવસે એક નિશ્ચિત કરેલા સ્થાન પર સદૈવ એકત્ર થઈને આ શબ્દોમાં પ્રાર્થના કરે છે. “હે અલ્લાહ! તે લોકોને, જેમણે પંથનો માર્ગ રોકી રાખ્યો છે, કતલ કરી દો. તેમના પાપો માટે, તેમના નિશ્ચિત દંડ દ્વારા, તેમના શીર્ષોને દંડ દો.”
મારો પૂરો વિશ્વાસ છે કે સર્વશક્તિમાન અલ્લાહ પોતાના પ્રિયજનોના હિત માટે તેમની પ્રાર્થનાઓ સ્વીકાર કરી લેશે અને પવિત્ર ઉદ્દેશ્યની ગુણવત્તાને કારણે આપણા સામૂહિક પ્રયાસોને તે ઉદ્દેશ્ય માટે ફળીભૂત કરી દેશે. અને આ શબ્દોના, “તારી (અલ્લાહ)ની સેનાઓ જ વિજયી થશે”, તારા પ્રભાવથી અમે વિજયી અને સફળ થઈશું.
ટીપુ દ્વારા હિન્દુઓ પર કરવામાં આવેલા અત્યાચારો તેની નિષ્પક્ષ હોવાની સારી રીતે પોલ ખોલે છે.
૧. ડૉ. ગંગાધરનજી બ્રિટિશ કમિશનની રિપોર્ટના આધારે લખે છે કે ઝમોરિયન રાજાના પરિવારના સભ્યોને અને અનેક નાયર હિન્દુઓને ટીપુ દ્વારા જબરદસ્તી સુન્નત કરીને મુસલમાન બનાવવામાં આવ્યા હતા અને ગૌમાંસ ખાવા માટે મજબૂર પણ કરવામાં આવ્યા હતા.
૨. બ્રિટિશ કમિશન રિપોર્ટના આધારે ટીપુ સુલતાનના મલબાર હુમલાઓ ૧૭૮૩-૧૭૯૧ના સમયમાં લગભગ ૩૦,૦૦૦ હિન્દુ નમ્બુદિરી મલબારમાં પોતાની બધી ધન-દૌલત અને ઘર-બાર છોડીને ત્રાવણકોર રાજ્યમાં આવીને વસી ગયા હતા.
૩. ઇલાનકુલમ કુંજન પિલ્લઈ લખે છે કે ટીપુ સુલતાનના મલબાર આક્રમણના સમયે કોઝીકોડમાં ૭૦૦૦ બ્રાહ્મણોના ઘર હતા જેમાં થી ૨૦૦૦ને ટીપુએ નષ્ટ કરી દીધા હતા અને ટીપુના અત્યાચારથી લોકો પોતાના ઘરો છોડીને જંગલોમાં ભાગી ગયા હતા. ટીપુએ સ્ત્રીઓ અને બાળકોને પણ બક્ષ્યા નહોતા. જબરદસ્તી ધર્મ પરિવર્તનને કારણે માપલા મુસલમાનોની સંખ્યામાં અત્યંત વૃદ્ધિ થઈ જ્યારે હિન્દુ વસ્તી ન્યૂન થઈ ગઈ.
૪. રાજા વર્મા કેરળમાં સંસ્કૃત સાહિત્યના ઇતિહાસમાં મંદિરોના તૂટવાનો અત્યંત વીભત્સ વિવરણ કરતા લખે છે કે હિન્દુ દેવી-દેવતાઓની મૂર્તિઓને તોડીને અને પશુઓના માથા કાપીને મંદિરોને અપવિત્ર કરવામાં આવતા હતા.
૫. બિદુર, ઉત્તર કર્ણાટકનો શાસક અયાઝ ખાન હતો જે પૂર્વમાં કામરાન નામ્બિયાર હતો, તેને હૈદર અલીએ ઇસ્લામમાં દીક્ષિત કરી મુસલમાન બનાવ્યો હતો. ટીપુ સુલતાન અયાઝ ખાનને શરૂઆતથી જ પસંદ કરતો નહોતો તેથી તેણે અયાઝ પર હુમલો કરવાનું મન બનાવી લીધું. જ્યારે અયાઝ ખાનને આની ખબર પડી ત્યારે તે મુંબઈ ભાગી ગયો. ટીપુ બિદુર આવ્યો અને ત્યાંની બધી જનતાને ઇસ્લામ કબૂલ કરવા મજબૂર કરી દીધી હતી. જે ન બદલ્યા તેમના પર ભયાનક અત્યાચાર કરવામાં આવ્યા હતા. કુર્ગ પર ટીપુ સાક્ષાત્ રાક્ષસ બનીને તૂટી પડ્યો હતો. તેણે લગભગ ૧૦,૦૦૦ હિન્દુઓને ઇસ્લામમાં જબરદસ્તી પરિવર્તિત કર્યા હતા. કુર્ગના લગભગ ૧૦૦૦ હિન્દુઓને પકડીને શ્રીરંગપટ્ટનમના કિલ્લામાં બંધ કરી દેવામાં આવ્યા હતા, જેમના પર ઇસ્લામ કબૂલ કરવા માટે અત્યાચાર કરવામાં આવ્યા હતા. પછીથી અંગ્રેજોએ જ્યારે ટીપુને મારી નાખ્યો ત્યારે જ તેઓ જેલમાંથી છૂટ્યા અને ફરીથી હિન્દુ બની ગયા. કુર્ગ રાજ પરિવારની એક કન્યાને ટીપુએ જબરન મુસલમાન બનાવીને નિકાહ પણ કરી લીધો હતો.
૬. મુસ્લિમ ઇતિહાસકાર પી.એસ. સૈયદ મુહમ્મદ કેરલા મુસ્લિમ ચરિત્રમમાં લખે છે કે ટીપુનું કેરળ પર આક્રમણ આપણને ભારત પર આક્રમણ કરનારા ચંગેઝ ખાન અને તૈમૂર લંગની યાદ અપાવે છે.
આ લેખમાં ટીપુના અત્યાચારોનું અત્યંત સંક્ષિપ્તમાં વિવરણ કરવામાં આવ્યું છે.
ભ્રાંતિ ૬. ટીપુ સુલતાન દેશભક્ત હતો. તેણે પોતાના રાજ્યની રક્ષા માટે પોતાના પ્રાણ આપીને વીરગતિ પ્રાપ્ત કરી હતી.
નિરાકરણ: સૌપ્રથમ તો ટીપુ સુલતાનના પિતા હૈદર અલીએ સૌપ્રથમ તો મૈસૂરના વાડિયાર રાજાને હટાવીને પોતાની સત્તા ગ્રહણ કરી હતી. તેથી મૈસૂરને ટીપુ સુલતાનનું રાજ્ય કહેવું ખોટું છે. બીજું, ટીપુનું સપનું દક્ષિણનો ઔરંગઝેબ બનવાનું હતું. ટીપુ પાદશાહ બનવા માંગતો હતો. તેનું સ્વપ્ન દેશવાસીઓ માટે એક ઉન્નત દેશનું નિર્માણ કરવાનું નહીં પરંતુ દક્ષિણ ભારતને દારુલ ઇસ્લામમાં બદલવાનું હતું. મલબાર જેવા સુંદર પ્રદેશનો ટીપુએ જે પ્રકારે વિનાશ કર્યો. તેને વાંચીને કોઈ પણ નિષ્પક્ષ વ્યક્તિ કહી શકે છે કે તે એક દેશભક્ત નહીં પરંતુ એક દુર્દાંત, મતાંધ, કટ્ટર અત્યાચારીનું લક્ષણ છે.
ડૉ. વિવેક આર્ય
સંદર્ભ સૂચિ
[i] ઇતિહાસ કે સાથ યહ અન્યાય: પ્રો. બી.એન. પાન્ડેય
[ii] એમ.એચ. ગોપાલ ટીપુ સુલતાન ઇન મૈસૂર: એન ઇકોનોમિક હિસ્ટ્રી
[iii] ટીપુ સુલતાન એક્સ-રેડ: ડૉ. આઈ.એમ. મુથન્ના
[iv] વિલિયમ લોગન મલબાર મૈન્યુઅલ
[v] લેવિસ રાઇસ મૈસૂર ગેઝેટિયર
[vi] કર્નલ આર.ડી. પાલસોકર કન્ફર્મ્સ ઇટ ઇન હીઝ રાઈટિંગ્સ.
[vii] હિન્દુ ટેમ્પલ્સ: વોટ હેપનડ ટૂ ધેમ (વોલ્યુમ્સ ૧ અને ૨), સીતારામ ગોયલ
·ઇન્ડિયન મુસ્લિમ્સ: હુ આર ધે, કે.એસ. લાલ
·નેશનાલિઝમ એન્ડ ડિસ્ટોર્શન ઑફ ઇન્ડિયન હિસ્ટ્રી, ડૉ. એન.એસ. રાજારામ
·નેગેશનિઝમ ઇન ઇન્ડિયા – કન્સિલિંગ ધ રેકોર્ડ ઑફ ઇસ્લામ, ડૉ. કોનરાડ એલ્સ્ટ
·પર્વર્ઝન ઑફ ઇન્ડિયાઝ પોલિટિકલ પાર્લન્સ, સીતારામ ગોયલ
[viii] હિસ્ટ્રી ઑફ કોચીન
[ix] હિસ્ટ્રી ઑફ કેરળ
[x] ફ્રીડમ સ્ટ્રગલ ઇન કેરળ: સરદાર કે.એમ. પાણિકર
[xi] ડૉ. એમ. ગંગાધરન માતૃભૂમિ સાપ્તાહિક જાન્યુઆરી ૧૪-૨૦, ૧૯૯૦
[xii] કેસરી વાર્ષિક ૧૯૬૪
[xiii] ભાષા પોષણી-મલયાલમ જર્નલ, ઓગસ્ટ ૧૯૨૩
[xiv] એ જ પુસ્તકમાં
[xv] એ જ પુસ્તકમાં
[xvi] હિસ્ટોરિકલ સ્કેચીઝ ઑફ ધી સાઉથ ઑફ ઇન્ડિયા ઇન એન એટેમ્પ્ટ ટૂ ટ્રેસ ધી હિસ્ટ્રી ઑફ મૈસૂર- માર્ક વિલ્ક્સ, ખંડ ૨ પૃષ્ઠ ૧૨૦
[xvii] ઇલમકુલમ કુંજન પિલ્લઈ રોટ ઇન ધ માતૃભૂમિ વીકલી ઑફ ડિસેમ્બર ૨૫, ૧૯૫૫
[xviii] વટ્ટંકૂર રાજા રાજા વર્મા ઇન હીઝ ફેમસ લિટરરી વર્ક, હિસ્ટ્રી ઑફ સંસ્કૃત લિટરેચર ઇન કેરળ
[xix] પી.સી.ન રાજા કેસરી વાર્ષિક ૧૯૬૪
#ટીપુ_સુલતાન_એક_અત્યાચારી