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राबड़ी देवी


इस #प्रेत_युगल को अभी बहुत कुछ देखना है,
इन्होंने अपने समय में ऐसे , ऐसे जघन्य कांड किए , और करने वालों को प्रश्रय दिया है,जिसका काल उसका पूरा मूल्य इनसे लेगा।
कुछेक घटनाओं पर नज़र डालते हैं,

– बेजुबान जानवरों का चारा खाया,
– चारा घोटाले की इंक्वायरी के दौरान  ग्यारह व्यक्तियों  की हत्या  करवा कर उन्हें एक्सीडेंट का रुप देना,
– अपहरण उद्योग स्थापित कर बिहारियों का जीवन नर्क बनाना,
– रागिनी यादव के मित्र अभिषेक मिश्र की हत्या कर उसे दुर्घटना का रूप देना,
– राबड़ी के भाई साधु यादव द्वारा शिल्पी जैन का ब्रूटल रेप , उसकी और उसके मित्र की हत्या करना,
राबड़ी का अपने भाई को बचाना,
– मीसा भारती के विवाह में पटना के शो रूम्स में लूट मचाना,
– चंदा बाबू के बेटों की निर्मम हत्या करने वाले शहाबुद्दीन का सरपरस्त बनना,
– चंपा विश्वास , उनकी भतीजियों, उनकी नौकरानियों का महीनों बलात्कार करने वाले के पक्ष में खड़े होना!
– रेलवे में नौकरी देने के बदले लोगों की जमीन हड़पना,
– राबड़ी द्वारा ऐश्वर्या यादव की पिटाई कर रात में घर से बाहर फेंकना,

ये कुछ ऐसे अमानवीय कृत्य हैं ,जो मेरी स्मृति में हैं। आप लोग चाहे तो इसमें योगदान कर सकते हैं।

इन दोनों को तिल तिल मरना चाहिए ,यदि ये सरलता से मुक्ति पा जाते हैं तो ये ईश्वर का अधूरा न्याय समझा जाएगा !
आर्यन जी की पोस्ट से प्रेरित पोस्ट!
Kumar Kalhans
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Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

#अक्षय_तृतीया ●
◆अक्षय तृतीया की हार्दिक शुभकामनाएं सम्प्रेषित हैं।
अक्षय तृतीया दिनाँक 03l05l2022 को प्रातः 03:39 बजे से  04l05l2020 को प्रातः 05:25 तक रोहणी उपरांत मृगशिरा नक्षत्र को मनाई जाएगी..
#अक्षय_तृतीया को पूर्ण चैतन्य काल व गजकेशरी अमृत सिद्धि काल कहा गया हैं एवं इसी दिन भगवान परशुराम अवतरित हुईं और त्रेतायुग का आरंभ भी अक्षय तृतीया को हुआ साथ ही बद्रीनाथ का दरवाजा इसी दिन खुलता हैं।
अतः अक्षय तृतीया को श्री चक्र श्री यंत्र अष्टलष्मी/कनक धारा/धनदा लक्ष्मी पूजन/प्रयोग अति विशेष फलदायी होता ही है।

#अक्षय_तृतीया का महत्व क्या है ? जानिए कुछ महत्वपुर्ण जानकारी:-
●आज ही के दिन जैन के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव जी भगवान ने 13 महीने का कठीन निरंतर उपवास (बिना जल का तप) का पारणा (उपवास छोडना) इक्षु (गन्ने) के रस से किया थl और आज भी बहुत जैन भाई व बहने वही वर्षी तप करने के पश्चात आज उपवास छोड़ते है और नये उपवास लेते है और भगवान को गन्ने के रस से अभिषेक किया जाता है।

●आज ही के दिन माँ गंगा का अवतरण धरती पर हुआ था।

●महर्षी परशुराम का जन्म आज ही के दिन हुआ था।

●माँ अन्नपूर्णा का जन्म भी आज ही के दिन हुआ था।

●द्रोपदी को चीरहरण से कृष्ण ने आज ही के दिन बचाया था।

●कृष्ण और सुदामा का मिलन आज ही के दिन हुआ था।

●कुबेर को आज ही के दिन खजाना मिला था।

●सतयुग और त्रेता युग का प्रारम्भ आज ही के दिन हुआ था।

●ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का अवतरण भी आज ही के दिन हुआ था।

●प्रसिद्ध तीर्थ स्थल श्री बद्री नारायण जी का कपाट आज ही के दिन खोला जाता है।

●बृंदावन के बाँके बिहारी मंदिर में साल में केवल आज ही के दिन श्री विग्रह चरण के दर्शन होते है। अन्यथा साल भर वो बस्त्र से ढके रहते है।

●इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था।

●अक्षय तृतीया अपने आप में स्वयं सिद्ध मुहूर्त है। कोई भी शुभ कार्य का प्रारम्भ किया जा सकता है।

🚩अक्षय तृतीया दिन विशेष●
१) साडेतीन मुहूर्तो में से एक
२) अक्षय फल प्रदान करनेवाला
३) लीग ऑफ डिओटीज की झान्सी मे स्थापना, 16 मई 1953 (श्रील प्रभूपाद)
४) चंदन यात्रा प्रारंभ
५) श्री परशुराम एवं श्री हयग्रीव जन्मोत्सव
६) श्री जगन्नाथ रथ बनना शुरु
७) श्री बद्रीनाथ दर्शन एवं सेवा शुरु
८) श्री बांकेबिहारीजी चरण दर्शन
९) कृष्ण और सुदामा मिलन
१०) द्रौपदी चिरहरण से रक्षण
११) व्रज में पावन सरोवर प्रकट्य
१२) सिंहाचलम नृसिंह पूर्ण दर्शन
१३) सूर्यदेवद्वारा पांडवोंको अक्षयपात्र प्रदान
१४) महाभारत का युद्ध समापन
१५) कुबेर को धन और पद प्राप्ती
१६) गंगामाता का पृथ्वीपर अवतरण
१७) चारों युग का प्रारंभ दिन
१८) महाभारत की रचना प्रारंभ
१९) ब्रह्माजी के पुत्र अक्षयकुमार का जन्म
२०) अन्नपूर्णा देवी का प्रकट्य
२१) आदिशंकराचार्य जी द्वारा कनकधारा स्तोत्ररचना

      जैसा की आप सभी जानते हैं कि *ब्रम्हविद्या श्री विद्या-श्री चक्र-विराट षोडशी-राजराजेश्वरी श्री श्री ललित महात्रिपुरमहासुन्दरी श्री महालक्ष्मी अष्टमहालष्मी, धनदा महालक्ष्मी महाविद्या*  प्रयोग/साधना से भोग और मोक्ष की प्राप्ति,पारिवारिक सुख में  वृद्धि,व्यापार में वृद्धि, ऎश्वर्य में वृद्धि व उन्नति,भय नाश,समस्त पापों का हरण, राजयोग की प्रबलता में वृद्धि,राजनेता बनाने में सक्षम, समस्त आधि-व्याधि’ शोक-संताप’ दीनता-हीनता से मुक्ति, तथा अन्य तांत्रिक प्रयोगों की अनिष्ट दोषो आदि के निवारण सहज ही हो जाता हैं। अतः  तंत्र साधना , में *दस महाविद्यायों* में अतिविशिष्ट महाविद्या   *श्री श्री राजराजेश्वरी श्री श्री ललिता महात्रिपुरमहासुन्दरी श्री महालक्ष्मी महाविद्या व अष्टमहालष्मी व धनदा महालक्ष्मी* का पूजन/प्रयोग से  साधनाओ  में सिद्धि/पूर्णता/ भोग मोक्ष देने में महत्वपूर्ण भूमिका है। अतः रोहणी उपरांत मृगशिरा नक्षत्र के साथ ही *श्री चक्र-श्री यंत्र में विराजमान देवी ब्रम्हविद्या राजराजेश्वरी श्री श्री ललित महात्रिपुरमहासुन्दरी महाविद्या व अष्टमहालष्मी व धनदा महाविद्या* प्रयोग/पूजन हेतु अतिविशिष्ट/अतिमहत्वपूर्ण दिन  *अक्षय तृतीया-परशुराम जयंती-द्वापरयुग का आरंभ* को *”तंत्रोक्त सद्गुरु,दादागुरु, आवाहन चरणपादुका पूजन,कायाकल्प विद्या”* उपरांत *”श्री- यंत्र श्री-चक्र राजराजेश्वरी षोडशी महात्रिपुरमहासुन्दरी महाविद्या व अष्टमहालष्मी व धनदा महाविद्या” पूजन/प्रयोग, मंत्र उत्कीलन  उपरांत यंत्र/मूर्ति/ प्राणप्रतिष्ठा*, ततपश्चात  *श्रीयंत्र-श्री चक्र अष्टलक्ष्मी , सत अष्टोत्तरीय श्री त्रिपुरमहासुन्दरी महालक्ष्मी श्री विद्या व धनदा महालक्ष्मी कीलन प्रयोग* उपरांत  *पुरूष सूक्त,श्री सूक्त,लक्ष्मी सूक्त,बीज युक्त श्री सूक्त-लक्ष्मी सूक्त* से *सम्पुटन* उपरांत *सम्पूर्ण दसमहाविद्या व श्री सूक्त से युक्त पूर्णाहुति* का पूजन  अतिविशेष रूप से *अक्षय तृतीया* में करना चाहिए।

#अक्षयतृतीया_विशिष्ट●
      अक्षय तृतीया भगवती महालक्ष्मी की कृपा प्राप्ति का एक महत्वपूर्ण मुहूर्त है।प्रत्येक गृहस्थ को इस अवसर पर देवी महालक्ष्मी का पूजन विधि विधान से संपन्न करना ही चाहिए। क्योंकि गृहस्थ जीवन का आधार ही महालक्ष्मी हैं। क्षय का अर्थ होता है नष्ट होना और अक्षय का अर्थ होता है जो कभी नष्ट नहीं होती।

लक्ष्मीप्राप्ति सिद्ध मुहूर्त :-
1-मकर संक्रांति
2-अक्षय तृतीया
3-शरद पूर्णिमा
4- दीपावली
5- गुरुपुष्य या रविपुष्य योग

महालक्ष्मी पूजन विविध प्रकार से किए जा सकते हैं लेकिन देवराज इंद्रकृत सहस्राक्षरी लक्ष्मी स्तोत्र अपने आप में अत्यंत ही प्रभावशाली तथा शीघ्र फलप्रदायक है। इस अवसर पर आप चाहें तो महालक्ष्मी के किसी भी मंत्र का जाप कर सकते हैं जिससे आपको अनुकूलता प्राप्त होगी।

यह स्तोत्र लक्ष्मी जी के यंत्र चित्र या मूर्ति के सामने करना चाहिए। पहले  पूजन करें तदुपरांत स्तोत्र पाठ करें।

महालक्ष्मी पूजनः-
श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः गंधम समर्पयामि । (इत्र कुंकुम चढायें)
श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः पुष्पम समर्पयामि । (फूल चढायें )
श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः धूपम समर्पयामि । (धूप अगरबत्ती दिखायें)
श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः दीपम समर्पयामि । (दीपक दिखायें )
श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः नैवेद्यम समर्पयामि । (प्रसाद चढायें )

क्षमतानुसार 11, 21,51 या 108 बार सहस्राक्षरी स्तोत्र मंत्र का पाठ करेंः-

(हाथ में जल लेकर)विनियोग करें:-
-ॐ अस्य श्री सर्व महाविद्या महारात्रि गोपनीय मंत्र रहस्याति रहस्यमयी पराशक्ति श्री मदाद्या भगवती सिद्ध लक्ष्मी सहस्राक्षरी सहस्र रूपिणि महाविद्याया श्री इंद्र ऋषिं गायत्रयादि नाना छंदांसि नवकोटि शक्तिरूपा श्री मदाद्या भगवती सिद्ध लक्ष्मी देवता श्री मदाद्या भगवती सिद्ध लक्ष्मी प्रसादादखिलेष्टार्थ जपे पाठे विनियोगः। (जल जमीन पर छोड़ दें )

अपने हाथ मे एक पुष्प रखें । एक पाठ पूरा हो जाने पर उसे देवी के चरणों मे चढ़ा दें और उनकी कृपा प्राप्ति की प्रार्थना करें ।

स्तोत्रमंत्र :- ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं हसौं श्रीं ऐं ह्रीं क्लीं सौः सौः ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं श्रीं जय जय महालक्ष्मी, जगदाद्ये,विजये सुरासुर त्रिभुवन निदाने दयांकुरे सर्व तेजो रूपिणी विरंचि संस्थिते, विधि वरदे सच्चिदानंदे विष्णु देहावृते महामोहिनी नित्य वरदान तत्परे महासुधाब्धि वासिनी महातेजो धारिणी सर्वाधारे सर्वकारण कारिणे अचिंत्य रूपे इंद्रादि सकल निर्जर सेविते सामगान गायन परिपूर्णोदय कारिणी विजये जयंति अपराजिते सर्व सुंदरि रक्तांशुके सूर्य कोटि संकाशे चंद्र कोटि सुशीतले अग्निकोटि दहनशीले यम कोटि वहनशीले ऊँकार नाद बिंदु रूपिणी निगमागम भाग्यदायिनी त्रिदश राज्य दायिनी सर्व स्त्री रत्न स्वरूपिणी दिव्य देहिनि निर्गुणे सगुणे सदसद रूप धारिणी सुर वरदे भक्त त्राण तत्परे बहु वरदे सहस्राक्षरे अयुताक्षरे सप्त कोटि लक्ष्मी रूपिणी अनेक लक्षलक्ष स्वरूपे अनंत कोटि ब्रहमाण्ड नायिके चतुर्विंशति मुनिजन संस्थिते चतुर्दश भुवन भाव विकारिणे गगन वाहिनी नाना मंत्र राज विराजिते सकल सुंदरी गण सेविते चरणारविंद्र महात्रिपुर सुंदरी कामेश दायिते करूणा रस कल्लोलिनी कल्पवृक्षादि स्थिते चिंतामणि द्वय मध्यावस्थिते मणिमंदिरे निवासिनी विष्णु वक्षस्थल कारिणे अजिते अमले अनुपम चरिते मुक्तिक्षेत्राधिष्ठायिनी प्रसीद प्रसीद सर्व मनोरथान पूरय पूरय सर्वारिष्टान छेदय छेदय सर्वग्रह पीडा ज्वराग्र भय विध्वंसय विध्वंसय सर्व त्रिभुवन जातं वशय वशय मोक्ष मार्गाणि दर्शय दर्शय ज्ञानमार्ग प्रकाशय प्रकाशय अज्ञान तमो नाशय नाशय धनधान्यादि वृद्धिं कुरूकुरू सर्व कल्याणानि कल्पय कल्पय माम रक्ष रक्ष सर्वापदभ्यो निस्तारय निस्तारय वज्र शरीरं साधय साधय ह्रीं सहस्राक्षरी सिद्ध लक्ष्मी महाविद्यायै नमः ।

#अक्षय_तृतीया_महत्त्व_व_कथा●

◆हिन्दू केलेण्डर की मुख्य तिथियों में से एक है अक्षय तृतीया. यह हिन्दुओ के लिए बहूत ही पवित्र दिन होता है. अक्षय तृतीया, हिन्दू केलेण्डर के वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है. शुक्ल पक्ष अर्थात अमावस्या के बाद के पंद्रह दिन जिनमें चंद्रमा बढ़ता है. अक्षय तृतीया शुक्ल पक्ष में ही आती है. इसे अखाती तीज भी कहते हैं.

#अक्षय का अर्थ होता है “जो कभी खत्म ना हो” और इसीलिए एसा कहा जाता है, कि अक्षय तृतीया वह तिथि है जिसमें सौभाग्य और शुभ फल का कभी क्षय नहीं होता. इस दिन होने वाले कार्य मनुष्य के जीवन को कभी न खत्म होने वाले शुभ फल प्रदान करते हैं. इसलिए यह कहा जाता है, कि इस दिन मनुष्य जीतने भी पुण्य कर्म तथा दान करता है उसे, उसका शुभ फल अधिक मात्रा में मिलता है और शुभ फल का प्रभाव कभी खत्म नहीं होता है.

#हिन्दू_मान्यताएँ ●

अखाती तीज के पीछे कई हिन्दू मान्यताएँ हैं. कुछ इसे भगवान विष्णु के जन्म से जोड़ती हैं, तो कुछ इसे भगवान कृष्ण की लीला से. सभी मान्यताएँ आस्था से जुड़ी होने के साथ साथ बहूत रोचक भी हैं.

यह दिन पृथ्वी के रक्षक श्री विष्णुजी को समर्पित है. हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार विष्णुजी ने श्री परशुराम के रूप में धरती पर अवतार लिया था. इस दिन परशुराम के रूप में विष्णुजी छटवी बार धरती पर अवतरित हुए थे, और इसीलिए यह दिन परशुराम के जन्मदिवस के रूप में भी मनाया जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार विष्णुजी त्रेता एवं द्वापरयुग तक पृथ्वी पर चिरंजीवी (अमर) रहे. परशुराम सप्तऋषि में से एक ऋषि जमदगनीतथा रेणुका के पुत्र थे. यह ब्राह्मण कुल में जन्मे और इसीलिए अक्षय तृतीय तथा परशुराम जयंती को सभी हिन्दू बड़े धूमधाम से मनाते हैं.
दूसरी मान्यता के अनुसार त्रेता युग के शुरू होने पर धरती की सबसे पावन माने जानी वाली गंगा नदी इसी दिन स्वर्ग से धरती पर आई. गंगा नदी को भागीरथ धरती पर लाये थे. इस पवित्र नदी के धरती पर आने से इस दिन की पवित्रता और बढ़ जाती है और इसीलिए यह दिन हिंदुओं के पावन पर्व में शामिल है. इस दिन पवित्र गंगा नदी में डुबकी लगाने से मनुष्य के पाप नष्ट हो जाते हैं.
यह दिन रसोई एवं पाक (भोजन) की देवी माँ अन्नपूर्णा का जन्मदिन भी माना जाता है. अक्षय तृतीया के दिन माँ अन्नपूर्णा का भी पूजन किया जाता है और माँ से भंडारे भरपूर रखने का वरदान मांगा जाता है. अन्नपूर्णा के पूजन से रसोई तथा भोजन में स्वाद बढ़ जाता है.
दक्षिण प्रांत में इस दिन की अलग ही मान्यता है. उनके अनुसार इस दिन कुबेर (भगवान के दरबार का खजांची) ने शिवपुरम नामक जगह पर शिव की आराधना कर उन्हें प्रसन्न किया था. कुबेर की तपस्या से प्रसन्न हो कर शिवजी ने कुबेर से वर मांगने को कहा. कुबेर ने अपना धन एवं संपत्ति लक्ष्मीजी से पुनः प्राप्त करने का वरदान मांगा. तभी शंकरजी ने कुबेर को लक्ष्मीजी का पूजन करने की सलाह दी. इसीलिए तब से ले कर आजतक अक्षय तृतीया पर लक्ष्मीजी का पूजन किया जाता है. लक्ष्मी विष्णुपत्नी हैं, इसीलिए लक्ष्मीजी के पूजन के पहले भगवान विष्णु की पूजा की जाती है. दक्षिण में इस दिन लक्ष्मी यंत्रम की पूजा की जाती है, जिसमें विष्णु, लक्ष्मीजी के साथ – साथ कुबेर का भी चित्र रहता है.
अक्षय तृतीया के दिन ही महर्षि वेदव्यास ने महाभारत लिखना आरंभ की थी. इसी दिन महाभारत के युधिष्ठिर को “अक्षय पात्र” की प्राप्ति हुई थी. इस अक्षय पात्र की विशेषता थी, कि इसमें से कभी भोजन समाप्त नहीं होता था. इस पात्र के द्वारा युधिष्ठिर अपने राज्य के निर्धन एवं भूखे लोगों को भोजन दे कर उनकी सहायता करते थे. इसी मान्यता के आधार पर इस दिन किए जाने वाले दान का पुण्य भी अक्षय माना जाता है, अर्थात इस दिन मिलने वाला पुण्य कभी खत्म नहीं होता. यह मनुष्य के भाग्य को सालों साल बढाता है.
महाभारत में अक्षय तृतीया की एक और कथा प्रचलित है. इसी दिन दुशासन ने द्रौपदी का चीरहरण किया था. द्रौपदी को इस चीरहरण से बचाने के लिए श्री कृष्ण ने कभी न खत्म होने वाली साड़ी का दान किया था.
अक्षय तृतीया के पीछे हिंदुओं की एक और रोचक मान्यता है. जब श्री कृष्ण ने धरती पर जन्म लिया, तब अक्षय तृतीया के दिन उनके निर्धन मित्र सुदामा, कृष्ण से मिलने पहुंचे. सुदामा के पास कृष्ण को देने के लिए सिर्फ चार चावल के दाने थे, वही सुदामा ने कृष्ण के चरणों में अर्पित कर दिये. परंतु अपने मित्र एवं सबके हृदय की जानने वाले अंतर्यामी भगवान सब कुछ समझ गए और उन्होने सुदामा की निर्धनता को दूर करते हुए उसकी झोपड़ी को महल में परिवर्तित कर दिया और उसे सब सुविधाओं से सम्पन्न बना दिया. तब से अक्षय तृतीया पर किए गए दान का महत्व बढ़ गया.
भारत के उड़ीसा में अक्षय तृतीया का दिन किसानों के लिए शुभ माना जाता है. इस दिन से ही यहाँ के किसान अपने खेत को जोतना शुरू करते हैं. इस दिन उड़ीसा के जगन्नाथपूरी से रथयात्रा भी निकाली जाती है.
अलग अलग प्रांत में इस दिन का अपना अलग ही महत्व है. बंगाल में इस दिन गणेशजी तथा लक्ष्मीजी का पूजन कर सभी व्यापारी द्वारा अपनी लेखा जोखा (ऑडिट बूक) की किताब शुरू करने की प्रथा है. इसे यहाँ “हलखता” कहते हैं.
पंजाब में भी इस दिन का बहूत महत्व है. इस दिन को नए मौसम के आगाज का सूचक माना जाता है. इस अक्षय तृतीया के दिन जाट परिवार का पुरुष सदस्य ब्रह्म मुहूर्त में अपने खेत की ओर जाते हैं. उस रास्ते में जितने अधिक जानवर एवं पक्षी मिलते हैं, उतना ही फसल तथा बरसात के लिए शुभ शगुन माना जाता है.
#जैनियों में अक्षय तृतीया की मान्यताएँ :

हिंदुओं के साथ साथ जैन समुदाय में भी अक्षय तृतीया का महत्व है. जैन धर्म में यह दिन उनके प्रथम चौबीस तीर्थंकर में से एक, भगवान ऋषभदेव से जुड़ा है. ऋषभदेव ही बाद में जा कर भगवान आदिनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुए. ऋषभदेव जैनी भिक्षु थे. इन्होंने ही जैन धर्म में “आहराचार्य– जैनी साधुओं तक आहार (भोजन) पहुंचाने का तरीका” प्रचारित किया था. जैनी भिक्षु कभी खुद के लिए भोजन नहीं पकाते तथा कभी भी किसी से कुछ नहीं मांगते, जो कुछ भी उन्हें लोग प्रेम से दे देते, वे उसे खा लेते.                                              अक्षयतृतीया के पीछे जैन समुदाय में बहुत ही रोचक कथा है. ऋषभदेव ने अपना राज्य पाठ अपने 101 पुत्रों के बीच बाँटते हुए संसार की मोह माया त्याग दी. उन्होने छः महीने तक बिना भोजन तथा पानी के तपस्या की और फिर उसके बाद वे भोजन की आवश्यकता में ध्यान से बाहर बैठ गए. यह जैनी संत आहार की प्रतीक्षा करने लगे. लोगों ने ऋषभदेव को राजा समझकर उन्हें सोना, चाँदी, हीरे, जवाहरात, हाथी, घोड़े, कपड़े और कुछ ने तो अपने राजा को खुश करने के लिए अपनी पुत्री तक दान में दे दी. परंतु ऋषभदेव को यह सब नहीं चाहिए था, वे तो सिर्फ भोजन के एक कौर की चाह में थे. इसलिए ऋषभदेव फिर से एक साल की तपस्या के लिए चले गए और उन्हें सालभर तक उपवास रखना पड़ा. फिर एक साल बाद राजा श्रेयांश हुए, जिन्होने अपने “पूर्व-भाव-स्मरण” (पिछले जन्म के विचार जानने की शक्ति) से ऋषभदेव के मन की बात समझी और उनका उपवास तुड़वा कर उन्हें गन्ने का रस पिलाया. यह दिन अक्षय तृतीया का दिन था. उस दिन से आजतक तीर्थंकर ऋषभदेव के उपवास का महत्व समझते हुए जैन समुदाय अक्षय तृतीया के दिन उपवास रखकर गन्ने के रस से अपना उपवास खतम करते हैं. इस प्रथा को “पारणा” कहते हैं.
#अक्षय_तृतीया का महत्व:

यह दिन सभी शुभ कार्य के लिए सर्वश्रेष्ठ है. अक्षय तृतीया के दिन विवाह होना अत्यंत ही शुभ माना जाता है. जिस प्रकार इस दिन पर दिये गए दान का पुण्य कभी खतम नहीं होता, उसी प्रकार इस दिन होने वाले विवाह में भी पति –पत्नी के बीच प्रेम कभी खत्म नहीं होता. इस दिन विवाह करने वाले जन्मों जन्मों तक साथ निभाते हैं.

विवाह के अलावा सभी मांगलिक कार्य जैसे, उपनयन संस्कार, घर आदि का उद्घाटन, नया व्यापार डालना, नए प्रोजेक्ट शुरू करना भी शुभ माना जाता है. इस दिन कई लोग सोना तथा गहने खरीदना भी शुभ मानते हैं. इस दिन व्यापार आदि शुरू करने से मनुष्य को हमेशा तरक्की मिलती है, तथ उसके भाग्य में दिनों दिन शुभ फल की बढ़ोत्तरी होती है.

#अक्षय_तृतीया की कथा एवं उसको सुनने का महत्व●

अक्षय तृतीया की कथा सुनने तथा विधि से पूजा करने से बहुत लाभ होता है. इस कथा का पुराणों में भी महत्व है. जो भी इस कथा को सुनता है, विधि से पूजन एवं दान आदि करता है, उसे सभी प्रकार के सुख, संपत्ति, धन, यश, वैभव की प्राप्ति होती है. इसी धन एवं यश की प्राप्ति के लिए वैश्य समाज के धर्मदास नामक व्यक्ति ने अक्षय तृतीया का महत्त्व जाना.

बहुत पुरानी बात है, धर्मदास अपने परिवार के साथ एक छोटे से गाँव में रहता था. वह बहुत ही गरीब था. वह हमेशा अपने परिवार के भरण – पोषण के लिए चिंतित रहता था. उसके परिवार में कई सदस्य थे. धर्मदास बहुत धार्मिक पृव्रत्ति का व्यक्ति था. एक बार उसने अक्षय तृतीया का व्रत करने का सोचा. अक्षय तृतीया के दिन सुबह जल्दी उठकर उसने गंगा में स्नान किया. फिर विधिपूर्वक भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना एवं आरती की. इस दिन अपने सामर्थ्यानुसार जल से भरे घड़े, पंखे, जौ, सत्तू, चावल, नमक, गेंहू, गुड़, घी, दही, सोना तथा वस्त्र आदि वस्तुएँ भगवान के चरणों में रख कर ब्राह्मणों को अर्पित की. यह सब दान देख कर धर्मदास के परिवार वाले तथा उसकी पत्नी ने उसे रोकने की कोशिश की . उन्होने कहा कि अगर धर्मदास इतना सब कुछ दान में दे देगा, तो उसके परिवार का पालन –पोषण कैसे होगा. फिर भी धर्मदास अपने दान और पुण्य कर्म से विचलित नहीं हुआ और उसने ब्राह्मणों को कई प्रकार का दान दिया. उसके जीवन में जब भी अक्षय तृतीया का पावन पर्व आया, प्रत्येक बार धर्मदास ने विधि से इस दिन पूजा एवं दान आदि कर्म किया. बुढ़ापे का रोग, परिवार की परेशानी भी उसे, उसके व्रत से विचलित नहीं कर पायी.

इस जन्म के पुण्य प्रभाव से धर्मदास ने अगले जन्म में राजा कुशावती के रूप में जन्म लिया. कुशावती राजा बहुत ही प्रतापी थे. उनके राज्य में सभी प्रकार का सुख, धन, सोना, हीरे, जवाहरात, संपत्ति की किसी भी प्रकार से कमी नहीं थी. उनके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी. अक्षय तृतीया के पुण्य प्रभाव से राजा को वैभव एवं यश की प्राप्ति हुई,  लेकिन वे कभी लालच के वश नहीं हुए एवं अपने सत्कर्म के मार्ग से विचलित नहीं हुए. उन्हें उनके अक्षय तृतीया का पुण्य सदा मिलता रहा.

जैसे भगवान ने धर्मदास पर अपनी कृपा की वैसे ही जो भी व्यक्ति इस अक्षय तृतीया की कथा का महत्त्व सुनता है और विधि विधान से पूजा एवं दान आदि करता है, उसे अक्षय पुण्य एवं यश की प्राप्ति होती है.

#श्री यन्त्र की महिमा ।।.

श्री यन्त्र को यंत्र शिरोमणि श्रीयंत्र, श्रीचक्र व त्रैलोक्यमोहन चक्र भी कहते हैं । धन त्रयोदशी और दीपावली को यंत्रराज श्रीयंत्र की पूजा का अति विशिष्ट महत्व है । श्री यंत्र या श्री चक्र सारे जगत को वैदिक सनातन धर्म, अध्यात्म की एक अनुपम और सर्वश्रेष्ठ देन है। इसकी उपासना से जीवन के हर स्तर पर लाभ का अर्जन किया जा सकता है, इसके नव आवरण पूजन के मंत्रों से यही तथ्य उजागर होता है।
मूल रूप में श्रीयन्त्र नौ यन्त्रों से मिलकर एक बना है , इन नौ यन्त्रों को ही हम श्रीयन्त्र के नव आवरण के रूप में जानते हैं, श्री चक्र के नव आवरण निम्नलिखित हैं:-

1:- त्रैलोक्य मोहन चक्र- तीनों लोकों को मोहित करने की क्षमता से परिपूर्ण चक्र है ।
2:- सर्वाशापूरक चक्र- सभी आशाओं, कामनाओं की पूर्ति करने की क्षमता से परिपूर्ण चक्र है ।
3:- सर्व संक्षोभण चक्र- अखिल विश्व को संक्षोभित करने की क्षमता से परिपूर्ण चक्र है ।
4:- सर्व सौभाग्यदायक चक्र- सौभाग्य की प्राप्ति,वृद्धि करने की क्षमता से परिपूर्ण चक्र है ।
5:- सर्वार्थ सिद्धिप्रद चक्र- सभी प्रकार की अर्थाभिलाषाओं की पूर्ति करने की क्षमता से परिपूर्ण चक्र है ।
6:- सर्वरक्षाकर चक्र- सभी प्रकार की बाधाओं से रक्षा करने की क्षमता से परिपूर्ण चक्र है ।
7:- सर्वरोगहर चक्र- सभी व्याधियों, रोगों से रक्षा करने की क्षमता से परिपूर्ण चक्र है ।
8:- सर्वसिद्धिप्रद चक्र- सभी सिद्धियों की प्राप्ति करने की क्षमता से परिपूर्ण चक्र है ।
9:- सर्व आनंदमय चक्र- परमानंद या मोक्ष की प्राप्ति करने की क्षमता से परिपूर्ण चक्र है ।

इसके अतिरिक्त श्रीयन्त्र का एक रहस्य ओर है कि श्रीयन्त्र वेदों, कौलाचार व अगमशास्त्रों में उल्लेखित स्वयंसिद्ध भैरवी चक्र या संहार चक्र का ही विस्तृत स्वरूप है , श्रीयन्त्र के क्रमशः 7,8 व 9 वें (बिंदु, त्रिकोण और अष्टकोण) चक्र ही संयुक्त होकर मूल स्वयंसिद्ध भैरवी चक्र है , व बाहर के अन्य 1 से 6 तक के चक्र उसका सृष्टि व   स्थिति क्रम में विस्तार मात्र है, इसीलिए श्रीचक्र या श्रीयन्त्र का समयाचार, दक्षिणाचार, व कौलाचार सहित अन्य सभी पद्धतियों से पूजन अर्चन किया जाता है !

श्रीयंत्र के ये नवचक्र सृष्टि, स्थिति और संहार चक्र के द्योतक हैं । अष्टदल, षोडशदल और भूपुर इन तीन चक्रों को सृष्टि चक्र कहते हैं। अंतर्दशार, बहिर्दशार और चतुर्दशार स्थिति चक्र कहलाते हैं। बिंदु, त्रिकोण और अष्टकोण को संहार चक्र कहते हैं।
श्री श्री ललिता महात्रिपुर सुंदरी श्री लक्ष्मी जी के यंत्रराज श्रीयंत्र के पिंडात्मक और ब्रह्मांडात्मक होने की बात को जो साधक जानता है वह योगीन्द्र होता है । श्रीयंत्र ब्रह्मांड सदृश्य एक अद्भुत यंत्र है जो मानव शरीर स्थित समस्त शक्ति चक्रों का भी यंत्र है। श्रीयंत्र सर्वशक्तिमान होता है। इसकी रचना दैवीय है। अखिल ब्रह्मांड की रचना का यंत्र होने से इसमें संपूर्ण शक्तियां और सिद्धियां विराजमान रहती हैं। स्व शरीर को एवं अखिल ब्रह्मांड को श्रीयंत्र स्वरूप जानना बड़े भारी तप का फल है। इन तीनों की एकता की भावना से शिवत्व की प्राप्ति होती है तथा साधक अपने मूल आत्मस्वरूप को प्राप्त कर लेता है ।
श्री यंत्र का आध्यात्मिक स्वरूप पूर्ण विधान से श्री यंत्र का पूजन जो एक बार भी कर ले, वह दिव्य देहधारी हो जाता है। दत्तात्रेय ऋषि एवं दुर्वासा ऋषि ने भी श्री यंत्र को मोक्षदाता माना है। इसका मुख्य कारण यह है कि मनुष्य शरीर की भांति, श्री यंत्र में भी 9 चक्र होते हैं।

* पहला चक्र मनुष्य शरीर में मूलाधार चक्र होता है। शरीर में यह रीढ़ की हड्डी के सबसे नीचे के भाग में, गुदा और लिंग के मध्य में है। श्री यंत्र में यह अष्ट दल होता है। यह रक्त वर्ण पृथ्वी तत्व का द्योतक है। इसके देव ब्रह्मा हैं
* दुसरा चक्र  स्वाधिष्ठान चक्र  यह लिंग स्थान के सामने है।  श्री यंत्र में इसकी स्थिति चतुर्दशार चक्र में बनी होती है। यह जल तत्व का द्योतक है। इसके देव विष्णु भगवान हैं।
* तीसरा चक्र मणीपुर चक्र यह नाभी के पीछे मेरु दंड के अंदर होता है। यह दश दल का होता है। श्री यंत्र में यह त्रिकोण है और अग्नि तत्व का द्योतक होता है। यंत्र के देव बुद्ध रुद्र माने गये हैं।

* चौथा चक्रअनाहत चक्र होता है। मनुष्य शरीर में यह हृदय के सामने होता है। यह द्वादश दल का है। श्री यंत्र में यह अंतर्दशार चक्र कहा जाता है। यह वायु तत्व का द्योतक माना जाता है। इसके देव ईशान रुद्र माने गये हैं।
* पांचवां चक्र विशुद्ध चक्र होता है। मनुष्य शरीर में यह कंठ में होता है। यह 16 दल का है। श्री यंत्र में यह अष्टकोण होता है। यह आकाश तत्व का द्योतक माना गया है। इसके देव भगवान शिव माने जाते हैं।
* छठा चक्र आज्ञा चक्र होताहै। मनुष्य शरीर में यह मेरुदंड  लँबिका स्थान ( दोनो भौओ के मध्य ) में माना गया है। यह 2 दलों का है। श्री यंत्र में इसकी स्थिति त्रिकोण मे मानी जाती है।
* सातवां चक्र सहस्रार चक्र  इंद्र योनि,जो शरीर में मेरुदण्ड के  ब्रहम नाडी मे माना गया है और श्री यंत्र में इसकी स्रिथति बिन्दु रूप में मानी जाती है।
* आठवा कुल  और नवम अकुल चक्र माना जाता है। श्री यंत्र में यह नूपुर के रूप में अंकित होता है। श्रीर  यंत्र के पूजन और उसे जागृत करते समय दश मुद्राएं होती हैं। इनमें संक्षोभिणी मुद्रा, द्रावणी मुद्रा, आकर्षिणी मुद्रा, वश्य उन्माद मुद्रा, महाङ्गशा मुद्रा, खेचरी मुद्रा, बीज मुद्रा, योनि मुद्रा, त्रिखंडा मुद्रा हैं। मुद्राओं के प्रयोग का एक कारण यह है कि मुद्राओं से सभी नाड़ियों में प्राण का सहज गति से प्रवेश, वीर्य की स्थिरता, कषायों और पातकों का नाश, सर्वरोगों का उपशमन्, जठराग्नि की वृद्धि, शरीर की निर्मल कांति, जरा का नाश,पंच तत्वों पर विजय एवं नाना प्रकार की योग सिद्धियों की प्राप्ति इनका मुख्य कार्य माना गया है। कुंडलिनी शक्ति का उद्बोधन, मुद्राभ्यास से ब्रह्म द्वार, या सुषुम्ना मुख से निद्रिता कुल कुंडलिनी जागृत हो कर ऊपर की ओर उठाने का कार्य मुद्राओं से होता है। इसी कारण श्री यंत्र को जागृतकरने में खेचरी मुद्रा को शामिल किया गया है।
दत्त ऋषि ने जमदाग्नि पुत्र परसराम जी से कहा कि यंत्र के पूजन से लाख गुणा फल अधिक होता है। इसी कारण यंत्रों को विशेष स्थान प्राप्त है। साथ ही श्री विद्या को दस महाविद्याओं में सर्वश्रेष्ठ, केवल मोक्ष प्रदान करने के कारण ही, माना गया है। इसी कारण श्री यंत्र को यंत्रराज की उपाधि दी गयी है। इस विद्या को अति गोपनीय रखा गया है और बिना पात्रता के श्री विद्या की दीक्षा नहीं दी जाती है। यही कारण है कि श्री यंत्र को जागृत करने वाले विद्वान बहुत ही कम हैं। यदि आम जन श्री यंत्र विद्या के साधक को साधक के रूप में पहचान लें, तो वह समय उसकी मृत्यु का माना जाता है, क्योंकि आम जन के जानने से उसे यश प्राप्त होता है, जो मोक्ष और सिद्धि में बाधक है।
श्री यंत्र में ऊध्र्वमुखी 5 त्रिकोण, 5 प्राण, 5 ज्ञानेंद्रियां, 5 तन्मात्रा और 5 माया भूतों के प्रतीक हैं। मनुष्य शरीर में येअस्थि, मेदा, मांस, अवृक और त्वक् के रूप में विद्यमान हैं। 4 त्रिकोण शरीर में प्राण, शुक्र, मज्जा, जीने के द्योतक हैं और ब्रह्मांड में मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के प्रतीक हैं। श्री यंत्र में त्रिकोण, अष्ट कोण, अंतर्दशार, बहिर्दशार और चतुरस्व, ये 5 शक्ति चक्र होते हैं और बिंदु, अष्ट दल, षोडश दल और चतुरस्त्र, ये 4 शिव चक्र होते हैं। श्री यंत्र में कुल 43 त्रिकोण होते हैं। ये त्रिकोणों के मंथन और योग से बने षट्कोण यंत्र हैं।

#ब्रम्हविद्या-श्रीविद्या-श्री चक्र-विराट षोडशी-राजराजेश्वरी श्री श्री ललिता महात्रिपुरमहासुन्दरी श्री महालक्ष्मी महाविद्या” —
साधक की आत्मा व मस्तिष्क इतने शक्तिशाली हो जाते है।

#श्रीविद्या – परिचय
एक बार पराम्बा पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि आपके द्वारा प्रकाशित तंत्रशास्त्र की साधना से मनुष्य समस्त आधि-व्याधि, शोक-संताप, दीनता-हीनता से मुक्त हो जायेगा। किंतु सांसारिक सुख, ऐश्वर्य, उन्नति, समृद्धि के साथ जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति कैसे प्राप्त हो इसका कोई उपाय बताईये।

भगवती पार्वती के अनुरोध पर कल्याणकारी शिव ने श्रीविद्या साधना प्रणाली को प्रकट किया। श्रीविद्या साधना भारतवर्ष की परम रहस्यमयी सर्वोत्कृष्ट साधना प्रणाली मानी जाती है। ज्ञान, भक्ति, योग, कर्म आदि समस्त साधना प्रणालियों का समुच्चय (सम्मिलित रूप) ही श्रीविद्या-साधना है।

श्रीविद्या साधना की प्रमाणिकता एवं प्राचीनता
जिस प्रकार अपौरूषेय वेदों की प्रमाणिकता है उसी प्रकार शिव प्रोक्त होने से आगमशास्त्र (तंत्र) की भी प्रमाणिकता है। सूत्ररूप (सूक्ष्म रूप) में वेदों में, एवं विशद्रूप से तंत्र-शास्त्रों में श्रीविद्या साधना का विवेचन है।

शास्त्रों में श्रीविद्या के बारह उपासक बताये गये है- मनु, चन्द्र, कुबेर, लोपामुद्रा, मन्मथ, अगस्त्य अग्नि, सूर्य, इन्द्र, स्कन्द, शिव और दुर्वासा ये श्रीविद्या के द्वादश उपासक है।

श्रीविद्या के उपासक आचार्यो में दत्तात्रय, परशुराम, ऋषि अगस्त, दुर्वासा, आचार्य गौडपाद, आदिशंकराचार्य, पुण्यानंद नाथ, अमृतानन्द नाथ, भास्कराय, उमानन्द नाथ प्रमुख है।

इस प्रकार श्रीविद्या का अनुष्ठान चार भगवत् अवतारों दत्तात्रय, श्री परशुराम, भगवान ह्यग्रीव और आद्यशंकराचार्य ने किया है। श्रीविद्या साक्षात् ब्रह्मविद्या है।#श्रीयंत्र

यह सर्वाधिक लोकप्रिय प्राचीन यन्त्र है,इसकी अधिष्टात्री देवी स्वयं श्रीविद्या अर्थात त्रिपुर सुन्दरी हैं,और उनके ही रूप में इस यन्त्र की मान्यता है। यह बेहद शक्तिशाली ललितादेवी का पूजा चक्र है,इसको त्रैलोक्य मोहन अर्थात तीनों लोकों का मोहन यन्त्र भी कहते है।

यह सर्व रक्षाकर सर्वव्याधिनिवारक सर्वकष्टनाशक होने के कारण यह सर्वसिद्धिप्रद सर्वार्थ साधक सर्वसौभाग्यदायक माना जाता है। इसे गंगाजल और दूध से स्वच्छ करने के बाद पूजा स्थान या व्यापारिक स्थान तथा अन्य शुद्ध स्थान पर रखा जाता है। इसकी पूजा पूरब की तरफ़ मुंह करके की जाती है,श्रीयंत्र का सीधा मतलब है,लक्ष्मी यंत्र जो धनागम के लिये जरूरी है।

श्रीयंत्र अलौकिक शक्ति व चमत्कारों से परिपूर्ण गुप्त शक्तियों का प्रजनन केन्द्र बिद्नु कहा गया है। जिस प्रकार से सब कवचों से चन्डी कवच सर्वश्रेष्ठ कहा गया है,उसी प्रकार से सभी देवी देवताओं के यंत्रों में श्रीदेवी का यंत्र सर्वश्रेष्ठ कहा गया है।

इसी कारण से इसे यंत्रराज की उपाधि दी गयी है। इसे यन्त्रशिरोमणि भी कहा जाता है। दीपावली धनतेरस बसन्त पंचमी अथवा पौष मास की संक्रान्ति के दिन यदि रविवार हो तो इस यंत्र का निर्माण व पूजन विशेष फ़लदायी माना गया है

श्रीयंत्र का मूल मंत्र:-

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महा-लक्ष्म्यै नमः

सिद्ध श्री यंत्र ही देता है फल आज बाजार में रत्नों के बने श्री यंत्र आसानी से प्राप्त हो जाते हैं किंतु वे सिद्ध नहीं होते। सिद्ध श्री यंत्र में विधिपूर्वक हवन-पूजन करके देवी-देवताओं को प्रतिष्ठित किया जाता है तब श्री यंत्र समृद्धि देने वाला बनता है। यह आवश्यक नहीं कि श्री यंत्र रत्नों का बना हो।

श्री यंत्र तांबे पर बना हो अथवा भोज पत्र पर जब तक उसमें मंत्र शक्ति विधिपूर्वक प्रवाहित नहीं की गई हो तब तक वह श्री प्रदाता अर्थात धन प्रदान करने वाला नहीं होता।

पौराणिक कथा

श्री यंत्र के संदर्भ में एक कथा का वर्णन मिलता है। उसके अनुसार एक बार आदि शंकराचार्यजी ने कैलाश मान सरोवर पर भगवान शंकर को कठिन तपस्या कर प्रसन्न कर दिया। भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर उनसे वर मांगने के लिए कहा। आदि शंकराचार्य ने विश्व कल्याण का उपाय पूछा।

भगवान शंकर ने शंकराचार्य को साक्षात लक्ष्मी स्वरूप श्री यंत्र की महिमा बताई और कहा- यह श्री यंत्र मनुष्यों का सर्वथा कल्याण करेगा। श्री यंत्र परम ब्रह्म स्वरूपिणी आदि प्रकृतिमयी देवी भगवती महा त्रिपुर सुदंरी का आराधना स्थल है क्योंकि यह चक्र ही उनका निवास और रथ है। श्री यंत्र में देवी स्वयं मूर्तिवान होकर विराजती हैं इसीलिए श्री यंत्र विश्व का कल्याण करने वाला है।

आज के यांत्रिक युग में जबकि मनुष्य अनेक प्रकार की समस्याओं से आक्रान्त है, अगर वह श्रीयंत्र की स्थापना करें तो यह यंत्र उसके लिए रामबाण सिद्व हो सकता है।

इस यंत्र को पूर्ण श्रद्वा, विश्वास से अपने व्यवसाय, दुकान, ऑफिस , फैक्टरी आदि में स्थापित करना चाहिए। इसकी प्रतिदन पूजा से श्रीलक्ष्मी प्रसन्न होती है। तथा साथक धनाढय बनता है आज जबकि वास्तु का युग है, प्रत्येक व्यक्ति वास्तु के द्वारा सुख भी प्राप्ति करना चाहता है। ऐसे में श्रीयंत्र की स्थापना और भी आवश्यक हो जाती है।

आदिकालीन विद्या का द्योतक हैं वास्तव में प्राचीनकाल में भी वास्तुकला अत्यन्त समृद्व थी। श्रीयंत्र में सर्वप्रथम धुरी में एक बिन्दु और चारो तरफ त्रिकोण है, इसमें पांच त्रिकोण बाहरी और झुकते है जो शक्ति का प्रदर्शन करते हैं और चार ऊपर की तरफ त्रिकोण है, इसमें पांच त्रिकोण बाहरी और झुकते हैं जो शक्ति का प्रदर्शन करते है और चार ऊपर की तरफ शिव ती तरफ दर्शाते है।

अन्दर की तरफ झुके पांच-पांच तत्व, पांच संवेदनाएँ, पांच अवयव, तंत्र और पांच जन्म बताते है। ऊपर की ओर उठे चार जीवन, आत्मा, मेरूमज्जा व वंशानुगतता का प्रतिनिधत्व करते है। चार ऊपर और पांच बाहारी ओर के त्रिकोण का मौलिक मानवी संवदनाओं का प्रतीक है। यह एक मूल संचित कमल है।

आठ अन्दर की ओर व सोलह बाहर की ओर झुकी पंखुड़ियाँ है। ऊपर की ओर उठी अग्नि, गोलाकर, पवन,समतल पृथ्वी व नीचे मुडी जल को दर्शाती है। ईश्वरानुभव, आत्मसाक्षात्कार है। यही सम्पूर्ण जीवन का द्योतक है। यदि मनुष्य वास्तव में सुखी और सृमद्व होना चाहता है तो उसे श्रीयंत्र स्थापना अवश्य करनी चाहिये।

अनन्त ऐश्वर्य एवं लक्ष्मी प्राप्ति के मुमक्ष को चाहिए कि श्री यंत्र के सम्मुख श्री सूक्त का पाठ करो पंचमेवा देवी को भोग लगायें तो शीघ्र ही इसका चमत्कार होता है।

यंत्र का उपयोगइस यंत्र को व्यापार वृद्धि के लिए तिजोरी में रखा जाता है धान्य वृद्धि के लिए धान्य में रखा जाता है

इस यंत्र को वेलवृक्ष की छाया में उपासना करने से लक्ष्मी शीघ्र प्रसन्न होती है और अचल सम्पत्ति प्रदान करती हैं।

इस यंत्र को सम्मुख रखकर सूखे वेलपत्र घी में डुबोकर वेल की समिधा में आहूति डालने से मां भगवती शीघ्र ही प्रसन्न होती है एवं धन ऐश्वर्य प्राप्त होता है तथा जीवन भर लक्ष्मी के लिए दुखी नहीं होना पड़ता।

मान्यता है कि भोजपत्र की अपेक्षा तांबे पर बने श्रीयंत्र का फल सौ गुना, चांदी में लाख गुना और सोने पर निर्मित श्रीयंत्र का फल करोड़ गुना होता है। ‘रत्नसागर’ में रत्नों पर भी श्रीयंत्र बनाने की बात लिखी गई है।

इनमें स्फटिक पर बने श्रीयंत्र को सबसे अच्छा बताया गया है। विद्वानों की ऐसी धारणा है कि भोजपत्र पर 6 वर्ष तक, तांबे पर 12 वर्ष तक, चांदी में 20 वर्ष तक और सोना धातु में श्रीयंत्र आजीवन प्रभावी रहता है।

केसर की स्याही से अनार की कलम द्वारा भोजपत्र पर श्रीयंत्र बनाया जाना चाहिए। धातु पर निर्मित श्रीयंत्र की रेखाएं यदि खोदकर बनाई गई हों और गहरी हों, तो उनमें चंदन, कुमकुम आदि भरकर पूजन करना चाहिए।
दीपावली की रात गृहस्थ के लिए श्री यंत्र सिद्ध करना सबसे आसान है।

इसके लिए पूजन के बाद लक्ष्मी मंत्र-

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महा-लक्ष्म्यै नमः

की 11 माला का जाप करें। साथ ही श्री यंत्र की स्थापना कर उसका पूजन करें तो वह सिद्ध हो जाएगा।
” # श्रीयंत्र “

” चतुर्थिः श्री कण्ठेः, शिवयुवतिभिः पंच भिरपि। प्रभिन्नाभिः शम्भोर्नवभिरपि मूल प्रकृतिभिः!त्रयश्चत्वारिशद्बसुदल कलाब्जत्रिविलय। त्रिरेखाभिः साधेः तव मव कोणः परिणताः !!

आनन्द लहरी में श्री शंकराचार्य ने बताया है कि 4 श्री कंठों (शिवस्वरूप),
पांच शिव की युवतियों,
शंभू की 9 अभिन्न मूल प्रकृति,
43 वसुदर,
कलाकब्ज की त्रिविलय, तीन रेखाओं के साथ इस महामंत्र में परिलक्षित हैं।

‘श्री यंत्र ‘समस्त यंत्रों में सर्वश्रेष्ठ है।
यह भगवती श्री त्रिपुर संदुरी का यंत्र है।
‘योगिनी हृदय’ ग्रंथ के अनुसार आद्या शक्ति अपने बल से ब्रह्माण्ड का रूप लेकर स्वयं अपने स्वरूप को निहारती हैं तो वहीं से ‘श्री चक्रों’ का प्रादुर्भाव होता है।

श्री यंत्र के केन्द्र में बिंदु है।
इस बिंदु के चारों ओर 9 त्रिकोण हैं जो नवशक्ति के प्रतीक हैं।

5 त्रिकोण को शक्ति स्वरूप माना जाता है।
ये (पांच त्रिकोण) पंच प्राण, पंच ज्ञानेन्द्रियां, पंच कर्मेन्द्रियां, पंच तन्मात्रा और पंच महाभूत का प्रतिनिधित्व करते हैं।

नीचे के चार त्रिकोण शिव स्वरूप माने जाते हैं।
ये शरीर में जीवात्मा, प्राण, मज्जा और शुक्र को परिलक्षित करते हैं और
मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार के द्योतक हैं।
इस तरह से ये 9 त्रिकोण 9 मूल प्रकृति का प्रतीक हैं।

इसके पश्चात इस यंत्रराज में पहले वृत्त के बाहर आठ दल का कमल और उसके पश्चात इस वृत्त के बाहर 16 दल का कमल है।

इस यंत्र में उर्ध्वमुखी त्रिकोण, अग्नितत्व का,
वृत्त वायु का,
बिंदु आकाश का और
भूपुर पृथ्वी तत्व का प्रतीक हैं।
कुल मिलाकर यंत्रराज श्री यंत्र स्वयं में मानव शरीर का ही प्रतिनिधित्व करते हैं।

” यदि इस प्राणप्रचलित चैतन्य महायंत्र के सामने धनतेरस या दीपावली से आरंभ करके नित्य 16 पाठ श्री सूक्त के किए जाएं तो यह यंत्र धीरे-धीरे जागृत होने लगता है।”

यह सर्वाधिक लोकप्रिय प्राचीन यन्त्र है,
इसकी अधिष्टात्री देवी स्वयं श्रीविद्या अर्थात त्रिपुर सुन्दरी हैं तथा उनके ही रूप में इस यन्त्र की मान्यता है।
इसे गंगाजल और दूध से स्वच्छ करने के बाद पूजा स्थान या व्यापारिक स्थान तथा अन्य शुद्ध स्थान पर रखा जाता है। इसकी पूजा पूर्व दिशा की तरफ़ मुंह करके की जाती है,
दीपावली धनतेरस बसन्त पंचमी अथवा पौष मास की संक्रान्ति के दिन यदि रविवार हो तो इस यंत्र का निर्माण व पूजन विशेष फ़लदायी माना गया है।

इस यंत्र की महिमा जग प्रसिद्ध है।
समस्त मठों और मंदिरों में इस यंत्रराज का पूजन अवश्य किया जाता है जिससे उनका वैभव अक्षुण्ण रहता है।

सोमनाथ मंदिर में प्रत्येक ईंट पर यह यंत्र स्थापित था, जिसकी वजह से वहां अकूत सम्पदा थी, जिससे महमूद गजनवी ने उसे बार-बार लूटा, ऐसी मान्यता है।

साधना –

नवरात्रि, धनतेरस के दिन ‘श्रीयंत्र’ का पूजन करने से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं।
तंत्र ग्रंथों में दीपावली को कालरात्रि, यक्षरात्रि, महानिशा कहा गया है।
इस रात्रि में आद्य शक्ति महालक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करने आती है और श्री यंत्र गणपति, यंत्र – लक्ष्मी यंत्र – कुबेर यंत्र सहित अपनी पूजा अर्चना होते देखती है वहीं  पर अपनी कृपा अनुकम्पा की वर्षा करती जाती है , जिसके प्रभाव से साधक वर्ष भर तक सुख-समृद्धि प्राप्त करता रहता है।

महालक्ष्मी की साधना-उपासना में सिद्ध प्राण प्रतिष्ठित ताम्रपत्र के श्री यंत्र या पारद श्री यंत्र , गणपति यंत्र, कुबेर यंत्र, अति आवश्यक है ।
लक्ष्मी साधना का मूल मंत्र आप नियमित 108 बार श्रद्धा से घर-प्रतिष्ठान में जप करें।

” ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः! “

” ह्रीं ऐश्वर्य श्री धन्म्धान्यादिपत्ये ऐं पूर्णत्व लक्ष्मी सिद्धये नमः ! “

” ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं सिद्ध लक्षम्ये नमः ! “

चमत्कारी साबर मंत्र –
” श्री शुक्ले महाशुक्ले कमल दल निवासे श्री महालक्ष्मी नमो नम: लक्ष्मी माई सत की सवाई-आओं चेतो करो भलाई, भलाई ना करो तो सात समुद्रों की दुहाई-मेरी ऋध्दि-सिध्दि खाओही (खाओगी) तो  नौ नाथ चौरासी सिद्धों की दुहाई ।”

#अक्षय तृतीया पर विशेष साधना●

#अक्षय पात्र साधना (दक्षिणावर्ती शंख)◆

जीवनदायनी कुदरत ने सब को एक समान जीवन दिया है|एक समान इसलिए कह रहI हूँ क्योकि शायद सांस लेने को ही हम लोगो ने जीवन मान लिया है क्योकि सांस रुक जाने की प्रक्रिया को तो हम लोग मृत्यु मानते है ना….और यदि ऐसा ही है तो क्या पड़ी थी ईश्वर को हमे मानव देह देने कि क्योकि सांस लेना,पेट भरना,बच्चे पैदा करना और फिर अन्त में मर जाना ये सब क्रिया कलाप तो जानवर भी करते ही है….और यदि हम में कोई विलक्षणता नहीं तो हम में और जानवरों में फर्क भी क्या है….बस इतना कि हमें बोलने के लिए भगवान ने जुबां दी है, हम एक दूसरे की भावनाएं समझ सकते है तो जानवर भी एक दूसरे कि भाषा समझते है, एक दूसरे के भाव समझ लेते है तो उनमें और हम में मात्र एक ही आधारित भेद ये है कि हम विवेक से काम ले सकते है तो यदि हम में सोचने समझने कि क्षमता है तो क्या ये उचित है कि हम सब कुछ जानते बूझते हुए भी दरिद्रता वाला जीवन जियें…क्या ये हमारी गलती नहीं है कि कल-कल करती बहती नदी हमारे सामने बह रही है और फिर भी हम चीख-पुकार मचा रहे है कि हमे प्यास लगी है…..ठीक इसी तरह होते हुए भी यदि हम अपूर्णता, दरिद्रता और आभावों से युक्त जीवन जीते हैं तो हमसे बड़ा बदनसीब कोई नहीं हो सकता और दूसरी बात कहते है कि ,” जीवन में पैसा सब कुछ नहीं होता मगर बहुत कुछ जरूर होता है”.

यदि सम्पन्नता चाहिए तो दरिद्रता का नाश करना ही पड़ेगा….पर ऐसे धन का क्या लाभ जिसमें लक्ष्मी हमारा वरन तो कर ले पर उसे सम्भालने का सामर्थ्य हममें नहीं है??मतलब यदि देह रोग मुक्त नहीं है तो धन का क्या अभिप्राय रह जाता है|ऐसा धन किसी काम का नहीं जो हमें सांसरिक सुखो को भोगने के काम ना आ सके क्योकि अक्सर ऐसा होता है कि अगर किसी धनवान को कोई रोग हो जाए तो डाक्टर उसे सिर्फ दाल रोटी खाने को बोल देंगे जब कि वो कुछ भी और कितना भी महंगा भोजन खा सकता है और एक गरीब जिसको दो वक्त को रोटी के वभी वांदे होते है उसको कोई रोग होने पर ऐसी ऐसी चीज़े खाने को बता देंगे जो उस बेचारे की कल्पना के भी बाहर हो…..कहने का अभिप्राय ये है कि यदि आप हर तरह से सुपात्र हैं तो ही जीवन सपूर्ण हो पायेगा.

सदगुरुदेव हमेशा कहते है कि पात्र का अर्थ मात्र बर्तन से नहीं है इसका गूढ़ अर्थ हमारे जीवन से जुड़ा है| अगर हम में सुपात्रता नहीं है तो हम अपने गुरु से कुछ भी नहीं ले पायेंगे क्योकि यदि हमारी ही अंजुरी छोटी है तो दाने तो बाहर गिरेंगे ही…इसीलिए अच्छे सुपात्र बनने के लिए जीवन को अक्षय बनाना अति आवश्यक है क्योकि जो अजय है वही तो अमर होंने कि कला सीख पायेगा ना| किसी भी साधना को सिद्ध करने का मूल मंत्र ये है कि खुद को ही शिव और शक्ति मान के आपने आप को मंत्र बनाना सीख लिया जाए अर्थात मंत्र और आप में कोई भेद ना रहे…जैसे लक्ष्य भेदन के लिए इकाग्र्ता जरूरी है ठीक वैसे ही आपनी अन्तश्चेतना को इतना गहरा कर लो कि सदगुरुदेव कि उपस्थिति महसूस कर सको…महसूस कर सको उनके शरीर की दिव्य गंध जो आपने आप में अद्वितीय है…क्योकि जिस दिन ये हो जाएगा उसी दिन आपका जीवन भी अक्षय पात्र बन जाएगा … हर साधना के अपने कुछ निर्धारित नियम होते हैं जिनसे उस साधना को सिद्ध किया जा सकता है…वैसे ही अक्षय पात्र साधना के लिए…

१- आपके पास दक्षिणावर्ती शंख होना चाहिए
२- चावल जिसे आप आपनी क्षमता के हिसाब से रोज मंत्र जाप करने के बाद उस पात्र में दाल सको.
३- पीली धोती या साड़ी
४- आपकी दिशा पूरब या उत्तर होगी
५- ये रात कालीन साधना है
५- एक लाल कपड़ा

ये ११ दिनों की साधना है और पहले दिन इसकी २१ माला करनी होती है उसके बाद अगले ११ दिनों तक १-१ माला और यदि २१ माला हर दिन कर सको तो और अच्छा. गुरु चित्र के सामने पात्र को रख लो और साधना शुरू करने से पहले गुरु मंत्र करो क्योकि गुरु मंत्र हमारे और सदगुरुदेव के बीच सेटेलाइट का काम करता है. साधना में बैठने से पहले देह का शुद्ध होना बहुत जरूरी है और जितने दिन साधना चलेगी उतने दिन बिलकुल शुद्ध भोजन खाये. रोज रात को साधना के बाद थोड़े से चावल हाथ में लेकर उस पात्र में डाल दे और अंतिम दिन साधना सम्पन्न करने के बाद उस पात्र को चावल समेत लाल कपड़े में बाँध कर अपनी तिजोरी में या मंदिर में रख दें.

मंत्र

ओम ह्रीं श्रीं ह्रीं अक्षय पात्र सिद्धिम ह्रीं श्रीं ह्रीं ओम ||

OM HREENG SHREEM HREENG AKSHAY PATRA SIDDHIM HREENG SHREEM HREENG OM…

वस्तुतः किसी भी साधना की महत्ता तभी समझी जा सकती है,जब उसे स्वयं प्रयोग का देखा जाये,मात्र शब्दों का महिमामंडन करने से तो प्रयोग को नहीं समझा जा सकता, अब मर्जी आपकी है|

#सम्पुटिक_श्रीसूक्त क्या है ?
               यह सूक्त तीनसौ गुना फल देने वाला है क्यों कि इस श्रीसूक्त को दुर्गा सप्तशती के चतुर्थ अध्याय के “दुर्गे स्मृता हरसि” मंत्र के साथ लक्ष्मी जी का मूल 27अक्षरों वाले

“ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः”!

इस मंत्र के साथ श्रीसूक्त के हर एक मन्त्र को सम्पुटित किया गया है! इसलिये इस सूक्त की शक्ति तीन सौ गुना बढ़ जाती है!

इस सूक्त की खासियत यह है की इसमें न ही विनियोग-न्यास-संकल्प आदि करने की जरुरत है यह सिर्फ पाठ करने मात्र से ही फल देने लगता है। 

अगर आप ज्यादा दरिद्रता से जूझ रहे हैं तो प्रतिदिन 9 पाठ करें। पूर्ण श्रद्धा भक्ति युक्त करें। अवश्य फल देगा। 

।।साम्पुटिक श्रीसूक्त पाठ।।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः।

ॐ दुर्गे स्मृता हरसिभीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि। 
ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्ण रजतस्रजां।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह।।
दारिद्रदुखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्दचित्ता।

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे स्मृता हरसीभीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
ॐ तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनप गामिनीं।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहं।।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता। 

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे स्मृता हरसीभीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि। 
ॐ अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनाद प्रबोधिनीं।
श्रियं देवी मुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषतां।।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता।

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः। 
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि। 
ॐ कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीं।
पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहो पह्वये श्रियं।।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता।

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
ॐ चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियम लोके देवजुष्टामुदारां।
तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे।।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता।

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
ॐ आदित्यवर्णे तपसोधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोथबिल्वः।
तस्यफलानि तपसानुदन्तु मायान्त रायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः।।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता।

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः। 
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
ॐ उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतो सुराष्ट्रेस्मिन कीर्तिमृद्धिं ददातु में।।
दरिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता।

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः। 
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि। 
ॐ क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहं।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद में गृहात।।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि। 
ॐ गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करिषिणिं।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियं।।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता।

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
ॐ मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूप मन्नस्य मयी श्रीः श्रयतां यशः।।
दरिद्र्यदुःखभयहरिणी का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता।

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ कर्दमेन प्रजा भूता मयी संभव कर्दम।
श्रियं वासय में कुले मातरं पद्ममालिनीं।।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकारण्य सदार्द्रचित्ता।

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
ॐ आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस् में गृहे।
नि च देविं मातरं श्रियं वासय में कुले।।

दरिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्दचित्ता।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः। 
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि। 
ॐ आर्द्रां यः करिणिं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीं।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह।।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता।

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
ॐ आर्द्रां पुष्करिणिं पुष्टिं पिंगलां पद्ममालिनीं।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह।।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता।

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः। 
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
ॐ तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीं।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योश्वान विन्देयं पुरुषानहं।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहयादाज्यमन्वहं |
सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्री कामः सततं जपेत।।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता।

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।।
            ।।श्री महालक्ष्मयार्पणंअस्तु।।
#षोडशीश्रीमहात्रिपुरसुन्दरी_सहस्रनामस्तोत्रम्!!
       वामकेश्वर तंत्र में वर्णित यह षोडशी सहस्रनाम स्तोत्र अति दुर्लभ है जो भी मनुष्य जिस कामना पूर्ति के निमित्त इस स्तोत्र का पाठ करता है उसकी वह कामना अवश्य पूरी होती है।

संक्रांति काल अष्टमी नवमी चतुर्दशी अमावस पूर्णिमा व मंगलवार को विशेष रूप से इसका पाठ करने से मनुष्य को सर्व भोगों की प्राप्ति होती है पापों से मुक्ति मिलती है तथा ऐसा मनुष्य कामेश्वर देव के समान हो जाता है इस स्तोत्र का एक बार पाठ करने से पापों का नाश 10 बार पाठ करने से वाक् सिद्धि 10000 बार पाठ करने से जगत धारिणी परम देवी से साक्षात्कार होता है। 1 लाख बार पाठ करने से मनुष्य सांसारिक प्रपंच से मुक्त हो जाता है तथा अंत में शिव स्वरुप हो जाता है इसमें लेश मात्र भी संशय नहीं है।

यह स्तोत्र स्वयं भगवान शिव ने पार्वती पुत्र कार्तिकेय को तब बताया था जब कार्तिकेय ने उनसे पूछा कि ऐसी कौन सी साधना है इसके द्वारा सभी सिद्धियां मोक्ष तीर्थ फल यज्ञ फल आदि की लब्धि बिना कठोर तप आदि किये बिना ही प्राप्ति हो जाती है इस कारण इस सहस्र नाम का विशेष महत्व है।

विनियोग:- ॐ अस्य श्रीमहात्रिपुर सुन्दरी सहस्रनाम स्तोत्र मन्त्रस्य श्रीभगवान् दक्षिणा मूर्ति ऋषिः जगती छन्दः समस्त प्रकट गुप्त सम्प्रदाय कुल कौलोत्तीर्ण निर्गर्भ रहस्याचिन्त्य प्रभावती देवता ओम्बीजम् मायाशक्तिः कामराजबीज कीलकम् जीवो बीजम् सुषुम्ना नाडी सरस्वती शक्तिर्धर्मार्थकाम मोक्षार्थे जपे विनियोगः ॥
                      ।।ध्यानम्।।
आधारे तरुणार्कबिम्बरुचिरं हेमप्रभम्वाग्भवम्।
बीजं मन्मथमिन्द्रगोपसदृशं हृत्पंकजे संस्थितम्॥

विष्णुब्रह्मपदस्थशक्तिकलितं सोमप्रभा भासुरं ये।
ध्यायन्ति पदत्रयं तव शिवे ते यान्ति सौख्यं पदम्॥
                ।।अथ सहस्रनाम।।
कल्याणी कमला काली कराली कामरूपिणी ।
कामाख्या कामदा काम्या कामना कामचारिणी ॥

कालरात्रिर्महारात्रिः कपाली कालरूपिणी ।
कौमारी करुणामुक्तिः कलिकल्मषनाशिनी ॥

कात्यायनी कराधारा कौमुदी कमलप्रिया ।
कीर्तिदा बुद्धिदा मेधा नीतिज्ञा नीतिवत्सला ॥

माहेश्वरी महामाया महातेजा महेश्वरी ।
महाजिह्वा महाघोरा महादंष्ट्रा महाभुजा॥

महामोहान्धकारघ्नी महामोक्षप्रदायिनी।
महादारिद्र्यनाशा च महाशत्रुविमर्द्दिनी ॥

महामाया महावीर्या महापातकनाशिनी।
महामखा मन्त्रमयी मणिपूरकवासिनी ॥

मानसी मानदा मान्या मनश्चक्षू रणेचरा ।
गणमाता च गायत्री गणगन्धर्वसेविता ॥

गिरिजा गिरिशा साध्वी गिरिस्था गिरिवल्लभा ।
चण्डेश्वरी चण्डरूपा प्रचण्डा चण्डमालिनी ॥

चर्विका चर्चिकाकारा चण्डिका चारुरूपिणी।
यज्ञेश्वरी यज्ञरूपा जपयज्ञपरायणा॥

यज्ञमाता यज्ञभोक्त्री यज्ञेशी यज्ञसम्भवा।
सिद्धयज्ञक्रियासिद्धिर्यज्ञाङ्गी यज्ञरक्षिका॥

यज्ञक्रिया यज्ञरूपा यज्ञाङ्गी यज्ञरक्षिका ।
यज्ञक्रिया च यज्ञा च यज्ञायज्ञ क्रियालया॥

जालन्धरी जगन्माता जातवेदा जगत्प्रिया ।
जितेन्द्रिया जितक्रोधा जननी जन्मदायिनी ॥

गङ्गा गोदावरी चैव गोमती च शतद्रुका ।
घर्घरा वेदगर्भा च रेचिका समवासिनी ॥

सिन्धुर्मन्दाकिनी क्षिप्रा यमुना च सरस्वती ।
भद्रा रागविपाशा च गण्डकी विन्ध्यवासिनी ॥

नर्मदा सिन्धु कावेरी वेत्रवत्या सुकौशिकी ।
महेन्द्रतनया चैव अहल्या चर्मकावती ॥

अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका ।
पुरी द्वारावती तीर्था महाकिल्बिषनाशिनीइ ॥

पद्मिनी पद्ममध्यस्था पद्मकिञ्जल्कवासिनी ।
पद्मवक्त्रा चकोराक्षी पद्मस्था पद्मसम्भवा ॥

ह्रीङ्कारी कुण्डलीधारी हृत्पद्मस्था सुलोचना ।
श्रीङ्कारीभूषणा लक्ष्मीः क्लीङ्कारी क्लेशनाशिनी ॥

हरिवक्त्रोद्भवा शान्ता हरिवक्त्रकृतालया ।
हरिवक्त्रोद्भवा शान्ता हरिवक्षस्थलस्थिता ॥

वैष्णवी विष्णुरूपा च विष्णुमातृस्वरूपिणी ।
विष्णुमाया विशालाक्षी विशालनयनोज्ज्वला ॥

विश्वेश्वरी च विश्वात्मा विश्वेशी विश्वरूपिणी ।
विश्वेश्वरी शिवाराध्या शिवनाथा शिवप्रिया ॥

शिवमाता शिवाख्या च शिवदा शिवरूपिणी ।
भवेश्वरी भवाराध्या भवेशी भवनायिका ॥

भवमाता भवगम्या भवकण्टकनाशिनी ।
भवप्रिया भवानन्दा भवानी भवमोहिनी ॥

गायत्री चैव सावित्री ब्रह्माणी ब्रह्मरूपिणी ।
ब्रह्मेशी ब्रह्मदा ब्रह्मा ब्रह्माणी ब्रह्मवादिनी ॥

दुर्गस्था दुर्गरूपा च दुर्गा दुर्गार्तिनाशिनी ।
सुगमा दुर्गमा दान्ता दया दोग्ध्री दुरापहा ॥

दुरितघ्नी दुराध्यक्षा दुरा दुष्कृतनाशिनी ।
पञ्चास्या पञ्चमी पूर्णा पूर्णपीठनिवासिनी ॥

सत्त्वस्था सत्त्वरूपा च सत्त्वस्था सत्त्वसम्भवा ।
रजस्स्था च रजोरूपा रजोगुणसमुद्भवा ॥

तमस्स्था च तमोरूपा तामसी तामसप्रिया ।
तमोगुणसमुद्भूता सात्त्विकी राजसी कला ॥

काष्ठा मुहूर्ता निमिषा अनिमेषा ततः परम् ।
अर्द्धमासा च मासा च सँवत्सरस्वरूपिणी ॥

योगस्था योगरूपा च कल्पस्था कल्परूपिणी ।
नानारत्नविचित्राङ्गी नानाभरणमण्डिता ॥

विश्वात्मिका विश्वमाता विश्वपाशविनाशिनी ।
विश्वासकारिणी विश्वा विश्वशक्तिविचारणा ॥

यवाकुसुमसङ्काशा दाडिमीकुसुमोपमा ।
चतुरङ्गी चतुर्बाहुश्चतुराचारवासिनी ॥

सर्वेशी सर्वदा सर्वा सर्वदा सर्वदायिनी ।
माहेश्वरी च सर्वाद्या शर्वाणी सर्वमङ्गला ॥

नलिनी नन्दिनी नन्दा आनन्दा नन्दवर्द्धिनी ।
व्यापिनी सर्वभूतेषु शवभारविनाशिनी ॥

सर्वश‍ृङ्गारवेषाढ्या पाशाङ्कुशकरोद्यता ।
सूर्यकोटिसहस्राभा चन्द्रकोटिनिभानना ॥

गणेशकोटिलावण्या विष्णुकोट्यरिमर्दिनी ।
दावाग्निकोटिनलिनी रुद्रकोट्युग्ररूपिणी ॥

समुद्रकोटिगम्भीरा वायुकोटिमहाबला ।
आकाशकोटिविस्तारा यमकोटिभयङ्करी ॥

मेरुकोटिसमुच्छ्राया गणकोटिसमृद्धिदा ।
निष्कस्तोका निराधारा निर्गुणा गुणवर्जिता ॥

अशोका शोकरहिता तापत्रयविवर्जिता ।
वसिष्ठा विश्वजननी विश्वाख्या विश्ववर्द्धिनी ।
चित्रा विचित्रचित्राङ्गी हेतुगर्भा कुलेश्वरी ।
इच्छाशक्तिर्ज्ञानशक्तिः क्रियाशक्तिः शुचिस्मिता ॥

शुचिः स्मृतिमयी सत्या श्रुतिरूपा श्रुतिप्रिया ।
महासत्त्वमयी सत्त्वा पञ्चतत्त्वोपरिस्थिता ॥

पार्वती हिमवत्पुत्री पारस्था पाररूपिणी ।
जयन्ती भद्रकाली च अहल्या कुलनायिका ॥

भूतधात्री च भूतेशी भूतस्था भूतभावना ।
महाकुण्डलिनी शक्तिर्महाविभववर्द्धिनी ॥

हंसाक्षी हंसरूपा च हंसस्था हंसरूपिणी ।
सोमसूर्याग्निमध्यस्था मणिमण्डलवासिनी ॥

द्वादशारसरोजस्था सूर्यमण्डलवासिनी ।
अकलङ्का शशाङ्काभा षोडशारनिवासिनी ॥

डाकिनी राकिनी चैव लाकिनी काकिनी तथा ।
शाकिनी हाकिनी चैव षट्चक्रेषु निवासिनी ॥

सृष्टिस्थितिविनाशाय सृष्टिस्थित्यन्तकारिणी ।
श्रीकण्ठप्रियहृत्कण्ठा नन्दाख्या बिन्दुमालिनी ॥

चतुष्षष्टिकलाधारा देहदण्डसमाश्रिता ।
माया काली धृतिर्मेधा क्षुधा तुष्टिर्महाद्युतिः ॥

हिङ्गुला मङ्गला सीता सुषुम्नामध्यगामिनी ।
परघोरा करालाक्षी विजया जयदायिनी ॥

हृत्पद्मनिलया भीममहाभैरवनादिनी ।
आकाशलिङ्गसम्भूता भुवनोद्यानवासिनी ॥

महत्सूक्ष्मा च कङ्काली भीमरूपा महाबला ।
मेनकागर्भसम्भूता तप्तकाञ्चनसन्निभा ॥

अन्तरस्था कूटबीजा त्रिकूटाचलवासिनी ।
वर्णाख्या वर्णरहिता पञ्चाशद्वर्णभेदिनी ॥

विद्याधरी लोकधात्री अप्सरा अप्सरः प्रिया ।
दीक्षा दाक्षायणी दक्षा दक्षयज्ञविनाशिनी ॥

यशः पूर्णा यशोदा च यशोदागर्भसम्भवा ।
देवकी देवमाता च राधिका कृष्णवल्लभा ॥

अरुन्धती शचीन्द्राणी गान्धारी गन्धमालिनी ।
ध्यानातीता ध्यानगम्या ध्यानज्ञा ध्यानधारिणी ॥

लम्बोदरी च लम्बोष्ठी जाम्बवन्ती जलोदरी ।
महोदरी मुक्तकेशी मुक्तकामार्थसिद्धिदा ॥

तपस्विनी तपोनिष्ठा सुपर्णा धर्मवासिनी ।
वाणचापधरा धीरा पाञ्चाली पञ्चमप्रिया ॥

गुह्याङ्गी च सुभीमा च गुह्यतत्त्वा निरञ्जना ।
अशरीरा शरीरस्था संसारार्णवतारिणी ॥

अमृता निष्कला भद्रा सकला कृष्णपिङ्गला ।
चक्रप्रिया  च चक्राह्वा पञ्चचक्रादिदारिणी ॥

पद्मरागप्रतीकाशा निर्मलाकाशसन्निभा ।
अधःस्था ऊर्द्ध्वरूपा च ऊर्द्ध्वपद्मनिवासिनी ॥

कार्यकारण कर्तृत्वे शश्वद्रूपेषु संस्थिता ।
रसज्ञा रसमध्यस्था गन्धस्था गन्धरूपिणी ॥

प्रब्रह्मस्वरूपा च परब्रह्मनिवासिनी ।
शब्दब्रह्मस्वरूपा च शब्दस्था शब्दवर्जिता ॥

सिद्धिर्बुद्धिः पराबुद्धिः सन्दीप्तिर्मध्यसंस्थिता ।
स्वगुह्या शाम्भवीशक्तिस्तत्त्वस्था तत्त्वरूपिणी ॥

शाश्वती भूतमाता च महाभूताधिपप्रिया ।
शुचिप्रेता धर्मसिद्धिर्धर्मवृद्धिः पराजिता ॥

कामसन्दीपिणी कामा सदा कौतूहलप्रिया ।
जटाजूटधरा मुक्ता सूक्ष्मा शक्तिविभूषणा ॥

द्वीपिचर्मपरीधाना चीरवल्कलधारिणी ।
त्रिशूलडमरुधरा नरमालाविभूषणा ॥

अत्युग्ररूपिणी चोग्रा कल्पान्तदहनोपमा ।
त्रैलोक्यसाधिनी साध्या सिद्धिसाधकवत्सला ॥

सर्वविद्यामयी सारा चासुराणाविनाशिनी ।
दमनी दामनी दान्ता दया दोग्ध्री दुरापहा ॥

अग्निजिह्वोपमा घोरा घोरघोरतरानना ।
नारायणी नारसिंही नृसिंहहृदयेस्थिता ॥

योगेश्वरी योगरूपा योगमाता च योगिनी ।
खेचरी खचरी खेला निर्वाणपदसंश्रया ॥

नागिनी नागकन्या च सुवेशा नागनायिका ।
विषज्वालावती दीप्ता कलाशतविभूषणा ||

~~~~““~~~~““~~~~““~~~~~

।।जय सद्गुरुदेव, जय महाकाली।।

*अंतराष्ट्रीय सिद्धाश्रम परिवार-छत्तीसगढ़*

Posted in हिन्दू पतन

*संभल का मुस्लि म डीएम फरहत अली, जिसके पैरों में गिरकर रोए थे हिंदू कि बचा लो लेकिन जला दिए गए 180 हिंदू ।*
– संभल और कश्मीर की कहानी एक जैसी है । कश्मीर में जब लाखों हिंदुओं का 1989 और 1990 में पलायन हुआ तो देश का गृहमंत्री एक मुसल मान था, जिसका नाम था मुफ्ती मुहम्मद सईद (पूर्व मुख्यमंत्री और महबूबा मुफ्ती का पिता) और जब संभल में 1978 में संभल से हिंदुओं का भारी पलायन हुआ तो उस वक्त संभल का डीएम भी एक मुसल मान ही था जिसका नाम था फरहत अली ।

– 2 दिसम्बर 1989 को पहली बार भारत का गृहमंत्री एक मुसल मान बना था, 10 नवंबर 1990 तक मुफ्ती मुहम्मद सईद गृहमंत्री रहा और बस 11 महीने के कार्यकाल में ही कश्मीर घाटी हिंदू विहीन हो गई ।

-इंडिया टीवी ने संभल के 1978 के दंगा पीड़ितों पर एक रिपोर्ट की थी और इसी रिपोर्ट में दंगों के चश्मदीद रहे हिंदू व्यापारियों ने बताया है कि वो दंगा रोकने के लिए कर्फ्यू की मांग लेकर उस वक्त संभल के डीएम रहे फरहत अली के पास गए थे, आतंकी भीड़ नर संहार कर रही थी, हिंदू व्यापारी फरहत अली के कदमों में गिरकर रोने लगे, गिड़गिड़ाने लगे, अपनी बहन बेटियों की इज्जत की भीख मांगने लगे । लेकिन फरहत अली ने ना तो फोर्स भेजी और ना ही कोई सुरक्षा दी । उल्टे हिंदू नेताओं को गिरफ्तार किया गया जिसके बाद मुस्लि म दरिंदों सके हौसले बुलंद हो गए और वो सड़कों पर हिंदू महिलाओं का बला त्कार सरेआम करने लगे । हमास के आतंकि यों की तरह ये दरिंदे भी हिंदू औरतों का सामूहिक बला त्कार करके उनके स्त नों के निप्पल काटर खून बहाकर बेदर्दी से मारने लगे । ये नंगानाच देखकर लाखों हिंदू जान बचाने के लिए संभल से मुरादाबाद और दूसरे जिलों में भाग निकले । और दुर्योग देखिए कि आज मुरादाबाद भी एक मुस्लि म बहुल जिला बन चुका है कहां कहां से भागेंगे हिंदू ।

– ये 1978 की घटना थी और 2024 में रिकॉर्ड 52 मुस्लिम आईएस बने हैं, भारत के सरकारी मदद प्राप्त संस्थाओं में लाखों फरहत अली मुफ्त आईएसएस की कोचिंग ले रहे हैं !

– 17 अप्रैल 2014 को नवभारत टाइम्स में छपी रिपोर्ट के मुताबिक संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की जारी सिविल सर्विसेज मेरिट लिस्ट, 2023 में 50 से ज्यादा मुस्लिम कैंडिडेट्स ने जगह पाई थी। इनमें से 5 तो ऐसे हैं, जिन्हें टॉप-100 में जगह मिली थी । ये सिविल सर्विसेज में अब तक मुसलमानों की सबसे बड़ी सफलता थी । ये सारे जब अफसर बनकर जिलाधिकारी बनेंगे तो फरहत अली की तरह हिंदुओं का नर संहार ही करवाएंगे 1978 मैं कांग्रेस की सरकार थी जो एक जिहादी पार्टी है

– और दुख की बात ये है कि 6 जुलाई 2019 को जनसत्ता अखबार में छपी रिपोर्ट के मुताबिक भारत सरकार ने अल्पसंख्यकों के नाम पर आईएएस की तैयारी करवाने वाली संस्थाओं की फंडिंग में भी कई गुना वृद्धि कर दी थी । इससे भारत में चुने जाने वाले मुस्लिम अफसरों में रिकॉर्ड बढोतरी दर्ज की जा रही है । सभी नागरिकों से अनुरोध है कि वो अपने इलाके के विधायकों और सांसदों पर दबाव डालें कि वक्फ के साथ ही अल्पसंख्यकों के नाम पर दी जाने वाली ये फंडिंग भी बंद की जाए ।

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પૂજ્ય એકનાથજી  રાનડે ,જન્મ 19 નવેમ્બર 1914

પૂજ્ય એકનાથ રાનડે ભારતીય સમાજના એવા મહાન વ્યક્તિઓમાંના એક માનવામાં આવે છે જેમણે સંગઠન, સમર્પણ અને નિશ્ચયને પોતાના જીવન તરીકે સ્વીકાર્યા હતા. રાષ્ટ્રીય સ્વયંસેવક સંઘના સૌથી વરિષ્ઠ પ્રચારકોમાંના એક તરીકે, તેમણે તેમના કાર્ય દ્વારા દર્શાવ્યું કે અતૂટ શ્રદ્ધા અને ધ્યેય પ્રત્યે અતૂટ પ્રતિબદ્ધતાથી, અશક્ય લાગતા કાર્યો પણ પૂર્ણ કરી શકાય છે.

એકનાથનું સૌથી મોટું યોગદાન કન્યાકુમારીમાં વિવેકાનંદ સ્મારક  નિર્માણ છે. જ્યારે સ્વામી વિવેકાનંદની યાદમાં અને તેમના તપસ્યા સ્થળને ચિહ્નિત કરવા માટે એક ભવ્ય સ્મારક બનાવવાનો વિચાર આવ્યો, ત્યારે તેમણે રાજકીય મતભેદો, વહીવટી અવરોધો, નાણાકીય અવરોધો અને સ્થાનિક વિવાદો સહિત અનેક અવરોધોનો સામનો કરવો પડ્યો. જોકે, રાનડે અવિચલ રહ્યા. તેમણે આ પ્રયાસને માત્ર બાંધકામ પ્રોજેક્ટ નહીં, પરંતુ રાષ્ટ્રીય ચેતના જાગૃત કરવાની ચળવળ માનતા હતા. તેમણે સામાન્ય લોકોનો ટેકો મેળવવા માટે દેશના દરેક ખૂણામાં પ્રવાસ કર્યો. તેમણે નાનામાં નાના નાગરિકથી લઈને દેશના સૌથી મોટા ઔદ્યોગિક ગૃહો સુધી, દરેકને આ સ્મારક સાથે જોડ્યા.

તેમના અપ્રતિમ સંગઠનાત્મક કૌશલ્ય અને મજબૂત ઇચ્છાશક્તિના પરિણામે, દેશભરના 30 મિલિયનથી વધુ લોકોએ આ કાર્યમાં પ્રત્યક્ષ કે પરોક્ષ રીતે યોગદાન આપ્યું. આ સ્મારક સમાજ રાષ્ટ્રીય વારસા માટે કેવી રીતે એક થઈ શકે છે તેનું જીવંત પ્રતીક છે.

એકનાથજી એ પોતાને સ્મારક નિર્માણ સુધી મર્યાદિત રાખ્યા નહીં. તેમણે વિવેકાનંદ કેન્દ્રની સ્થાપના કરી અને સ્વામી વિવેકાનંદના ઉપદેશોને સમાજના છેવાડાના વ્યક્તિ સુધી પહોંચાડવા માટે એક અભિયાન શરૂ કર્યું. શિક્ષણ, સેવા અને સંસ્કૃતિના ક્ષેત્રોમાં વિવેકાનંદ કેન્દ્ર દ્વારા કરવામાં આવી રહેલ કાર્ય તેમના દૂરંદેશી નેતૃત્વ અને વિચારધારાનો સીધો પુરાવો છે.

તેમનું જીવન આપણને પ્રેરણા આપે છે કે રાષ્ટ્ર નિર્માણ ઉચ્ચ હોદ્દા કે શક્તિ દ્વારા પ્રાપ્ત થતું નથી, પરંતુ નિશ્ચય, સતત મહેનત અને સંગઠનાત્મક શક્તિ દ્વારા પ્રાપ્ત થાય છે. આજે, તેમની પુણ્યતિથિ પર, ચાલો આપણે બધા તેમની સ્મૃતિમાં પ્રતિજ્ઞા લઈએ કે આપણે સ્વામી વિવેકાનંદના આદર્શો અને રાણડેજીના સમર્પણને આપણા જીવનમાં સમાવીને ભારતને વિકસિત દેશ બનાવવા માટે સતત પ્રયત્નશીલ રહીશું.

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