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लालू प्रसाद यादव


राजद के इतिहास में ‘जंगल राज’ का वह काला अध्याय एक ऐसा धब्बा है, जिसे मिटाना असंभव-सा लगता है। यह केवल एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि बिहार की जनता की सामूहिक स्मृति में गहराई तक समाया हुआ दर्द है—अपराध, भय और अराजकता का प्रतीक।

चुनाव प्रचार की शुरुआत में तेजस्वी यादव ने कुशलता से मोर्चा संभाला। विकास, रोजगार और युवा-केंद्रित एजेंडा पर फोकस कर उन्होंने ‘जंगल राज’ के मुद्दे को बैकफुट पर धकेलने की कोशिश की। लगा भी कि शायद यह पुराना नैरेटिव इस बार फीका पड़ जाएगा।

लेकिन जैसे ही तेजस्वी ने सिवान से मोहम्मद शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शाह को टिकट थमाया, पूरे बिहार में एक झटका-सा लगा। शहाबुद्दीन—जो राजद शासन के दौरान अपराध के पर्याय थे—उनके बेटे को मैदान में उतारना किसी पुराने घाव को कुरेदने जैसा था। उस पीढ़ी की आंखों के सामने फिर से वही खौफनाक दृश्य घूमने लगे, जिसने लालू-राबड़ी राज में रातों की नींद उड़ा दी थी।

और फिर शुरू हुआ डिजिटल युद्ध। 
हम जैसे लोग—सोशल मीडिया के सैनिक—मैदान में कूद पड़े। पुराने वीडियो, अखबार कटिंग्स, कोर्ट के दस्तावेज़ और पीड़ितों के बयान—सब कुछ सामने लाया गया:

– चंपा बिस्वास बलात्कार कांड (1997): एक IAS अधिकारी की पत्नी के साथ दरिंदगी, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था की पोल खोल दी।

– शहाबुद्दीन का तेज़ाब कांड (1998): छोटू और राजू नामक दो भाइयों को ड्रम में डालकर जिंदा जलाने की क्रूरता—गवाह बनने की सजा। 

– शिल्पी-गौतम जैन हत्याकांड (1999): अपहरण, बलात्कार और हत्या—ऐसी वारदातें जो रोज़ की खबर बन गई थीं। 

– CBI अधिकारी यू.एन. बिस्वास पर हमला (1998): अपराधियों का इतना दुस्साहस कि जांच एजेंसी तक को नहीं बख्शा। 

– ललित सिन्हा हत्याकांड (1997): एक युवा व्यवसायी को दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या, सिर्फ़ इसलिए कि उसने शहाबुद्दीन के गुंडों का विरोध किया था। 

– चंदन कुमार हत्याकांड (1998): पटना में एक कॉलेज छात्र की हत्या, जिसे शहाबुद्दीन के इशारे पर अंजाम दिया गया—गवाह बनने की सजा। 

– गोपालगंज नरसंहार (1997): एक ही परिवार के 7 लोगों की हत्या, जिसमें बच्चे भी शामिल थे—राजद विधायक के भाई का हाथ माना गया।

– बाथानी टोला नरसंहार (1996): रणवीर सेना और राजद समर्थित गुंडों के बीच हिंसा में 21 दलितों की हत्या—न्याय आज तक अधूरा। 

– लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार (1997): 58 दलितों की सामूहिक हत्या, जिसमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल—शहाबुद्दीन जैसे नेताओं पर संरक्षण का आरोप। 

– पटना मेडिकल कॉलेज गोलीकांड (1998)*ल: छात्रों पर राजद कार्यकर्ताओं द्वारा फायरिंग, जिसमें एक छात्र की मौत—कैंपस में भी दहशत। 

आज हर हाथ में स्मार्टफोन है, हर घर में अंबानी का Jio। इंटरनेट ने इन पुरानी यादों को वायरल कर दिया। व्हाट्सएप ग्रुप्स, फेसबुक पोस्ट्स, इंस्टाग्राम रील्स—हर तरफ ‘जंगल राज’ ट्रेंड करने लगा। यह कोई संगठित कैंपेन नहीं था, बल्कि जनता की स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया थी।

अगर तेजस्वी ने ओसामा को टिकट न दिया होता, तो शायद नुकसान इतना गहरा न होता।

और रही-सही कसर पूरी कर दी राजद की दो प्रवक्ताओं कंचना यादव और प्रियंका गौतमने। उनकी आक्रामक, असंवेदनशील और तथ्यों से परे बयानबाजी ने मध्यम वर्ग, महिलाओं और शहरी मतदाताओं को पूरी तरह अलग कर दिया।

यह चुनाव साबित करता है: 
डिजिटल भारत में इतिहास को दबाया नहीं जा सकता। जनता की स्मृति अब सर्वर पर सेव है।
राजद की हार कोई आश्चर्य नहीं—यह पुराने पापों का हिसाब था, जो सोशल मीडिया के ज़रिए वसूला गया।

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बिहार पतन


– नरेंद्र मोदी की खाल उधड़वा लेंगे
– सुशील मोदी को घर में घुसकर मारेंगे
– एयरपोर्ट पर ही बाबा बागेश्वर को रोक देंगे

ये कुछ बयान हैं तेज प्रताप यादव के। वही तेज प्रताप यादव जिसके लिए अचानक दक्षिणी टोले में प्रेम उमड़ा हुआ है। भावनाओं का ऐसा सैलाब उमड़ा हुआ है कि हम भूल गए इसने बिहार की एक बेटी ऐश्वर्या के साथ क्या सलूक किया। वो तो भला हो महुआ की जनता का कि वह इस झांसे में नहीं आई।

अब वही प्रेम रोहिणी आचार्य को लेकर उमड़ रहा है। भावनाओं का ज्वार उठ गया है। रोहिणी के भीतर की घृणा से उनका टाइमलाइन भरा पड़ा है।

परिवार लालू यादव का। बच्चे लालू यादव के। लालू के घोटालों के माल पर मौज करने वाले बच्चे उनके। फिर उनके बच्चों की कथित लड़ाई, हमारी-आपकी या बिहार की क्यों हो गई?

हम क्यों तेज प्रताप से लेकर रोहिणी के लिए पार्टी बने। ये सारे एक दिन फिर एक होंगे। यदि गलती से भी मौका मिल गया तो बिहार का फिर उसी तरह मान-मर्दन करेंगे।

कोई संजय यादव, कोई रमीज इस स्थिति का दोषी नहीं। जब परिवार आपकी, पार्टी आपकी तो सारा दोष भी आपका है। कर्मचारियों को तो बलि का बकरा बनाया जा रहा ताकि जनता की आंखों में धूल झोंक, उनकी भावनाओं के साथ खेला जा सके।

ये कुछ इसी तरह है कि कुछ समय पहले एक सज्जन ने कहा कि यहां कुछ चुगलखोर हैं, उनसे सावधान रहिए। पर उन्हीं सज्जन को मैं उस चुगलखोर के इनपुट पर राय बनाते भी देखता हूं। दोषी कौन है- वे सज्जन या चुगलखोर?

इसलिए लालू प्रसाद के परिवार या उनके बच्चों के लिए अपनी संवेदनाओं को जाया मत करिए। इसको बचाकर बिहार के उन बच्चों परिवारों के लिए रखिए जो इसके सच्चे हकदार हैं।

इस परिवार ने बिहार को जितने घाव दिए हैं, वह सब इनको भोगना ही होगा। यही इनका प्रारब्ध है।

Posted in PM Narendra Modi

उसने सिर्फ़ एक बार #गमछा क्या लहराया….
…..बिहार में कारीगरों को 5 करोड़ से अधिक के गमछों का ऑर्डर मिल गया…

इसे कहते है ट्रेंड सेटर,…
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने विभिन्न भाषणों, ‘मन की बात’ कार्यक्रमों और स्वतंत्रता दिवस संबोधनों में ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के मंत्र के तहत कई स्थानीय उत्पादों का जिक्र किया है।

यह #बिहारी_गमछे (जिसका हाल ही में बिहार चुनावी जीत के दौरान प्रतीकात्मक उपयोग किया गया, जिसमें मधुबनी आर्ट शामिल था) की तरह ही स्थानीय कारीगरी और संस्कृति को बढ़ावा देने का प्रयास है।

गमछा को उन्होंने कोविड काल में मास्क के विकल्प के रूप में भी प्रचारित किया था।

मोदी जी ने मन की बात में #खादी का बोला तो खादी फैशन सिंबल बन गई
भाषणों में दैनिक जीवन में उपयोग की अपील, जैसे खादी उत्सव 2022 में। 75वें स्वतंत्रता वर्ष तक खरीदारी का संकल्प दिया तो पूरा देश खाड़ी की ओर दौड़ पड़ा

एक बार मेघालय के #एरी_सिल्क में बारे में बताया तो उसकी अप्रत्याशित बिक्री बढ़ गई क्यों कि ये मोदी जी ने बताया तब पूरे देश को पता चला कि ये सिल्क निर्माण में कीड़ों को उबाल कर सिल्क नहीं बनाया जाता ….जिसके कारण जैन समाज में इसकी स्वीकार्यता अचानक बढ़ गई,..

एक बार उन्होंने असम की एक दुकान से #असमी_गमोसा (गमछा) क्या खरीदा पूरे असम और बंगाल में वो एक फैशन सिंबल बन गया

सिर्फ कपड़े ही नहीं उन्होंने स्थानीय उत्पाद को भी बढ़ाया
कई बार #बांस का जिक्र किया… बांस के बने उत्पाद की बिक्री बढ़ गई
पहले तो बांस को पेड़ से घास की केटेगरी में डाला जिससे इसका व्यावसायिक उत्पादन ओर बिक्री सुलभ हो  देखते देखते बांस से फर्नीचर ही नहीं इथेनॉल तक बनने लगा जिससे किसानों की आय में वृद्धि हुई
(ओर कुछ तो अघोषित बांस खरीद रहे है चमचों के लिए 😄)

#मिलेट्स का जिक्र किया तो आज पूरा देश ओर सोशल मीडिया में मिलेट्स खाने ओर बनाने की रील की न सिर्फ बाढ़ आई मिलेटस की बिक्री ओर उत्पादन बढ़ गया

अभी बिहार चुनाव से पहले #मखाना बोर्ड बनाया मखाना किसानों को मखाने की खेती और बिक्री में सहायता करवाई तो आज मखाने की बिकी ओर उत्पादन बढ़ गया

असम की #शोरूमलाई साड़ी का जिक्र किया इसके बाद देश को पता चला ओर पूरे देश से इसकी डिमांड आई खादी ग्रामोद्योग के पास
यहां तक कि उसे GI टैग भी दिलवाया

#कांजीवरम सिल्क की साड़ी का जिक्र किया तो मानो महिलाओं में फिर से साड़ी का क्रेज बढ़ गया इस सिल्क के प्रति ओर बिक्री तो बढ़ना स्वाभाविक थी ही

और अब बिहारी गमछे का उपयोग कर जिस गमछे को गरीब मजदूर का पटका समझा जाता था आज वो फैशन सिंबल बन गया
सुना है कल तक बिहार के कारीगरों को करीब  5 करोड़ से अधिक का ऑर्डर मिला है

ये मोदी का करिश्माई व्यक्तित्व है और मोदी के प्रति लोगों का विश्वास और समर्पण है कि मोदी के कहे का अनुशरण करने लगते है
जिसका असर पूरे देश में कोविड काल में देखा है

🚩 Manish Soni