Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

गुप्ता जी दोपहर को अपने बरामदे में बैठे थे कि तभी एक अलसेशियन नस्ल का हष्ट पुष्ट व बेहद थका थका सा एक कुत्ता वहाँ पहुंच गया .
कुत्ते के गले में एक पट्टा भी था.
उसे देख गुप्ता जी ने मन ही मन सोचा …जरूर किसी अच्छे घर का पालतू कुत्ता है.
जब उन्होंने उसे पुचकारा तो वह उनके पास आ गया. फिर जब उन्होंने उस पर प्यार से हाँथ फिराया तो वो पूँछ हिलाता वहीं बैठ गया.
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कुछ देर बाद जब गुप्ता जी उठकर घर के अंदर गए तो वह कुत्ता भी उनके पीछे पीछे हॉल में चला आया और खिड़की के पास अपने पैर फैलाकर बैठा और देखते देखते ही सो गया.
गुप्ता जी ने भी हॉल का दरवाज़ा बंद किया और सोफे पर आ बैठे.
करीब एक घंटे सोने के बाद कुत्ता उठा और दरवाजे की तरफ गया तो उठकर गुप्ता जी ने दरवाज़ा खोल दिया.
कुत्ता घर के बाहर निकला और चला गया.
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अगले दिन उसी समय कुत्ता फिर आ गया. खिड़की के नीचे एक घंटा सोया और फिर चला गया.
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उसके बाद वो रोज आने लगा. आता, सोता और फिर चला जाता.
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गुप्ता जी के मन में उत्सुकता दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही थी कि इतना शरीफ, समझदार, व्यवहार कुशल कुत्ता आखिर है किसका और प्रतिदिन कहाँ से आता है?
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एक दिन गुप्ता जी ने उसके पट्टे में एक चिठ्ठी बाँध दी. जिसमें लिख दिया : आपका कुत्ता रोज मेरे घर आकर सोता है. ये आपको मालूम है क्या ?
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अगले दिन जब वो प्यारा सा कुत्ता आया तो गुप्ता जी ने देखा कि उसके पट्टे में एक चिठ्ठी बँधी हुई है.
उसे निकालकर उन्होंने पढ़ना शुरू किया…. जिसमें लिखा था : ये एक अच्छे घर का बहुत ही शांतिप्रिय कुत्ता है औऱ हमारे साथ ही रहता है लेकिन मेरी पत्नी की पूरे दिन की किटकिट, पिटपिट, चिकचिक, बड़बड़ के कारण वो सो नहीं पाता और रोज हमारे घर से कहीं चला जाता है.
अगर आप इजाजत दे दें तो मैं भी उसके साथ आ कर कुछ देर आपके घर सो सकता हूँ क्या …??

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ऐसा कहा जाता है कि पहला प्यार कभी नहीं भूलता और हर दिन यह विचार दिमाग में आता है कि, वह कहां होगी, कैसी होगी और क्या कर रही होगी….

एक बार घर पर,मेरा मोबाइल फोन बजा….
देखा तो एक अज्ञात नंबर था

मैंने फोन उठाया…..
सामने से एक मधुर आवाज आई:- क्या मैं रवि से बात कर सकती हूं..

आवाज थोड़ी जानी-पहचानी सी लगी….
मैंने कहा:-
हां बोलो,मैं रवि बोल रहा हूं,तुम कौन…

उसने कहा:- पहचानो,मेरा रोल नंबर 69 था…

रोल नंबर 69…
मुझे एक लड़की,रश्मि की याद दिलाई,जो स्कूल में मेरी एक सहपाठी थी,जिसने स्कूल के समय में कई प्रयासों के बावजूद मुझे महत्व नहीं दिया था….

तुरंत ही मैं घर के बाहर पहुंचा,दिल की धड़कन बढ़ गई, सांस भी रुक गई क्या करुं,समझ नहीं आ रहा था कि, कैसे बात करूं…

वह फिर बोली:- तुम कहां हो…
मैंने तुम्हें कितने सालों से नहीं देखा,मेरे पास तुम्हारा नंबर भी नहीं था,कल ही जीत मिला था,उससे तुम्हारा नंबर लिया और तुम्हें फोन किया….

अचानक उसने एक और बड़ा बम गिराया:-
मैं तुमसे मिलना चाहती हूं,कब समय है तुम्हारे पास…

मैंने तुरंत जवाब दिया:- रविवार को फ्री हूं….मिलते हैं…

उसने पूछा:- कहां मिलना है…

फिर उन्होंने शहर के सबसे अच्छे होटलों में से एक का नाम लिया और रविवार को शाम 5 बजे वहां मिलने का फैसला किया….

रविवार को अभी भी तीन दिन बाकी थे…..

मैं एक नया मोदी जैकेट लाया,फेशियल के लिए सैलून गया,बाल डाई किए,एक नया इत्र लाया,आखिरकार मैं अपनी “उससे” मिलने जा रहा था….

यह सब देखकर पत्नी ने पूछा:-
क्या बात है,क्या तैयारी चल रही है…बड़े सज संवर रहे हो…

रविवार को एक विदेशी कस्टमर के साथ मीटिंग है, बहाना बना दिया

पत्नी बेचारी….भोली भाली,वह मान गई…

फिर नए जूते,काला चश्मा भी खरीदा….

आखिरकार रविवार आ गया….ओला टैक्सी दरवाजे पर खड़ी थी,पत्नी और बच्चे समझ गए कि मैं एक बड़ी बैठक में जा रहा हूं…..

टैक्सी होटल के दरवाजे के सामने पहुंची,सामने वह गुलाब के फूल के साथ खड़ी,मेरा इंतजार कर रही थी…..

दोनों ने एक-दूसरे को गले लगाया और होटल में प्रवेश किया….
महंगे व्यंजनों का आदेश दिया,बहुत सारी बातें की और खाना समाप्त किया..
फिर मैंने अपने डेबिट कार्ड से भुगतान किया,जिससे मेरा बैंक अकाउंट,लगभग खाली हो गया…

फिर अचानक ही उसने कहा:-
मुझे तुमसे एक काम है मुझे आशा है कि तुम मना नहीं करोगे….
मैंने कहा:- तुम्हारे लिए तो मेरी जान भी हाजिर है, बोलो क्या करना है ।

तुरंत उसने अपना बैग खोला और कुछ कागजात निकालते हुए कहा:-
मैं एलआईसी एजेंट हूं और मुझे इस महीने का लक्ष्य पूरा करना है….
तो कृपया आप एक पॉलिसी ले लें….
मैंने भोजन करते समय आपकी सारी जानकारी ले ली है, फॉर्म बाद में भर लुंगी बस तुम यहां “हस्ताक्षर” कर दो…..

मेरे पास हस्ताक्षर करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था…
अब मुझे इसकी किश्तों का भुगतान भी करना होगा, यह सोचकर ही बहुत तेज सिरदर्द होने लगा और अब हर किश्त इस घटना की याद को ताजा कर देगी….

तो इस तरह अचानक किसी से मिलने से पहले यह जानना बहुत ज़रूरी है कि वह आपसे क्यों मिलना चाहती है….

एलआईसी – स्कूल के साथ भी स्कूल के बाद भी…!!

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एक वकील साहब बहुत दिनों पर कोर्ट गए थे औऱ अपने काम से निवृत होकर कोर्ट से घर लौट रहे थे।

रास्ते में एक नदी पड़ती थी। नदी पार करने लगे तो वहाँ का दृश्य बड़ा मनोरम लगा और उन्हें जाने क्या सूझा। एक पत्थर पर बैठकर अपने पौकेट से पेन और फाइल से कागज निकालकर एक बेल लिखने लगे ।

अचानक….,

हाथ से पेन 🖊 फिसला और डुबुक ….

पानी में डूब गया। वकील साहब परेशान। आज ही सुबह पूरे 10 रूपये में खरीदा था।

कातर दृष्टि से कभी इधर कभी उधर देखते, पानी में उतरने का प्रयास करते, फिर डर कर कदम खींच लेते।

एकदम नया पेन था, छोड़कर जाना भी मुनासिब न था ।

अचानक…….

पानी में एक तेज लहर उठी और साक्षात् *वरुण देव* सामने थे।

वकील साहब हक्के -बक्के रह गये।

कुल्हाड़ी वाली कहानी याद आ गई।🤔🤔

वरुण देव ने कहा, ”वकील साहब , इतने परेशान क्यों हैं ?

क्या चाहिए आपको ?

वकील साहब अचकचाकर बोले, “प्रभु ! आज ही सुबह एक पेन खरीदा था ।पूरे 10 रूपये का था वह ।
देखिए ढक्कन भी मेरे हाथ में है।
यहाँ पत्थर पर बैठा बेल लिख रहा था कि अचानक पानी में गिर गया।

प्रभु बोले, ”बस इतनी सी बात ! अभी निकाल लाता हूँ ।”घबराइए मत आपकी पसीने की कमाई यूं ही नहीं बर्बाद होगी ।
प्रभु ने डुबकी लगाई और चाँदी का एक चमचमाता पेन लेकर बाहर आ गए।

बोले – ये है आपका पेन ?

वकील साहब बोले – ना प्रभु। मुझ गरीब को कहाँ ये चांदी का पेन नसीब। ये मेरा नहीं।

प्रभु बोले – कोई बात नहीं, एक डुबकी और लगाता हूँ।

डुबुक …..

इस बार प्रभु सोने का रत्न जड़ित पेन लेकर आये और बोले, “लीजिये वकील साहब अपना पेन।”

वकील साहब बोले – ”क्यों मजाक कर रहे हैं प्रभु। इतना कीमती पेन और वो भी मेरा। मैं एक वकील हूँ कोई राजनेता नहीं ।

थके हारे प्रभु ने कहा, “चिंता ना करो वकील साहब

अबकी बार फाइनल डुबकी होगी और आपकी पेन आपके पास होगी ।

डुबुक ….

बड़ी देर बाद प्रभु पानी से उपर आये तो
हाँथमें वकील साहब का वहीं था जो उन्होनें आज ही सुबह दस रुपए में खरीदा था ।

बोले – ये है क्या ?

वकील साहब चिल्लाए – हाँ यही है, यही है प्रभु ।

प्रभु ने कहा – आपकी इमानदारी ने मेरा दिल जीत लिया वकील साहब
आप सच्चे वकील हैं। आप ये तीनों पेन ले लो।

वकील साहब ख़ुशी-ख़ुशी घर को चले।

कहानी अभी बाकी है दोस्तों 🤞

वकील साहब ने घर आते ही सारी कहानी पत्नी जी को सुनाई और
चमचमाते हुए कीमती पेन भी दिखाए।

पत्नी को विश्वास नहीं हुआ और
बोली कि नहीं ऐसा हो ही नहीं सकता आप किसी के चुराकर लाये हो। 😡

बहुत समझाने पर भी जब पत्नी ना मानी तो वकील साहब उसे घटना स्थल की ओर ले गये।

दोनों उस पत्थर पर बैठे,

वकील साहब ने बताना शुरू किया था कि कैसे-कैसे सबकुछ हुआ।
पत्नी एक-एक कड़ी को किसी शातिर पुलिसिये की तरह जोड़ रही थी और घटना स्थल की मुआयना कर रही थी कि

अचानक …

डुबुक.. !!!

पत्नी का पैर फिसला और वो गहरे पानी में समा गई। वकील साहब की आँखों के आगे तारे नाचने लगे ये क्या हुआ ! डर लगने लगा कि कहीं ससुराल वाले 304 (B) का उन पर केस ना कर दें ।

जोर -जोर से रोने लगे।

तभी अचानक ……

पानी में ऊँची ऊँची लहरें उठने लगीं। नदी का सीना चीरकर साक्षात वरुण देव प्रकट हुए।

बोले – क्या हुआ वकील साहब ? अब क्यों रो रहे हो ?

वकील साहब ने रोते हुए घटना प्रभु को सुनाई। बोले प्रभु मैं तो बर्बाद हो जाऊँगा और नाहक ही आजीवन कारावास को झेलुँगा।क्यूँकि मेरी पत्नी पानी में डूब गई है। और उसके मायके वाले दहेज हत्या के मुकदमे में मुझे बर्बाद कर देंगे।


प्रभु बोले – रोओ मत। धीरज रखो। मैं अभी आपकी पत्नी को निकाल कर लाता हूँ।

प्रभु ने डुबकी लगाईं,

और …..

थोड़ी देर में,
वो कैटरीना कैफ को लेकर प्रकट हुए।💃

बोले –वकील साहब

क्या यही आपकी पत्नी जी हैं ?
वकील साहब ने एक क्षण सोचा और चिल्लाए, “हाँ यही है, यही है।”

अब चिल्लाने की बारी प्रभु की थी
बोले – दुष्ट वकील ठहर अभी तुझे श्राप देता हूँ ।😡

वकील साहब बोले – माफ़ करें प्रभु। 🙏🙏

मेरी कोई गलती नहीं। अगर मैं इसे मना करता तो आप अगली डुबकी में रिया चक्रवर्ती को ले लाते। 💃

मैं फिर भी मना करता तो आप मेरी पत्नी को लाते। फिर आप खुश होकर तीनों मुझे दे देते।

अब आप ही बताओ प्रभु,
इस कोरोना के कारण हम वकीलों को जीने के लाले पड़े हैं। इस कोरोना ने हम वकीलों की हालत पहले ही खराब कर रखी है ।अब मैं तीन-तीन बीबियाँ कैसे पालता?

क्षमा करें प्रभु।
इसलिये सोचा, कैटरीना ही ठीक है।
प्रभु बेहोश होकर पानी में गिर गये।

Posted in हिन्दू पतन

जिस थाली में खाया है , उसी थाली में आज तक छेद करते आए है वहाबी तबलीबी…

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के साथ विश्वासघात करने वाला और नेहरू के साथ मिलकर सत्तासुख भोगने वाला जनरल शाह नवाज खान जंजुआ शाहरुख़ खान का नाना था….

यही शाह नवाज खान जब भारत सरकार में मंत्री था तब पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया था तो उसका बेटा महमूद खान पाकिस्तान की फौज में था और हमलावर टुकड़ी में था…फिर भी उसे मन्त्रीपद से नही हटाया गया और वो युद्धकाल में भी लगातार मन्त्रीमण्डल की गोपनीय बैठको में भाग लेता रहा…कितने लोग जानते है कि शाहरुख खान की मां तथाकथित आयरन लेडी की बहुत खास थी ??? क्यों खास थी यह अब पता चल ही गया होगा…

उसी जनरल शाह नवाज का भतीजा जहीरुल इस्लाम जंजुआ पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई का चीफ भी था मतलब आईएसआई का पूर्व चीफ इस शाहरुख़ खान का रिश्तेदार था… नेताजी सुभाषचंद बोस के साथ दगा करने वाला और अपनी रिपोर्ट में नेताजी को फर्जी विमान दुर्घटना में मृत बताने वाला शाहनवाज खान इस शाहरुख़ का नाना ही था…

जब पाकिस्तान में आपदा आई तो शाहरुख़ ने करोड़ो रूपये की मदद की और जब उत्तराखण्ड में तबाही आई तो इसने फूटी कौड़ी भी नही दी…आप जिहादी मानसिकता का अंदाजा यही से लगा सकते है… भारत के हिंदुओं को असहिष्णु बताने वाले शाहरुख ने शादी भी एक हिंदू से क्यों की… अगर हिन्दू असहिष्णु होते तो क्या शाहरुख़ खान सुपरस्टार बनता ???

इस धूर्त को स्टार बनाया पढ़े लिखे मुर्ख सेक्युलर मानसिकता के हिंदुओं ने… इस बदसूरत हकले की एक एक अदा पर करोड़ो हिन्दू लड़कियां अपनी जान छिड़कती हैं और ये हिन्दुओ को गाली देता आया है… और अफसोस हिंदू इन्हें अपना खुदा समझता आया है…

साभार

Posted in गौ माता - Gau maata

कुत्ता पालो तो पशु प्रेमी, भैंस पालो तो गंवार… यह कैसा समाज बना लिया हमने?🤔

यह चित्र सिर्फ हास्य नहीं, बल्कि “समाज की मानसिकता पर गहरा प्रहार” है।

यह दिखाता है कि कैसे एक ही काम  “जानवर पालने” को दो अलग-अलग वर्गों में बाँट दिया गया है:
एक “क्लासी” कहलाता है, दूसरा “गंवार”।

हमने समाज को इतना दिखावे का बना दिया है कि सच्चाई और मेहनत अब स्टेटस’ से मापी जाने लगी है।

कुत्ता-बिल्ली पालना “आधुनिकता का पर्योय” हो गया,

लेकिन जो किसान भैंस-बकरी पालता है, वही हमें “गंवार” दिखने लगता है।
सोचिए  क्या यह सभ्यता है या मानसिक गुलामी?🥹

गाँव का वह आदमी, जो रोज़ सुबह उठकर भैंस का चारा काटता है,

उसके हाथों में मिट्टी लगी होती है, लेकिन वही मिट्टी इस देश का अन्न देती है।

वह ‘गंवार’ नहीं है  वह हमारे जीवन का आधार है।
पर अफसोस! शहर की चमक ने हमें इतना अंधा कर दिया है कि

हमने मेहनत को ही नीचा समझना शुरू कर दिया।

कुत्ता पालने वाला अगर कह दे
“मैं अपने पेट को परिवार समझता हूँ”
तो सब ताली बजाते हैं,

“क्या संवेदनशील व्यक्ति है!”

पर भैंस पालने वाला अगर कह दे
“ये मेरी लाडो है, मेरे परिवार जैसी है,”
तो हम हँस पड़ते हैं…

क्यों? क्योंकि उसका प्यार ‘ब्रांडेड नस्ल’ से नहीं जुड़ा।

असल में यह फर्क जानवरों में नहीं,
हमारी सोच की जात में है।

शहर में जानवर पालना “शौक” कहलाता है,

गाँव में जानवर पालना “ज़रूरत” कहलाता है।

और हमें “ज़रूरत वाले लोग” छोटे लगते हैं,

क्योंकि हमने मेहनत से ज़्यादा दिखावे को मूल्य बना दिया है।

कुत्ता पालने वाले की फोटो इन्स्टाग्राम पर जाती है,
#PetLove #DogMom’ के साथ।
भैंस पालने वाला वही फोटो डाल दे,
तो लोग कहेंगे  “अरे भाई ये क्या डाल दिया!”
अरे भाव एक ही है ना  प्रेम का, जीवन का, सेवा का।
फर्क सिर्फ फ्रेम में है।

हम ऐसे समाज में पहुँच चुके हैं जहाँ
‘Milk in Starbucks cup’ classy लगता है,
पर वही दूध निकालने वाली गाय भैंस ‘dirty’ लगती है।
हमने ‘Source’ को नीचा और ‘Result’ को ऊँचा मान लिया है।
यही आधुनिकता की सबसे बड़ी बीमारी है।

भैंस पालने वाला जो घाम-धूप में खड़ा रहता है,
उसका हर दिन परिश्रम का उत्सव है।
वह Animal Lover नहीं, Animal Servant है
क्योंकि वह उस जानवर से अपने परिवार का पेट भरता है,
उसकी सेवा करता है,
और बदले में समाज उसे ‘गंवार’ कह देता है।🥹

हमारी शिक्षा ने हमें डिग्री दी है, पर दृष्टि नहीं।
हमने यह तो सीख लिया कि कौन-सा कुत्ता किस नस्ल का है,

पर यह नहीं सीखा कि “भैंस की आँखों में भी वही भाव हैं”
जो तुम्हारे पालतू कुत्ते की आँखों में हैं
विश्वास, ममता और जुड़ाव।😍

ये सिर्फ भैंस-बकरी का मुद्दा नहीं है,
ये मानसिकता का दर्पण है।

हमने “शहर का दिखावा” और “गाँव की सच्चाई” के बीच

एक अदृश्य दीवार खड़ी कर दी है।
और दुख की बात ये है
अब वो दीवार हमारे अंदर भी बस गई है।

कभी गाँव जाओ,
देखना कोई किसान अपनी गाय के सिर पर हाथ फेरता है,

तो उसमें एक माँ जैसी ममता होती है।
वो दूध सिर्फ बेचने के लिए नहीं निकालता,
वो उसे “प्रसाद” मानता है।
पर हम शहर वाले उस प्रसाद को भी
“प्रोडक्ट” समझने लगे हैं।

Animal Lover” बनने के लिए नस्ल या कपड़ा नहीं चाहिए,
चाहिए तो बस दयाभाव।
चाहे वो कुत्ते के लिए हो या भैंस के लिए
प्रेम की भावना वही है।
जिसे हम गंवार कहते हैं,
वो धरती के सबसे बड़े Animal Lover होते हैं,
बस अंग्रेज़ी नहीं जानते।

याद रखो 👇
जो भैंस-बकरी पालता है,
वही तुम्हारे घर की दूध की मिठास है।
जिसे तुम गंवार कहते हो,
वो तुम्हारे बच्चों की सेहत का रक्षक है।
और जिसे तुम Animal Lover कहते हो,
वो सिर्फ फोटो खिंचवाने के लिए प्रेम दिखाता है।

कभी खुद से पूछो
हम जानवरों से प्रेम करते हैं, या उनके साथ अपने image से?
कुत्ता पालने से पहले,
एक बार उस किसान की आँखों में झाँको जिसने तुम्हारे घर का दूध भेजा है।
वो सच्चा Animal Lover है,
क्योंकि उसके प्रेम में “फैशन” नहीं, “सेवा” है।

💭 सोचिए — अगर समाज सच्चे कर्मयोगियों को  को गंवार कहेगा,
तो हमारी आधुनिकता किस दिशा में जा रही है?

क्या सच में “Animal Lover” होना सिर्फ एक पालतू कुत्ते तक सीमित है?
या फिर भैंस पालने वाला भी उसी श्रेणी में आता है
बस उसका Instagram अकाउंट नहीं है?

अगर यह बात दिल को लगी हो,
तो बस एक बार दिल से सोचिए 🤔
गंवार कौन है? वो जो मेहनत करता है,
या वो जो मेहनत करने वालों का मज़ाक
गंवार कौन है? वो जो मेहनत करता है,
या वो जो मेहनत करने वालों का मज़ाक उड़ाता है?

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टाइटैनिक की सबसे डरावनी कहानी…🥹🥹

यह कहानी टाइटैनिक के उस हिस्से की है जिसे ज़्यादातर लोग कभी जान ही नहीं पाये। चमकते डेक, संगीत और शानों शौकत के नीचे एक दूसरी दुनिया थी, जहाँ ब्लैक गैंग नाम के लोग काम करते थे। यही असली मेहनती हाथ थे जो टाइटैनिक को चलाते थे।

जहाज के सबसे निचले हिस्से में भट्ठियों का लम्बा इलाका था। चारों ओर अंधेरा, भयंकर गर्मी, कोयले की उड़ती धूल और केवल आग की लाल चमक। यही इन मज़दूरों का रोज़ का माहौल था। कोई ठण्डी हवा नहीं, कोई खिड़की नहीं, बस आग, धुआँ और पसीने से तर शरीर।

फायरमैन भट्ठियों में कोयला झोंकते थे ताकि भाप बनती रहे और इंजन घूमता रहे। Trimmers कोयले को सम्भाल कर रखते थे, ताकि जहाज सन्तुलित रहे। टनों कोयला झाँकने के कारण उनके हाथ जल जाते, कपड़े हमेशा गीले रहते और साँस लेना तक मुश्किल हो जाता। फिर भी यही मेहनत टाइटैनिक को ताक़त देती थी।

फिर वह रात आयी जिसे इतिहास कभी नहीं भूलता। टाइटैनिक बर्फीले पानी में हिमखण्ड से टकराया। ऊपर अफरा तफरी फैलने लगी, लेकिन नीचे ब्लैक गैंग भागे नहीं।

वे जानते थे कि अगर भट्ठियाँ अचानक बन्द हो गयीं तो जहाज और जल्दी डूबेगा। उन्होंने वहीं रहकर पानी रोकने की कोशिश की, भट्ठियाँ बन्द कीं और पम्प और बिजली को जितना हो सके उतने समय तक चलाये रखा। क्योंकि जब तक रोशनी और वायरलेस चलते रहे, ऊपर लोग बचाव नावों में चढ़ते रहे और मदद का सन्देश भेजा जा सका।

इनमें से बहुत से मज़दूर बाहर नहीं निकल पाये। जहाँ ऊपर संगीत और अमीरी थी, वहीं नीचे उन्हीं भट्ठियों के बीच उन्होंने अपनी अन्तिम साँस ली। दूसरों की जान बचाने के लिये अपनी जान बलिदान कर दी।

यह कहानी उन अनसुने नायकों की है जिनकी पसीने और हिम्मत ने टाइटैनिक को चलाया और डूबते समय भी आशा की किरण बुझने नहीं दी। सैल्यूट नायकों को…🙏🙇
😢😢😢🫤🫤🫤🥺🥺🥺🥹🥹🥹

                             दुःखद 🙏🥹

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कांग्रेस ने सब को गुमनाम कर खुद को सामने रखने का कार्य किया।😓😌

1842 में खंडवा जिले के बड़दा गांव में जन्मे टंट्या भील (टंट्या मामा) एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्हें भारतीय रॉबिन हुड भी कहा जाता है। 1857 के भारतीय विद्रोह के बाद, अंग्रेजों ने बेहद कठोर कार्रवाई की, जिसके बाद ही टंट्या भील ने अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ना शुरू किया। वह उन महान क्रांतिकारियों में से एक थे, जिन्होंने बारह साल तक ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष किया।

विदेशी शासन को उखाड़ फेंकने के लिए, अपने अदम्य साहस और जुनून के बल पर वह 12 साल तक लड़ते रहे और  आदिवासियों और आम लोगों की भावनाओं के प्रतीक बने। वह ब्रिटिश सरकार के सरकारी खजाने और उनके चाटुकारों की संपत्ति को लूटकर गरीबों और जरूरतमंदों में बांट देते थे।

टंट्या भील, गुरिल्ला युद्ध में निपुण थे। लेकिन एक लंबी लड़ाई के बाद, वर्ष 1888-89 में राजद्रोह के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और जबलपुर जेल ले जाया गया, जहां ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें अमानवीय रूप से प्रताड़ित किया। टंट्या भील की गिरफ्तारी की ख़बर 10 नवंबर 1889 को न्यूयॉर्क टाइम्स के अंक में प्रमुखता से प्रकाशित की गई थी। इस ख़बर में उन्हें ‘भारत का रॉबिन हुड’ बताया गया था।

4दिसंबर 1889 को उन्हें फांसी की सज़ा सुनाई गई थी। भारत के वीर सपूत टंट्या भील को शत् शत् नमन!

इसी तरह की इतिहास से जुड़ी पोस्ट पढ़ने के लिए हमें फॉलो जरूर करें। धन्यवाद

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5 नवम्बर 1556, एक निहत्था और घायल शख्स, सामने बैठा, था और अकबर का जल्लाद, बहरम खान, उसे इस्लाम कबूल करने पर जोर डाल रहा था।
ये निहत्था और घायल शख्स था, हेमचंद विक्रमादित्य उर्फ़ हेमू।
वो राजा जिसने 350 वर्ष के मुग़ल सल्तनत को उखड फेका था।
वो राजा जिसने अपने जीवन में लड़े 24 युद्ध में से 22 को जीता था।
वो राजा, जिसके चलते दिल्ली ने कई सो वर्ष बाद हिन्दु रीतीरिवाज़ से हुआ राज्य अभिषेक देखा था।
पानीपत की दूसरी लड़ाई में हेमू ने अकबर की फौज को तिनके की तरह बिखेर दिया था, हेमू की तलवार के सामने, अकबर का कोई भी योद्धा आने को तैयार नही था।
पर शायद भारत की इस भूमि के नसीब में अभी और मुगलिया अत्याचार लिखे थे।
और तभी किसी ने धोखे से हेमू की आँख में एक तीर मार दिया।
जिसके बाद, युद्ध का रूप बिलकुल पलट गया और अकबर की सेना ने हेमू को गिरफ्तार कर लिया।
इस पर भी अकबर का जब कोई भी जल्लाद, हेमू की वीरता से प्रभावित हो, उसका सर कलम करने को राजी नही हुआ,और बहरम खान की लाख यातनायो पर भी हेमू ने इस्लाम नही कबूला।
तो क्रूर बहरम खान ने निहत्थे हेमू का सर कलम कर दिया।
और भारत की भूमि फिर से मुगलों के आधीन हो गई।
आज भारत के अंतिम हिन्दू राजा हेमचन्द्र विक्रमादित्य की पुण्यतिथि पर नमन है इस महान योद्धा को।

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गणितज्ञ “लीलावती” का नाम हममें से अधिकांश लोगों ने नहीं सुना है, उनके बारे में कहा जाता है कि वो पेड़ के पत्ते तक गिन लेती थीं।

शायद ही कोई जानता हो कि आज यूरोप सहित विश्व के सैंकड़ो देश जिस गणित की पुस्तक से गणित को पढ़ा रहे हैं, उसकी रचयिता भारत की एक महान गणितज्ञ महर्षि भास्कराचार्य की पुत्री लीलावती हैं, आज गणितज्ञों को गणित के प्रचार और प्रसार के क्षेत्र में लीलावती पुरूस्कार से सम्मानित किया जाता है।

आइए जानते हैं महान
“गणितज्ञलीलावती” जी के बारे में जिनके नाम से गणित को पहचाना जाता था :-

दसवीं सदी की बात है, दक्षिण भारत में भास्कराचार्य नामक गणित और ज्योतिष विद्या के एक बहुत बड़े पंडित थे। उनकी कन्या का नाम लीलावती था।

वही उनकी एकमात्र संतान थी। उन्होंने ज्यो‍तिष की गणना से जान लिया कि ‘वह विवाह के थोड़े दिनों के ही बाद विधवा हो जाएगी।’

उन्होंने बहुत कुछ सोचने के बाद ऐसा लग्न खोज निकाला, जिसमें विवाह होने पर कन्या विधवा न हो। विवाह की तिथि निश्चित हो गई। जलघड़ी से ही समय देखने का काम लिया जाता था।

एक बड़े कटोरे में छोटा-सा छेद कर पानी के घड़े में छोड़ दिया जाता था। सूराख के पानी से जब कटोरा भर जाता और पानी में डूब जाता था, तब एक घड़ी होती थी।
पर विधाता का ही सोचा होता है। लीलावती सोलह श्रृंगार किए सजकर बैठी थी, सब लोग उस शुभ लग्न की प्रतीक्षा कर रहे थे कि एक मोती लीलावती के आभूषण से टूटकर कटोरे में गिर पड़ा और सूराख बंद हो गया; शुभ लग्न बीत गया और किसी को पता तक न चला।

विवाह दूसरे लग्न पर ही करना पड़ा। लीलावती विधवा हो गई, पिता और का के धैर्य का बांध टूट गया। लीलावती अपने पिता के घर में ही रहने लगी।
पुत्री का वैधव्य-दु:ख दूर करने के लिए भास्कराचार्य ने उसे गणित पढ़ाना आरंभ किया। उसने भी गणित के अध्ययन में ही शेष जीवन की उपयोगिता समझी।
थोड़े ही दिनों में वह उक्त विषय में पूर्ण पंडिता हो गई। पाटी-गणित, बीजगणित और ज्योतिष विषय का एक ग्रंथ ‘सिद्धांतशिरोमणि’ भास्कराचार्य ने बनाया है। इसमें गणित का अधिकांश भाग लीलावती की रचना है।

पाटीगणित के अंश का नाम ही भास्कराचार्य ने अपनी कन्या को अमर कर देने के लिए ‘लीलावती’ रखा है।

भास्कराचार्य ने अपनी बेटी लीलावती को गणित सिखाने के लिए गणित के ऐसे सूत्र निकाले थे जो काव्य में होते थे। वे सूत्र कंठस्थ करना होते थे।

उसके बाद उन सूत्रों का उपयोग करके गणित के प्रश्न हल करवाए जाते थे।कंठस्थ करने के पहले भास्कराचार्य लीलावती को सरल भाषा में, धीरे-धीरे समझा देते थे।

वे बच्ची को प्यार से संबोधित करते चलते थे, हिरन जैसे नयनों वाली प्यारी बिटिया लीलावती, ये जो सूत्र हैं, बेटी को पढ़ाने की इसी शैली का उपयोग करके भास्कराचार्य ने गणित का एक महान ग्रंथ लिखा, उस ग्रंथ का नाम ही उन्होंने “लीलावती” रख दिया।

आजकल गणित एक शुष्क विषय माना जाता है पर भास्कराचार्य का ग्रंथ ‘लीलावती‘ गणित को भी आनंद के साथ मनोरंजन, जिज्ञासा आदि का सम्मिश्रण करते हुए कैसे पढ़ाया जा सकता है,

इसका नमूना है। लीलावती का एक उदाहरण देखें- ‘निर्मल कमलों के एक समूह के तृतीयांश, पंचमांश तथा षष्ठमांश से क्रमश: शिव, विष्णु और सूर्य की पूजा की, चतुर्थांश से पार्वती की और शेष छ: कमलों से गुरु चरणों की पूजा की गई।
लीलावती, शीघ्र बता कि उस कमल समूह में कुल कितने फूल थे?
उत्तर-120 कमल के फूल।

वर्ग और घन को समझाते हुए भास्कराचार्य कहते हैं लीलावती, वर्गाकार क्षेत्र और उसका क्षेत्रफल वर्ग कहलाता है।

दो समान संख्याओं का गुणन भी वर्ग कहलाता है। इसी प्रकार तीन समान संख्याओं का गुणनफल घन है और बारह कोष्ठों और समान भुजाओं वाला ठोस भी घन है।

“मूल” शब्द संस्कृत में पेड़ या पौधे की जड़ के अर्थ में या व्यापक रूप में किसी वस्तु के कारण, उद्गम अर्थ में प्रयुक्त होता है।

इसलिए प्राचीन गणित में वर्ग मूल का अर्थ था ‘वर्ग का कारण या उद्गम अर्थात् वर्ग एक भुजा।

इसी प्रकार घनमूल का अर्थ भी समझा जा सकता है। वर्ग तथा घनमूल निकालने की अनेक विधियां प्रचलित थीं।

लीलावती के प्रश्नों का जबाब देने के क्रम में ही “सिद्धान्त शिरोमणि” नामक एक विशाल ग्रन्थ लिखा गया, जिसके चार भाग हैं- (1) लीलावती (2) बीजगणित (3) ग्रह गणिताध्याय और (4) गोलाध्याय।

‘लीलावती’ में बड़े ही सरल और काव्यात्मक तरीके से गणित और खगोल शास्त्र के सूत्रों को समझाया गया है।

अकबर के दरबार के विद्वान फैजी ने सन् 1587 में “लीलावती” का फारसी भाषा में अनुवाद किया।

अंग्रेजी में “लीलावती” का पहला अनुवाद जे. वेलर ने सन् 1716 में किया। कुछ समय पहले तक भी भारत में कई शिक्षक गणित को दोहों में पढ़ाते थे। जैसे कि पन्द्रह का पहाड़ा तिया पैंतालीस, चौके साठ, छक्के नब्बे अट्ठ बीसा, नौ पैंतीस।

इसी तरह कैलेंडर याद करवाने का तरीका भी पद्यमयसूत्र में था, “सि अप जूनो तीस के, बाकी के इकतीस, अट्ठाईस की फरवरी चौथे सन् उनतीस” इस तरह गणित अपने पिता से सीखने के बाद लीलावती भी एक महान गणितज्ञ एवं खगोल शास्त्री के रूप में जानी गईं…

मनुष्य के मरने पर उसकी कीर्ति ही रह जाती है अतः आज गणितज्ञो को लीलावती पुरूस्कार से सम्मानित किया जाता है। हमारे पास बहुत कीमती इतिहास है जिसे छोड़कर हम आधुनिकता की दौड़ में विदेशों की नकल कर रहे हैं।

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श्रीकृष्ण की अद्भुत लीला: रानी सत्यभामा के घमंड का नाश
श्री कृष्ण भगवान द्वारका में रानी सत्यभामा के साथ सिंहासन पर विराजमान थे, निकट ही गरुड़ और सुदर्शन चक्र भी बैठे हुए थे, तीनों के चेहरे पर दिव्य तेज झलक रहा था।

बातों ही बातों में रानी सत्यभामा ने श्रीकृष्ण से पूछा कि हे प्रभु, आपने त्रेता युग में राम के रूप में अवतार लिया था, सीता आपकी पत्नी थी। क्या वे मुझसे भी ज्यादा सुंदर थी?

द्वारकाधीश समझ गए कि सत्यभामा को अपने रूप का अभिमान हो गया है। तभी गरुड़ ने कहा कि भगवान क्या दुनिया में मुझसे भी ज्यादा तेज गति से कोई उड़ सकता है?

इधर सुदर्शन चक्र से भी रहा नहीं गया और वे भी कह उठे कि भगवान, मैंने बड़े-बड़े युद्धों में आपको विजयश्री दिलवाई है, क्या संसार में मुझसे भी शक्तिशाली कोई है?

भगवान मन ही मन मुस्कुरा रहे थे। वे जान रहे थे कि उनके इन तीनों भक्तों को अहंकार हो गया है और इनका अहंकार नष्ट करने का समय आ गया है, ऐसा सोचकर उन्होनें गरुड़ से कहा कि हे गरुड़।

तुम हनुमान के पास जाओ और कहना कि भगवान राम, माता सीता के साथ उनकी प्रतीक्षा कर रहे है। गरुड़ भगवान की आज्ञा लेकर हनुमान को लाने चले गए।

इधर श्रीकृष्ण ने सत्यभामा से कहा कि देवी, आप सीता के रूप में तैयार हो जाएं और स्वयं द्वारकाधीश ने राम का रूप धारण कर लिया।

मधुसूदन ने सुदर्शन चक्र को आज्ञा देते हुए कहा कि तुम महल के प्रवेश द्वार पर पहरा दो और ध्यान रहे कि मेरी आज्ञा के बिना महल में कोई प्रवेश न करे।

भगवान की आज्ञा पाकर चक्र महल के प्रवेश द्वार पर तैनात हो गए।

गरुड़ ने हनुमान के पास पहुंचकर कहा कि हे वानर श्रेष्ठ। भगवान राम, माता सीता के साथ द्वारका में आपसे मिलने के लिए प्रतीक्षा कर रहे है। आप मेरे साथ चलें। मैं आपको अपनी पीठ पर बैठाकर शीघ्र ही वहां ले जाऊंगा।

हनुमान ने विनयपूर्वक गरुड़ से कहा, आप चलिए, मैं आता हूं।

गरुड़ ने सोचा, पता नहीं यह बूढ़ा वानर कब पहुंचेगा?

फिर गरुड़ अकेले ही महल पहुंच गए. महल पहुंचकर गरुड़ देखते

है कि हनुमान तो उनसे पहले ही महल में प्रभु के सामने बैठे है। गरुड़ का सिर लज्जा से झुक गया।

तभी श्रीराम ने हनुमान से कहा कि पवनपुत्र, तुम बिना आज्ञा के महल में कैसे प्रवेश कर गए? क्या तुम्हें किसी ने प्रवेश द्वार पर रोका नहीं?

हनुमान ने हाथ जोड़ते हुए सिर झुकाकर अपने मुंह से सुदर्शन चक्र को निकालकर प्रभु के सामने रख दिया। हनुमान ने कहा कि प्रभु, आपसे मिलने से मुझे इस चक्र ने रोका था इसलिए इसे मुंह में रख मैं आपसे मिलने आ गया। मुझे क्षमा करें। ये सुनकर भगवान मन ही मन मुस्कुराने लगे।

हनुमान ने हाथ जोड़ते हुए श्रीराम से प्रश्न किया- हे प्रभु। आज आपने माता-सीता के स्थान पर किस दासी को इतना सम्मान दे दिया कि वह आपके साथ सिंहासन पर विराजमान है?

अब रानी सत्यभामा के अहंकार भंग होने की बारी थी। उन्हें सुंदरता का अहंकार था, जो पल भर में चूर हो गया था।

रानी सत्यभामा, सुदर्शन चक्र और गरुड़ जी तीनों का गर्व चूर-चूर हो गया था। वे भगवान की लीला समझ रहे थे। तीनों की आंखों से आंसू बहने लगे और वे भगवान के चरणों में झुक गए।

इस प्रकार श्रीकृष्ण ने एक ही बार में तीनों का अंहकार खत्म किया.

अहंकार पतन का कारण बनता है। हमें कभी भी अपने रूप, बल या शक्ति पर घमंड नहीं करना चाहिए।