यह नाम ‘कौर’ (Kaur), जो आप सिख महिलाओं के नामों के बाद देखते हैं, वास्तव में संस्कृत शब्द ‘कुमारी’ से आया है।
प्राचीन काल में महिलाओं के लिए उपनाम (surname) का कोई प्रचलन नहीं था — उन्हें केवल उनके पहले नाम से जाना जाता था, और यदि वे अविवाहित होती थीं तो उनके नाम के बाद ‘कुमारी’ लगाया जाता था।
विवाह के बाद उसी नाम के साथ ‘देवी’ जुड़ जाता था।
उदाहरण के लिए —
सरिता कुमारी (Sarita Kumari) विवाह के बाद सरिता देवी (Sarita Devi) बन जाती थीं।
मुझे कुमारी और देवी जैसे प्रत्ययों (suffixes) के बारे में तो पता था, लेकिन यह जानना अत्यंत रोचक है कि सिखों द्वारा प्रयोग किया जाने वाला ‘कौर’ वास्तव में ‘कुमारी’ से विकसित हुआ — जो कालांतर में ‘कुंवारी’ और फिर ‘कौर’ बन गया।
कुछ विद्वानों का यह भी मत है कि ‘कौर’ (महिलाओं के लिए) और ‘सिंह’ (पुरुषों के लिए) जैसे धार्मिक उपनामों को अपनाने का एक उद्देश्य जातिवाद (casteism) को समाप्त करना भी था।
सिख आज भी इस प्राचीन परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
आज हम विवाह से पहले अपने पिता का नाम और विवाह के बाद अपने पति का नाम जोड़ते हैं; किंतु संभवतः यह परंपरा भारत के ब्रिटिश उपनिवेश बनने के बाद विकसित हुई।
इसी प्रकार, उत्तर कर्नाटक और महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में विवाह के बाद ‘देवी’ की जगह ‘बाई’ लगाया जाता है, जबकि तमिलनाडु में विवाहोपरांत महिलाओं के नाम के साथ ‘अम्मल’ जोड़ा जाता है।
यह देखना अत्यंत सुंदर और सांस्कृतिक रूप से अर्थपूर्ण है कि विवाह के पश्चात महिला को ‘देवी’ या ‘माता’ के स्वरूप में देखा जाता है।
— सहाना सिंह (Sahana Singh)
चित्र:
कर्नल जेम्स स्किनर की रचना ‘तज़किरत-उल-उमरा’ (‘Biographies of the Nobles’) के एक पृष्ठ से अंश। इसमें रादाौर के रूप सिंह की विधवा सिख रानी को दर्शाया गया है, लगभग सन् 1836 का चित्र।
Day: November 6, 2025
औरंगजेब ने पूछाः “मतिदास कौन है?”…
तो भाई मतिदास ने आगे बढ़कर कहाः “मैं हूँ मतिदास। यदि गुरुजी आज्ञा दें तो मैं यहाँ बैठे बैठे दिल्ली और लाहौर का सभी हाल बता सकता हूँ। तेरे किले की ईंट से ईंट बजा सकता हूँ।”
औरंगजेब गुर्राया और उसने भाई मतिदास को धर्म परिवर्तन करने के लिए विवश करने के उद्देश्य से अनेक प्रकार की यातनाएँ देने की धमकी दी। खौलते हुए गरम तेल के कड़ाहे दिखाकर उनके मन में भय उत्पन्न करने का प्रयत्न किया, परंतु धर्मवीर पुरुष अपने प्राणों की चिन्ता नहीं किया करते। धर्म के लिए वे अपना जीवन उत्सर्ग कर देना श्रेष्ठ समझते हैं।
जब औरंगजेब की सभी धमकियाँ बेकार गयीं, सभी प्रयत्न असफल रहे, तो वह चिढ़ गया। उसने काजी को बुलाकर पूछाः “बताओ इसे क्या सजा दी जाये?”
काजी ने हुक्म सुनाया कि ‘इस काफिर को इस्लाम ग्रहण न करने के आरोप में आरे से लकड़ी की तरह चीर दिया जाये।’
औरंगजेब ने सिपाहियों को काजी के आदेश का पालन करने का हुक्म जारी कर दिया।
दिल्ली के चाँदनी चौक में भाई मतिदास को दो खंभों के बीच रस्सों से कसकर बाँध दिया गया और सिपाहियों ने ऊपर से आरे के द्वारा उन्हें चीरना प्रारंभ किया। किंतु उन्होंने ‘सी’ तक नहीं की। औरंगजेब ने एक बार फिर फिर कहाः “अभी भी समय है। यदि तुम इस्लाम कबूल कर लो, तो तुम्हें छोड़ दिया जायेगा और धन दौलत से मालामाल कर दिया जायेगा।”
वीर मतिदास ने निर्भय होकर कहाः “मैं जीते जी अपना धर्म नहीं छोड़ूँगा।”
ऐसे थे धर्मवीर मतिदास ! जहाँ आरे से चिरवाया गया, आज वह चौक ‘भाई मतिदास चौक’ के नाम से प्रसिद्ध है।
