इस फोटो को दिखाकर कांग्रेसी कहते हैं कि – इन्दिरा गाँधी फौजियों का बहुत सम्मान करती थीं और उनके लिये अपने हाथ से खाना परोसती थीं। पहली बात तो ये कि फोटो में फौजी नहीं हैं बल्कि NCC कैडेट्स हैं जो गणतन्त्र दिवस की परेड के बाद भोजन कर रहे हैं।
अगर आप ध्यान से देखें तो पता चल जायेगा कि – इन्दिराजी के हाथ में भोजन परोसने वाला डोंगा नहीं है बल्कि भोजन करने वाली प्लेट है। इसका मतलब साफ है कि – वे उन कैडेट्स के लिये भोजन परोस नहीं रही हैं बल्कि उनके लिये रखे डोंगों में से अपने लिये भोजन निकाल रही हैं।
कांग्रेसी किसी को खिलाने में नहीं बल्कि दूसरों के हिस्से का खाने में विश्वास करते हैं…! 😄😄😄😀😀😀😃😃😃😮😮😮
#अनसुने_किस्से (यही सच्चाई है विधर्मी खानदान की) ऐसा ही एक रंगीन किस्सा जो आपमे से शायद ही किसी ने सुना हो ? दोस्तों कांग्रेस के दौर में देश कैसे चलता था आप लोग #अनिल_मथरानी नामक व्यक्ति से समझिए।
आजकल कांग्रेसी वामी गंवे हमेशा दूसरों का हाथ में लेकर, बायो डाटा की बात कर रहा हूं, गांन घिसड़ते घूमते रहते हैं कि मोदी सरकार ने इस आदमी को कैसे इस पद पर बैठा दिया ?
अनिल मथरानी की याद है आपको ? अधिकांश ने नाम भी नहीं सुना होगा यकीनन….. इस व्यक्ति ने सद्दाम हुसैन के साथ तेल सौदे में तत्कालीन विदेश मंत्री नटवर सिंह पर अपने रिश्तेदारों को फायदा पहुंचाने का आरोप लगाया था। वैसे उस समय इराक गए कांग्रेसी प्रतिनिधिमंडल में नटवर के साथ अनिल मथरानी भी थे।
घोटाला हुआ था तो उजागर भी हो गया, अब कांगी कोई काम काम करें और घोटाला नहीं ये हो नहीं सकता। और फिर नटवरलाल तो नटवरलाल थे कैसे चूक सकते थे । घोटाला जब हुआ था तो उजागर भी होना ही था , उजागर हुआ तो अनिल मथरानी क्रोशिया में भारत के राजदूत थे। अब नटवर तो नप गए भाया, पर मथरानी की कहीं कोई चर्चा नहीं थी! क्या कोई ऊपरी दबाव था? बार की दोस्ती थी और महिला मित्र सबकुछ थी तो दबाव भी होना ही था।
अनिल मथरानी विदेश सेवा के अफसर नहीं थे, और कांग्रेस के भी तीसरे चौथे दर्जे के नेता थे, वो भी बार की मेहरबानी के चलते। जनाधार वाले भी नहीं थे, चापलूस टाइप के,फिक्सर टाइप के थे। पर कृपा से राजदूत बन बैठे थे। नटवरगेट की भेंट चढ़ने से पहले लगभग साल भर के कार्यकाल में छह महीने उन्होंने दिल्ली में गुजारे।
उन्हें 40 लाख की आबादी वाले पिद्दी से देश में राजदूत का पद मामूली लगता था। वे केंद्र में मंत्री बनना चाहते थे और उसी फेर में दिल्ली आते थे।
मथरानी ने ले-दे कर छह महीने में जगरेब (क्रोशिया की राजधानी) में गुजारे।
लेकिन इन छह महीनों में ही वे जगरेब में हर कूटनयिक, स्थानीय पुलिस व इंटेलीजेंस यूनिट के राडार पर आ गए थे।
भारत के ये राजदूत इतने रंगीले थे कि अक्सर चौराहों पर और सस्ते बारों में भी वेश्याएं तलाशते दिख जाते थे और उनका क्रोशियाई ड्राइवर मोलभाव में दुभाषिए की भूमिका निभाता था।
हद तो तब हो गई जब बतौर राजदूत ये महाशय क्रोशिया के राष्ट्रपति को अपना परिचय पत्र सौंपने पहुंचे तो उनके साथ पत्नी की जगह आस्ट्रिया की कोई छिनरी सी महिला थी। कूटनयिक प्रोटोकाल की दृष्टि से यह अविश्वसनीय घटना थी।
और जितने दिन वे क्रोशिया में रहे, तमाम खूबसूरत तटीय शहरों में नित नईनवेली महिला मित्रों के साथ भारत सरकार के खर्चे पर रंगरलियां मनाते रहे। बुरा हो कुछ दुश्मनों का जिन्होंने उन होटलों के बिल भी निकाल लिए।
जगरेब में भारतीय राजदूत के आवास पर ऐसी वैसी महिलाओं का जमघट होता था। इस कदर जमघट कि महिलाओं में आपस में अपनी फीस को लेकर लड़ाई झगड़े भी हो जाते थे। और जब वे दिल्ली रहते थे तो भी राजदूत का आवास किसी कामकाजी महिला छात्रावास की तरह या किसी प्रसिद्ध को..& ठे की तरह रंगीन होता था जहां भारत सरकार के खर्चे से वे सभी आतिथ्य सुख उठाती थीं।
अपनी महिला मित्रों से मिलने मथरानी विदेश मंत्रालय को बिना बताए सरकारी झंडे वाली कार से रंगरलियां मनाने स्लोवेनिया और बोस्निया भी जाते थे। भारत का राजदूत चुपचाप दूसरे देश चला जाता है और सरकार को खबर नहीं। ठीक वैसे ही जैसे उत्तर प्रदेश एक कांगी मुख्यमंत्री रंगरलियां मनाने के लिए अक्सर कई की दिनों तक गायब हो जाते थे 😁
इन हरकतों से नाराज विदेश मंत्री नटवर ने मथरानी का फोन तक उठाना बंद कर दिया था, पर मेडम माया की कृपा के चलते किसी कार्रवाई का साहस नहीं जुटा पाए क्योंकि अफवाहें थी कि उन पर भारत की राजधानी दिल्ली के एक बहुत ही ताकतवर पते पर या सबसे ताकतवर पते पर रहने वाली किसी महिला का वरदहस्त है। समझ रहे हो ना ताकतवर पता और महिला ….
आयल फॉर कैश घोटाला उजागर करने के बाद मथरानी को होश आया कि अब खुद कैसे बचें। तब उन्होंने शुद्ध देशी अंदाज में #क्रोशिया के उन सभी छोटे बड़े शहरों जहां उन्होंने महिला मित्रों के साथ रात गुजारी थी, के मेयरों को फोन किया और सिफारिश की कि वे एक पुरानी तारीख का सरकारी निमंत्रण पत्र भेज दें अपने शहर में आने का ताकि लगे कि वे आधिकारिक काम से आए थे।
मेड सर्वेंट के साथ उनका बर्ताव ऐसा था कि देवयानी खोबरागडे सुनें तो अनशन पर बैठ जाएं कि यह क्यों बच निकला।
ये कांग्रेस के जमाने की नियुक्तियों का बस एक छोटा सा नमूना है। आज भी कोई नहीं जानता कि मथरानी राजदूत कैसे बन गए। उनकी काबिलियत क्या थी ?! खैर काबिलियत भी बतायेंगे जब बात निकली है तो दूर तलक ही जायेगी।
काबिलियत छोड़िए पर जो सत्ता के गलियारों में उन दिनों अफवाहें थीं कि राजनीति में आने से पहले वे दिल्ली में बसंत बिहार में एक पंचतारा होटल में बारटेंडर थे, शराब शराब भी परोसा करते। अब काम एक ही हो दो आदमियों का तो अक्सर दोस्ती भी हो जाया करती है,हो गयी 😁
बताते हैं कि “त्याग की देवी” अक्सर इस बार में #आचमन के लिए आती थीं, अरे भई बार में डांस और परोसना ही तो छोड़ा था, पीना थोडे छोडा था। तो बस ऐसे ही आते जाते बारबाला की बारटेंडर से दोस्ती हो गयी। तो क्या बारटेंडर होना राजदूत बनने के लिए योग्यता का पैमाना है? यूपीए सरकार में जरूर था किसी समय, क्योंकि दो-चार और बारटेंडरों की भी किस्मत बदलने की चर्चाएं भी रही हैं। रसोईयों की भी किस्मत बदलने और शीर्ष पदों तक पहुंचने के उदाहरण हैं।
लरिकैयां गानू प्रजाति के कुछ भोई वाले वृद्ध ज्ञानी नियुक्तियों पर सवाल उठाएं, उनका हक है। पर भोई वाले ये भी बताएं कि इस आयु में कुंठाएं इस कदर अनियंत्रित होकर किलकारी क्यों मार रही हैं? भोई वालैओ ऐसे सवाल नही उठाने लायक हो तुम, अन्यथा अतीत तुम्हारे मालिकों का इतना स्याह है कि हर दिन का एक किस्सा है।
બહુ ઓછા લોકોને ખબર હશે કે કામચલાઉ સરકારમાં સરદાર પટેલને જ્યારે ગૃહખાતુ સોંપવામાં આવ્યુ ત્યારે સૌથી મોટો પ્રશ્ન તો એ હતો કે સરદારને રહેવું ક્યા ? કારણકે દિલ્હીમાં સરદારનો પોતાનો કોઇ બંગલો તો ઠીક એક નાનુ સરખુ મકાન પણ નહોતું. અરે દિલ્હીની ક્યાં વાત કરો છો આખા દેશમાં ક્યાંય કોઇ સ્થવર મિલ્કત વલ્લભભાઇ પટેલના નામે નહોતી. બાપુજીની મિલ્કતમાંથી પણ એમણે ભાગ જતો કર્યો હતો. દિલ્હીના ઉદ્યોગપતિ બનવારીલાલ શેઠે સરદાર સાહેબને રહેવા માટે પોતાનો ખાલી બંગલો આપ્યો અને ઓરંગઝેબ રોડ પરનો આ બંગલો સરદાર સાહેબની સાધુતાનો સાક્ષી બનીને રહ્યો.