Posted in सुभाषित - Subhasit

गीता चतुर्थ अध्याय प्रथम श्लोक में कहा गया है,
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ।

अन्वय – अहम् इमम् अव्ययम् योगम् विवस्वते प्रोक्तवान् । विवस्वान् मनवे प्राह । मनुः इक्ष्वाकवे अब्रवीत् ।

अर्थ – कृष्ण भगवान कहते हैं मेंने इस अविनाशी योग (कर्मयोग) को (सर्वप्रथम) सूर्यसे कहा था । (फिर) सूर्यने (अपने पुत्र वैवस्वत) मनु से कहा । (और) मनु ने (अपने पुत्र) राजा इक्ष्वाकु से कहा । आगे चलकर कृष्ण भगवान कहते हैं कि इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस कर्मयोग को राजर्षियोंने जाना । परन्तु बहुत समय बीत जाने के कारण वह योग मनुष्यलोक में लुप्तप्राय हो गया । इसलिये वही यह पुरातन योग को कृष्ण भगवान ने उनके प्रिय शिष्य एवं सखा अर्जुन को पुनः उपदेश किया ।

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