Posted in सुभाषित - Subhasit

मणिलुण्ठति पादेषु काचः शिरसि धार्यते।
यथैवास्ते तथैवास्तां (व्यवहारावसरे तु) काचः काचो मणिर्मणिः।

मणि को पैर के पास रखते हो और काँच को शिर पर रखते हो। उनका कुछ नहीं वदलता। वह जैसे हैं, वैसे ही रहेंगे। परन्तु जब उनका व्यवहार किया जायेगा, तो उनका मूल्य पहचाना जायेगा – काँच काँच ही रहेगा और मणि मणि रहेगा।

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