Posted in गौ माता - Gau maata

भारत में गाय, कन्या और नदी को पूजनीय माना गया है।

भारत की संस्कृति और सनातन परंपरा विश्व में अपनी विशिष्टता के लिए जानी जाती है।

यहाँ प्रकृति, जीव-जंतु, नारी और जल को दैवीय स्वरूप मानकर पूजनीय माना गया है।

विशेष रूप से गाय, कन्या और नदी का स्थान हिंदू धर्म में अद्वितीय है।

इन तीनों को केवल भौतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।

1. गाय – मातृत्व और समृद्धि का प्रतीक

भारतीय संस्कृति में गाय को “माता” का दर्जा प्राप्त है। वेदों और पुराणों में गाय को कामधेनु कहा गया है, जो सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाली है।

ऋग्वेद (6.28.1) में उल्लेख है –

“गावो भगो गाव इन्द्रः सन्तु नो गावः सुवः।”

अर्थात् गाय हमारे लिए संपत्ति, सुख और स्वर्ग का साधन है।

महाभारत और भागवत पुराण में भी कहा गया है कि गाय धर्म का आधार हैं।

गोमाता का दूध, घी और गोबर जीवनोपयोगी होते हैं।

आयुर्वेद में भी गाय के पंचगव्य (दूध, दही, घी, मूत्र और गोबर) को अमृततुल्य बताया गया है।

गाय को अहिंसा, करुणा और समृद्धि का प्रतीक माना गया है। यही कारण है कि गाय का पूजन हिंदू जीवन में अनिवार्य अंग है।

2. कन्या – शक्ति और पवित्रता का रूप

भारतीय संस्कृति में कन्या को देवी स्वरूप माना गया है।

मनुस्मृति (3/56) में कहा गया है –

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।”

अर्थात जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहीं देवताओं का वास होता है।

देवी भागवत पुराण और दुर्गा सप्तशती में भी कन्याओं को देवी का ही स्वरूप कहा गया है।

नवरात्रि में कन्या पूजन परंपरा है, जहाँ कन्याओं को नौ देवियों का रूप मानकर उनका आदर किया जाता है।

कन्या केवल समाज का भविष्य नहीं, बल्कि धर्म, संस्कृति और शक्ति की आधारशिला भी है।

3. नदी – जीवन और आध्यात्मिक ऊर्जा का स्रोत

भारत को “नदियों की भूमि” भी कहा जाता है। यहाँ गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी जैसी नदियों को देवी मानकर पूजा जाता है।

ऋग्वेद (10.75) में नदियों का स्तुति-सूक्त है, जिसमें गंगा, यमुना, सरस्वती सहित अनेक नदियों का महिमामंडन है।

गंगा को तो “त्रिपथगा” कहा गया है, जो तीनों लोकों को पवित्र करने वाली है।

स्कंद पुराण और पद्म पुराण में गंगा स्नान को मोक्षदायी बताया गया है।

नदियाँ जीवनदायिनी हैं, क्योंकि वे खेती, पीने के जल और पर्यावरण के लिए आवश्यक हैं। यही कारण है कि इन्हें देवियों का रूप मानकर पूजनीय माना गया है।

निष्कर्ष

भारतीय परंपरा में गाय, कन्या और नदी केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि जीवन के अस्तित्व, संतुलन और समृद्धि के प्रतीक हैं।

गाय – माता और पोषण का प्रतीक।

कन्या – शक्ति और पवित्रता का स्वरूप।

नदी – जीवनदायिनी और मोक्षदायिनी।

हिंदू धर्म के ग्रंथ स्पष्ट करते हैं कि इनका सम्मान और संरक्षण करना केवल धार्मिक कर्तव्य ही नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय दायित्व भी है।

क्या आपको लगता है आज के समय में इनकी स्थिति सही है?

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

अल्बर्ट आइंस्टीन की मृत्यु के दिन, जब अन्य पत्रकार प्रिंसटन अस्पताल की ओर भागे, तो राल्फ मॉर्स नाम के एक फ़ोटोग्राफ़र ने अलग रास्ता चुना। उन्होंने अस्पताल जाने के बजाय आइंस्टीन के दफ़्तर का रुख किया और इमारत के सुपरिटेंडेंट को एक बोतल स्कॉच देकर अंदर जाने की अनुमति हासिल की। वहाँ पहुँचकर उन्होंने आइंस्टीन की मेज़ की तस्वीरें खींचीं — वह मेज़ जिस पर कुछ ही घंटे पहले तक एक महान दिमाग़ काम कर रहा था।

18 अप्रैल 1955 को 76 वर्ष की आयु में अल्बर्ट आइंस्टीन का निधन हुआ। जैसे ही यह ख़बर फैली, पत्रकार और फ़ोटोग्राफ़र प्रिंसटन अस्पताल की ओर दौड़े, जहाँ आइंस्टीन ने अपने अंतिम घंटे बिताए थे। लेकिन लाइफ़ मैगज़ीन के फ़ोटोग्राफ़र राल्फ मॉर्स ने कुछ अलग सोचा। उन्हें लगा कि प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में आइंस्टीन का दफ़्तर ही शायद उनके जीवन की सच्ची झलक दिखा सके। एक बोतल स्कॉच के बदले सुपरिटेंडेंट से इजाज़त लेकर वे अंदर पहुँचे और वहाँ उन्होंने बेहद भावुक कर देने वाली तस्वीरें उतारीं—आइंस्टीन की काग़ज़ों, जर्नल्स और नोट्स से भरी मेज़, किताबों की अलमारियाँ और समीकरणों से भरा ब्लैकबोर्ड—सब कुछ समय में थमा हुआ, ठीक उनकी मृत्यु के कुछ घंटों बाद।

वह मेज़ काग़ज़ों, जर्नल्स और नोट्स से अटी पड़ी थी—मानो यह दिखा रही हो कि उनका दिमाग़ आख़िरी सांस तक काम करता रहा। ब्लैकबोर्ड पर लिखे समीकरण गवाही दे रहे थे कि आइंस्टीन अपनी अंतिम समस्याओं से जूझ रहे थे। ये तस्वीरें सिर्फ़ ऐतिहासिक महत्व के कारण ही मशहूर नहीं हुईं, बल्कि इसलिए भी क्योंकि उन्होंने यह एहसास दिलाया कि महान प्रतिभा अक्सर अव्यवस्था से जन्म लेती है।

मज़ेदार तथ्य: आइंस्टीन ने एक बार कहा था—
“अगर बिखरी हुई मेज़ बिखरे हुए दिमाग़ की निशानी है, तो खाली मेज़ किस चीज़ की निशानी है?”
यही वजह है कि उनके दफ़्तर की यह अंतिम तस्वीर उनके जीवन का सबसे सटीक चित्र बन गई।

Posted in हिन्दू पतन

कालका मंदिर का दान कोष सरकार के नियंत्रण में है किन्तु जामा मस्जिद नहीं।

पुष्कर मंदिर का दानकोष भी सरकार के नियंत्रण में लेकिन अजमेर शरीफ नहीं।

वैष्णो देवी मंदिर का भी सरकारी नियंत्रण में लेकिन हजरत बल की दरगाह नहीं।

सिद्धिविनायक मंदिर भी सरकार के नियंत्रण में लेकिन हाजी अली की दरगाह नहीं।

4 लाख मठ-मंदिर सरकार के नियंत्रण में हैं किन्तु मस्जिद, मज़ार, दरगाह व् चर्च दरगाह एक भी नहीं हैं।

मठों मंदिरों के संपूर्ण दान कोष के साथ साथ करोड़ों के टैक्स सरकार लेती है किन्तु दूसरों से एक रुपैया भी नहीं लेती।

क्या ऐसी होती हैं धर्मनिरपेक्ष सरकारें?
तनिक सोचिए।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक आदमी किसी से 50 लाख मांग रहा था… पर उतने नही मिले… कुछ बातों के बाद मामला 25 लाख में सलटा दिया। और एक नई बुलेट ली।
वो बहुत खुश था…
पर पिछले हफ्ते दो हफ्तों से अपनी माँ और बहन को लगातार आती हिचकियों से परेशान हो कर वो दोनों को डॉक्टर के पास लेकर गया।

डॉक्टर ने चैकअप किया, सारे जरूरी टेस्ट कराए और रिपोर्ट्स आने के बाद आदमी को अपने केबिन में बुलाया।

डॉक्टर : ” सारी रिपोर्ट्स नॉर्मल हैं। लेकिन एक बात बताओ, 15-20 दिन पहले तुमने कोई नया सामान खरीदा है क्या ? “

आदमी (बेहद खुश होकर) : ” हाँ, डॉक्टर साहब। 15 दिन पहले, एकदम नई, एकदम कड़क, एकदम झकास, बुलेट मोटरसाइकिल खरीदी है। “

डॉक्टर : ” उस गाड़ी में, राॅयल एनफील्ड कंपनी का साइलेंसर निकालकर अधिक आवाज करने वाला साइलेंसर लगवाया है क्या ? “

आदमी (बेहद आश्चर्यचकित होते हुए) : ” हाँ डॉक्टर साहब, एकदम तीखी और कड़क आवाज आती है साइलेंसर से और बीच बीच में तेज फटाके वाली आवाज भी निकाली जा सकती है।  लेकिन आपको कैसे पता चला, ये सब ? “

डॉक्टर : ” ये बीमारी अब कॉमन हो गई है। कारण तुम रास्ते पर कड़क, जोरदार आवाज करते, फटाके उड़ाते बढ़ते जाते हो और पीछे लोग तुम्हारी माँ और बहन को याद करते रहते हैं। “

‘” अब, सबसे पहले एक काम करो। मोटर साइकिल का वर्तमान साइलेंसर अलग करो और कंपनी ने जो दिया था, उसे वापस लगाओ। “

” तुम्हारी माँ और बहन दोनों स्वस्थ हो जायेंगी। “

👆शहर वाहन नियंत्रण शाखा👆

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Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक गांव में ठहरा हुआ था। उस रात उस गांव में एक बड़ी अनूठी घटना घट गयी, फिर मैं उसे भूल न सका। छोटा गांव, बस एक ही ट्रेन आती और एक ही ट्रेन जाती, तो दो बार स्टेशन पर चहल पहल होती। आने वाली ट्रेन दिन को बारह बजे आती, जाने वाली ट्रेन रात को दो बजे। स्टेशन पर भी कुछ ज्यादा लोग नहीं हैं एक स्टेशन मास्टर है, एकाध पोर्टर है, एकाध और आदमी क्लर्क है। कोई ज्यादा यात्री आते जाते भी नहीं हैं।

उस रात ऐसा हुआ कि एक आदमी रात की गाड़ी पकड़ने के लिए सांझ स्टेशन पर आया। वह बार बार अपने बैग में देख लेता था। स्टेशन मास्टर को संदेह हुआ, शक हुआ कि कुछ बड़ा धन लिए हुए है। वह अपने बैग को भी दबाए था, एक क्षण को भी उसे छोड़ता नहीं था। आदमी देखने से भी धनी मालूम पड़ता था। रात दो बजे ट्रेन जाएगी। मन में बुराई आयी। उसने पोर्टर को बुलाकर कहा कि ऐसा कर, दो बजे रात तक कहीं भी इसकी जरा भी झपकी लग जाए और आठ बजे रात के बाद तो गांव में सन्नाटा हो जाता है, गाव भी कोई दो मील दूर…

उन्होंने ने सोचा इसको खतम करना है। पोर्टर ने कुल्हाड़ी ले ली और वह घूमता रहा कि यह कब सो जाए। मगर वह भी आदमी जागा रहा, जागा रहा, जागा रहा। पोर्टर को झपकी आ गयी। और जब पोर्टर को झपकी आ गयी तो वह आदमी जिस बेंच पर बैठा था उससे उठकर, उसको नींद आने लगी थी तो अपना बैग लेकर वह टहलने लगा प्लेटफार्म पर। इस बीच स्टेशन मास्टर आकर उस बेंच पर लेट गया, जिस पर वह धनी लेटा था। पोर्टर की आंख खुली, देखा कि सो गया, उसने आकर गर्दन अलग कर दी। स्टेशन मास्टर मारा गया। सुबह गांव में खबर आयी। मैं उसे भूल नहीं सका उस घटना को। इंतजाम उसी ने किया था, मारा खुद ही गया।

जीवन में करीब करीब ऐसा ही हो रहा है। जो दुख तुमने दूसरों को दिए हैं, वे लौट आएंगे। जो सुख तुमने दूसरों को दिए हैं, वे भी लौट आएंगे। दुख भी हजार गुने होकर लौट आते हैं, सुख भी हजार गुने होकर लौट आते हैं।

इसलिए बुद्ध कहते हैं, दूसरा सूत्र याद रखना, सुख बन सके तो दे देना; अगर सुख न दे सको, तो कम से कम दुख मत देना। दूसरों को दुख मत देना। अपना सुख ऐसा बनाना कि तुम पर ही निर्भर हो, दूसरे के दुख पर निर्भर न हो।

फर्क समझो। एक आदमी धन के इकट्ठे करने में सुख लेता है। निश्चित ही यह कई लोगों का धन छीनेगा। बिना धन छीने धन आएगा भी कहां से? धन बहुत बहुलता से है भी नहीं, न्यून है। धन ऐसा पड़ा भी नहीं चारों तरफ। जितने लोग हैं, उनसे धन बहुत कम है। तो धन छीनेगा तो धन इकट्ठा कर पाएगा। यह आदमी दूसरों को दुख दिए बिना धनी न हो सकेगा। और धन पाने से जो सुख मिलने वाला है, दो कौड़ी का है। और जितना दुख दिया है, उसके जो दुष्परिणाम होंगे, अनंत समय तक उसकी जो प्रतिक्रियाएं होंगी, वे बहुत भयंकर हैं।

एक दूसरा आदमी ध्यान में सुख लेता है। ध्यान और धन में यही खूबी है। ध्यान जब तुम करते हो तो तुम किसी का ध्यान नहीं छीनते। तुम्हारा ध्यान बढ़ता जाता है, किसी का ध्यान छिनता नहीं।

तो बुद्ध कहेंगे, अगर ध्यान और धन में चुनना हो तो ध्यान चुनना, यह अप्रतियोगी है, इसकी किसी से कोई स्‍पर्धा नहीं है। और तुम्हारा आनंद बढ़ता जाएगा। और आश्चर्य की बात यह है कि तुम जितने आनंदित होते जाओगे अनायास तुम दूसरों को भी आनंद देने में सफल होने लगोगे, समर्थ होने लगोगे।

जो है, उसे हम बांटते हैं। दुखी आदमी दुख देता है, सुखी आदमी सुख देता है  देना ही पड़ेगा। जब फूल खिलेगा और गंध निकलेगी तो हवाओं में बहेगी ही। जब तुम्हारा ध्यान सघनीभूत होगा, तो तुम्हारे चारों तरफ गंध उठेगी। सुख दोगे तो सुख मिलेगा। ऐसा सुख खोजना जो किसी के दुख पर आधारित न होता हो, यही बुद्ध की मौलिक शिक्षा है।

और फिर अल्प भी सुख मिले आज, अल्प भी शायद छोड़ना पड़े कल के महासुख के लिए, तो उसे भी छोड़ देना। अल्प मिले तो अल्प ले लेना, अल्प छोड़ना पड़े तो छोड़ देना, मगर एक खयाल रखना: जीवन का पूरा विस्तार खयाल रखना। चीजें एक दूसरे से संयुक्त हैं। अंतिम परिणाम क्या होगा, उस पर ध्यान रहे। और ऐसा सुख कमाना, जो तुम्हारा अपना हो, जिसके लिए दूसरे को दुखी नहीं करना पड़ता है।

अब एक आदमी को राजनेता बनना है, तो उसे दूसरों को दुखी करना होगा। अब इंदिरा और मोरारजी दोनों साथ साथ सुखी नहीं हो सकते, इसका कोई उपाय नहीं है। कोई न कोई दुखी होगा।
तो बूद्ध कहते हैं, ऐसी दिशा में मत जाना, जहां किसी को बिना दुखी किए तुम सुखी हो ही न सको। हजार और उपाय हैं जीवन में आनंदित होने के।

एस धम्मो सनंतनो

ओशो