एक सुबह एक सज्जन मुझसे मिलने आए, झुककर चरण स्पर्श किया और पूछा, ‘सर, मुझे पहचाने?’
‘नहीं, याद नहीं आ रहा है, आप बताइए.’ मैंने कहा.
‘मैं संजय हूँ, संजय पाटिल. आपने मुझे २३ वर्ष पूर्व हिरमी के एल एंड टी सीमेंट संयंत्र में प्रशिक्षण दिया था.’
‘अरे वाह, बहुत ख़ुशी हो रही है मुझे आपसे मिलकर.’ मैंने मुदित भाव से कहा.
उसके बाद प्रशिक्षण की बातें चली, उन्होंने मुझे वे उद्धरण सुनाए जो मुझे खुद याद नहीं रह गए हैं कि मैंने वे बातें कभी की थी.
संजय ने बताया, ‘मैं दसवीं पास हूँ और मेरी पत्नी ग्यारहवीं. मेरी नौकरी एल एंड टी सीमेंट संयंत्र में श्रमिक (लेबर) के रूप में लगी. वहां नौकरी करते-करते मैं मेकेनिक बन गया. मेरे दो बच्चे हैं, एक लड़की नेहा और एक लड़का लोकेश. दोनों नर्सरी से लेकर दसवीं तक हिरमी में संयंत्र के स्कूल में पढ़े. उसके बाद मैंने नौकरी छोड़ दी और मुंबई से प्राइवेट काम करने लग गया. भारत के लगभग सभी संयंत्रों में मुझे सलाह देने के लिए बुलाया जाता है जब क्रेन, बुलडोजर काम नहीं करते तो लिफ्टिंग का काम कैसे होगा मैं बताता हूँ. अपने काम में व्यस्त रहने और देश भर में दौरों के कारण मैं अपने परिवार को बहुत कम समय दे पाता हूँ.
एक दिन पत्नी का फोन आया, “नेहा तो पढ़ने में तेज है लेकिन लोकेश पढ़ाई में बिलकुल ध्यान नहीं देता. उसका ध्यान बस दौड़ में लगा रहता है. जितनी मेहनत वह दौड़ने में करता है उतनी मेहनत पढ़ाई में करे तो बारहवीं पास कर लेगा, नहीं तो फेल होना तय है.” मैंने कहा कि घर पहुँच कर उससे बात करूंगा.
जब मैं घर पहुंचा तो उससे बात की. उसने बताया कि उसे पढ़ाई पसंद नहीं है, दौड़ना पसंद है.’ ‘फिर क्या हुआ?’ मैंने पूछा.
‘मुझे प्रशिक्षण कार्यक्रम में आपकी कही गई बात याद आई जिसमें आपने आपने पुत्र को संन्यास का रास्ता चुनने की अनुमति दी थी और यह कहा था, “इंसान जो करना चाहता है, उसे करने देना चाहिए क्योंकि यदि वह अपनी रूचि के अनुसार काम करता है तो उसका रिजल्ट अच्छा आता है.”
मैंने उसे दौड़ में अधिक ध्यान देने की बात कही और यह भी कहा “यदि तुम बारहवीं में सभी विषय में फेल होते हो तो मैं पूरी बिल्डिंग के लोगों को डिनर दूंगा.”
उसके बाद लोकेश ने दौड़ पर अधिक ध्यान देना शुरू कर दिया और ४२ किलोमीटर की मेराथन दौड़ में भाग लेने वाला देश का सबसे कम उम्र का खिलाड़ी घोषित हुआ. टाइम्स ऑफ़ इंडिया जैसे अखबार में उसकी फोटो के साथ समाचार प्रकाशित हुआ. इस समय वह दक्षिण अफ्रीका गया हुआ है ९० किलोमीटर की मेराथन दौड़ में भाग लेने के लिए. वह अभी २० वर्ष का है और उसने इस उम्र में मुंबई में एक अकादमी शुरू की है जिसका नाम है, “गेट फिट विद पाटिल”. मेरी बेटी नेहा अभी अमेरिका में पढ़ाई की और वहीं रह रही है.
मेरे दोनों बच्चे आपकी सलाह पर इतनी तरक्की किए जबकि हम दोनों कितना कम पढ़े-लिखे हैं.’
सम्प्रेषण में दो छोर होते हैं, एक छोर पर सन्देश देने वाला अर्थात वक्ता और दूसरे छोर पर सन्देश ग्रहण करने वाला अर्थात श्रोता. सन्देश एक तरफ से चला, दूसरी तरफ पहुंचा, उसके बाद यह जानना जरूरी होता है कि सन्देश कितना पहुंचा और उसका श्रोता पर क्या प्रभाव पड़ा? इसे ‘फीडबेक’ कहते हैं. हम प्रशिक्षक प्रशिक्षण तो देते हैं लेकिन यह जानने के लिए उत्सुक रहते हैं कि हमने जो बताया उसका असर क्या हुआ?
संजय पाटिल ने २३ वर्ष पुरानी बात के असर को बताकर प्रशिक्षण का मान बढ़ाया.
(लिखी जा रही पुस्तक ‘याद न जाए बीते दिनों की’ का अंश)
**प्रस्तुत फोटो में संजय पाटिल जब ‘लेबर’ के रूप में एल एंड टी में कार्यरत थे और दूसरा फोटो मैं उनके साथ.

