कर्ण ही पूर्वजन्म में दंभोद्भवा नामक असुर थे।
महाभारत ऐसी छोटी-छोटी कथाओं का समूह भी है जो हमें आश्चर्यचकित कर देती है। जी सुंदरता के साथ वेदव्यास ने सहस्त्रों छोटी-छोटी घटनाओं को एक साथ पिरोया है वो निश्चय ही अद्वितीय है।
ऐसी ही एक कथा दंबोधव दानव की है जो सीधे तौर पर कर्ण से जुडी है और अर्जुन एवं श्रीकृष्ण भी उसका हिस्सा हैं। ये कथा वास्तव में कर्ण के पूर्वजन्म की कथा है जिसके कारण उसे अगले जन्म में भी इतना दुःख भोगना पड़ा।
ये कथा महाभारत से बहुत पहले, रामायण से भी बहुत पहले, त्रेतायुग की है। दंबोधव नाम का एक प्रतापी असुर था जिसने भगवान सूर्यनारायण की १००० वर्षों तक तपस्या की।
उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने उसे दर्शन दिए और वर माँगने को कहा। वर में उसने अमरत्व का वरदान माँगा जिस पर सूर्यदेव ने उसे कहा कि “भक्त! अमरत्व का वरदान देना संभव नहीं है क्यूँकि सृष्टि के नियम के रचयिता स्वयं परमपिता ब्रह्मा भी अपने विधान को नहीं बदलते।
तब उस दानव ने बहुत सोच कर कहा – “हे देव! अगर ऐसा है तो मैंने सहस्त्र वर्षों तक आपकी तपस्या की है इसी कारण मुझे प्रत्येक वर्ष के लिए एक दिव्य कवच प्रदान करें।
उन १००० कवचों में मैं पूर्णतः सुरक्षित रहूँ। प्रत्येक कवच को केवल एक मानव ही नष्ट कर सके और वो भी वही जिसने मेरी तरह १००० वर्षों तक तप किया हो। साथ ही जैसे ही वो मेरा कवच तोड़े, वो तत्काल मृत्यु को प्राप्त हो जाये।
वर्षों तक दोनों का युद्ध चलता रहा। उधर जैसे ही नारायण ने अपनी तपस्या के १००० वर्ष पूरे किये, नर ने दंबोधव का एक कवच तोड़ डाला। कवच टूटते ही वरदान के कारण नर की मृत्यु हो गयी। दंबोधव प्रसन्न हुआ कि एक कवच भले ही नष्ट हो गया किन्तु उसका शत्रु भी नष्ट हो गया। वो विजयनाद करते हुए अपने नगर लौट गया।
उधर नारायण की तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव ने उसे दर्शन दिए। नारायण ने वर के रूप में उनसे “मृतसञ्जीवनी” माँगी, जिसे महादेव ने उन्हें प्रदान किया।
वो विद्या लेकर नारायण तत्काल नर के मृत शरीर के पास पहुँचा और उसे जीवित कर दिया। अब नर तपस्या को गया और नारायण ने दंबोधव को ललकारा।
दोनों के रूप-गुण में कोई भेद ना था इसी कारण दंबोधव को लगा कि नर लौट आया है। दोनों में पुनः युद्ध प्रारम्भ हुआ और जैसे ही नर ने १००० वर्षों की तपस्या पूर्ण की, नारायण ने दंबोधव का एक और कवच तोड़ डाला।
कवच टूटते ही नारायण मृत हो गए किन्तु नर ने नारायण को मृतसञ्जीवनी विद्या से जीवित कर दिया। अब फिर नारायण तप को गए और नर ने दंबोधव को पुनः युद्ध के लिए ललकारा। ये क्रम चलता ही रहा और तबतक चलता रहा जबतक उस असुर के ९९९ कवच नष्ट नहीं हो गए।
जब अंतिम कवच शेष रहा तो दंबोधव भयभीत हो सूर्यदेव की शरण में चला गया जिन्होंने उसे अपने तेज का एक भाग बना कर स्वयं में समा लिया।
उधर तपस्या पूर्ण कर नर और नारायण उसे ढूँढ़ते हुए सूर्यदेव के पास पहुँचे और उनसे कहा कि वे दंबोधव को उनके सुपुर्द कर दें। किन्तु शरणागत की रक्षा करने के लिए सूर्यदेव ने ऐसा नहीं किया।
तब नर-नारायण ने सूर्यदेव की भर्त्सना करते हुए कहा – “हे सूर्यदेव! आपने ही अविवेक के कारण इस असुर को ऐसा वरदान दिया जिससे पृथ्वी त्रस्त हो गयी। आपके वरदान के कारण हम दोनों भाई ९९९ बार मृत्यु का कष्ट भोग चुके हैं।
ये जानते हुए कि इसका वध अनिवार्य है, आप इसकी रक्षा कर रहे हैं। अतः अब आपको भी इसका दंड भोगना पड़ेगा। जाइये हम आपको श्राप देते हैं कि इस असुर को अगला जन्म आपके ही तेज से मिलेगा और इसे जीवन भर संघर्ष करना होगा। यही नहीं, अगले जन्म में भी इसके वध के लिए हम दोनों भाई पुनः जन्म लेंगे।
नर और नारायण के श्राप के कारण ही दंबोधव द्वापर युग में सूर्यदेव के तेज के साथ उसी एक बचे हुए कवच के साथ कर्ण के रूप में जन्मा।
द्वापर में नर और नारायण अर्जुन एवं कृष्ण के रूप में जन्मे जिनके कारण अंततः कर्ण मृत्यु को प्राप्त हुआ। सूर्य एवं और के मेल के कारण जहाँ कर्ण में सूर्यदेव का तेज और अतुल बल था, वही असुर दंबोधव के प्रभाव से उसने धर्म का मार्ग त्याग कर अधर्म का मार्ग चुना और अंत में उसका पतन हुआ।
कर्ण के पूर्वजन्म के विषय में एक और विवरण पद्मपुराण में मिलता है जहाँ उसका जन्म ब्रह्मा के अंश से हुआ जिसका नाम स्वेदजा हुआ। उसे नारायण के अंश से जन्मे नर से युद्ध करना पड़ा जिसका नाम रक्त्जा था।
अब तक हमने पढ़ा महारथी कर्ण के पिछले जन्म “दंबोधव” के बारे में पढ़ा। इससे हमें ये जानने को मिलता है कि इन दोनों के बीच की प्रतिस्पर्धा कितनी पुरानी है। जिन्हे दंबोधव के बारे में पता नहीं था उसके लिए ये कथा सुनना वास्तव में आश्चर्यजनक है।
किन्तु उससे भी अधिक आश्चर्यजनक कथा हमें पद्मपुराण में मिलती है जिसमे इन दोनों की प्रतिदंद्विता का विवरण है जो सीधे त्रिदेवों से सम्बंधित है।
कथा उस समय की है जब परमपिता ब्रह्मा पंचमुखी थे। उनके चार मुख चारों वेदों का पाठ करते थे किन्तु उर्ध्वमुखी पाँचवा मुख सदैव महादेव की निंदा करता था।
इससे रुष्ट होकर महादेव ने ब्रह्मदेव से युद्ध किया और उनका वो पाँचवा मुख काट दिया। ब्रह्मदेव युद्ध से अत्यंत श्रमित थे और अपना पाँचवा मुख काटने पर अत्यंत क्रोधित भी। उसी क्रोध एवं श्रम के कारण उनके शरीर के पसीने से एक अत्यंत भयानक दैत्य ने जन्म लिया।
ब्रह्मदेव से उत्पन्न होने के कारण उसका तेज और बल असाधारण था और साथ ही परमपिता के प्रताप से उसे जन्मजात १००० दिव्य कवच प्राप्त हुए। उसने ब्रह्मदेव को प्रणाम किया और उनसे पूछा कि वो कौन है और उसकी उत्पत्ति क्यों हुई है।
तब ब्रह्मदेव ने अपने पसीने (स्वेद) से जन्मे उस असुर का नाम “स्वेदजा” रखा और महादेव से हुए अपमान के कारण उन्होंने उसे भगवान रूद्र से युद्ध करने के लिए कैलाश की ओर जाने की आज्ञा दी। अपने पिता की आज्ञा पाकर स्वेदजा भयानक अट्टहास करता हुआ कैलाश की ओर चला।
उधर कैलाश में भगवान शिव समाधि में जाने वाले थे कि उनके गणों ने उन्हें बताया कि स्वेदजा उनसे युद्ध करने को कैलाश आ रहा है। उन्होंने स्वेदजा के भयानक रूप और बल की भी चर्चा की और महारुद्र से प्रार्थना की कि वे उस महान असुर का वध करें। तब महादेव ने भगवान विष्णु से इसका उपाय खोजने को कहा और स्वयं समाधि में चले गए।
जब श्रीहरि ने स्वेदजा का रौद्र रूप देखा हो उन्होंने अपने खून से एक अन्य असुर की उत्पत्ति की और उसका नाम “रक्त्जा” (रक्त से जन्मा) रखा। रक्त्जा नारायण की शक्ति से जन्मा था और युद्ध कौशल में उन्ही के समान था।
नारायण के आशीर्वाद से उसके १००० हाथ थे और वो ५०० दिव्य धनुषों का स्वामी था। उसने नारायण से पूछा कि उसका जन्म क्यों हुआ है?
तब नारायण ने उसे बताया कि क्रोधवश ब्रह्मदेव ने स्वेदजा नामक एक असुर की उत्पत्ति की है जो महादेव से युद्ध की मूर्खता करने जा रहा है।
वो महाकाल को तो कोई क्षति नहीं पहुंचा सकता किन्तु इससे ब्रह्मा और महादेव में वैमनस्य बढ़ेगा, अतः वो जाये और स्वेदजा को रोके।
नारायण की आज्ञा पाते ही रक्त्जा ने तत्काल कैलाश की ओर जाते हुए स्वेदजा को रोका और उसे युद्ध के लिए ललकारा।
तब उन दोनों असुरों में भयानक युद्ध आरम्भ हुआ। दोनों ब्रह्मदेव और विष्णुदेव के अंश से जन्मे थे और अतुल बलशाली थे। दोनों के बीच वो युद्ध कई वर्षों तक चलता रहा।
उस युद्ध में रक्त्जा ने स्वेदजा के ९९९ कवच तोड़ डाले, वहीँ स्वेदजा ने रक्त्जा के ९९८ हाथ काट डाले और ५०० धनुषों का नाश कर दिया। अब रक्तजा के पास को अस्त्र-शस्त्र शेष नहीं था,
किन्तु स्वेदजा के पास उसका एक दिव्य कवच अभी भी बाँकी था। नारायण समझ गए कि उस युद्ध में रक्त्जा स्वेदजा से पराजित हो जाएगा। ये जानकर उन्होंने बीच-बचाव किया और ब्रह्मदेव को समझा-बुझा कर उस युद्ध को रुकवाया।
रक्त्जा को उस युद्ध में स्वेदजा को पराजित ना कर पाने का क्षोभ हुआ और उसने प्रतिज्ञा की कि अगले जन्म में वो अवश्य ही स्वेदजा को पराजित करेगा।
रक्त्जा की इस कामना को देखकर श्रीहरि विष्णु ने उसे आशीर्वाद दिया कि अगले जन्म में रक्त्जा की सहायता के लिए वे भी अवतार लेंगे।
जब तक उन दोनों का युद्ध समाप्त हुआ, भगवान शिव की समाधि भी टूटी। वे वहाँ आये और स्वेदजा और रक्त्जा के पराक्रम को देख कर अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने दोनों को ब्रह्मदेव एवं नारायण से माँग लिया और फिर सूर्यनारायण को स्वेदजा और देवराज इंद्र को रक्त्जा के संरक्षण का दायित्व सौंपा।
समय आने पर सूर्यदेव के तेज से स्वेदजा कर्ण और इंद्रदेव के तेज से रक्त्जा अर्जुन के रूप में जन्मे। उसी युग में नारायण श्रीकृष्ण के रूप में अवतरित हुए। कर्ण अपने बचे हुए उस एक कवच के साथ ही जन्मा किन्तु श्रीकृष्ण और देवराज इंद्र के छल के कारण उसे अपना कवच दान करना पड़ा और अर्जुन ने अपने पूर्वजन्म की प्रतिज्ञा के कारण अंततः कर्ण को पराजित किया और उसका वध किया।
Day: August 28, 2025
2 એપ્રિલ, 1954 ના રોજ, લોસ એન્જલસ ટાઇમ્સના ફોટોગ્રાફર જોન ગૌન્ટ કેલિફોર્નિયાના હર્મોસા બીચ પર તેમના ઘરે હતા, ત્યારે તેમણે એક દંપતીને કિનારા પાસે ઉભેલા જોયું. તે ખૂબ જ ટેન્શન માં હતા, ગૌન્ટે, કંઈક અસામાન્ય લાગતા, તેનો કેમેરો પકડ્યો અને તેની બાલ્કનીમાંથી એક જ ફોટોગ્રાફ લીધો.
જોન અને લિલિયન મેકડોનાલ્ડનો 19 મહિનાનો પુત્ર, માઇકલ, બીચના કિનારા પર ગાયબ થઈ ગયો હતો. લિલિયને પોલીસને જણાવ્યું કે માઇકલ પરિવારના આંગણામાંથી ગાયબ ગયો હતો, જેના કારણે તેણીએ અધિકારીઓને ફોન કર્યો. ઝડપથી શોધખોળ શરૂ કરવામાં આવી.
શોધ દરમિયાન, બેવર્લી મર્ડોક નામની એક મહિલા પોલીસ સ્ટેશનમાં દોડી ગઈ અને જાણ કરી કે તેણે સમુદ્રમાં સીવીડના ટુકડામાં એક બાળક તરતું જોયું છે. તેણીએ જે કપડાં વર્ણવ્યા હતા તે માઇકલના પહેરેલા પોશાક સાથે મેળ ખાતા હતા.
બીચ પર, જોન મેકડોનાલ્ડ પાણીમાં પ્રવેશવા માટે ઉતાવળમાં આગળ પાછળ દોડી ગયો, જ્યારે લિલિયન તેને રોકવાનો પ્રયાસ કર્યો. શોધ પ્રયાસો છતાં, તે દિવસે માઇકલ મળ્યો ન હતો, અને રાત પડતાં, શોધ બંધ કરવામાં આવી. જોન અને લિલિયને કિનારા છોડવાનો ઇનકાર કર્યો, અંધારા પછી પણ ત્યાં જ રહ્યા, જ્યારે અંધારાથી શોધ ચાલુ રાખવી અશક્ય બની ગઈ.
ગાઉન્ટે લીધેલો ફોટોગ્રાફ, જેને પાછળથી ટ્રેજેડી બાય ધ સી નામ આપવામાં આવ્યું, તે બીજા દિવસે લોસ એન્જલસ ટાઇમ્સમાં પ્રકાશિત થયો, જે નુકસાન અને નાજુકતાનું ,ટેન્શન નું પ્રતીક બની ગયો.
દસ દિવસ પછી માઈકલનો મૃતદેહ મળી આવ્યો. ગાઉન્ટના ફોટોગ્રાફને ફોટોગ્રાફી માટે 1955નો પુલિત્ઝર પુરસ્કાર મળ્યો, જેની કરુણતા અને સંયમ માટે પ્રશંસા કરવામાં આવી.
દાયકાઓ પછી, તે ફિલ્મમાં કેદ કરાયેલા વ્યક્તિગત દુઃખના સૌથી ભયાનક ચિત્રોમાંનું એક છે. 🥺
