यूनान में ऐसा हुआ, एक ज्योतिषी रात आकाश के तारों का अध्ययन करता हुआ चला जा रहा था, एक कुएं में गिर पड़ा। पाट नहीं थी कुएं पर। आंखें आकाश में अटकी थीं। चांद—तारों का अध्ययन हो रहा था। कुएं में गिर पड़ा तो चिल्लाया। पास के ही झोपड़े से एक गरीब बुढ़िया ने उसे बामुश्किल निकाला। वह यूनान का सबसे बड़ा ज्योतिषी था। सम्राट भी उसके द्वार पर आते थे।
उसने बुढ़िया का बहुत—बहुत धन्यवाद किया और कहा कि देख, तुझे पता नहीं कि तुझे सौभाग्य से किसको बचाने का अवसर मिला है! मैं यूनान का सबसे बड़ा ज्योतिषी हूं। तारों, नक्षत्रों, उनकी गतिविधियों, मनुष्य के भाग्य से उनके संबंध में मुझसे बड़ा कोई जानकार पृथ्वी पर नहीं है। बड़े से बड़े सम्राट: मेरे पास आते हैं। मेरी फीस भी बहुत ज्यादा है। लेकिन तूने मुझे बचाया है तो तेरा भाग्य मैं बिना फीस के देख दूंगा, तू कल आ जाना।
वह बुढ़िया हंसने लगी। उस ज्योतिषी ने कहा : तू हंसती क्यों है? उसने कहा. मैं इसलिए हंसती हूं कि जिसे अपने सामने का कुआं नहीं दिखाई पड़ता, उसे चांद—तारों की गतिविधि, नक्षत्र और भविष्य…। तुझे अपने पैर सम्हलते नहीं हैं, तू मेरा भविष्य बतायेगा?
होश में आ!
और कहते हैं यह घटना उस ज्योतिषी के जीवन में क्रांति का कारण बन गयी। उसने ज्योतिष छोड़ दी। यह चोट भारी थी! यह बात भी इतनी सच थी! सामने पैर के कुआं है, नहीं दिखाई पड़ा! मगर उसे क्यों कुआं नहीं दिखाई पड़ा था? नहीं कि उसके पास आंख नहीं थी; आंख थी, मगर आंख दूर के तारों पर अटकी थी!
यही आदर्शवादी की भ्रांति है, उसकी आंख दूर के तारों पर अटकी है। आदर्शवादी कहता है मोक्ष पायेंगे! अभी यह सड़ा—गला क्रोध, इससे छुटकारा नहीं हो रहा है। यह सड़ा—गला काम, इससे छुटकारा नहीं हो रहा है। मोक्ष पायेंगे! बैकुंठ जायेंगे! निर्वाण होगा! आंखें बड़े दूर के आकाश पर लगी हैं। और उसकी वजह से रोज—रोज गड्डों में गिर रहे हो। गड्डे—क्रोध के, काम के, वैमनस्य के, ईर्ष्या के, घृणा के! मैं तुमसे कहता हूं : आंखें लौटा लाओ जमीन पर। जहां चलना है वहीं आंखें होनी चाहिए। इस क्षण में ही आंखें होनी चाहिए, क्योंकि गड्डे यहां हैं। और सारे गड्डों से तुम बच जाओ, तो उसी बचाव का नाम मोक्ष है।
मोक्ष कहीं दूर आकाश में नहीं है। जिसके जीवन में गिरने की संभावना न रही, वही मुक्त है।
[8/19, 10:03 AM] +91 83063 07911: सुख और दुःख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जिस क्षण तुम सुख को पकड़ने की कोशिश करते हो, उसी क्षण दुःख की छाया साथ आ जाती है। यह ऐसे है जैसे दिन के साथ रात भी आती है — तुम केवल दिन को चुन नहीं सकते।
ओशो कहते हैं, जीवन में जो आता है, उसे आने दो; जो जाता है, उसे जाने दो। सुख आए, स्वागत करो; दुःख आए, उसे भी प्रेम से देखो। क्योंकि जब तुम अनुभवों को अच्छा-बुरा कहकर बाँटना बंद कर देते हो, तभी भीतर शांति का द्वार खुलता है।
सुख में अहंकार फूलता है, दुःख में वह टूटता है। दोनों ही तुम्हें सीख देते हैं। सुख बताता है कि जीवन सुंदर है; दुःख याद दिलाता है कि यह क्षणिक है। जो इन दोनों को खेल की तरह जी लेता है, वही मुक्त हो जाता है।
जब तुम यह समझ जाते हो कि सुख और दुःख तुम्हारे बाहर की लहरें हैं — और तुम सागर हो — तब कोई भी लहर तुम्हें डुबो नहीं सकती। तब जीवन न सुख है, न दुःख; वह सिर्फ अस्तित्व का आनंद है।
#viral
Day: August 26, 2025
हृदय को झकझोर देने वाला कांड 😭😭😭
अजमेर सेक्स बलात्कार ब्लैकमेल कांड जिसमें सभी मुस्लिम अभियुक्त थे और जिसमें सभी बलात्कार पीड़ित लड़कियां हिंदू थी उसकी कुछ बातें जो मीडिया में नहीं बताई गई
7 हिंदू लड़कियों ने शर्मिंदगी से जब उनके नंगे पिक्चर से ब्लैकमेल किए गए तब उन्होंने आत्महत्या कर लिया
3 हिंदू लड़कियों ने अपने माता-पिता और भाई के साथ सामूहिक आत्महत्या कर लिया क्योंकि उनकी नंगी तस्वीरें से जब ब्लैकमेल किया जा रहा था और कई लोगों तक उनकी तस्वीर पहुंच गई तब वह इतने शर्मसार हुए कि उन्होंने सामूहिक आत्महत्या कर लिया
8 हिंदू लड़कियां मानसिक विक्षिप्त होकर पागल हो गई थी
तीन हिंदू लड़कियों ने मरे हुए भ्रूण को जन्म दिया था और अदालत में सबूत के लिए उन भ्रूण को फॉर्मलडिहाइड में प्रिजर्व करके रखा गया था
कुछ हिंदू लड़कियों का गर्भपात इस तरह से हुआ कि वह भविष्य में कभी मां नहीं बन सकती थी
और एक बुजुर्ग बाप इंसाफ के लिए इस कांड की वजह से अपनी मानसिक विक्षिप्त पागल हो चुकी बेटी को लेकर 32 साल तक अदालत में आता था और उसने कहा कि मेरी बेटी तो इस घटना से पागल हो गई है मैं बुजुर्ग हूं लेकिन फिर भी मैं अपनी बेटी को इंसाफ दिला कर रहूंगा
400 से ज्यादा कंडोM को सबूत के लिए रखा गया था जो बाद में बुरी तरह से बदबू मारने लगे थे फिर भी उन्हें सबूत के लिए संभाल कर रखा गया था
कुल 32 साल तक मुकदमा चला
जब यह घटनाक्रम हुआ तब राजस्थान में कांग्रेस सत्ता में थी आठ आरोपी कांग्रेस पार्टी के बड़े पदाधिकारी थे और धीरे-धीरे उन्होंने कई अन्य मुस्लिम लोगों को अपने गैंग में जोड़ लिया और इस तरह से हिंदू लड़कियों के बलात्कार और उनके ब्लैकमेल करने का पूरा गंदा खेल रचा गया
22 से ज्यादा हिंदू लड़कियों की कभी शादी इसलिए नहीं हो पाई क्योंकि वह अजमेर कांड में पीड़ित थी और आज 50 से 55 साल की अवस्था में भी वह बगैर परिवार के एकाकी जीवन जी रही हैं
फिर भी कुछ लोग बुलडोजर न्याय का विरोध करते हैं
32 साल हो गए न्याय नहीं मिला इसीलिए मैं कहती हूं बुलडोजर न्याय के लिए सबसे जरूरी है
और उस वक्त राजस्थान की कांग्रेस सरकार ने तीन पत्रकारों को जेल भेज दिया था जिन्होंने इस घटना पर एक खबर बनाई थी राजस्थान सरकार ने उनके ऊपर कई गंभीर धाराएं लगाई थी
जब तक राजस्थान में कांग्रेस सत्ता में रही अजमेर के दरिंदे खुलेआम हिंदू लड़कियों का बलात्कार करते रहे और कानून उनका कुछ नहीं बिगड़ा सका क्योंकि राजस्थान की कांग्रेस सरकार उनके साथ थी
जब राजस्थान में सत्ता बदली और राजस्थान में सत्ता परिवर्तन में अजमेर बलात्कार कांड ही सबसे बड़ा मुद्दा था और भैरव सिंह शेखावत मुख्यमंत्री बने तब जाकर आरोपियों को गिरफ्तार किया गया मुकदमा चला बेटियों के बयान दर्ज हुए सुबह इकट्ठा किया गया और अंततः आरोपियों को सजा सुनाई गई
इसीलिए ही बार-बार कहा जाता है कि इस्लाम और कांग्रेस का गठन जोड़ हिंदुओं के लिए आत्मघाती है घातक है
हिंदुओं की विनाश इसी गठजोड़ की वजह से होता है….
जय हिन्द 🙏
जीबोनेर झारा पाता
●●●●●●●●●●●●●●
सरला : गुरुदेव! यह वही #मंदराचल पर्वत है जिसने पृथ्वी को श्रीहीन होने से बचा लिया? फिर तो, इस भारत की दुर्दशाओं को भी इसने देखा होगा न?
ठाकुर बिजॉय कृष्ण : हाँ, निर्विवाद रूप से।
सरला : मंदराचल, अपनी तरह क्यों नहीं बना लेते मुझे तुम। मैं विलीन होना चाहती हूं तुममें। मुझे मुक्ति दे दो, मेरे गुरु के सामने। गुरु मुझे क्षमा करें।
#बैद्यनाथजी को साक्षी मानकर उनके प्रांगण में मैंने 7 फेरे लिए थे। #जोड़ासांको में जन्म लेकर अग्नि स्वभाव पाई थी। कलकत्ते ने मुझे पाला, पढ़ाया और दिव्य विचारों से अग्निभाव किया। सम्पूर्ण भारत घूमकर तुम्हारी शरण में आई हूं। बंगाल से लाहौर, पंजाब, हैदराबाद तक मुझे लोग जानते हैं किंतु मैं स्वयं को नहीं जानती हूं।
पहले #ब्रह्म_समाजी हुई। #काली भक्त हुई। अब अपने गुरुदेव #क्रियायोगी_बिजॉय_कृष्ण के शरणागत हूँ। इनकी कृपा से ही यह संभव हुआ है कि मैं तुम्हारी गोदी में बैठकर मुक्ति मांगती हूँ।
सरला कहे जा रही थी। जमे आंसू बरक रहे थे। वो अंदर से व्यक्त हो रही थी। हाँ, वही सरला जिन्हें #गांधीजी ने कहा था कि मेरा स्वदेशी तुम्हारे स्वदेशी आंदोलन से पुराना नहीं है। तुम महिलाओं की प्रेरणा बनोगी। हाँ, हाँ… वही सरला जो कविगुरु #रवींद्रनाथ_टैगोर की सगी बहन की बेटी थी। जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बंगाल के प्रथम सचिव #जानकीनाथ_घोषाल की पुत्री थी। जो अपने समय की चर्चित लेखिका स्वर्णकुमारी देवी की बेटी थी। ‘भारती’ पत्र का संपादक/मालिक थी। नामी वकील और पत्रकार एवं राष्ट्रवादी नेता #रामभुजदत्त_चौधरी की पत्नी थी। जिनकी प्रोपर्टी #देवघर में भी काफी थी। हाँ, वही सरला जो गांधीजी की पौत्री राधा की सास थी।
मंदार पर्वत के ऊपर एक बड़े पत्थर पर बैठकर यह सब कहे जा रही थी। मौन होकर मंदराचल उसकी पीड़ा सुन रहा था। यह शरद ऋतु काल था। शाम होने से पहले ओस गहरा रहा था।
ठाकुर ने कहा : उठो सरला। पुरोधा मंदराचल कह रहे हैं कि तुम अभी कूर्म की पीठ पर हो। जाओ और मन की पीड़ा को ‘जीबोनेर झारा पाता’ लिखो। लेकिन यह सब किसी से कहना मत। अब चलो, मेरे गुरुभाई सान्याल महाशय प्रतीक्षा कर रहे होंगे।
सरला वहां से लौटी और फिर से अपनी लेखनी को तीव्र कर अपने जीवनवृत्त के रूप में लिखती गई। उसमें विभाजन की त्रासदी, कुत्सित राजनीति, शत्रु बनते मित्रों का हिडन एजेंडा जैसा सबकुछ था। उसका नाम ‘जीबनेर झारा पाता’ यानी जीवन के झड़े हुए पत्ते रखा।
सरला अपने समय की उच्चशिक्षा प्राप्त महिला थी। बेथ्यूने कॉलेज से उन्होंने इंग्लिश में मास्टर की डिग्री ली थी। यहीं से प्रथम भारतीय डिग्री वाली महिला डॉक्टर कादम्बिनी गांगुली ने पढ़ाई की थी।
इलाहाबाद में इन्होंने ‘भारत स्त्री महामंडल’ की स्थापना की थी। स्वामी #विवेकानंद की आलोचना के लिए भी यह बहुचर्चित हुई थीं। इनका प्रभाव अपने समय में ऐसा था कि #लाला_लाजपत_राय इनसे मिलने कलकत्ता पहुंच गए थे।
इनके प्रेम प्रसंगों के चर्चे कभी जापान के ओकाकुरा से तो कभी महात्मा गांधी से भी उड़े।
इन्हीं सरला ने एक बार विवेकानंद से पूछा था कि एक अशिक्षित ब्राह्मण को गुरु मानकर पूजा करना क्या आपको शोभा देता है? जबकि यह वही सरला थी जिसने बंगाली महिलाओं को अपनी संस्कृति बचाने के लिए, स्वदेशी को महत्व देने के लिए माथे पर लाल टीका लगाने, पांव में आलता लगाने व सरस्वती पूजा में हिंदुत्व का परिचायक भगवा कपड़े पहनकर आने का आह्वान किया था। बाद में पत्र लिखकर इनको विवेकानंद ने बुलाया और सिस्टर निवेदिता से भी मिलाया।
सरला ने सम्पूर्ण भारत में पहली बार #भारती पत्रिका में प्रकाशित सामग्रियों के लेखकों को पारिश्रमिक देना आरंभ किया था। उन्होंने #शरतचंद्र (चट्टोपाध्याय) की रचना ‘बोरोदीदी’ को छापने से इनकार करते हुए लौटा दिया था। बाद में शरत बाबू के मामाजी ने सरला से समय निकालकर उसे पढ़ने का निवेदन करते हुए पांडुलिपि छोड़कर गए। पठनोपरांत उन्होंने इसे धारावाहिक के रूप में छापा था। बाद में पता चला कि यह वही रचना थी जिसे वापस किया गया था।
अपने समय की फायरब्रांड लेडी थी सरला। बड़ी विद्रोही लेकिन अंग्रेजों के खिलाफ। उसकी परंपरा के खिलाफ। उन्हें पसंद था विजयादशमी को तलवार का पूजन। वे मातृशक्ति की आराधक बन गई थी। पति के साथ मिलकर उर्दू पत्रकारिता भी जमकर किया उन्होंने। ‘हिंदुस्थान’ नाम से उर्दू पत्र पंजाब से निकाला था। सन 1945 में देहावसान से पूर्व वो मन से टूट चुकी थी।
देवघर में उनका ब्याह बाबा वैद्यनाथजी के मन्दिर में 1905 में हुआ था। यह विवाह भी अप्रत्याशित था। वे यहां अपनी बीमार माँ से मिलने आई थी लेकिन ट्रेन से उतरते ही उन्हें दुल्हन की डोली और ढोल-बाजा के साथ लाया गया था। विवाह की कोई सूचना उन्हें नहीं थी। मंदार पर्वत पर वे गुरुदेव बिजॉय कृष्ण चट्टोपाध्याय के साथ गई थी। वहां, भूपेंद्र नाथ सान्याल की कुटिया में ठहरी थी। बाद में सान्याल जी ने अपने गुरुदेव श्यामाचरण लाहिड़ी की स्मृति में आश्रम की स्थापना की।
– Uday Shankar©

– પહેલા શિક્ષણ મંત્રી મૌલાના આઝાદ જેમને કોઈ શાળાનું શિક્ષણ નહોતું, જે ભારતના નાગરિક પણ નહોતા, જેમના દાદા મક્કામાં સ્થાયી થયા હતા, જેઓ મક્કામાં જન્મ્યા હતા અને મક્કા અને ઇજિપ્તના ઇસ્લામિયા અઝહર મદરેસામાં અભ્યાસ કર્યો હતો, નેહરુએ તેમને ભારતના શિક્ષણ મંત્રી બનાવ્યા.
પછી મૌલાના આઝાદે એક કટ્ટર મુસ્લિમની શોધ કરી જેને તેઓ ભારતના શિક્ષણ સચિવ બનાવી શકે.
પછી તેમને એક કટ્ટર મુસ્લિમ ખ્વાજા ગુલામ સૈયદ્દીન મળ્યા.
જ્યારે કોંગ્રેસે મૌલાના આઝાદને ભારત રત્ન આપ્યો, ત્યારે તેમના દ્વારા નિયુક્ત શિક્ષણ સચિવ, ખ્વાજા ગુલામ સૈયદ્દીનને પદ્મ ભૂષણ ની ભેટ આપી.
આ સૈયદા હમીદ ખ્વાજા ગુલામ સૈયદ્દીનની પુત્રી છે.
સૈયદા હમીદને ઇન્દિરા ગાંધીના પીએમઓમાં સચિવ બનાવવામાં આવ્યા હતા.
તેઓ વહીવટી સેવામાંથી નહોતા, પણ તેઓ એક કટ્ટર મુસ્લિમ પરિવારમાંથી હતા, તેથી જ ઇન્દિરા ગાંધીએ તેમને ભારતના સર્વોચ્ચ પદ, પીએમઓમાં સચિવ બનાવ્યા.
તેમને પદ્મશ્રી પણ મળ્યો.
પછી મનમોહન સિંહ વડાપ્રધાન બન્યા, સોનિયા ગાંધી અને રાહુલ ગાંધી સુપર વડાપ્રધાન બન્યા. આ કટ્ટર મુસ્લિમ સૈયદા હમીદને તેમને આયોજન પંચનો સભ્ય બનાવીને તેમને દરજ્જો આપવામાં આવ્યો એક કેબિનેટ મંત્રીનું.
આ એ રોગનું નામ છે જેનાથી કોંગ્રેસ પીડાઈ રહી છે.
“ધર્મ અને દેશ વચ્ચે કોણ મોટું છે” ના પ્રશ્ન પર પ્રશ્નાર્થ
તે કહે છે કે જો આ પૃથ્વી અલ્લાહ દ્વારા બનાવવામાં આવી હોય, તો બાંગ્લાદેશી મુસ્લિમોને પણ ભારતમાં રહેવાનો અધિકાર છે. તમે બાંગ્લાદેશી મુસ્લિમોને બહાર કાઢી શકતા નથી.
જીતેન્દ્ર સિંહ
જ્યારે કર્નલ નાથુ સિંહ રાઠોડે નહેરુને કહ્યું – “કોઈ પણ ભારતીયને વડા પ્રધાન બનવાનો અનુભવ નહોતો, તો પછી તમે કેમ બેઠા છો?”
સ્વતંત્રતા પછી, દેશ એક નવા માર્ગ પર ચાલવાનું શીખી રહ્યો હતો. સંસ્થાઓનું નિર્માણ થઈ રહ્યું હતું, પ્રણાલીઓનું નિર્માણ થઈ રહ્યું હતું, અને એક મહત્વપૂર્ણ પ્રશ્ન ઉભો થયો – ભારતીય સેનાનું નેતૃત્વ કોણે કરવું જોઈએ?
પંડિત જવાહરલાલ નહેરુ માનતા હતા કે ભારતીયો પાસે સેના ચલાવવાનો અનુભવ કે ક્ષમતા નથી. તેમના મતે, બ્રિટિશ સેનામાં ભારતીયો હંમેશા નીચલા સ્તર સુધી સીમિત હતા, તેથી સ્વતંત્ર ભારતની સેનાને સંભાળવા માટે એક વિદેશી, અનુભવી જનરલની જરૂર હતી.
આ વિચારીને, તેમણે બ્રિટિશ જનરલ સર રોબ લોકહાર્ટને ભારતના પ્રથમ આર્મી ચીફ બનાવ્યા. પરંતુ 1948 ના અંતમાં, લોકહાર્ટે રાજીનામું આપ્યું – તેઓ ઇંગ્લેન્ડ પાછા ફરવા માંગતા હતા. આ પદ ખાલી હતું, અને નહેરુએ ફરી એકવાર વિદેશી જનરલ શોધવા માટે કેબિનેટની ખાસ બેઠક બોલાવી.
આ બેઠકમાં ઘણા વરિષ્ઠ ભારતીય લશ્કરી અધિકારીઓ પણ હાજર હતા.
નહેરુએ સૂચવ્યું, “આ વિદેશી નામોમાંથી કોને સેના પ્રમુખ બનાવવો જોઈએ? કૃપા કરીને તમારો અભિપ્રાય આપો.”
પછી એક જોરદાર અવાજ સંભળાયો.
તે કર્નલ નાથુ સિંહ રાઠોડ હતા – રાજસ્થાનની ભૂમિથી, જ્યાં મહારાણા પ્રતાપે અકબર ને હરાવ્યો હતો.
નાથુ સિંહ ઉભા થયા અને કહ્યું:
> “જો અનુભવ જ માપદંડ હોય, તો તમને એક ભારતીયને પ્રધાનમંત્રી બનાવવાનો અનુભવ ન હતો – તો તમે આ પદ કેવી રીતે સંભાળ્યું? જો આ જ તર્ક છે, તો પછી એક અંગ્રેજને પ્રધાનમંત્રી બનાવો. વિશ્વનો કયો સ્વાભિમાની દેશ પોતાની સેનાનું નેતૃત્વ વિદેશીને સોંપે છે?”
આ સાંભળીને, નેહરુ ગુસ્સે થયા, અને નાથુ સિંહને તાત્કાલિક સભામાંથી બહાર કાઢી મૂકવામાં આવ્યા.
પરંતુ તે દિવસે જે વાતે નેહરુને દુઃખ પહોંચાડ્યું, તે જ વાત સંરક્ષણ પ્રધાન સરદાર બલદેવ સિંહને સ્પર્શી ગઈ. તેમણે તરત જ નાથુ સિંહનો સમગ્ર લશ્કરી રેકોર્ડ માંગ્યો. પછી ખબર પડી કે:
નાથુ સિંહે બર્મા યુદ્ધમાં મોરચા પરથી નેતૃત્વ કર્યું હતું,
તેમણે બીજા વિશ્વયુદ્ધમાં ઘણી સફળ લશ્કરી ઝુંબેશોનું નેતૃત્વ કર્યું હતું,
અને તેઓ માત્ર શિસ્તબદ્ધ જ નહીં, પણ નેતૃત્વ કૌશલ્યમાં પણ અજોડ હતા.
બલદેવ સિંહે તેમને આર્મી ચીફ બનાવવાની ભલામણ કરી, પરંતુ નેહરુની નારાજગીને કારણે આવું થયું નહીં.
જોકે, નાથુ સિંહની હિંમત સફળ રહી – અને તે જ વર્ષે જનરલ કે.એમ. કરિયપ્પાને સ્વતંત્ર ભારતના પ્રથમ કાયમી ભારતીય આર્મી ચીફ તરીકે નિયુક્ત કરવામાં આવ્યા.
🇮🇳 નાથુ સિંહ રાઠોડ – એક એવું નામ જે આજે પણ આપણને ગર્વ કરાવે છે
તેમનો અવાજ ભારતના આત્મસન્માનનો અવાજ હતો –
જય હિન્દ 🚩
વંદે માતરમ્ 🚩

वक्त कैसे बदला लेता है!
सौराष्ट्र के पोरबंदर और अमरेली के कई लोग अफ्रीका के कई देशों में जाकर वहां बहुत बड़े उद्योगपति बन गए. जैसे नानजीभाई मेहता ~ माधवानी ग्रुप के माधवानी और विसावाड़ा के केशवाला ग्रुप के केशवाला.
फिर इनकी फैक्ट्रियों में काम करने के लिए पोरबंदर के आसपास के कई छोटे-छोटे गांव के लोग मेहनत मजदूरी करने 19वीं सदी के शुरुआत में छोटे-छोटे जहाजों में बैठकर अफ्रीका गए ।
पोरबंदर का एक छोटे से गांव का एक दलित हिन्दू युवक मजदूरी करने के लिए एक स्ट्रीमर में बैठकर युगांडा गया
बाद में उसने अपनी पत्नी को भी बुला लिया. वक्त गुजरता गया. वह दलित हिन्दू दंपत्ति एक बच्चे का पिता बना. वह बच्चा युगांडा का नागरिक बना ।
वक्त गुजरा. वह दलित बच्चा बड़ा हुआ. उसने भी शादी किया और उसे दो बेटियां और एक बेटा हुए।
वक्त गुजरता गया. 1972 में युगांडा में क्रूर तानाशाह नरभक्षी #ईदी_अमीन ने तख्तापलट किया और उसने रातों-रात फतवा निकालकर मूल युगांडा के कालों के अलावा सभी देश के लोगों को भले ही वह युगांडा के नागरिक ही क्यों ना हो, उनका सारा धंधा मिलकत सामान जप्त कर लिया और उन्हें युगांडा के नागरिक होते हुए भी देश छोड़ने का आदेश दे दिया।
भारत पाकिस्तान बांग्लादेश के तमाम मूल निवासी, जो दो या तीन पीढ़ियों से युगांडा में रहते थे, उन सबको उसने युगांडा से बाहर जाने का फरमान दे दिया।
हालात ऐसे हो गए कि युगांडा के हब्शी सैनिक भारतीय बस्तियों, जिसमें सबसे ज्यादा गुजराती थे, उनकी बस्ती में जाते थे और वहां तमाम अत्याचार करते थे.
भारत सरकार ने उन गुजरातियों को #युगांडा से निकाला. बहुत से ऐसे लोगों को ब्रिटेन ने अपने देश में शरण दे दिया।
पहले उन्हें ब्रिटिश कैंप में रखा गया ।
वह दलित दंपत्ति भी अपनी एक 14 साल की बच्ची और दो छोटे बच्चों को लेकर महीनों तक रिफ्यूजी कैंप में रहा.
उस दलित बच्ची का नाम था, #बसंती_मकवाना. और वह दलित दंपत्ति कई सौ किलोमीटर पैदल चलकर ब्रिटिश कैंप में गए थे. रास्ते में उनके एक बच्चे का दु:खद निधन भी हो गया ।
बाद में ब्रिटिश सरकार ने उस कैंप में रहने वाले तमाम शरणार्थियों को ब्रिटेन भेज दिया, जिसमें वह छोटी 14 साल की किशोरी बच्ची बसंती मकवाना भी अपने मां बाप और एक भाई के साथ ब्रिटेन आ गई ।
वक्त गुजरता गया.
समय बदला. कई सालों बाद ईदी अमीन का भी तख्तापलट हो गया और उसे भी देश छोड़कर भागना पड़ा. वो कई टन सोना और कई मिलियन डॉलर प्लेन में रखकर, सऊदी अरब भाग आया।
फिर और कुछ दशक गुजरे.
ईदी अमीन को सऊदी अरब में किडनी की बहुत खतरनाक बीमारी हो गई. सऊदी अरब के जद्दा शहर के सबसे बड़े हॉस्पिटल में उसे वीआईपी मरीज कि तरह लाया गया, क्योंकि ईदी अमीन के पास पैसे की कोई कमी नहीं थी. वह कई जहाजों में भरकर डॉलर लेकर सऊदी अरब आया था ।
दुनिया के सभी देशों में खोज की गई कि कौन सा डॉक्टर है, जो किडनी का बहुत अच्छा स्पेशलिस्ट है, यानी नेफ्रोलॉजिस्ट है ।
तब पता चला कि कनाडा में एक महिला डॉक्टर है, जो किडनी की बहुत बड़ी डॉक्टर है।
उस महिला डॉक्टर को तुरंत विशेष विमान से सऊदी अरब बुलाया गया. उस महिला डॉक्टर ने सऊदी अरब के विख्यात हॉस्पिटल में आकर ईदी अमीन का बहुत ही रिस्की हीमोडायलिसिस किया और ज्यादा अच्छे इलाज के लिए उसे एक एयर एंबुलेंस से कनाडा के हॉस्पिटल में शिफ्ट किया ।
ईदी अमीन ने कई बार उसे फीस लेने के लिए कहा, लेकिन उस महिला डॉक्टर ने हर बार फीस के लिए मना किया ।
फिर ईदी अमीन एकदम ठीक हो गया उसे वापस सऊदी अरब लाया गया ।
सऊदी अरब में वह चलने-फिरने लायक हो गया ।
फिर ईदी अमीन ने हाथ जोड़कर उस महिला डॉक्टर से निवेदन किया कि अब तो आप अपनी फीस ले लीजिए. आपकी वजह से आज मैं जिंदा हूं. मैं अपने पैरों पर खड़ा हो गया. और मेरे पास पैसे की कोई कमी नहीं है. आपको फीस लेनी ही पड़ेगी।
तब उस महिला डॉक्टर ने कहा कि फीस की बात तो जाने ही दीजिए. अब मैं आपको अपने बारे में बताती हूं-
उस महिला डॉक्टर ने कहा, मेरा नाम डॉक्टर #बसंती_मकवाना है. मैं एक भारतीय मूल की हूं. कभी आपके ही देश युगांडा की नागरिक थी ।
मैं गुजरात के महात्मा गांधी की धरती पोरबंदर से हूं। आपकी वजह से मेरा एक प्यारा छोटा भाई इलाज के बगैर मारा गया, क्योंकि हम कई सौ किलोमीटर पैदल जा रहे थे. आप के सैनिकों ने हमारे ऊपर बेहद अत्याचार किया. मेरे मां-बाप उन सैनिकों के सामने हाथ जोड़कर निवेदन करते थे. फिर भी हमने अत्याचार सहा।
अंत में हम महीनों तक शरणार्थी शिविर में रहे. दाने-दाने के मोहताज थे हम. घंटों लाइन लगाकर हमें एक पैकेट बिस्किट मिलता था.
किसी तरह से हम ब्रिटेन आ गए. मैंने सिर्फ 14 साल की उम्र में आपकी वजह से जिंदगी के सबसे कठोर अनुभव झेले.
मैंने पढ़ाई की. जीवित रहने के लिए कठोर मेहनत की। बाद में मैंने लंदन से एमबीबीएस किया. एमएस किया. और मैंने अमेरिका से किडनी में विशेषज्ञता हासिल की।
इतना ही नहीं, आपने जो मेरे माता पिता को जो आघात दिए, उनकी वजह से, कुछ ही सालों बाद उनका भी दुःखद निधन हो गया था।
आपके प्रतिनिधि जब कनाडा में मेरे हॉस्पिटल में आए कि आपको सऊदी अरब में एक वीवीआइपी मरीज का इलाज करना है और आपको मुंह मांगा पैसा दिया जाएगा, तो मैंने मना किया.
फिर मैंने उत्सुकता बस पूछा कि उस मरीज का नाम क्या है? तब उन्होंने बताया ईदी अमीन।
तब ही मैंने सोच लिया था कि मैं एक पैसा भी नहीं लूंगी। लेकिन मैं आपकी चिकित्सा अवश्य ही करूंगी।
यह सुनकर, ईदी अमीन फूट-फूट कर रोने लगा। डॉक्टर बसंती मकवाना के पैरों पर गिर कर, क्षमा याचना करने लगा. और डॉक्टर बसंती मकवाना बिना पैसे लिए ही कनाडा अपने हॉस्पिटल में चली गई.
बाद में कई बार उन्हें ईदी अमीन के इलाज के लिए कनाडा से सऊदी अरब बुलाया गया. लेकिन एक बार भी उन्होंने फीस नहीं ली.
और अंत में डॉक्टर बसंती मकवाना के सामने ही 16 अगस्त 2003 को रोते हुए, चिल्लाते हुए, पागलों की तरह सिर पटकते हुए, ईदी अमीन मर गया।
मरने से पहले उसने अपनी वसीयत में लिखा था कि उसकी जो भी दौलत हो, वह डॉक्टर बसंती मकवाना को दे दी जाए.
लेकिन खुद्दार डॉक्टर बसंती मकवाना ने उसकी दौलत को लात मार दी।
(अभी हाल ही में गुजरात के एक दिनेश भाई गढवी कनाडा गए थे. तब वह फुर्सत में डॉक्टर बसंती मकवाना से मिले और बसंती मकवाना ने यह सब बातें उन्हें बताई)
भारतीयों ने पुरातन काल में सम्पूर्ण विश्व में बिना युद्ध किए, बिना रक्त बहाए, सनातन धर्म कैसे प्रसारित किया होगा, उसकी एक झलक उपरोक्त प्रसंग में स्पष्ट ही देखने को मिलती है।
#सेवा_परमोधर्मः
#वसुधैव_कुटुंबकम्
#हमारी_संस्कृति – #हमारा_गौरव
