Posted in हिन्दू पतन

अग्निवेश नामक एक वामपंथी आर्यसमाज जॉइन करता है और देखते ही देखते आर्य प्रतिनिधि सभा में फूट डालकर एक गुट पर कब्जा करता है।

वह सामाजिक कार्यकर्ता होने का दिखावा करते हुए जगह जगह हिन्दू धर्म पर चोट करने के व्याख्यान देता फिरता है।

अग्निवेश एक एनजीओ स्थापित करता है बचपन बचाओ।

कैलाश सत्यार्थी भी इसी प्रकार के दो-तीन एनजीओ बनाता हैं। कुछ पुस्तकें लिखता है।

फिर ये दोनों अलग अलग समय विदेशी देशी पुरस्कारों से पुरस्कृत होते हैं।

फिर चीन इन दोनों दलालों को करोड़ों रुपए देता है।

चीन भारत में कालीन यानी कारपेट बेचना चाह रहा था!

लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश के भदोही जो अपने कालीन उद्योग के लिए पूरे विश्व में प्रख्यात था और भदोही के कालीन बेहद अच्छे और सस्ते होते थे इसलिए चीन अपने कालीन यानी कारपेट को भारत में नहीं बेच पा रहा था ।

भदोही में एक दो नहीं बल्कि हजारों कालीन की यूनिट थी जो अपने कालीन को विदेशों में एक्सपोर्ट करती थी। एक जमाने में भदोही ने ईरान के कालीन इंडस्ट्रीज को भी टक्कर दिया!

फिर चीन के ये दलाल कैलाश सत्यार्थी और अग्निवेश एक फर्जी फिल्म बनाते हैं, जिसमें यह दिखाया जाता है कि छोटे-छोटे बच्चों को जबरदस्ती पकड़कर भदोही लाया जाता है और उन्हें बधुआ मजदूर बनाकर उनसे दिन-रात कालीन बनवाया जाता है।

उन्होंने अपने दावे में एक फर्जी तर्क यह लगा दिया कि छोटे बच्चों की उंगलियां पतली होती हैं इसलिए धागों के बीच में आसानी से चली जाती है और गांठ बांधने में आसानी रहती है और इन्होंने कई ऐसे बच्चों के वीडियो बनाएं जिसमें बच्चों की उंगलियों में खून दिखाने के लिए लाल रंग लगा दिया गया।

उसके बाद इस फिल्म को लेकर कैलाश सत्यार्थी और अग्निवेश अमेरिका यूरोप सहित दुनिया के कई देशों में जाते हैं और वहां बकायदा प्रोजेक्टर पर फिल्म दिखाते हैं कि आप लोग भारत से कालीन मत खरीदिए क्योंकि भारत में बच्चों से कालीन बनाया जाता है, और देखिए बच्चों की हालत कितनी खराब होती है?

और वह फिल्म देख कर तमाम विदेशी कंपनियां जो भारत से कालीन खरीदती थी उन्होंने कालीन खरीदना बंद कर दिया।

फिर जब भदोही का कालीन उद्योग बर्बाद होने लगा तब सरकार ने एक और कोशिश की उन्होंने कालीन को एक ऐसा मार्का (रुगमार्क) देना शुरू किया जो इस बात का प्रमाण करता था कि इसे बच्चों ने नहीं बनाया है जैसे डायमंड के लिए एक सर्टिफिकेट होता है कि यह ब्लड डायमंड नहीं है उसी तरह उन्होंने रुगमार्क नामक एक सर्टिफिकेट बनाया जो इस बात का प्रमाण था कि इस कालीन को बच्चों ने नहीं बनाया है।

लेकिन यह लॉबी इतनी तगडी है कि अग्निवेश और कैलाश सत्यार्थी के लोग कालीन फैक्ट्रियों में जाते हैं, मालिकों को धमकाते हैं, उन्हें ब्लैकमेल करते हैं, फर्जी मुकदमे और इवेंट बनाते हैं। अखबार, मीडिया में ऐसी बहस होती है। बालश्रम और बचपन बचाओ का आर्तनाद होता है।

इस तरह भदोही का कालीन उद्योग पूरी तरह से बर्बाद हो जाता है।

तब इसमें चीन की एंट्री होती है।

आज आप भारत के किसी भी मॉल में जाइए वहां आपको मेड इन चाइना कालीन मिलेगा!!
  साभार

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अग्निवेश नामक एक वामपंथी आर्यसमाज जॉइन करता है और देखते ही देखते आर्य प्रतिनिधि सभा में फूट डालकर एक गुट पर कब्जा करता है।

वह सामाजिक कार्यकर्ता होने का दिखावा करते हुए जगह जगह हिन्दू धर्म पर चोट करने के व्याख्यान देता फिरता है।

अग्निवेश एक एनजीओ स्थापित करता है बचपन बचाओ।

कैलाश सत्यार्थी भी इसी प्रकार के दो-तीन एनजीओ बनाता हैं। कुछ पुस्तकें लिखता है।

फिर ये दोनों अलग अलग समय विदेशी देशी पुरस्कारों से पुरस्कृत होते हैं।

फिर चीन इन दोनों दलालों को करोड़ों रुपए देता है।

चीन भारत में कालीन यानी कारपेट बेचना चाह रहा था!

लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश के भदोही जो अपने कालीन उद्योग के लिए पूरे विश्व में प्रख्यात था और भदोही के कालीन बेहद अच्छे और सस्ते होते थे इसलिए चीन अपने कालीन यानी कारपेट को भारत में नहीं बेच पा रहा था ।

भदोही में एक दो नहीं बल्कि हजारों कालीन की यूनिट थी जो अपने कालीन को विदेशों में एक्सपोर्ट करती थी। एक जमाने में भदोही ने ईरान के कालीन इंडस्ट्रीज को भी टक्कर दिया!

फिर चीन के ये दलाल कैलाश सत्यार्थी और अग्निवेश एक फर्जी फिल्म बनाते हैं, जिसमें यह दिखाया जाता है कि छोटे-छोटे बच्चों को जबरदस्ती पकड़कर भदोही लाया जाता है और उन्हें बधुआ मजदूर बनाकर उनसे दिन-रात कालीन बनवाया जाता है।

उन्होंने अपने दावे में एक फर्जी तर्क यह लगा दिया कि छोटे बच्चों की उंगलियां पतली होती हैं इसलिए धागों के बीच में आसानी से चली जाती है और गांठ बांधने में आसानी रहती है और इन्होंने कई ऐसे बच्चों के वीडियो बनाएं जिसमें बच्चों की उंगलियों में खून दिखाने के लिए लाल रंग लगा दिया गया।

उसके बाद इस फिल्म को लेकर कैलाश सत्यार्थी और अग्निवेश अमेरिका यूरोप सहित दुनिया के कई देशों में जाते हैं और वहां बकायदा प्रोजेक्टर पर फिल्म दिखाते हैं कि आप लोग भारत से कालीन मत खरीदिए क्योंकि भारत में बच्चों से कालीन बनाया जाता है, और देखिए बच्चों की हालत कितनी खराब होती है?

और वह फिल्म देख कर तमाम विदेशी कंपनियां जो भारत से कालीन खरीदती थी उन्होंने कालीन खरीदना बंद कर दिया।

फिर जब भदोही का कालीन उद्योग बर्बाद होने लगा तब सरकार ने एक और कोशिश की उन्होंने कालीन को एक ऐसा मार्का (रुगमार्क) देना शुरू किया जो इस बात का प्रमाण करता था कि इसे बच्चों ने नहीं बनाया है जैसे डायमंड के लिए एक सर्टिफिकेट होता है कि यह ब्लड डायमंड नहीं है उसी तरह उन्होंने रुगमार्क नामक एक सर्टिफिकेट बनाया जो इस बात का प्रमाण था कि इस कालीन को बच्चों ने नहीं बनाया है।

लेकिन यह लॉबी इतनी तगडी है कि अग्निवेश और कैलाश सत्यार्थी के लोग कालीन फैक्ट्रियों में जाते हैं, मालिकों को धमकाते हैं, उन्हें ब्लैकमेल करते हैं, फर्जी मुकदमे और इवेंट बनाते हैं। अखबार, मीडिया में ऐसी बहस होती है। बालश्रम और बचपन बचाओ का आर्तनाद होता है।

इस तरह भदोही का कालीन उद्योग पूरी तरह से बर्बाद हो जाता है।

तब इसमें चीन की एंट्री होती है।

आज आप भारत के किसी भी मॉल में जाइए वहां आपको मेड इन चाइना कालीन मिलेगा!!
  साभार

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

मैंने सुना है, फ्रान्स की क्रांति के समय, वहां का जो सबसे खतरनाक कारागृह था, जहां आजीवन कैदी रखे जाते थे, क्रांतिकारियों ने उसे तोड़ दिया। उस कारागृह में ऐसे लोग बंदी थे, कोई बीस वर्ष से, कोई तीस वर्ष से, कोई पचास वर्ष से भी उस कारागृह की जंजीरें और बेड़ियां, सदा के लिए लगती थी। फिर जब आदमी मरता था, तो उसके हाथ तोड़ कर ही, खोली जाती थी। क्योंकि बीच में खुलने का कोई सवाल नहीं था, वह सिर्फ आजन्म कैदियों के लिए था। क्रांतिकारियों ने जाकर जेल की दीवारें तोड़ दीं, दरवाजे. तोड़ दिये, कारागृह में बंद कैदियों को बाहर निकाला। और जबरजस्ती उनकी जंजीरें तोड़ दीं। कई कैदियों ने इंकार भी किया। उन कैदियों ने कहा कि हम अपनी कोठरियों के बाहर हम नहीं आ सकते हैं। हम अंधेरे के आदि हो गए हैं। रोशनी में आंखों को तकली.फ होती है। लेकिन क्रांतिकारी नहीं माने। उन्होंने उनकी जंजीरें भी तोड़ दी, और उन्हें जेल खाने से बाहर कर दिया। एक चमत्कार घटा, लेकिन यह चमत्कार दुनिया को रहा होगा, हम समझ सकते हैं कि यह चमत्कार नहीं, बड़ा स्वाभाविक है। सांझ होते-होते आधे कैदी वापस लौट आए। और उन्होंने क्रांतिकारियों से कहा हम बाहर जाने से इंकार करते हैं। और बिना जंजीरों के हम जी नहीं सकते, क्योंकि वह हमारे शरीर के हिस्से हो गई हैं। अब जब हम चलते हैं तो हमें ऐसा लगता है हम नंगे-नंगे हैं, कुछ खाली-खाली है। हमारी जंजीरें हमें वापस लौटा दो। स्वाभाविक है, जिनके हाथ-पैरों में, सेरों व.जन की जंजीरे पड़ी रही हों, वर्षों तक जो उनके साथ सोए हों, उठे हों, जागे हों, बैठे हों, वह जंजीरें अब जंजीरें नहीं, उनके शरीर के हिस्से हो गई हैं। उनके बिना अब उन्हें नींद न आ सकेगी। ऐसा ही हमारे देश के साथ हुआ है। हमारा अधूरा अध्यात्म, सच है, लेकिन आधा सच। और हमने भौतिकवाद मैटेरियलिज्म को इंकार पर उसे खड़ा किया है। भारत के जिंदगी के अधिकतम दुर्भाग्य का कारण, भारत का भौतिकवाद को इंकार करना है। क्योंकि जैसे ही हम भौतिकवाद को इंकार करते हैं, पूरा जीवन अस्वीकृत हो जाता है। क्योंकि जीवन के सारे आधार भौतिक हैं। शरीर भी भौतिक है, मस्तिष्क भी भौतिक है, .जमीन भी भौतिक है, वृक्ष, पाधे, पशु-पक्षी यह सारा जीवन भौतिक है। इस भौतिक जीवन में अध्यात्म के फूल लगते हैं जरूर, लेकिन यह भौतिक जीवन जब सम्पन्न हो, समृद्ध हो, यह भौतिक जीवन जब संतृप्त हो, जब यह भौतिक जीवन पूरी तरह भरा-पूरा हो, ओवरलोइंग हो, असल में अध्यात्म भौतिक जीवन की ओवरलोइंग है। ऊपर से बह जाना है। मेरी दृष्टि मे अध्यात्म आखिरी लग्जरी है। आखिरी विलास है जो मनुष्य जाति उपलब्ध कर सकती है। लेकिन जिन्होंने भौतिक जीवन को इंकार कर दिया हो, एक आदमी अपने शरीर को इंकार करे, भोजन बंद कर दे, पानी देना बंद कर दे, श्वांस लेना बंद कर दे, क्योंकि यह सब भौतिक हैं। कितनी देर उसकी आत्मा टिकेगी ? और अगर उसकी आत्मा खो जाए, तो कौन जिम्मेदार होगा? आत्मा को बचाने की कोशिश में हमने आत्मा भी खो दी है। आत्मा की चर्चा हम करते रहे हैं, हमसे आत्महीन लोग खोजने कठिन हैं। क्योंकि एक हजार साल तक अगर लोग गुलाम रह सकते हों तो उनके भीतर आत्मा है, यह मानने में शक होता है। और अगर तीन हजार साल तक दीन, दरिद्र रह सकते हों तो यह मानने में थोड़ी सी हिम्मत जुटानी पड़ती है, कि वह जीवित हैं।

~ओशो

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

मिलट्री के कमांडर से कुछ जवानो ने शिकायत की आप सिक्खो के ग्रंथ को हमारे ग्रंथ से ज्यादा आदर देते हैं जबकि सारे ग्रंथो का सार एक ही है;
कमांडर ने कहा ऐसा नही है, आप लोग ऐसा कीजिए कल अपने-अपने ग्रंथ ले आईए मै इसका जवाब भी आपको कल दूंगा। दूसरे दिन सुबह  सब से पहले पंडित जी अपनी गीता को झोले मे डाले बगल मे दबाये पहुंचे; फिर एक मुल्ला जी कुरान-शरीफ को कपड़े मे लपेट कर लाये ; उसी तरह से पादरी भी बाईबल लेकर पहुंचा।  कमांडर उन तीनो को इज्जत के साथ बैठाया और इंतजार करने लगे सिक्खों के पहुचने का…
तभी सभी ने देखा कि ढोलक व छैने के साथ वाहेगुरू का जाप करते कुछ सिख अपने सिर के ऊपर गुरू ग्रंथ साहिब जी स्वरूप उठाये आगे-आगे जल छिड़कते चले आ रहे हैं, यह देख कमांडर सहित वे तीनो भी आदर मे खड़े  होकर नतमस्तक हुए, कमांडर मुस्कुराते हुए उन तीनो की तरफ देखा और कहा आप तीनो अपने -अपने ग्रंथो को यू ही कपड़े मे लपेटे बगल मे दबाये चले आये । आप लोगो ने देखा सिक्ख कैसे आदर सत्कार के साथ अपने गुरू ग्रंथ साहिब जी को लेकर आये; आप लोग भी इनसे सीखिए‌।
सार; अपने अपने धर्म ग्रंथों का आदर कीजिए🙏

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक दिन मौत जंगल से गुजर रही थी।
रास्ते में उसे एक छोटी सी लड़की मिली।
जब उसने मौत को उसके काले, चमकदार, सुंदर घोड़े पर देखा, तो बड़ी मासूमियत से पूछा:

“क्या आप भी रास्ता भटक गए हैं?”
मौत ने उसे देखा और हल्की सी मुस्कान के साथ कहा:
“हाँ, मैं भी भटक गया हूँ। और तुम? क्या तुम्हें घर का रास्ता पता है?”
लड़की ने जवाब दिया:

“नहीं… पर अब मुझे डर नहीं लग रहा, क्योंकि आप मेरे साथ हो। अब मैं अकेली नहीं हूँ।”
मौत हैरान हो गई। उसने पूछा:

तुम मुझसे नहीं डरती? क्या तुम जानती हो मैं कौन हूँ? मैं मौत हूँ!”

लड़की ने शांत भाव से कहा:

“अगर आप मुझे लेने आए हो तो ठीक है।

लेकिन क्या मैं आपसे एक निवेदन कर सकती हूँ?”

मौत बोली:

“हाँ, बताओ। मौत से क्या मांगोगी?”

लड़की के चेहरे पर उदासी थी। उसने कहा:

“मेरी माँ को बचा लीजिए। वो बहुत बीमार है।

इसीलिए मैं जंगल में औषधियाँ लेने आई थी और रास्ता भटक गई।

मुझे डर है अगर मैं घर नहीं लौटी तो वो मेरे ग़म और अपनी बीमारी से मर जाएंगी।

हमारे पास कोई नहीं है। पापा तो पिछले साल ही गुजर गए थे।

अब माँ ही मेरा सब कुछ हैं।”

मौत पहली बार शर्मिंदा और दुखी हुई।

वो तो लड़की को बिना वापसी के ले जाने आई थी, लेकिन अब उसका मन बदल गया।

वे दोनों साथ-साथ चलने लगे –

लड़की नंगे पाँव दर्द से कराहती हुई, और मौत अपने घोड़े पर सवार।

कुछ देर बाद उनका घर दूर से दिखने लगा।

मौत रुक गई, और लड़की आगे बढ़ने लगी।

लड़की ने पीछे मुड़कर देखा और पूछा:

“आप क्यों नहीं आ रहे? चलिए ना!”

मौत ने जवाब दिया:

“अब मैं आगे नहीं जा सकता!”

लड़की हैरान होकर बोली:

“तो क्या आप मुझे नहीं ले जाएंगे? क्या मैं आपके साथ नहीं जाऊंगी?”

मौत ने उसकी मासूम आँखों में देखते हुए कहा:

“नहीं। अभी नहीं।
तुम्हें अपनी माँ का ख़याल रखना है।

जब सही समय आएगा, तब मैं तुम्हारे और तुम्हारी माँ के लिए आऊँगा।

और तब तुम दोनों मेरे साथ चलोगी।”

लड़की की आँखों में खुशी की चमक दौड़ गई।

उसने कहा:

“शुक्रिया। मैं आपका इंतजार करूँगी…

क्योंकि अब मुझे पता है – आप बुरे नहीं हैं।”

यह सुनकर मौत ने अपने घोड़े को एड़ लगाई।

घोड़ा धरती को चीरता हुआ दौड़ पड़ा और देखते ही देखते मौत का काला साया जंगल के अंधेरे में गायब हो गया।



मौत बुरी नहीं होती।

वो तो बस तब डरावनी लगती है जब वो समय से पहले आ जाए।

✅✨

(यह कहानी स्पेनिश लोककथा पर आधारित है।)

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक फकीर एक गांव में ठहरा था। वह फकीर बड़ा अदभुत फकीर रहा होगा। गांव के लोगों ने उससे कहा, शुक्रवार का दिन है, आप चलें, हमारी मस्जिद में थोड़ा ईश्वर के संबंध में समझाएं।
वह फकीर कहने लगा, ईश्वर के संबंध में कभी कुछ समझाया गया हो तो मैं भी समझाऊं।
लेकिन वे लोग नहीं माने, जितना फकीर इनकार करने लगा उतने लोग उसके पीछे पड़ गए। लोगों की बुद्धि ऐसी है, जहां दरवाजे बंद होते हैं वहां दरवाजे ठोकने लगते हैं, जहां दरवाजे खुले हैं वहां जाते भी नहीं। जिस दरवाजे पर लिखा है यहां झांकना मना है, वहीं—वहीं चक्कर लगाने लगते हैं।
वह फकीर कहने लगा कि नहीं—नहीं, मैं नहीं जाऊंगा। ईश्वर के संबंध में क्या कहा जा सकता है? कुछ भी नहीं कहा जा सकता।
लेकिन लोग नहीं माने, उसे ले गए। नहीं माने तो गया। मस्जिद में जाकर वह खड़ा हो गया मंच के ऊपर और उसने कहा, मेरे दोस्तो, इसके पहले कि मैं ईश्वर के संबंध में कुछ कहूं? मैं तुमसे कुछ पूछ लूं। पहली बात, ईश्वर के संबंध में तुम कुछ जानते हो? ईश्वर है?
उन सारे लोगों ने हाथ हिला दिए कि हम जानते हैं ईश्वर है।
वह फकीर बोला, फिर क्षमा करो, जब तुम जानते हो तो मेरे बोलने की कोई जरूरत न रही, मैं वापस जाता हूं। मैं फिजूल, मैं अपना समय, तुम्हारा समय क्यों खराब करूं! मुझे क्या पता कि तुम्हें पता है। फिर तुम मुझे किसलिए लाए हो? जब तुम्हें मालूम है, ईश्वर है, और तुम्हारे हाथ उठते हैं उसकी गवाही में, मेरी कोई जरूरत न रही, मैं जाता हूं।
लोग बड़े हैरान हुए, मन और आतुर हो गया कि इस आदमी से सुनना जरूर था। भूल हो गई। उन्होंने तय किया कि अगली बार फिर उसे बुला कर लाएं। और अब की बार जब वह पूछेगा कि जानते हो ईश्वर है, तो हम कहेंगे कि ईश्वर है ही नहीं, हम कुछ भी नहीं जानते। फिर तो बोलेगा।
दूसरा शुक्रवार आ गया। फिर उस फकीर के पास गए और कहा कि चलें, ईश्वर के संबंध में कुछ समझाएं। वह फकीर फिर टालमटोल करने लगा। लेकिन वे नहीं माने, वे उसे ले गए। वह मंच पर खड़ा हो गया। उसने फिर पूछा कि मैं ईश्वर के संबंध में कुछ कहूं उसके पहले एक बात जान लूं कि ईश्वर है? तुम्हें कुछ पता है ईश्वर के होने का?
लोगों ने कहा, ईश्वर नहीं है और हमें कुछ भी पता नहीं।
वह फकीर बोला, क्षमा करना, जब ईश्वर है ही नहीं, तो मेरी क्या जरूरत? मैं वापस जाता हूं। और तुम सबको पता है कि ईश्वर नहीं है, बात खत्म हो गई। अब और क्या जानने को शेष रह गया? जिन्हें यह तक पता हो गया कि ईश्वर नहीं है, उनको अब जानने को और क्या शेष रह गया होगा? आ गई अंतिम सीमा शान की, जब यह भी जान लिया कि ईश्वर नहीं है।
वह फकीर वापस लौट गया, लोग फिर बड़ी मुश्किल में पड़ गए। सुनना जरूर था। अब और तीव्र आकांक्षा हो गई कि पता नहीं वह आदमी क्या कहता! उन्होंने फिर तय किया, तीसरा उत्तर तैयार किया कि अब की बार फिर चलें। तीसरे शुक्रवार फिर उसके पास पहुंच गए कि चलो। उन्होंने तीसरा उत्तर तैयार कर लिया। उन्होंने कहा, अब की बार जब वह पूछे, तो आधे लोग कहेंगे कि हमको पता है कि ईश्वर है और आधे लोग कहेंगे कि हमको पता नहीं है कि ईश्वर है। अब तो कुछ बोलोगे।
फकीर आकर खड़ा हो गया और उसने कहा कि दोस्तों, फिर वही सवाल, पता है ईश्वर है या कि पता नहीं है? जानते हो कि नहीं जानते?
आधी मस्जिद के लोगों ने कहा, आधे लोगों को पता है कि ईश्वर है, और आधे लोगों ने कहा, हमें पता नहीं कि ईश्वर है।
फकीर ने कहा, जिनको पता है वे उनको समझा दें जिनको पता नहीं। मैं जाता हूं मेरी कोई जरूरत नहीं।
उस फकीर से मैंने भी पूछा कि चौथी बार वे लोग आए कि नहीं?
वह फकीर कहने लगा, चौथा उत्तर उन लोगों को नहीं मिल सका, तीन में उत्तर समाप्त हो गए। फिर वे लोग नहीं आए। मैं तो रास्ता देखता रहा कि आएं तो फिर जाऊं।
मैंने उस फकीर को कहा कि अगर उनके पास चौथा उत्तर होता तो आप जाते?
वह कहने लगा, अगर चौथा उत्तर होता तो मैं जरूर जाता और बोलता।
मैंने पूछा, वह चौथा उत्तर क्या हो सकता था?
वह फकीर कहने लगा, अगर वे चुप रह जाते और कोई भी उत्तर न देते तो मैं कुछ बोलता। क्योंकि तब वे सच्चे लोग होते। तब वे एक झूठी बात को गवाही नहीं देते। तब वे मौन रह जाते। उन्हें कुछ भी पता नहीं है— न होने का, न ना होने का। तब वे अपने अज्ञान में मौन रह जाते। अज्ञान उनका सत्य था, सच्चाई थी। शान— आस्तिक का ज्ञान, नास्तिक का शान— सब झूठ है, सीखी हुई बकवास है। अगर वे चुप रह जाते तो मैं बोलता, वह फकीर कहने लगा। और आज तक सत्य के संबंध में तभी समझाया जा सका है या जाना जा सका है, बोला जा सका है, इशारे किए जा सके है—जब दूसरी तरफ सच्चाई से भरा हुआ मौन हो। झूठ से भरे हुए उत्तर नहीं, सच्चाई से भरा हुआ प्रश्न काफी है। झूठ से भरा हुआ ज्ञान नहीं, सच्चाई से भरा हुआ अज्ञान भी परमात्मा की तरफ ले जाने वाला चरण बन जाता है।

ओशो, जीवन रहस्य(प्रवचन-12)
*_संकलन-रामजी🙏🌹🌹_*