साबरमती आश्रम का वास्तविक नाम साबरमती सेटलमेंट था। अंग्रेज कोई भी जगह बसाते या नामांकरण करते थे तो उसका नाम सेटलमेंट ही रखते थे। उदाहरण के स्वरूप दक्षिण अफ्रीका के फिनिक्स में फिनिक्स सेटलमेंट अंग्रेजों ने ही बसाया था और गांधी को जमीन और घर अंग्रेजों ने नहीं दिया था। आपको यह जानकर बहुत आश्चर्य होगा कि दक्षिण अफ्रीका में जो गांधी के चेले चपाटे फिनिक्स सेटलमेंट में रहते थे, वही सभी चेले चपाटे साबरमती सेटलमेंट से अपना वही सामान लेकर आ गए थे। तो क्या यह सब एक मात्र संयोग था? दूसरी बात गांधी जून 1914 में दक्षिण अफ्रीका से भारत के लिए चले और जनवरी 1915 में मुंबई के बंदरगाह पर उतरे। एक महीने की समुद्री यात्रा में उसे 7 महीने क्यों लगे? क्या वह लंदन में रुके थे? वहां पूरी स्ट्रेटजी तय की गई? उनका ड्रेस कोड तय किया गया? मुंबई बंदरगाह पर के लिए खर्च किसने किया था? भारत में गांधी के आगमन के समय मीडिया में माहौल कौन बना रहा था? मुंबई के ग्रांट रोड क्षेत्र में लेबरनम रोड है। यह ग्रांट रोड और लेबरनम रोड अंग्रेजों का क्षेत्र होता था। बड़े बड़े अंग्रेज ऑफिसर वहां रहते थे। गांधी को तीन मंजिला इमारत लेबर्नम रोड पर कैसे मिल गई? अभी वर्तमान में बिल्डिंग का नाम मणि भवन है, जिसे गांधी ने 1915 से लेकर 1947 तक उपयोग में लिया था। आज एक नई जानकारी यह मिली कि गुजरात में सबसे पहला टेलीफोन किसी बड़े उद्योगपति मिल मालिक के घर पर नहीं बल्कि साबरमती आश्रम में गांधीजी के टेबल पर लगा था। इतन ही नय यह टेलीफोन अंग्रेजों ने विशेष लाइन डलवा कर लाखो रुपये खर्च करके लगवाया था ताकि अंग्रेज गांधी जी से बात कर सके। समझे भाई…✍️ Mr.satish kaler
वैशाली में वर्तमान बिहार के किसी हिस्से से पांच सौ मत- मतांतरो से अधिक जानने वाला एक विद्वान आया और उसने आकर शास्त्रार्थ के लिए सबको ललकारा। कोई उसके पांडित्य के सामने ठहर न पाए। वो अजेय घोषित होता इसके पहले ही एक विद्वान स्त्री, जो वहीं की थी, उसके समक्ष आई जो स्वयं भी पांच सौ के करीब मत- मतांतरो की विद्वान थी।
दोनों में शास्त्रार्थ शुरू हुआ पर कोई किसी से कम नहीं दिख रहा था। शास्त्र चर्चा देखने वालों ने सोचा कि अगर इन दोनों का वैवाहिक संबंध करा दिया जाए तो इनसे जो संतान जन्म लेगी वो कितनी विद्वान होगी।
फिर सबकी सहमति से दोनों का विवाह करा दिया गया। कालांतर में उन्हें एक पुत्र और चार पुत्री हुई। पांचों ने अपने मां और पिता से समस्त मत- मतांतरो की शिक्षा ली। बेटे की विद्वता के कारण उसे वहीं के लिच्छवी गणराज्य में आचार्य बना लिया गया पर बेटियों ने किसी लाभ के पद को ग्रहण करने से इंकार कर दिया और वो चारों बहनें देश भर में शास्त्रार्थ करने निकल गईं। वो चारों बौद्ध महाविहारों के द्वार पर जाकर उन्हें ललकारने लगी। बौद्ध आचार सारिपुत्त से उन्होंने हजार से अधिक प्रश्न पूछे। महास्थविर को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दी और इस तरह चारों बहनें देश में प्रसिद्ध हो गईं।
उनके सम्मान में बौद्धों और सनातन के बड़े बड़े आचार्यों के मस्तक झुके रहते थे। किसी ने उनका असम्मान नहीं किया, किसी ने उनको गालियां नहीं दी, असहमति पर हिंसा नहीं की।
भारत भूमि के अंदर जन्में सारे मत मतांतरों के लोग एक दूसरे का अध्ययन करते थे; एक दूसरे को समझते थे और इसलिए हमारे इतिहास पर कोई कितना भी कीचड़ उछाले, कितना भी भेद दिखाए, हम एक ही रहे हैं।
मैं बिहार बल्कि बिहार के उस इलाके से हूँ जहां बौद्ध मत और जैन मत परवान चढ़े। उसी क्षेत्र के पास याज्ञवल्क्य हुए जिनके बनाए विधानों से हिन्दू धर्म के काफी विधान आज संचालित हो रहा है, उसी क्षेत्र में सिखों के खालसा पंथ के प्रवर्तक जन्में, बाबा श्रीचंद का उदासी संप्रदाय आगे बढ़ा, इसलिए भारत भूमि के मत, पंथों पर लिखना मैं अपना उत्तरदायित्व समझता हूँ और इसलिए अपनी पुस्तक #इनसाइड_द_हिन्दू_मॉल में मत, पंथों पर लिखा था और अब अगली पुस्तक #अमृत_कुंभ में इसका और भी विस्तार है। इस पुस्तक में हिंदुओं के अंदर के पंथों के संबंधों पर काफी गहराई से चिंतन है।
जिनको भी हिन्दू धर्म के मत, पंथ और संप्रदायों के अध्ययन में रुचि है; उनके लिए मेरी यह पुस्तक संग्रहणीय होगी। इसलिए भी ताकि आप हमें आपस में लड़ाने वालों को प्रत्युत्तर देना आ सके। वरना, शिवकांत शर्मा जी की तरह हमारी आपकी उम्र भी प्रोपागेंडा वालों को जवाब देते निकल जाएगी।
જલાલુદ્દીન ખિલજીના શાસનકાળ દરમિયાન, અમીર ખુસરો લખે છે, “…જ્યારે પણ કોઈ જીવતો બળવાખોર હિન્દુ કોઈ વિજયી ઇસ્લામિક રાજા દ્વારા પકડાતો હતો, ત્યારે તેને હાથીના પગ નીચે કચડી નાખવામાં આવતો હતો, તે એક આનંદની ક્ષણ હતી…” (સંદર્ભ – કે.એસ. લાલ; ભારતમાં મુસ્લિમ શાસનનો વારસો, પૃષ્ઠ-120]
“…આપણા પાક લડવૈયાઓએ તલવારોની શક્તિથી આખા દેશને સાફ કરી દીધો હતો, જેમ જંગલમાંથી કાંટા સાફ કરવામાં આવે છે. આપણી તલવારોની ગરમીથી હિન્દુઓ બાષ્પીભવન થઈ ગયા. હિન્દુઓના બળવાન માણસો ઘૂંટણ નીચે કાપી નાખવામાં આવ્યા, ઇસ્લામનો વિજય થયો… મૂર્તિપૂજકો અદૃશ્ય થઈ ગયા…” (સંદર્ભ – તારીખ-એ-અલૈ: (એલિયટ અને ડોસન. ભાગ III)
અમીર ખુસરોને સૂફી સંત (?) માનવામાં આવે છે, પરંતુ વાસ્તવમાં આ કહેવાતા સંતો ઇસ્લામિક શાસકો સાથે ભારતમાં આવ્યા હતા. સૂફી પરંપરા એક પ્રકારના “ઇસ્લામિક મિશનરી”, એટલે કે “ટ્રોજન-હોર્સ વાયરસ” સિવાય બીજું કંઈ નથી. “સુફી-સંતો” (??) ના ઇશારે કામ કરે છે. તેમના રાજાઓ અને શાસકોએ હિન્દુઓને કટ્ટરપંથી અને કટ્ટરપંથી મુલ્લાઓ કરતાં વધુ નુકસાન પહોંચાડ્યું છે…
ઉદાહરણ તરીકે – “અજમેરના ખ્વાજા મોઈનુદ્દીન ચિશ્તી 90 લાખ હિન્દુઓને ઇસ્લામમાં રૂપાંતરિત કરવાનું ગૌરવ ધરાવે છે. તે મોઈનુદ્દીન ચિશ્તી હતા જેમણે મોહમ્મદ ઘોરીને ભારત લૂંટવા માટે ઉશ્કેર્યો અને આમંત્રણ આપ્યું… (સંદર્ભ – ઉર્દૂ અખબાર “પાક એક્સપ્રેસ, ન્યુ યોર્ક 14 મે 2012).
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આને “છબી નિર્માણ” કહેવામાં આવે છે… જો કોઈ લાંબા સમય સુધી સત્તામાં રહે છે, તો તે સ્વાભાવિક રીતે શિક્ષણ પ્રણાલી, ઈતિહાસ અને પાઠ્યપુસ્તકો પર કબજો કરે છે, અને આ દ્વારા, એક તરફ “બ્રેન વોશ” દ્વારા સત્ય છુપાવવામાં આવે છે, અને બીજી તરફ “છબી પોલિશિંગ” પણ કરવામાં આવે છે…
एक राजा था उसके शयनकक्ष में #मंदरीसर्पिणी नाम की जूं ने डेरा डाल रखा था। रोज रात को जब राजा जाता तो वह चुपके से बाहर निकलती और राजा का खून चूसकर फिर अपने स्थान पर जा छिपती। संयोग से एक दिन #अग्निमुख नाम का एक खटमल भी राजा के शयनकक्ष में आ पहुंचा। जूं ने जब उसे देखा तो वहां से चले जाने को कहा। उसने अपने अधिकार-क्षेत्र में किसी अन्य का दखल सहन नहीं था। लेकिन खटमल भी कम चतुर न था, बोला, ‘‘देखो, मेहमान से इसी तरह बर्ताव नहीं किया जाता, मैं आज रात तुम्हारा मेहमान हूं।’’ जूं अततः खटमल की चिकनी-चुपड़ी बातों में आ गई और उसे शरण देते हुए बोली, ‘‘ठीक है, तुम यहां रातभर रुक सकते हो, लेकिन राजा को काटोगे तो नहीं उसका खून चूसने के लिए।’’ खटमल बोला, ‘‘लेकिन मैं तुम्हारा मेहमान है, मुझे कुछ तो दोगी खाने के लिए। और राजा के खून से बढ़िया भोजन और क्या हो सकता है।’’ ‘‘ठीक है।’’ जूं बोली, ‘‘तुम चुपचाप राजा का खून चूस लेना, उसे पीड़ा का आभास नहीं होना चाहिए।’’ ‘‘जैसा तुम कहोगी, बिलकुल वैसा ही होगा।’’ कहकर खटमल शयनकक्ष में राजा के आने की प्रतीक्षा करने लगा। रात ढलने पर राजा वहां आया और बिस्तर पर पड़कर सो गया। उसे देख खटमल सबकुछ भूलकर राजा को काटने लगा, खून चूसने के लिए। ऐसा स्वादिष्ट खून उसने पहली बार चखा था, इसलिए वह राजा को जोर-जोर से काटकर उसका खून चूसने लगा। इससे राजा के शरीर में तेज खुजली होने लगी और उसकी नींद उचट गई। उसने क्रोध में भरकर अपने सेवकों से खटमल को ढूंढकर मारने को कहा। यह सुनकर चतुर खटमल तो पंलग के पाए के नीचे छिप गया लेकिन चादर के कोने पर बैठी जूं राजा के सेवकों की नजर में आ गई। उन्होंने उसे पकड़ा और मार डाला।😢
हम लोगों में से बहुत ही कम जानते होंगे कि नेहरू पेशे से वकील थे लेकिन किसी भी क्रांतिकारी का उसने केस नहीं लड़ा।
बात उस समय की है जिस समय महाराजा हरिसिंह 1937 के दरमियान ही जम्मू कश्मीर में लोकतंत्र स्थापित करना चाहते थे लेकिन शेख अब्दुल्ला इसके विरोध में थे क्योंकि शेख अब्दुल्ला महाराजा हरिसिंह के प्रधानमंत्री थे और कश्मीर राज्य का नियम यह था कि जो प्रधानमंत्री होगा वही अगला राजा बनेगा लेकिन महाराजा हरि सिंह प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला के कुकृत्य से भलीभांति परिचित थे इसलिए कश्मीर के लोगों की भलाई के लिए वह 1937 में ही वहां लोकतंत्र स्थापित करना चाहते थे लेकिन शेख अब्दुल्ला ने बगावत कर दी और सिपाहियों को भड़काना शुरू कर दिया लेकिन राजा हरि सिंह ने समय रहते हुए उस विद्रोह को कुचल डाला और शेख अब्दुल्ला को देशद्रोह के केस में जेल के अंदर डाल दिया।
शेख अब्दुल्ला और जवाहरलाल नेहरू की दोस्ती प्रसिद्ध थी। जवाहरलाल नेहरू शेख अब्दुल्ला का केस लड़ने के लिए कश्मीर पहुंच जाते हैं, वह भी बिना इजाजत के राजा हरिसिंह द्वारा चलाई जा रही कैबिनेट में प्रवेश कर जाते हैं , महाराजा हरि सिंह के पूछे जाने पर की आप किसकी मंजूरी से यहाँ आये हो नेहरु ने बताया कि मैं भारत का भावी प्रधानमंत्री हूं।
राजा हरिसिंह ने कहा चाहे आप कोई भी है, बगैर इजाजत के यहां नहीं आ सकते अच्छा रहेगा आप यहां से निकल जाएं।
नेहरु ने जब राजा हरि सिंह के बातों को नहीं माना तो राजा हरिसिंह ने कहा यह तुम्हारी कांग्रेस नहीं है या तुम्हारा ब्रिटिश राज नहीं है जो तुम चाहोगे वही होगा। तुम होने वाले प्रधानमंत्री हो सकते हो लेकिन मैं वर्तमान राजा हूं और उसी समय अपने सैनिकों को कहकर कश्मीर की सीमा से बाहर फेंकवा दिया।
कहते हैं फिर नेहरू ने दिल्ली में आकर शपथ ली कि वह 1 दिन शेख अब्दुल्ला को कश्मीर के सर्वोच्च पद पर बैठा कर ही रहेगा। इसीलिए बताते हैं कि भारत मे विलीनीकरण के समय कश्मीर को छोड़कर अन्य सभी रियासतों का जिम्मा सरदार पटेल को दिया गया और एकमात्र कश्मीर का जिम्मा भारत में मिलाने के लिए जवाहरलाल नेहरु ने लिया था।
सरदार पटेल ने सभी रियासतों को मिलाया लेकिन नेहरू ने अपने अपमान के लिए भारत के साथ गद्दारी की ओर शेख अब्दुल्ला को मुख्यमंत्री बनाया और 1955 में जब वहां की विधानसभा ने अपना प्रस्ताव पारित करके जवाहरलाल नेहरू को पत्र सौंपा कि हम भारत में सभी शर्तों के साथ कश्मीर का विलय करना चाहते हैं तो जवाहरलाल नेहरू ने कहा —- नहीं अभी वह परिस्थितियां नहीं आई है कि कश्मीर का पूर्ण रूप से भारत में विलय हो सके।
इस प्रकार उस पत्र को प्रधानमंत्री नेहरू ने इरादतन ठुकरा दिया था, और अपने अपमान का बदला लिया जिसका खामियाजा भारत आज तक भुगत रहा था !
ठाकुर नाथू सिंह साहब रौबदार आदमी थे। राजपूताने के एक प्रतिष्ठित खानदान में (जयमल राठौड़ के वंश में) पैदा हुए थे, लेकिन माता-पिता का साया बचपन में ही उठ गया। उनकी रिश्तेदारी डूंगरपुर राज्य के राजा से थी। वे ही उनके अभिभावक बने।
नाथू सिंह जी ने कट्टर मिजाज पाया था। देश पर बाहरी हुकूमत उन्हें बुरी लगती थी। बचपन में ही मन बना लिया कि बड़े होकर राज्य की सेना में भर्ती होना है और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ना है। हालांकि जब मौका आया तो राजा साहब ने ही उन्हें ब्रिटिश इंडियन आर्मी जॉइन करने का सुझाव दिया। वहाँ बेहतर प्रशिक्षण मिलता। दरअसल उस समय तक सेना का भारतीयकरण होने लगा था। अर्थात अब सेना में हिंदुस्तानी अफसरों के लिए बराबरी के मौके थे। बस दिक्कत थी कि काबिल ऑफिसर मिलते नहीं थे। आप देखिए कि स्वतंत्र भारत में भी अफसरों की शॉर्टेज बनी रहती है। गुलाम भारत में स्थिति और खराब ही होनी थी।
जब नाथू सिंह जी ट्रेनिंग के लिए ब्रिटेन गए तो पहले ही दिन मेस में उन्होंने बवाल काट दिया। आमतौर होता यह था कि गोरे आपत्ति जताते कि क्या हम अब इन कालों के साथ भोजन करेंगे। यहाँ नाथू सिंह जी का कहना था कि मैं इतने ऊँचे राजपूत खानदान का पैदा हुआ, किंग्स एंड प्रिंस के साथ भोजन करने वाला, इन म्लेच्छ गोरों के साथ भोजन करूँ?
यह जातिवाद नहीं था, बल्कि अंग्रेजों को उन्हीं के जूते का स्वाद चखाना था। अंग्रेज लोग खानदानों, शुद्ध रक्त, कुलीनता को बहुत महत्व देते थे। भारतीय कुलीनों को भी। लेकिन आम हिंदुस्तानियों से रंगभेद बरतते। ठाकुर साहब ने तो बस अपने देशवासियों की तरफ से बदला भर लिया था।
ट्रेनिंग पूरी हुई। ट्रेनिंग समाप्ति पर कमांडिंग अफसर ने अपने भाषण में हिंदुस्तानी अफसरों से कहा कि हमने आपको इसलिए ट्रेन किया है कि कल को यदि हम चले गए तो कुछ तो शिक्षित लोग हों जो सेना को चला सकें। इस पर नाथू जी बोल पड़े कि अंग्रेजों के आने से पहले भी भारत में सेनाएं थी और बेहतर थी। और ‘यदि हम चले गए’ का क्या मतलब है? आपको जाना तो है ही, कल जाना है, अभी निकल लो।
भारत में भी कभी किसी अंग्रेज अफसर ने कहा कि उसे भारत अच्छा नहीं लगता। ठाकुर साहब ने जवाब दिया, “मैं ब्रिटेन एक बार गया। मुझे बहुत ही ज्यादा बुरा लगा। मैं जितनी जल्दी हो सका, वहाँ से निकल आया। अब कभी उस बेकार देश में नहीं जाऊंगा। सर! यदि आपको भारत अच्छा नहीं लगता तो किसने आपका हाथ पकड़ा है? अभी निकल जाइए, और अपने साथ सभी ब्रिटिश मित्रों को भी लेते जाइए।”
नाथू सिंह जी की कई बार शिकायतें की गई। लेकिन हर बार परिणाम एक ही होता। जाँच करने वाले अफसर लिखते कि यह आदमी सेना में रहने के लायक नहीं हैं। अपने साथी अफसरों (ब्रिटिश अफसरों) को अपने से कमतर समझता है, सेना के सोशल प्रोटोकॉल (यूरोपियन संस्कृति) को फॉलो नहीं करता। साथ ही यह भी कि तमाम अफसरों में यह सबसे काबिल, तकनीकी रूप से दक्ष, बेहतरीन लीडर और ईमानदार व्यक्ति है।
नाथू सिंह जी को एक बार इलाहाबाद में एक सड़क पर राजनीतिक रैली को रोकने के लिए कहा गया। ये अपनी पलटन लेकर पहुंचे। सामने से नेहरू और अन्य नेताओं की अगुवाई में देशभक्तों का हुजूम आ रहा था। नाथू जी ने ऑर्डर फॉलो करते हुए रैली को उस सड़क से तो नहीं गुजरने दिया, लेकिन अपनी देखरेख में दूसरे रास्तों से रैली को जाने दिया। ऐसा लगातार कई दिन तक हुआ। अफसर चिढ़ गए और फिर से इंक्वायरी बैठा दी। नाथू जी फिर से साफ बच निकले। दरअसल वे कागज-पत्तर से बिलकुल दुरुस्त काम करते थे।
एक बार ऐसा मौका भी आया कि उन्होंने सेना की नौकरी छोड़ कॉंग्रेस जॉइन करने का मन बनाया। मोतीलाल नेहरू ने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया। उनका कहना था कि देश जब आजाद होगा तो उस नए राष्ट्र को उन जैसे सैनिक अफसरों की जरूरत पड़ेगी।
उस समय के सैनिक अफसरों को लेकर अक्सर यह बात कही जाती है कि वे तो अंग्रेजी नौकरी कर रहे थे, वे कैसे देशभक्त। पर हमें समझना होगा कि ये सैनिक भी अंग्रेजों से कुछ इसलिए सीख रहे थे कि वह देश के काम आ सके। केवल नाथू सिंह जी ही नहीं, बल्कि करियप्पा साहब और सगत सिंह जी ने भी समय-समय पर आर्मी छोड़ देश की आजादी की लड़ाई में योगदान देने का मन बनाया था। पर कभी गाँधी, कभी मोतीलाल और कभी पटेल ने इन सैनिकों को ऐसा करने से रोक दिया।
नाथू सिंह जी नियम-कायदों को घोंटकर पी चुके थे। वे अंग्रेजों के बनाए नियमों के अंतर्गत ही, शिकायती पत्र लिख-लिखकर अंग्रेजों की नाक में दम कर देते और अंततः अपनी माँग मनवा लेते।
इनका राष्ट्रवाद इतना प्रखर था कि आजादी से पहले ही अंतरिम सरकार ने तय कर लिया था कि देश के पहले आर्मी-चीफ नाथू सिंह जी ही होंगे।
आजादी के बाद एक मीटिंग में नेहरू जी कह रहे थे कि अभी हमारा देश नया है और फौज में भारतीय अफसर बहुत कम हैं, अनुभवहीन है। अतः कुछ साल तक ब्रिटिश अफसर भारतीय सेना में अपनी सेवाएं दें। जब नेहरू बोल चुके तो सभी लोग चुप बैठे थे और नेहरू का मौन समर्थन कर रहे थे। नाथूसिंह जी ने बोलने की अनुमति लेकर कहा, “यह सही है कि हमारा यह सनातन देश वर्तमान परिस्थितियों में नया है, और भारतीय अफसर कम है, लेकिन अनुभवहीन नहीं हैं। हम सबको सेना में बीस वर्ष से अधिक का अनुभव है। यदि सभी ब्रिटिश अफसर चले भी गए, तब भी हम हिंदुस्तानी अफसर सेना को संभाल लेंगे। और गुस्ताखी की माफी के साथ, अनुभव की ही बात पर, श्रीमान प्रधानमंत्री जी को भी प्रधानमंत्री बनने का कितना अनुभव है? यदि वे नगण्य अनुभव के साथ देश चला सकते हैं तो हम भारतीय अफसर बीस साल के अनुभव के साथ फौज को क्यों नहीं चला सकते?”
हालांकि नेहरू जी की बात अधिक व्यवहारिक थी। कैबिनेट ने नेहरू जी के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
जब पहले भारतीय सेना-प्रमुख की नियुक्ति की बात आई तो सरकार की पहली पसंद ठाकुर नाथूसिंह जी ही थे। लेकिन उन्होंने यह पद इसलिए स्वीकार नहीं किया क्योंकि सेना में उनसे भी वरिष्ठ जनरल थे, जिनमें वरिष्ठतम करियप्पा थे। देश की सेना की शुरुआत ही गलत परम्परा से हो, यह नाथू जी को स्वीकार्य नहीं था।
इसके बाद से नाथूसिंह जी और सरकार के रिश्ते बिगड़ते ही गए। नाथू सिंह जी पहले की तरह ही सरकार को चिट्ठियां लिखा करते। पर अब हालात बदल गए थे। अब सत्ता पर अंग्रेज नहीं भारतीय नेता बैठे थे। नाथू जी ने लिखा, “मैंने अंग्रेजों के साथ काम किया, और मैं उन्हें पसन्द नहीं करता था। पर मैंने एक भी ऐसा अंग्रेज नहीं देखा जो अपने देश के प्रति, नियमों और कर्तव्यों के प्रति प्रतिबद्ध न हो। अफसोस है कि बिलकुल यही बात मैं इंडियन्स के लिए नहीं कह सकता।”
સત્ય ઘટના..- સંગીતા જૈન મારા પપ્પાનો દેહાંત થઇ ગયો હતો.અમે માત્ર બે બહેન જ હતી. મારે કોઈ ભાઈ નહોતો. મારી માએ ખૂબ મહેનતથી અમને ઉછેર્યા હતા. મોટા થતા મારી માને મારા લગ્નની ચિંતા સતાવવા લાગી હતી. તેમની એક સાહેલી હતી, તેમને આ વિશે માએ કહ્યું ત્યારે તેમણે માને એક છોકરા વિશે જણાવ્યું.
તે સમયે મારી માએ તેમની સાહેલીને કહ્યું હતું, ‘‘છોકરાવાળા આવીને વાતચીત કરી લે અને છોકરીને પણ જોઈ લે.’
પછી મારા ભાવિ સસરા આવ્યા અને તેમણે મને પસંદ કરી. હવે વાત છોકરો જોવાની હતી. મારી માએ મારા સગા કાકાને છોકરો જોવા મોકલ્યો. મારી પિતરાઈ બહેન મારાથી માત્ર ૧ દિવસ મોટી હતી. તેથી મારા કાકા ચાંદીના ૧૧ સિક્કા લઈને છોકરો મારા માટે નહી, તેમની દીકરી એટલે કે મારી પિતરાઈ માટે બુક કરવા લાગ્યા.
મારો સસરા વચનના પાક્કા હતા. તેમને દાનનો કોઈ લોભ નહોતો. તેથી તેમણે કાકાને ઠપકો આપતા કહ્યું, “તમને તમારા ભાભીએ ખૂબ વિશ્વાસ સાથે પોતાની દીકરી માટે છોકરો જોવા અહી મોકલ્યા છે એક તમે છો જે તેમની સાથે છેતરપિંડી કરી રહ્યા છો. તે છોકરીના પિતા કે ભાઈ કોઈ જ નથી. તે જોતા તમારે તે બધા કામ આગળ વધીને કરવા જોઈએ.”
પછી મારા કાકા પોતાનું માથું શરમથી નીચું કરીને પાછા આવી ગયા અને પૂરી વાત જણાવી. વાત સાંભળીને મારી મા ધ્રુસકેષુસકે રડી પડી. આ ઘટનાને ૨૫ વર્ષ થયા છે અને મારા સસરાના આદર્શવાદના લીધે આજે હું તેમના ઘરની વહુ છું. – સંગીતા જૈન (ગૃહશોભા ઓગસ્ટ ૨૦૨૧ માંથી સાભાર) સં./ ટાઈપીંગઃ હસમુખ ગોહીલ
लौकिक यातनाओं से गुजरता #महाभारत काल का साक्ष्य #भागलपुर में ●●●●●●●●●●●●●●●●●●●
भागलपुर अपने इतिहास को बिगाड़ने के लिए ख्यात है। यहां के पुरातात्विक टीलों पर बसे लोगों को अपनी विरासत से अधिक पसंद निज संपत्ति है। पुरातात्विक सामग्रियों को धड़ल्ले से नष्ट किया जा रहा है जिसमें इनकी मौन सहभागिता है। इस भागलपुर ने छद्मनामों को अपना आदर्श बना कर मूर्तियों की स्थापना कर लिए और अपने यशस्वी नायकों को भुला दिया। कर्ण के नाम से चम्पा नगर का टीला ही है। इस पर बड़ी आबादी बसी हुई है। यहां जिनके घर के नीचे कोई पुरातात्विक सामग्री मिलती है, वे नष्ट कर देते हैं। उन्हें डर होता है कि अगर प्रशासन को जानकारी मिलेगी तो वे इस स्थान को निर्माण कार्य के लिए प्रतिबंधित कर देंगे। सरकार भी इस आफत से बचना चाहती है कि उनका वोट बैंक प्रभावित न हो जाए। इसी तरह अंदर ही अंदर एक षड्यंत्र है कि भागलपुर यानी प्राचीन अंग देश के महाराजा रोमपाद, महाराजा सेनापति कर्ण, महर्षि पालकाप्य (‘गज आयुर्वेद’ के रचयिता) को बिसरा दिया जाए। यहां के लोग नहीं चाहते कि दानवीर कर्ण की विशालकाय प्रतिमा लगाई जाए। क्योंकि इससे इतिहास जीवंत होने लगेगा। यहां महावीर जैन और महात्मा बुद्ध को भी भुला दिया गया।
भागलपुर में लगभग दर्जन भर विशालकाय टीले हैं जिनके नीचे इतिहास दबा हुआ है। इन्हें अब तेजी से नष्ट किया जा रहा है। ह्वेनसांग 7वीं शताब्दी में भागलपुर के चम्पा (अब नगर) में आए थे। तब जिन मठों और मंदिरों की चर्चा उन्होंने किये हैं वे इन टीलों के नीचे दबे हुए हैं। समय के बवंडर, विदेशी बर्बर आक्रमणों के उपरांत उपेक्षा और गंगा की अलमस्त लहरों ने मिट्टी डालकर इन विशाल धरोहरों को गर्भ में सुरक्षित कर लिया था जिन्हें तथाकथित बुद्धिजीवी कहे जाने वाले यहां के निवासी मृत विशालकाय जंतु को गिद्ध की भांति नोचते आ रहे हैं।
एक ऐसा ही टीला भागलपुर के सबौर में है। उसे भी नष्ट करने का यत्न जारी है।
खांडवप्रस्थ के बागपत (व्याघ्रप्रस्थ), सोनीपत (स्वर्णप्रस्थ), पानीपत (पाण्डवप्रस्थ), तिलपत (तिलप्रस्थ) और श्रीप्रस्थ (इंद्रप्रस्थ) जैसा ‘प्रस्थ’ नाम वाला एक ग्राम भागलपुर नगर के आसपास यानी प्राचीन अङ्ग क्षेत्र में है।
यह ग्राम भी महाभारत काल का प्रतीत होता है। यहां कुछ अतिप्राचीन टीले हैं जिससे कभी मौर्यकाल तो कभी शुंगकाल के आहत (पंचमार्क) सिक्के प्राप्त होते रहे हैं। यहां से 2″ का एक सुंदर नंदी भी प्राप्त हुआ है। यहां पेंटेड ग्रे वेयर (PGW) मिलते हैं। इतिहासकार बीबी लाल इन्हें महाभारत काल का मानते हैं। कौशाम्बी और इंद्रप्रस्थ में उन्हें यही मृदभांड मिले थे।
यह स्थान गंगा के किनारे है। पूर्वकाल में गंगा और इस टीले के मध्य एक सड़क थी। टीले के नीचे विशाल भवनों के अवशेष हैं। यह भी अन्य पुरास्थलों की भांति स्ट्रेटिफ़ायड है। टीले के पूर्वी भाग में मानव अस्थियों के अवशेष अत्यधिक मात्रा में मिलते हैं जो अंग भंग प्रतीत होते हैं, मानो कोई भीषण नरसंहार हुआ है।
टीले के दक्षिण-पश्चिम में एक विशाल अन्नागार था। दो वर्षों पूर्व यहां खेत बनाने के क्रम में लगभग 2 दर्जन विशालकाय अन्नकोष मिले थे। ये अन्नकोष मिट्टी के बने विशालकाय घड़े थे जिन्हें स्थानीय लोगों ने नष्ट कर दिया लेकिन इसके अवशेष देखे जा सकते हैं। ये घड़े हाल में तमिलनाडु के आदिचन्नूर में मिले घड़े से भी बड़े थे।
इस स्थान पर 7वीं सदी में आए चीनी यात्री ह्वेनसांग नहीं पहुंचे। क्योंकि वो उस मार्ग से गए ही नहीं इसलिए अपने यात्रा वृतांत में उन्होंने इसकी चर्चा नहीं की। यहां फ्रांसिस बुकानन, विलियम फ्रेंकलिन, एनएल डे जैसे सर्वेयर – इतिहास मर्मज्ञ पहुंचे। किन्तु, इस स्थान की विवेचना ही गलत की। फ्रेंकलिन की विवेचना का पुछल्ला पकड़कर ही भागलपुर का आधुनिक गजेटियर लिखनेवाले पीसी रायचौधुरी ने नंदो लाल डे के हवाले से वही गलत और घिसीपिटी कहानी कह दी जिसका भूगोल तक उक्त ग्रंथों से फिट नहीं बैठता। फ्रेंकलिन ने इस स्थान को ‘मार्कण्डेय’, ‘वायु’ और ‘हरिवंश पुराण’ के संदर्भों से जोड़ने का प्रयत्न किया मगर लक्ष्य तक नहीं पहुंचे किन्तु एक आउटलाइन अवश्य खींच दिए। उन्होंने ‘धरणी कोष’ और ‘चौर पंचासिका’ से संदर्भ भी लिए किन्तु लक्ष्य से भटक गए। उन्हीं कहानियों को लेकर अब भी इतिहास के खोजी प्रवृत्ति के लोग वैतरणी पार कर रहे हैं।
इस स्थान का नाम #कुरूप्रस्थ है जिसे अपभ्रंश में कुर्पट कहते हैं। यह कुरूपत ही है। कुरुओं की रियासत।
‘अष्टाध्यायी’ में पाणिनी ने लिखे कि ‘प्रस्थ’ अब गांवों के नाम से हट रहा है। किन्तु यहां तो प्रस्थ प्राप्त है वह अब ‘पट’ में बदल गया है।
‘सांख्यायन श्रौतसूत्र’ में भी कुरुओं के अन्यत्र फैलने की बात है। ‘मत्स्य पुराण’ में उधृत है कि भारत युद्ध के उपरांत कौरव मगध और इसके आसपास भी बस गए। बुद्धघोष द्वारा त्रिपिटकों की टीकाओं में भी बुद्ध द्वारा कुरुओं के मध्य उपदेश का प्रसंग आया है।
गंगा द्वारा सिंचित प्रदेश को भी ‘प्रस्थ’ कहने की प्रथा थी किन्तु पाणिनी के काल तक यह समाप्त हो चली थी।
इस विशाल टीले पर खेती होती ही है, एक विशाल बरगद के नीचे एक मजार भी बना दिया गया है। टीले के बीचों बीच एक कुआं भी है। लोग यहां इसलिए जाते हैं कि उन्हें सुलेमान की तरह कुछ रत्न और सिक्के तथा आभूषण मिल जाएंगे। हाँ, वही सुलेमान जिसकी चर्चा 1813 में यहां पालिबोथरा (पाटलिपुत्र) को ढूंढते हुए आए विलियम फ्रेंकलिन ने की है।
बिहार में सरकार प्राचीन टीलों के संरक्षण और उत्खनन को लेकर बहुत उदासीन है। सबकुछ सरकार के ऊपर छोड़ी हुई जनता तो स्वार्थ में इस तरह डूबी हुई है कि उसे संस्कृति का संरक्षण बेकार लगता है। भारतवर्ष की गौरवशाली परम्परा और इतिहास उत्तरोत्तर नष्ट हो रही है। हम कब चेतेंगे भला!
ब्लैक डाहलिया अमेरिका के अपराध इतिहास की सबसे डरावनी और रहस्यमयी कहानियों में से एक है। यह घटना जनवरी 1947 में लॉस एंजिलिस में हुई थी, जब एक 22 साल की लड़की का टुकड़े-टुकड़े किया हुआ शव मिला। उस लड़की का नाम था एलिज़ाबेथ शॉर्ट।
एलिज़ाबेथ एक छोटी सी उम्र में हॉलीवुड आई थी, उसका सपना था कि वह एक दिन बड़ी अभिनेत्री बने। लेकिन सपने और हक़ीक़त के बीच की दूरी अक्सर क्रूर होती है। 15 जनवरी 1947 की सुबह लॉस एंजिलिस के एक खाली प्लॉट में एक महिला ने देखा कि घास पर एक अजीब-सा “मॉडल” पड़ा है। पास जाकर पता चला कि वो कोई मॉडल नहीं, बल्कि एक इंसान का शव था।
शव को बीच से दो हिस्सों में बाँटा गया था, पूरा शरीर खून से खाली था और चेहरा इस तरह काटा गया था कि उसके होंठ कानों तक फटे हुए लग रहे थे। पुलिस के लिए ये नज़ारा किसी डरावनी फ़िल्म से कम नहीं था। जल्द ही पहचान हुई कि ये एलिज़ाबेथ शॉर्ट है, जिसे स्थानीय अख़बारों ने बाद में “ब्लैक डाहलिया” नाम दिया। कहा जाता है कि वह अक्सर काले कपड़े पहनती थी और एक फ़िल्म The Blue Dahlia भी हाल ही में रिलीज़ हुई थी, जिससे उसका ये नाम जुड़ गया।
जांच शुरू हुई तो मीडिया और पुलिस दोनों में सनसनी फैल गई। सैकड़ों संदिग्धों से पूछताछ हुई, लेकिन कोई ठोस सबूत नहीं मिला। पुलिस को कुछ रहस्यमयी फ़ोन कॉल्स और लेटर मिले जिनमें कातिल खुद को “ब्लैक डाहलिया अवेंजर” कह रहा था। उसने एलिज़ाबेथ के निजी सामान और पहचान पत्र भी पुलिस को भेजे। यह सब ऐसे लग रहा था मानो हत्यारा जानबूझकर खेल खेल रहा हो।
उस दौर में लॉस एंजिलिस पहले ही अपराध और भ्रष्टाचार से भरा शहर था। ब्लैक डाहलिया केस ने उस अंधेरे चेहरे को और उजागर किया। कई थियोरी बनीं—कुछ लोगों ने सोचा कि यह किसी डॉक्टर या सर्जन का काम है क्योंकि शरीर को बहुत सफाई से काटा गया था। कुछ ने कहा कि यह हॉलीवुड के अंदर की गंदी दुनिया का हिस्सा है। यहाँ तक कि कुछ बड़े फिल्म प्रोड्यूसर और पुलिस अधिकारियों के नाम भी अफ़वाहों में आए।
लेकिन असली कातिल कौन था, यह आज तक किसी को पता नहीं चल पाया। कई किताबें लिखी गईं, डॉक्यूमेंट्री बनीं और हॉलीवुड फ़िल्में भी बनीं, पर सच अभी भी धुंध में छिपा हुआ है। ब्लैक डाहलिया केस इस बात की मिसाल बन गया कि कैसे एक क्रूर अपराध रहस्य और डरावनी कहानी में बदल जाता है, जो दशकों बाद भी लोगों के ज़हन में जिंदा रहता है।
याद करो,उद्धव जी हिन्दू हृदय सम्राट बाला साहेब ठाकरे का पत्रकार शेखर गुप्ता को 2007 में दिया हुआ एक शानदार इंटरव्यू….
*शेखर गुप्ता: आज जो मेरे मेहमान हैं..उनके बारे में बहुत से लोग बहुत सी बातें कहते हैं।कोई उन्हें मुंबई का डॉन कहता है तो कोई एक महान चित्रकार। कोई तानाशाह कहता है..तो कोई महाराष्ट्र का शेर। जी हाँ, आज मेरे मेहमान हैं शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे।तो बाला साहब मैं आपसे ही पूछता हूँ, आपको इनमें से कौन सा नाम पसंद है??…..
*बाल ठाकरे:मुझे बस महाराष्ट्र का टाइगर या मराठी टाइगर ही कहलाया जाना पसंद है।शेर मैं मोदी को कहता हूँ…
*शेखर गुप्ता:आपका मतलब नरेंद्र मोदी???……
*बाल ठाकरे: हाँ,नरेंद्र मोदी,अभी कुछ दिन पहले आया था मुझसे मिलने। मैंने उसे कहा कि मैं मराठी टाइगर हूँ और तुम गुजराती शेर हो…
*शेखर गुप्ता: मोदी ने इस पर क्या कहा??…
*बाल ठाकरे: वो हँसने लगा…और बोला….बाला साहब, बस आपका आशीर्वाद मेरे ऊपर बना रहे…
*शेखर गुप्ता: लेकिन नरेंद्र मोदी के बारे में तो बहुत से लोग अच्छी राय नहीं रखते??…..
*बाल ठाकरे: हा हा हा हा हा हा ( जोर से हँसते हैं ) मैं वो पहला व्यक्ति था, जिसने नरेंद्र मोदी की २००२ के दंगों के बाद भी तारीफ की थी। तुम मीडिया वालों ने उस समय उसके खिलाफ जो तूफ़ान खड़ा किया था, उस समय भी मैंने उसका साथ दिया था। लोग कहते हैं कि मोदी की कुर्सी आडवाणी ने बचाई। जबकि वो मैं था, जिसने मोदी की कुर्सी बचाई थी…
*शेखर गुप्ता: वो कैसे??….
*बाल ठाकरे: ये आडवाणी आया था मेरे पास मिलने दंगों के बाद। मैंने उससे पूछा कि फिर क्या फैसला लिया है तुम लोगों ने मोदी के बारे में?? आडवाणी बोला…बाला साहब, हमें मोदी को हटाना पड़ेगा। सारे देश में इस गुजरात दंगे के कारण काफी बड़ा बवाल खड़ा हो गया है। मैंने उसी समय आडवाणी का हाथ पकड़ लिया और कहा… नहीं, ऐसा हरगिज मत करना। मोदी गया तो गुजरात गया….
*शेखर गुप्ता: ”मोदी गया तो गुजरात गया” का मतलब?? गुजरात कहाँ गया??….
*बाल ठाकरे: मतलब गुजरात हमेशा के लिए बीजेपी के हाथ से गया। मोदी को हटाया तो आने वाले सौ सालों तक कोई भी गुजराती बीजेपी को वोट नहीं करेगा। मैंने अडवाणी को कहा, तुमको मोदी दिखाई देता है…गोधरा नहीं दिखाई देता है?? वहाँ जिन्दा जलाये गए हिन्दू नहीं दिखाई पड़ते हैं?? ठीक से सुन लो, अगर मोदी को हटाया तो हमारा तुम्हारा (यानी बीजेपी और शिवसेना) रिश्ता भी खत्म समझना…
*शेखर गुप्ता: फिर आडवाणी ने इस पर क्या कहा??….
*बाल ठाकरे: अडवाणी बोला, मैं आपको वचन देता हूँ कि गुजरात का सीएम मोदी ही रहेगा…
*शेखर गुप्ता: लेकिन बाला साहब, अटल जी द्वारा कहे गए ”राजधर्म” ‘शब्द का क्या? क्या गुजरात में जो हुआ, वो राजधर्म के खिलाफ नहीं था??…
*बाल ठाकरे: राजधर्म?? क्या होता है ये राजधर्म?? इस देश में राजधर्म जैसी कोई चीज कहीं पर भी नहीं है। यहाँ एक ही धर्म चलता है ”मुस्लिम खुश करो धर्म”…
*शेखर गुप्ता: आप मुसलमानों के इतना खिलाफ क्यों हैं??…
*बाल ठाकरे: मैं सारे मुसलामानों के खिलाफ नहीं हूँ। लेकिन ये पता लगाना बड़ा मुश्किल है कि कौन से वाले के दिल में हिन्दुस्तान है?….और कौन से के दिल में पाकिस्तान?? हिन्दुस्तान में रहकर पाकिस्तान दिल में रखने वालों के मैं खिलाफ हूँ और ये बात कहने से मैं डरता नहीं हूँ…