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लिखे जो ख़त तुझे

(एक ऐतिहासिक सत्य कथा, बकलम जनाब भूरेलाल जी)

बरस था १९५१ तब पाकिस्तान में स्थित ईरानी दूतावास में एक ईरानी अफ़सर की नियुक्ति वहाँ हुई। अफ़सर अपनी तीस साला ख़ूबसूरत शोख़ हसीन बेगम नाहिद और अपनी लड़की को लिए मुल्क में आया। मुल्क काफ़िरों के चंगुल से ताज़ा आजाद हुआ था और सियासत के गलियारों में वो हुक्मरान भेड़ियों के मानिंद घूम रहे थे जो हिन्दुस्थान से आए थे। ऐसे ही एक हुक्मरान थे जनाब इसिकन्दर मिर्ज़ा। आप नवाब मीर जाफ़र के कुनबे से थे और इस बात पे जनाब मिर्ज़ा को बड़ा गुरूर था। मिर्ज़ा मुल्क के रक्षा मंत्रालय में आसीन थे।

एक शाम की बात है जब रूसी दूतावास में ईरानी अफसरान पाकिस्तानी आमद के साथ पार्टी में मशगूल थे। पार्टी के दौरान बावन साल के मिर्जा जो छह बच्चों के अदद अब्बा थे, की मुलाकात बेगम नाहिद से हुई। बावन साल का मिर्ज़ा बेहद हसीन ईरानी हसीना को देख अपना दिल हार बैठा। दोनों में गुफ्तगू शुरू हुई- मालूम हुआ बेगम तैमूर लंगड़े के कुनबे से वास्ता रखती है। मीर जाफ़र के लहू ने उबाल मारा- तैमूरी ख़ातून तो अपने हरम में होनी चाहिए। पहली ही मुलाक़ात में मिर्ज़ा ने बेगम नाहिद से गुज़ारिश की- क्या आप मेरी दूसरी बीवी बनेंगी?

बेगम को भी इस अधेड़ मरद में अपना मुस्तक़बिल नज़र आया, दिल मचल रहा था कि इस हज़रात को अपना दूसरा खाबिंद बना लूँ किंतु ज़माना क्या कहेगा। आग दोनों तरफ़ लगी थी। बेगम ने हाँ तो नहीं कहा किंतु आँखों से रज़ामंदी दे दी। मिर्ज़ा और बेगम नाहिद के बीच ख़त से अब इश्क़ की गुफ़्तगू शुरू हुई। एक साल में ही बेगम ने अपने फ़ौजी ईरानी शौहर को तलाक दे मिर्ज़ा से निकाह पढ़वा लिया।

मिर्ज़ा के कलपुर्जे अब भी दुरुस्त थे। मिर्ज़ा कुश्तों की बदौलत तीस साल के फ़ौजियों को भी मात देते थे। चुनांचे ईरानी हसीनाएँ भी मिर्ज़ा की मुरीद थी। निकाह के कुछ बरस में ही बेगम नौहिद की क़िस्मत ने पलटा खाया जब पाकिस्तानी को मज़हबी रियासत में तब्दील कर दिया गया और बहुत जल्दी मिर्ज़ा मुल्क के सदर बने। मिर्ज़ा पजामे के ढीले इतने थे कि सियासत में अपना दिमाग़ ना इस्तेमाल करते, सब सियासती फ़ैसले बेगम लेती थी। आख़िर बेगम ने मिर्ज़ा को अपना दिल दिया था तो फ़ैसले तो लेने का हक़ उन्हें था। क़ौमी लेन देन ऐसे ही होते है।

मिर्ज़ा ने सदर होने के नाते बेगम को इनामत तमगे अता किए। लगे हाथों बेगम ने रियासत के मसले जो ईरान के साथ उलझे हुए थे, उन्हें रफ़ा दफ़ा करवाने में अहम भूमिका निभाई। किंतु पाकिस्तानी फ़ौज में इस बात से क्रोध फ़ैल रहा था- लोग सोचते थे बेगम ईरानी एजेंट है और सदर साहब उनके गरारे में रहते थे।

बहुत जल्द तख्ता पलट हुआ जब फौज ने सत्ता अपनी पकड़ में ले ली- मिर्ज़ा और बेगम को वहाँ से लंदन भागना पड़ा। मिर्ज़ा वहाँ मुफ़लिसी में दिल के दौरे से खुदागंज रवाना हुए और बेगम उनकी याद में अकेली रह गई। बेवा बेगम ने अगले पचास साल मिर्ज़ा की याद में अकेले आँसू बहाते हुए निकाले। बेगम की मुराद थी- काश उन्हें कोई वो ख़त ला देता जो उन्होंने मिर्ज़ा को निकाह से पहले छिप कर लिखे थे।

बेनज़ीर ने बेगम नाहिद की ये मुराद पूरी की- उन्हें उनके ख़तों का पुलिंदा ला कर दिया। लेकिन ये क्या- पुलिंदा में केवल ख़ाली लिफ़ाफ़े थे, ख़त नदारद थे। कमबख़्त जनरल अयूब ने वो सब ख़त पढ़ जलवा दिए थे बस लिफ़ाफ़े रहने दिए । बेवा बेगम की तन्हाई और बढ़ गई जब उन्होंने उन लिफाफों पे अपनी इबारत में लिखा पढ़ा-

तुम्हारी तब तक ,जब तक सांस में है साँस!

बेगम ने अपना वायदा निभाई- तीसरा ख़सम ना किया। बेगम ९९ की उम्र में अकेली लंदन में फ़ौत हुई!

तस्वीर में बेगम के साथ चच्चा साहब। बेग़म के साथ खड़े चच्चा साहब—जो ऐसी तमाम बेग़मों के “जनाब-ए-मेज़बान” बन जाते थे। जनाब चच्चा ने ज़िंदगी का उसूल बना रखा था—“किसी की पहली नहीं तो दूसरी सही, और दूसरी नहीं तो तीसरी सही।”

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