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જેતપુર નો પ્રસંગ ,
મર્યાદા અને ચારિત્ર્યની વાત

હોળીનો તહેવાર હતો.
જેતપુરના રાજદરબારમાં રંગરોગાનની છોળો ઉડતી હતી.

દરબાર એભલવાળા હોળી રમીને ઉત્સાહથી ઉછળતા રાણીવાસમાં આવ્યા.

રાણીવાસમાં મહારાણી મીનળદેવી પલંગ પર બેઠા-બેઠા ઘોડિયામાં પોઢેલા પુત્ર ચાંપરાજ વાળાને હિંચકાવી રહ્યાં હતાં.

દરબાર એભલ આજ ઉલ્લાસમાં હતાં,તે રાણી પાસે પલંગ પર બેઠા અને હસતાં-હસતાં ઉત્સવના ઉમંગમાં રાણીના શરીરને માત્ર જરા સ્પર્શ કરી અડપલું કર્યું.

મીનલદે બોલ્યાં – ” હા દરબાર ! ચાંપરાજ જુએ છે “

એભલે રાણીનું વેણ હસી કાઢ્યું – ” રાણી ! ચાંપરાજ છ મહિનાનું બાળક છે.એ શું સમજવાનો હતો ? “

ત્યાં તો ચાંપરાજે ઘોડિયામાં રહેલું બાળોતીયું ( વસ્ર ) માથે ઓઢી લીધું અને પડખું ફરી ગયો.

દરબાર તો પછી ચાલ્યાં ગયાં પણ મીનલદેવીને હવે જીવવું ઝેર થયું,પોતાની મર્યાદા જતી રહી એવું લાગ્યું અને એ વખતે જ ભારતની એ જોગમાયાએ પોતાની જીભ કરડી ને પોતાના પ્રાણ ત્યજી દીધાં !

શું મર્યાદા ! વાહ ! આ દેવીને મુલવવાં માટે શબ્દ ક્યાંથી લાવવાં ! આજે જ્યારે ભારતની જે સ્ત્રીઓ ખુલ્લેઆમ પોતાની ઇજ્જતની હરાજી કરી રહી છે ત્યારે આ ઘટના કેટલો મહાન ઉપદેશ આપે છે !

એક વાત કહેવાની ગુસ્તાખી કે – ભારતના સંવિધાનમાં ભલે ગમે તેટલાં ટુંકાં કે મનફાવે તેવા વસ્ત્રો પહેરવાની પરવાનગી હોય પણ એ બધું કરતાં પહેલાં એકવાર વિચાર કરી જોજો !

પશ્વિમી સંસ્કૃતિ અપનાવીને તમે આપણી મહાન નારીઓએ આપેલાં બલિદાનને ભુલી રહ્યાં છો તમે એ જોગમાયાઓનો અનાદર કરી રહ્યાં છો પોતાની અમુલ્ય વિરાસત,

તમારા ભવ્ય ધર્મનો એકવાર વિચાર કરજો આ સતીઓના બલિદાનોને નિરર્થક ના જવા દેતા તમે એના સંતાન છો.

મીનલદેવી અમર થયાં છે પોતાની મર્યાદા ખાતર બલિદાન આપીને.એની કુખે પછી દુશ્મનોના મસ્તક વાઢતાં ચાંપરાજ વાળા જેવા નરવાહન જ જન્મે,,,,

એભલ ગયો નિજ ઓરડે, ત્રીય ઉપહાસ્ય કર્યુ
પોઢેલ ચાંપો પારણે, વસ્ત્ર લઈ મુખ પર ધર્યુ

તે દી’ જીભ કરડી જોગમાયા, સિધાવી સ્વર્ગવાસમાં
અમ દેશની એ આર્યરમણી અમર છે ઇતિહાસમાં…

શત શત નમન જય માતાજી

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एक राजा की बेटी की शादी होनी थी। बेटी की यह शर्त थी कि जो भी 20 तक की गिनती सुनाएगा, वही राजकुमारी का पति बनेगा। गिनती ऐसी होनी चाहिए जिसमें सारा संसार समा जाए। जो यह गिनती नहीं सुना सकेगा, उसे 20 कोड़े खाने पड़ेंगे। यह शर्त केवल राजाओं के लिए ही थी।

अब एक तरफ राजकुमारी का वरण और दूसरी तरफ कोड़े! एक-एक करके राजा-महाराजा आए। राजा ने दावत का आयोजन भी किया। मिठाई और विभिन्न पकवान तैयार किए गए। पहले सभी दावत का आनंद लेते हैं, फिर सभा में राजकुमारी का स्वयंवर शुरू होता है।

एक से बढ़कर एक राजा-महाराजा आते हैं। सभी गिनती सुनाते हैं, जो उन्होंने पढ़ी हुई थी, लेकिन कोई भी ऐसी गिनती नहीं सुना पाया जिससे राजकुमारी संतुष्ट हो सके।

अब जो भी आता, कोड़े खाकर चला जाता। कुछ राजा तो आगे ही नहीं आए। उनका कहना था कि गिनती तो गिनती होती है, राजकुमारी पागल हो गई है। यह केवल हम सबको पिटवा कर मज़े लूट रही है।

यह सब नज़ारा देखकर एक हलवाई हंसने लगा। वह कहता है, “डूब मरो राजाओं, आप सबको 20 तक की गिनती नहीं आती!”

यह सुनकर सभी राजा उसे दंड देने के लिए कहने लगे। राजा ने उससे पूछा, “क्या तुम गिनती जानते हो? यदि जानते हो तो सुनाओ।”

हलवाई कहता है, “हे राजन, यदि मैंने गिनती सुनाई तो क्या राजकुमारी मुझसे शादी करेगी? क्योंकि मैं आपके बराबर नहीं हूँ, और यह स्वयंवर भी केवल राजाओं के लिए है। तो गिनती सुनाने से मुझे क्या फायदा?”

पास खड़ी राजकुमारी बोलती है, “ठीक है, यदि तुम गिनती सुना सको तो मैं तुमसे शादी करूँगी। और यदि नहीं सुना सके तो तुम्हें मृत्युदंड दिया जाएगा।”

सब देख रहे थे कि आज तो हलवाई की मौत तय है। हलवाई को गिनती बोलने के लिए कहा गया।

राजा की आज्ञा लेकर हलवाई ने गिनती शुरू की:

“एक भगवान,

दो पक्ष,

तीन लोक,

चार युग,

पांच पांडव,

छह शास्त्र,

सात वार,

आठ खंड,

नौ ग्रह,

दस दिशा,

ग्यारह रुद्र,

बारह महीने,

तेरह रत्न,

चौदह विद्या,

पन्द्रह तिथि,

सोलह श्राद्ध,

सत्रह वनस्पति,

अठारह पुराण,

उन्नीसवीं तुम और

बीसवां मैं…”

सब लोग हक्के-बक्के रह गए। राजकुमारी हलवाई से शादी कर लेती है! इस गिनती में संसार की सारी वस्तुएं मौजूद हैं। यहाँ शिक्षा से बड़ा तजुर्बा है। 🙏🏻🙏🏻

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गोडसे


सावरकर टाइम्स

पं नाथूराम गोडसे का ऐसा योगी रूप देखकर जेल अधिकारी भी रह गए थे दंग .
August 13, 2019 • आचार्य मदन, अध्यक्ष-विश्व हिन्दू पीठ

गोडसे ने अम्बाला जेल को बना दिया था हिन्दू राष्ट्र मंदिर का सत्संग भवन

फांसी पर चढ़ने से एक दिन पहले सरकार ने गोडसे और नाना आप्टे के कुछ परिजनों को अम्बाला जेल में मिलने की अनुमति दे दी. सरकार ने हिन्दू सभा व संघ से जुड़े किसी भी व्यक्ति को जेल में मिलने पर प्रतिबन्ध लगा दिया. गोरक्ष पीठाधीश्वर महंत दिग्विजय नाथ, वीर सावरकर व सावरकर टाइम्स के संपादक जंग बहादुर क्षत्रिय के पिताश्री हिन्दुसभाई नेता श्री चमनलाल क्षत्रिय व कुरान की 24 आयतों पर मुकदमा जीतने वाले पंडित इन्द्रसेन शर्मा को भी पंडित नाथूराम गोडसे से जेल में मिलने से रोक लगा दी गई | नेहरु को भय था कि कहीं महाराष्ट्र के हिन्दू क्रन्तिकारी गोडसे व उनके सहयोगियों को जेल से मुक्त ना करा ले, इसके लिए शासन ने काफी चौकसी की हुई थी.

      अंतिम दर्शनों के लिए 14 नवम्बर की सुबह 10 बजे लगभग 35 के करीब लोग जेल में पहुंचे. सबकी अच्छी तरह तलाशी लेकर ही जेल अधिकारीयों ने उनको प्रवेश कराया. प्रवेश द्वार के पास एक कक्ष में ले जाकर पुनः  उनके नाम पते आदि की जाँच कर  अलग-अलग 7-8 के ग्रुप में भीतर भेजने की व्यवस्था रखी. मिलने वालों में नाना आप्टे की पत्नी चम्पूताई भी थी.
    सभी परिजन अपने साथ फल, पूरन पोली मिष्ठान भी लाए थे. सभी प्रकार के खाने के समान की भली भांति जांच जेल अधिकारीयों ने कर ली थी. पूरन पोली – चने की दाल, गुड व आटे के मिश्रण  तैयार किया जाता है. हर मंगल प्रसंग पुरण पोली के बिना अधुरा हैं- ऐसा भाव मानते हुए कि देश की रक्षार्थ गोडसे का बलिदान देश भक्ति के साथ एक मंगल कार्य भी है. 
   कड़े सुरक्षा प्रहरी और ऊँची प्राचीरों से घिरे कारागार के आंगन के बीच से चलते हुए, फांसी घर के पास स्थित काल कोठरी तक परिजनों का एक समूह पहुंचा. उस समय कोठरी के बाहर दीवार के साथ लगे एक तख़्त पर पंडित गोडसे आसन लगा कर ध्यानस्थ मग्न बैठे थे. पास में ही कई पुस्तकों का संग्रह भी रखा हुआ था. सरदार पटेल ने नाना आप्टे व पं गोडसे को ‘बी’ श्रेणी का कैदी का दर्जा दिया हुआ था, इस कारण उनके अध्ययन व लेखन की सारी व्यवस्था थी.

कारागार में बंद आजीवन सजा भोग रहे गोपाल गोडसे, विष्णु करकरे और मदनलाल पाहवा भी उस दिन अपने दैनिक श्रम को छोड़ कर भेंट करने वालों के साथी काल कोठरी के पास जमीन पर बैठ गए. मिलने वाले सम्बन्धी गण भी पंडित जी के सामने नीचे जमीन पर बैठ गए. और पंडित जी के उठने की प्रतीक्षा करने लगे. थोड़ी देर में पंडित जी आँख खोली, अपने परिजनों को देखकर मुस्कराए. सभी का भावाभिभूत होना स्वाभाविक था, उठकर सभी से यथा योग्य आदर सत्कार से मिले. फिर, वहां उपस्थित संबंधियों को संबोधित करते हुए पंडित नाथूराम गोडसे ने कहा, ” मैं शाण्डिल्य गोत्रीय,जो चितपावन ब्राह्मण कुल में जन्मा हूँ, आप सभी का इस पावन कारागार मंदिर में आपका स्वागत करता हूँ, यह हमारी अंतिम भेंट हैं, चूँकि जीवन यात्रा में अब थोड़ा सा समय बचा है, अतः राष्ट्र-धर्म की चर्चा करें.”
पंडित जी गोडसे व आप्टे ने अपने संबंधियों नातेदारों से परिवार की कुशल क्षेम पुछा, इसके बाद उन सबमें हिन्दू राष्ट्र व सनातन धर्म व देश की स्थिति पर भी गंभीरता से चर्चाएँ होने लगी. पंडित जी बहुत ही संतुलित वाणी से और अत्यंत सहजता से वार्तालाप कर रहे थे.

भेंट करने वालों ने एक ने अपनी यात्रा का अनुभव बताया कि दिल्ली से अम्बाला आते समय रेल में बहुत भीड़ थी, एक भी सीट खाली नहीं थी,  चूँकि समय नहीं बचा था, रात का समय था इसलिए भी ट्रेन छोड़ नहीं सकते थे, सबने खड़े-खड़े ही आना स्वीकार किया. थोड़ी देर बाद हमारी वेश भूषा को देखकर जब किसी यात्री ने पूछा की – कहाँ जा रहे हैं आप लोग ? इस पर मैंने कहा कि-” हम अम्बाला जेल में गाँधी-वध करने वाले पंडित नाथूराम गोडसे से मिलने जा रहे हैं- इतना सुनते ही वहां मोजूद लोंगों में अजब सा उत्साह फैल गया. उसके बाद विभाजन के बाद से पंजाब में हो रही हिन्दूओं की हत्याओं व लूटपाट की चर्चाएँ जोर-शोर से होने लगी, गाँधी-वध को सभी सही व उचित कदम मान रहे थे”
मार-काट, हिन्दू  जैसे शब्दों को सुनकर आसपास तैनात जेल की काल पुलिस वाले भी भेंट करने वालों के निकट आकर खड़े हो गए. इतने एक बुजुर्ग सम्बन्धी ने गोडसे से कहा, ” जबसे महराष्ट्र से यहाँ तक आते हुए मैंने अनेक लोगों से आपसे अंतिम दर्शन मिलने की बात बताई तो सभी का मानना था कि गाँधी को गोडसे नहीं, बल्कि पाकिस्तान से निर्वासित लुटे हुए बेघर हिन्दुओं के श्राप ने मारा है, गोडसे तो केवल गोली चलाई “.

पंडित जी आँख बंद कर मौन होकर यह सब सुन रहे थे. इतने दुसरे समूह में कुछ लोग फांसी घर के सामने बरामदे से कालकोठरी के सामने आ पहुंचे. परिजनों से मिलने के लिए गोडसे व आप्टे को काल कोठरी की ताले खोल दिए गए थे. जेल के पहरेदारों का विशेष प्रहरा था. जो लोग पहले आए हुए थे, वे जमीन पर ही बैठे हुए थे, उठना नहीं चाहते. वहा उपस्थित जेल अधिकारी ने कुछ सोचकर उनसे उठने को नहीं कहा और चला गया.
  गाँधी-वध के यह सभी जेल की फाईलों में क्रूर कर्मी के रूप में दर्ज थे, परन्तु पंडित नाथूराम गोडसे के राष्ट्रवादी विचारों से और गीता के आध्यात्मिक ज्ञान से वहां के सभी अधिकारी वर्ग व अन्य पुलिस कर्मी सभी बहुत प्रभावित थे. शिमला उच्च न्यायालय में पंडित जी के लिए जिस प्रकार वहां का बुद्धिजीवी साम्भ्रांत वर्ग  उनके व्यक्तव्यों को सुनने आता था. महिलाऐं अपने हाथ से बुने हुए स्वेटर बुनकर पंडित जो पहनने के लिए आग्रह करती थी, उससे पंडित जी ने सभी का ध्यान खिंचा. शासन की ड्यूटी करना उनकी मजबूरी थी, फिर वे गोडसे व उनके साथियों के साथ बहुत विनम्र व्यवहार करते थे.

इसका एक अन्य कारण यह भी रहा कि जेल प्रशासन में अधिकांश सुरक्षाकर्मियों के परिवार की भी कहीं न कहीं इस विभाजन में हानि हुई थी. पाकिस्तान बन जाने के बाद जो मार-काट हुई, उसमें अचल संपत्ति तो नष्ट हुई थी. किसी के माता-पिता मारे गए, किसी की माँ-बहन का अपहरण हुआ था,उनकी इज्जत तार-तार हुई, और ना जाने कितने ही मुस्लिम समुदाय के द्वारा लूट-खसोट के बाद किसी तरह जीवित बचकर भारत पंहुचा था. देश विभाजन के कारण हिन्दुओं की दुर्दशा के समाचार और आँखों देखा हाल सबके सामने था, इसलिए जेल के पुलिस अधिकारी भारत शासन की नौकरी करते हुए भी जो कुछ उनसे बन पड़ा, मराठा वीरों को हर संभव सुविधाएं प्रदत्त कराई.
    मिलने वालों को ऐसा बिलकुल नहीं लग रहा था कि  गोडसे को किसी प्रकार भी फांसी लगने का कोई दुःख है, वे मृत्यु से बिलकुल भी भयभीत नहीं थे, अपितु, वे एक योगी की भांति शान्त गंभीर चित्त होकर वह सबकी बात सुन रहे थे, और अपनी बातों को बहुत अर्थपूर्ण ढंग से कह रहे थे.
     भेंटकर्ताओं की बातों में भी सार यही था कि – देश में गोडसे की देश भक्ति को सराहा जा रहा है और  कांग्रेस के प्रति एक धिक्कार की भावना समाप्त नही हो रही. चर्चा करते हुए काफी समय बीतने पर नाना आप्टे को लगा कि परिजनों को कुछ खाने को दिया जाए, इसलिए उन्होंने उन्हीं  फलों को ग्रहण करने का उनसे निवेदन किया, परन्तु किसी ने कुछ भी ग्रहण नहीं किया, ये सब वे गोडसे व उनके सहयोगी क्रांतिकारियों की सेवा के लिए लाए थे.
  सभी के मन में पंडित गोडसे की फांसी को लेकर बहुत क्षोभ था, परन्तु वे कर ही क्या सकते थे ? जब शासन मुस्लिम परस्त सेकुलर नेताओं के चुंगल में था. फिर वहां किसी मिलने वाले ने बताया कि, ” जैसे ही हम अम्बाला स्टेशन पहुंचे, तो पंजाब के हिन्दू भाईयों ने हमसे ठहरने के लिए पूछा – आप लोगों के रुकने की क्या व्यवस्था है ? हमने उन्हें बताया कि  फलां धर्मशाला में हमें जाना है, तो उन भाईयों ने हमें कई तांगे करा दिया, जिससे हम सीधे धर्मशाला पहुँच गए. जब हम सब तांगे से उतरे तो वे सब तांगे वाले कहने लगा कि आप लोग प्राण संकट में डाल कर महान देशभक्त पंडित गोडसे के दर्शन करने यहाँ आए हो, हम आपसे एक रुपया नहीं लेंगे. यह तो हमारा सौभाग्य है, जो आप मराठा वीरों के दर्शन हो गए”. कहते कहते हुए उस व्यक्ति के आँखों में एक गर्व की झलक आ गई.

भेंटकर्ता की बातों को पंडित गोडसे जी बड़े धीर ह्रदय से सुनते रहे, वे मन ही मन हिन्दू जनमानस में उमड़ रहे विद्रोह व राष्ट्र की आगामी समस्याओं व चिंताओं पर भी विचार कर रहे थे. पंडितजी ने उन्हें समझाते हुए कहा,”अपने कर्तव्य कर्म को ही करते रहना चाहिए, चाहे इसमें कितना ही कष्ट क्यों ना हो, चाहे इस काम को करते हुए हमें सम्मान ना मिले, किन्तु जो हमारे गुणों और स्वभाव से अलग काम है, चाहे उस काम को करने में बहुत लाभ हो, तो भी नहीं करना चाहिए. हमारी अंतरात्मा ही हमारे स्वभाव व गुणों के अनुसार हमें किसी काम को करने के लिए प्रेरित करती है, वही करो जो अन्दर से भाव आ रहा है”,
फिर इस उपदेश को अपने राजनीतिक धर्म से जोड़ते हुए पंडित जी ने कहा,  “मैंने भी गाँधी वध अपनी भीतरी आवाज को सुनकर किया. मेरा स्वभाव देश भक्ति है, राष्ट्र के लिए ही मेरा धर्म है, राष्ट्र सेवा ही मेरा गुण है. उसी गुणों के वशीभूत होकर मैंने क्षात्र धर्म निभाया. देश की पुनः अखंडता के लिए अनेक हिन्दू वीरों को बलिदान के लिए तैयार रहना होगा, ऐसा नियति का संकेत है.”

कारावास की अवधि में भी नित्य प्रतिदिन पं नाथूराम गोडसे निरंतर गीता का स्वाध्याय करते थे. गीता के ज्ञान व कृष्ण के प्रति अगाध श्रद्धा से उनका जीवन योगमय हो गया था. बाल्यकाल से ही नाथूराम की स्मरण शक्ति बहुत ही तीव्र थी. मनुस्मृति, रामायण, महाभारत के अनेक श्लोक उन्हें कंठस्थ थे. आध्यात्मिक साधना में उनकी रूचि के कारण उनमें एक विशेष दैवीय गुण प्रकट होने लगा. पूजा करते समय वे लोगों के प्रश्नों का उत्तर देने लगे, वे बातें सच साबित होती रही तो परिवार और अन्य सम्बन्धियों में यह विश्वास और अधिक होगा गया कि नाथूराम कोई साधारण बालक नहीं है. आगे चलकर नाथूराम के राष्ट्रचिंतन व धर्म ज्ञान से प्रसन्न होकर वीर सावरकर ने उन्हें पंडित जी की उपाधि प्रदान की.
    अंतिम भेंट के लिए आए परिजनों और मित्रों से बहुत शान्त चित्त होकर भेंट कर रहे थे. मृत्यु से एक दिन पूर्व भी पंडित गोडसे की आँखों में एक अद्भुत तेज चमक रहा था. उनकी वाणी में योगी की गंभीरता झलक रही थी. कारागृह के पहरेदारों भी दृश्य देखकर भाव विभोर होने लगे. पंडित जी गीता के दुसरे, ग्यारहवें व अठारहवें अध्याय को सबसे अधिक महत्व देते थे. शाम को अपने साथ जेल में बंद साथियों के साथ कर्म व अनासक्त कर्म पर चर्चा करते थे. महाभारत के पात्रों को आधुनिक सन्दर्भ में जोड़ते हुए उनके उपदेशों में गीता की अनुपम व्याख्या प्रस्तुत होती थी.
    इस प्रकार बातचीत एक सत्संग की भांति चल रही थी. पंडित जी ने कहा, “गीता के ग्यारहवें अध्याय में भगवान वासुदेव ने अर्जुन को अपने दिव्य विराट रूप दिखाया, जैसे विराट के मुख में दुर्योधन, कर्ण सहित सम्पूर्ण कौरव सेना काल का ग्रास बन रही है, ठीक वैसे ही काल पहले गांधी और अनेक हिन्दू राष्ट्र धर्म द्रोहियों को पहले ही मृत्युदंड दे चूका है, ऐसा मुझे ध्यान में दिखाया दिया. मैंने अर्जुन की भांति अपने कर्तव्य का पालन किया और शस्त्र प्रयोग कर गाँधी को यमलोक पहुंचाया “.
    अपने सहयोगी वीरों के साथ इसी तरह के रहस्यपूर्ण व्याख्यान नित्य ही कारावास में करते थे. पंडित जी के छोटे भाई गोपाल गोडसे को यह विश्वास पहले से ही था कि नाथूराम में बचपन से ही कोई दैवीय शक्ति रही है, परन्तु अब गोडसे के मुख से निकलने वाली शौर्य युक्त दिव्य वचनों के प्रभाव से सभी साथियों का भी विश्वास और दृढ होता जा रहा था. जेल के अधिकांश पुलिस अधिकारी गोडसे के ह्रदय से आदर करते थे, क्योंकि वे जानते थे कि गोडसे द्वारा गाँधी वध के पीछे केवल एक ही भावना थी, भारत की पूर्ण स्वतंत्रता.
सम्बन्धियों से घीरे पंडित जी के मुख से निरंतर जो शब्द निकल रहे थे, उनमें एक अलौकिकता झलक रही थी, भक्त ध्रुव का उदहारण देते हुए उन्होंने कहा, ” जिस प्रकार ध्रुव के भीतर अमरता और स्थिर जीवन की भावना जागृत हो गई थी, और किसी भी प्रकार के प्रलोभन के समक्ष उसने अपने स्वाभिमान को झुकने नहीं दिया, ठीक उसी प्रकार हम भी एक स्थिर व स्वतंत्र राष्ट्र चाहते हैं. हमारा भी स्वाभिमान जाग चूका है. ध्रुव ने तप किया, हमने भी तप करना प्रारम्भ किया. क्रूर विदेशी शासक ने कितने ही अत्याचार किये, प्रलोभन दिए, किन्तु पूर्ण स्वराज्य से कम हमने कभी नही स्वीकारा, और यही उद्देश्य अंतिम श्वास तक रहेगा- अखंड भारत की पूर्ण स्वतंत्रता. हमें ध्रुव के सामान अपने लक्ष्य पर स्थिर रहना होगा, तभी करोडो हिन्दुओं का यह स्वप्न साकार होगा.”
  भेंट करने वालों  के ह्रदय में गाँधी-वध के बाद पुनर्जीवित हुई राष्ट्रवाद की जो भावना थी, उसके कारण वे पंडित जी के दर्शन और प्रत्यक्ष साक्षात्कार करके स्वयं को धन्य महसूस कर रहे थे. पंडित जी  की वाणी व हाव भाव में मृत्यु का कहीं भी भय नहीं था, न ही कोई शोक  था. भेंट कर्ताओं के साथ बातचीत के दौरान पंडित जी आत्मा की दिव्यता, अमरता व अनासक्त कर्म से सम्बंधित श्लोक सुना कर सबको मन्त्रमुग्ध करने लगे. इस प्रकार का यह अद्भुत सत्संग शाम 5 बजे तक चलता रहा. पंडित जी अपने ज्ञान से सबको हर्षित व मन्त्र मुग्ध कर रहे थे, तुकाराम की वाणी स्पंदन उनके व्याख्यान में महसूस हो रहा था.
    ड्यूटी पर तैनात अधिकारीयों ने हमेशा लोगों के साथ ऐसे साक्षात्कारों में  मृत्युदंड के भय के कारण रोदन- क्रंदन ही देखा था. पंडित गोडसे की योग शक्ति से यह भेंटवार्ता एक सत्संग में परिवर्तित हो गई थी.
नाना आप्टे ने अपनी पत्नी चम्पूताई से आधा घंटे बातें की. दोनों ही बड़े संयम से एक दुसरे से मिले. सूर्यास्त का समय होने लगा, अब बिछड़ते समय मिलने वाले सभी आँखों में एक विचित्र सी खामोशी थी. राष्ट्र व धर्म चिंतन करते हुए समय का पता ही नही चला. अब जेल अधिकारीयों का इशारा हो गया था कि मिलने का समय समाप्त हो चूका है. भरे हुए ह्रदय से सभी परिजन लौटने लगे. जाते हुए किसी ने पंडित गोडसे को गले लगाया, किसी ने उनके चरण रज को माथे लगाया.
   गोडसे से मिलने  वालों इन मराठा वीरों का अम्बाला में बहुत ही सम्मान हुआ. एक भोजनालय के मालिक जब पता चला कि महाराष्ट्र से लोग का यह समूह गोडसे से मिलने आया है, तो उसने बिना मूल्य लिए सबको भोजन कराया. जब तक ये लोग अम्बाला में रहे स्थानीय लोगों ने अपनी ओर से भोजन की व्यवस्था की. जब वे लोग वापस स्टेशन में हिन्दुओं की भारी भीड़, विदाई के लिए एकत्रित हो गए, अनेक के हाथों में भगवा ध्वज था, कईयों ने केसरिया पगड़ी पहने हुई थी, और पूरा स्टेशन ‘अखंड भारत की जय’ , ‘वीर गोडसे अमर रहे’ के नारों से गुंजायमान हो रहा था.

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गोडसे


सावरकर टाइम्स

पं नाथूराम गोडसे का ऐसा योगी रूप देखकर जेल अधिकारी भी रह गए थे दंग .
August 13, 2019 • आचार्य मदन, अध्यक्ष-विश्व हिन्दू पीठ

गोडसे ने अम्बाला जेल को बना दिया था हिन्दू राष्ट्र मंदिर का सत्संग भवन

फांसी पर चढ़ने से एक दिन पहले सरकार ने गोडसे और नाना आप्टे के कुछ परिजनों को अम्बाला जेल में मिलने की अनुमति दे दी. सरकार ने हिन्दू सभा व संघ से जुड़े किसी भी व्यक्ति को जेल में मिलने पर प्रतिबन्ध लगा दिया. गोरक्ष पीठाधीश्वर महंत दिग्विजय नाथ, वीर सावरकर व सावरकर टाइम्स के संपादक जंग बहादुर क्षत्रिय के पिताश्री हिन्दुसभाई नेता श्री चमनलाल क्षत्रिय व कुरान की 24 आयतों पर मुकदमा जीतने वाले पंडित इन्द्रसेन शर्मा को भी पंडित नाथूराम गोडसे से जेल में मिलने से रोक लगा दी गई | नेहरु को भय था कि कहीं महाराष्ट्र के हिन्दू क्रन्तिकारी गोडसे व उनके सहयोगियों को जेल से मुक्त ना करा ले, इसके लिए शासन ने काफी चौकसी की हुई थी.

      अंतिम दर्शनों के लिए 14 नवम्बर की सुबह 10 बजे लगभग 35 के करीब लोग जेल में पहुंचे. सबकी अच्छी तरह तलाशी लेकर ही जेल अधिकारीयों ने उनको प्रवेश कराया. प्रवेश द्वार के पास एक कक्ष में ले जाकर पुनः  उनके नाम पते आदि की जाँच कर  अलग-अलग 7-8 के ग्रुप में भीतर भेजने की व्यवस्था रखी. मिलने वालों में नाना आप्टे की पत्नी चम्पूताई भी थी.
    सभी परिजन अपने साथ फल, पूरन पोली मिष्ठान भी लाए थे. सभी प्रकार के खाने के समान की भली भांति जांच जेल अधिकारीयों ने कर ली थी. पूरन पोली – चने की दाल, गुड व आटे के मिश्रण  तैयार किया जाता है. हर मंगल प्रसंग पुरण पोली के बिना अधुरा हैं- ऐसा भाव मानते हुए कि देश की रक्षार्थ गोडसे का बलिदान देश भक्ति के साथ एक मंगल कार्य भी है. 
   कड़े सुरक्षा प्रहरी और ऊँची प्राचीरों से घिरे कारागार के आंगन के बीच से चलते हुए, फांसी घर के पास स्थित काल कोठरी तक परिजनों का एक समूह पहुंचा. उस समय कोठरी के बाहर दीवार के साथ लगे एक तख़्त पर पंडित गोडसे आसन लगा कर ध्यानस्थ मग्न बैठे थे. पास में ही कई पुस्तकों का संग्रह भी रखा हुआ था. सरदार पटेल ने नाना आप्टे व पं गोडसे को ‘बी’ श्रेणी का कैदी का दर्जा दिया हुआ था, इस कारण उनके अध्ययन व लेखन की सारी व्यवस्था थी.

कारागार में बंद आजीवन सजा भोग रहे गोपाल गोडसे, विष्णु करकरे और मदनलाल पाहवा भी उस दिन अपने दैनिक श्रम को छोड़ कर भेंट करने वालों के साथी काल कोठरी के पास जमीन पर बैठ गए. मिलने वाले सम्बन्धी गण भी पंडित जी के सामने नीचे जमीन पर बैठ गए. और पंडित जी के उठने की प्रतीक्षा करने लगे. थोड़ी देर में पंडित जी आँख खोली, अपने परिजनों को देखकर मुस्कराए. सभी का भावाभिभूत होना स्वाभाविक था, उठकर सभी से यथा योग्य आदर सत्कार से मिले. फिर, वहां उपस्थित संबंधियों को संबोधित करते हुए पंडित नाथूराम गोडसे ने कहा, ” मैं शाण्डिल्य गोत्रीय,जो चितपावन ब्राह्मण कुल में जन्मा हूँ, आप सभी का इस पावन कारागार मंदिर में आपका स्वागत करता हूँ, यह हमारी अंतिम भेंट हैं, चूँकि जीवन यात्रा में अब थोड़ा सा समय बचा है, अतः राष्ट्र-धर्म की चर्चा करें.”
पंडित जी गोडसे व आप्टे ने अपने संबंधियों नातेदारों से परिवार की कुशल क्षेम पुछा, इसके बाद उन सबमें हिन्दू राष्ट्र व सनातन धर्म व देश की स्थिति पर भी गंभीरता से चर्चाएँ होने लगी. पंडित जी बहुत ही संतुलित वाणी से और अत्यंत सहजता से वार्तालाप कर रहे थे.

भेंट करने वालों ने एक ने अपनी यात्रा का अनुभव बताया कि दिल्ली से अम्बाला आते समय रेल में बहुत भीड़ थी, एक भी सीट खाली नहीं थी,  चूँकि समय नहीं बचा था, रात का समय था इसलिए भी ट्रेन छोड़ नहीं सकते थे, सबने खड़े-खड़े ही आना स्वीकार किया. थोड़ी देर बाद हमारी वेश भूषा को देखकर जब किसी यात्री ने पूछा की – कहाँ जा रहे हैं आप लोग ? इस पर मैंने कहा कि-” हम अम्बाला जेल में गाँधी-वध करने वाले पंडित नाथूराम गोडसे से मिलने जा रहे हैं- इतना सुनते ही वहां मोजूद लोंगों में अजब सा उत्साह फैल गया. उसके बाद विभाजन के बाद से पंजाब में हो रही हिन्दूओं की हत्याओं व लूटपाट की चर्चाएँ जोर-शोर से होने लगी, गाँधी-वध को सभी सही व उचित कदम मान रहे थे”
मार-काट, हिन्दू  जैसे शब्दों को सुनकर आसपास तैनात जेल की काल पुलिस वाले भी भेंट करने वालों के निकट आकर खड़े हो गए. इतने एक बुजुर्ग सम्बन्धी ने गोडसे से कहा, ” जबसे महराष्ट्र से यहाँ तक आते हुए मैंने अनेक लोगों से आपसे अंतिम दर्शन मिलने की बात बताई तो सभी का मानना था कि गाँधी को गोडसे नहीं, बल्कि पाकिस्तान से निर्वासित लुटे हुए बेघर हिन्दुओं के श्राप ने मारा है, गोडसे तो केवल गोली चलाई “.

पंडित जी आँख बंद कर मौन होकर यह सब सुन रहे थे. इतने दुसरे समूह में कुछ लोग फांसी घर के सामने बरामदे से कालकोठरी के सामने आ पहुंचे. परिजनों से मिलने के लिए गोडसे व आप्टे को काल कोठरी की ताले खोल दिए गए थे. जेल के पहरेदारों का विशेष प्रहरा था. जो लोग पहले आए हुए थे, वे जमीन पर ही बैठे हुए थे, उठना नहीं चाहते. वहा उपस्थित जेल अधिकारी ने कुछ सोचकर उनसे उठने को नहीं कहा और चला गया.
  गाँधी-वध के यह सभी जेल की फाईलों में क्रूर कर्मी के रूप में दर्ज थे, परन्तु पंडित नाथूराम गोडसे के राष्ट्रवादी विचारों से और गीता के आध्यात्मिक ज्ञान से वहां के सभी अधिकारी वर्ग व अन्य पुलिस कर्मी सभी बहुत प्रभावित थे. शिमला उच्च न्यायालय में पंडित जी के लिए जिस प्रकार वहां का बुद्धिजीवी साम्भ्रांत वर्ग  उनके व्यक्तव्यों को सुनने आता था. महिलाऐं अपने हाथ से बुने हुए स्वेटर बुनकर पंडित जो पहनने के लिए आग्रह करती थी, उससे पंडित जी ने सभी का ध्यान खिंचा. शासन की ड्यूटी करना उनकी मजबूरी थी, फिर वे गोडसे व उनके साथियों के साथ बहुत विनम्र व्यवहार करते थे.

इसका एक अन्य कारण यह भी रहा कि जेल प्रशासन में अधिकांश सुरक्षाकर्मियों के परिवार की भी कहीं न कहीं इस विभाजन में हानि हुई थी. पाकिस्तान बन जाने के बाद जो मार-काट हुई, उसमें अचल संपत्ति तो नष्ट हुई थी. किसी के माता-पिता मारे गए, किसी की माँ-बहन का अपहरण हुआ था,उनकी इज्जत तार-तार हुई, और ना जाने कितने ही मुस्लिम समुदाय के द्वारा लूट-खसोट के बाद किसी तरह जीवित बचकर भारत पंहुचा था. देश विभाजन के कारण हिन्दुओं की दुर्दशा के समाचार और आँखों देखा हाल सबके सामने था, इसलिए जेल के पुलिस अधिकारी भारत शासन की नौकरी करते हुए भी जो कुछ उनसे बन पड़ा, मराठा वीरों को हर संभव सुविधाएं प्रदत्त कराई.
    मिलने वालों को ऐसा बिलकुल नहीं लग रहा था कि  गोडसे को किसी प्रकार भी फांसी लगने का कोई दुःख है, वे मृत्यु से बिलकुल भी भयभीत नहीं थे, अपितु, वे एक योगी की भांति शान्त गंभीर चित्त होकर वह सबकी बात सुन रहे थे, और अपनी बातों को बहुत अर्थपूर्ण ढंग से कह रहे थे.
     भेंटकर्ताओं की बातों में भी सार यही था कि – देश में गोडसे की देश भक्ति को सराहा जा रहा है और  कांग्रेस के प्रति एक धिक्कार की भावना समाप्त नही हो रही. चर्चा करते हुए काफी समय बीतने पर नाना आप्टे को लगा कि परिजनों को कुछ खाने को दिया जाए, इसलिए उन्होंने उन्हीं  फलों को ग्रहण करने का उनसे निवेदन किया, परन्तु किसी ने कुछ भी ग्रहण नहीं किया, ये सब वे गोडसे व उनके सहयोगी क्रांतिकारियों की सेवा के लिए लाए थे.
  सभी के मन में पंडित गोडसे की फांसी को लेकर बहुत क्षोभ था, परन्तु वे कर ही क्या सकते थे ? जब शासन मुस्लिम परस्त सेकुलर नेताओं के चुंगल में था. फिर वहां किसी मिलने वाले ने बताया कि, ” जैसे ही हम अम्बाला स्टेशन पहुंचे, तो पंजाब के हिन्दू भाईयों ने हमसे ठहरने के लिए पूछा – आप लोगों के रुकने की क्या व्यवस्था है ? हमने उन्हें बताया कि  फलां धर्मशाला में हमें जाना है, तो उन भाईयों ने हमें कई तांगे करा दिया, जिससे हम सीधे धर्मशाला पहुँच गए. जब हम सब तांगे से उतरे तो वे सब तांगे वाले कहने लगा कि आप लोग प्राण संकट में डाल कर महान देशभक्त पंडित गोडसे के दर्शन करने यहाँ आए हो, हम आपसे एक रुपया नहीं लेंगे. यह तो हमारा सौभाग्य है, जो आप मराठा वीरों के दर्शन हो गए”. कहते कहते हुए उस व्यक्ति के आँखों में एक गर्व की झलक आ गई.

भेंटकर्ता की बातों को पंडित गोडसे जी बड़े धीर ह्रदय से सुनते रहे, वे मन ही मन हिन्दू जनमानस में उमड़ रहे विद्रोह व राष्ट्र की आगामी समस्याओं व चिंताओं पर भी विचार कर रहे थे. पंडितजी ने उन्हें समझाते हुए कहा,”अपने कर्तव्य कर्म को ही करते रहना चाहिए, चाहे इसमें कितना ही कष्ट क्यों ना हो, चाहे इस काम को करते हुए हमें सम्मान ना मिले, किन्तु जो हमारे गुणों और स्वभाव से अलग काम है, चाहे उस काम को करने में बहुत लाभ हो, तो भी नहीं करना चाहिए. हमारी अंतरात्मा ही हमारे स्वभाव व गुणों के अनुसार हमें किसी काम को करने के लिए प्रेरित करती है, वही करो जो अन्दर से भाव आ रहा है”,
फिर इस उपदेश को अपने राजनीतिक धर्म से जोड़ते हुए पंडित जी ने कहा,  “मैंने भी गाँधी वध अपनी भीतरी आवाज को सुनकर किया. मेरा स्वभाव देश भक्ति है, राष्ट्र के लिए ही मेरा धर्म है, राष्ट्र सेवा ही मेरा गुण है. उसी गुणों के वशीभूत होकर मैंने क्षात्र धर्म निभाया. देश की पुनः अखंडता के लिए अनेक हिन्दू वीरों को बलिदान के लिए तैयार रहना होगा, ऐसा नियति का संकेत है.”

कारावास की अवधि में भी नित्य प्रतिदिन पं नाथूराम गोडसे निरंतर गीता का स्वाध्याय करते थे. गीता के ज्ञान व कृष्ण के प्रति अगाध श्रद्धा से उनका जीवन योगमय हो गया था. बाल्यकाल से ही नाथूराम की स्मरण शक्ति बहुत ही तीव्र थी. मनुस्मृति, रामायण, महाभारत के अनेक श्लोक उन्हें कंठस्थ थे. आध्यात्मिक साधना में उनकी रूचि के कारण उनमें एक विशेष दैवीय गुण प्रकट होने लगा. पूजा करते समय वे लोगों के प्रश्नों का उत्तर देने लगे, वे बातें सच साबित होती रही तो परिवार और अन्य सम्बन्धियों में यह विश्वास और अधिक होगा गया कि नाथूराम कोई साधारण बालक नहीं है. आगे चलकर नाथूराम के राष्ट्रचिंतन व धर्म ज्ञान से प्रसन्न होकर वीर सावरकर ने उन्हें पंडित जी की उपाधि प्रदान की.
    अंतिम भेंट के लिए आए परिजनों और मित्रों से बहुत शान्त चित्त होकर भेंट कर रहे थे. मृत्यु से एक दिन पूर्व भी पंडित गोडसे की आँखों में एक अद्भुत तेज चमक रहा था. उनकी वाणी में योगी की गंभीरता झलक रही थी. कारागृह के पहरेदारों भी दृश्य देखकर भाव विभोर होने लगे. पंडित जी गीता के दुसरे, ग्यारहवें व अठारहवें अध्याय को सबसे अधिक महत्व देते थे. शाम को अपने साथ जेल में बंद साथियों के साथ कर्म व अनासक्त कर्म पर चर्चा करते थे. महाभारत के पात्रों को आधुनिक सन्दर्भ में जोड़ते हुए उनके उपदेशों में गीता की अनुपम व्याख्या प्रस्तुत होती थी.
    इस प्रकार बातचीत एक सत्संग की भांति चल रही थी. पंडित जी ने कहा, “गीता के ग्यारहवें अध्याय में भगवान वासुदेव ने अर्जुन को अपने दिव्य विराट रूप दिखाया, जैसे विराट के मुख में दुर्योधन, कर्ण सहित सम्पूर्ण कौरव सेना काल का ग्रास बन रही है, ठीक वैसे ही काल पहले गांधी और अनेक हिन्दू राष्ट्र धर्म द्रोहियों को पहले ही मृत्युदंड दे चूका है, ऐसा मुझे ध्यान में दिखाया दिया. मैंने अर्जुन की भांति अपने कर्तव्य का पालन किया और शस्त्र प्रयोग कर गाँधी को यमलोक पहुंचाया “.
    अपने सहयोगी वीरों के साथ इसी तरह के रहस्यपूर्ण व्याख्यान नित्य ही कारावास में करते थे. पंडित जी के छोटे भाई गोपाल गोडसे को यह विश्वास पहले से ही था कि नाथूराम में बचपन से ही कोई दैवीय शक्ति रही है, परन्तु अब गोडसे के मुख से निकलने वाली शौर्य युक्त दिव्य वचनों के प्रभाव से सभी साथियों का भी विश्वास और दृढ होता जा रहा था. जेल के अधिकांश पुलिस अधिकारी गोडसे के ह्रदय से आदर करते थे, क्योंकि वे जानते थे कि गोडसे द्वारा गाँधी वध के पीछे केवल एक ही भावना थी, भारत की पूर्ण स्वतंत्रता.
सम्बन्धियों से घीरे पंडित जी के मुख से निरंतर जो शब्द निकल रहे थे, उनमें एक अलौकिकता झलक रही थी, भक्त ध्रुव का उदहारण देते हुए उन्होंने कहा, ” जिस प्रकार ध्रुव के भीतर अमरता और स्थिर जीवन की भावना जागृत हो गई थी, और किसी भी प्रकार के प्रलोभन के समक्ष उसने अपने स्वाभिमान को झुकने नहीं दिया, ठीक उसी प्रकार हम भी एक स्थिर व स्वतंत्र राष्ट्र चाहते हैं. हमारा भी स्वाभिमान जाग चूका है. ध्रुव ने तप किया, हमने भी तप करना प्रारम्भ किया. क्रूर विदेशी शासक ने कितने ही अत्याचार किये, प्रलोभन दिए, किन्तु पूर्ण स्वराज्य से कम हमने कभी नही स्वीकारा, और यही उद्देश्य अंतिम श्वास तक रहेगा- अखंड भारत की पूर्ण स्वतंत्रता. हमें ध्रुव के सामान अपने लक्ष्य पर स्थिर रहना होगा, तभी करोडो हिन्दुओं का यह स्वप्न साकार होगा.”
  भेंट करने वालों  के ह्रदय में गाँधी-वध के बाद पुनर्जीवित हुई राष्ट्रवाद की जो भावना थी, उसके कारण वे पंडित जी के दर्शन और प्रत्यक्ष साक्षात्कार करके स्वयं को धन्य महसूस कर रहे थे. पंडित जी  की वाणी व हाव भाव में मृत्यु का कहीं भी भय नहीं था, न ही कोई शोक  था. भेंट कर्ताओं के साथ बातचीत के दौरान पंडित जी आत्मा की दिव्यता, अमरता व अनासक्त कर्म से सम्बंधित श्लोक सुना कर सबको मन्त्रमुग्ध करने लगे. इस प्रकार का यह अद्भुत सत्संग शाम 5 बजे तक चलता रहा. पंडित जी अपने ज्ञान से सबको हर्षित व मन्त्र मुग्ध कर रहे थे, तुकाराम की वाणी स्पंदन उनके व्याख्यान में महसूस हो रहा था.
    ड्यूटी पर तैनात अधिकारीयों ने हमेशा लोगों के साथ ऐसे साक्षात्कारों में  मृत्युदंड के भय के कारण रोदन- क्रंदन ही देखा था. पंडित गोडसे की योग शक्ति से यह भेंटवार्ता एक सत्संग में परिवर्तित हो गई थी.
नाना आप्टे ने अपनी पत्नी चम्पूताई से आधा घंटे बातें की. दोनों ही बड़े संयम से एक दुसरे से मिले. सूर्यास्त का समय होने लगा, अब बिछड़ते समय मिलने वाले सभी आँखों में एक विचित्र सी खामोशी थी. राष्ट्र व धर्म चिंतन करते हुए समय का पता ही नही चला. अब जेल अधिकारीयों का इशारा हो गया था कि मिलने का समय समाप्त हो चूका है. भरे हुए ह्रदय से सभी परिजन लौटने लगे. जाते हुए किसी ने पंडित गोडसे को गले लगाया, किसी ने उनके चरण रज को माथे लगाया.
   गोडसे से मिलने  वालों इन मराठा वीरों का अम्बाला में बहुत ही सम्मान हुआ. एक भोजनालय के मालिक जब पता चला कि महाराष्ट्र से लोग का यह समूह गोडसे से मिलने आया है, तो उसने बिना मूल्य लिए सबको भोजन कराया. जब तक ये लोग अम्बाला में रहे स्थानीय लोगों ने अपनी ओर से भोजन की व्यवस्था की. जब वे लोग वापस स्टेशन में हिन्दुओं की भारी भीड़, विदाई के लिए एकत्रित हो गए, अनेक के हाथों में भगवा ध्वज था, कईयों ने केसरिया पगड़ी पहने हुई थी, और पूरा स्टेशन ‘अखंड भारत की जय’ , ‘वीर गोडसे अमर रहे’ के नारों से गुंजायमान हो रहा था.

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*देश के पहले राष्ट्रपति की मौत का सच

*सोमनाथ मंदिर के लिए डा. राजेंद्र प्रसाद व सरदार पटेल को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी*

*ये जगजाहिर है कि जवाहर लाल नेहरू सोमनाथ मंदिर के पक्ष में नहीं थे*

*महात्मा गांधी जी की सहमति से सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का काम शुरु किया था.*

*पटेल की मौत के बाद मंदिर की जिम्मेदारी के एम मुंशी पर आ गई.*

*मुंशी नेहरू की कैबिनेट के मंत्री थे.*

*गांधी और पटेल की मौत के बाद नेहरू का विरोध और तीखा होने लगा था.*

*एक मीटिंग में तो उन्होंने मुंशी की फटकार भी लगाई थी.*
*उन पर हिंदू-रिवाइवलिज्म और हिंदुत्व को हवा देने का आरोप भी लगा दिया.*

*लेकिन, मुंशी ने साफ साफ कह दिया था कि सरदार पटेल के काम को अधूरा नहीं छोड़ेगे.*

*के एम मुंशी भी गुजराती थे इसलिए उन्होंने सोमनाथ मंदिर बनवा के ही दम लिया.*

*फिर उन्होंने मंदिर के उद्घाटन के लिए देश के पहले राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद को न्यौता दे दिया.*

*उन्होंने इस न्यौते को बड़े गर्व से स्वीकार किया लेकिन जब जवाहर लाल नेहरू की इसका पता चला तो वे नाराज हो गए.*
*उन्होंने पत्र लिख कर डा. राजेंद्र प्रसाद को सोमनाथ जाने से मना कर दिया.*

*राजेंद्र बाबू भी तन गए.*

*नेहरू की बातों को दरकिनार कर वो सोमनाथ गए और जबरदस्त भाषण दिया था.*

*जवाहर लाल नेहरू को इससे जबरदस्त झटका लगा.*
*उनके इगो को ठेंस पहुंची.*
*उन्होंने इसे अपनी हार मान ली.*

*डा. राजेंद्र प्रसाद को सोमनाथ जाना बड़ा महंगा पड़ा क्योंकि इसके बाद नेहरू ने जो इनके साथ सलूक किया वो हैरान करने वाला है.*

*सोमनाथ मंदिर की वजह से डा. राजेंद्र प्रसाद और जवाहर लाल नेहरू के रिश्ते में इतनी कड़वाहट आ गई कि जब राजेंद्र बाबू राष्ट्रपति पद से मुक्त हुए तो नेहरू ने उन्हें दिल्ली में घर तक नहीं दिया.*

*राजेंद्र बाबू दिल्ली में रह कर किताबें लिखना चाहते थे.*    *लेकिन, नेहरू ने उनके साथ अन्याय किया.*

*एक पूर्व राष्ट्रपति को सम्मान मिलना चाहिए, उनका जो अधिकार था उससे उन्हें वंचित कर दिया गया.*

*आखिरकार, डा. राजेंद्र प्रसाद को पटना लौटना पड़ा.*
*पटना में भी उनके पास अपना मकान नहीं था.*      *पैसे नहीं थे.*

*नेहरू ने पटना में भी उन्हें कोई घर नहीं दिया जबकि वहां सरकारी बंगलो और घरों की भरमार है.*

*डा. राजेंद्र प्रसाद आखिरकार पटना के सदाकत आश्रम के एक सीलन भरे कमरे में रहने लगे.*
*न कोई देखभाल करने वाला और न ही डाक्टर.*

*उनकी तबीयत खराब होने लगी. उन्हें दमा की बीमारी ने जकड़ लिया.*

*दिन भर वो खांसते रहते थे. अब एक पूर्व राष्ट्रपति की ये भी तो दुविधा होती है कि वो मदद के लिए गिरगिरा भी नहीं सकता.*

*लेकिन, राजेंद्र बाबू के पटना आने के बाद नेहरू ने कभी ये सुध लेने की कोशिश भी नहीं कि देश का पहला राष्ट्रपति किस हाल में जी रहा है*

*इतना ही नहीं, जब डा. राजेंद्र प्रसाद की तबीयत खराब रहने लगी, तब भी किसी ने ये जहमत नहीं उठाई कि उनका अच्छा इलाज करा सके.*

*बिहार में उस दौरान कांग्रेस पार्टी की सरकार थी. आखिर तक डा. राजेन्द्र बाबू को अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिलीं.*     *उनके साथ बेहद बेरुखी वाला व्यवहार होता रहा.*      *मानो ये किसी के निर्देश पर हो रहा हो. उन्हें कफ की खासी शिकायत रहती थी.*

*उनकी कफ की शिकायत को दूर करने के लिए पटना मेडिकल कालेज में एक मशीन थी.*      *उसे भी दिल्ली भेज दिया गया.*

*यानी राजेन्द्र बाबू को मारने का पूरा और पुख्ता इंतजाम किया गया.*

*एक बार जय प्रकाश नारायण उनसे मिलने सदाकत आश्रम पहुंचे.*

*वो देखना चाहते थे कि देश पहले राष्ट्रपति और संविधान सभा के अध्यक्ष आखिर रहते कैसे हैं.*

*जेपी ने जब उनकी हालत देखी तो उनका दिमाग सन्न रह गया.*     *आंखें नम हो गईं.*

*उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर वो क्या कहें.*
*जेपी ने फौरन अपने सहयोगियों से कहकर रहने लायक बनवाया.*
*लेकिन, उसी कमरे में रहते हुए राजेन्द्र बाबू की 28 फरवरी,1963 को मौत हो गई.*

*डा. राजेंद्र प्रसाद की मौत के बाद भी नेहरू का कलेजा नहीं पसीजा.*
*उनकी बेरुखी खत्म नहीं हुई.*

*नेहरू ने उनकी अंत्येष्टि में शामिल तक नहीं हुए.*      *जिस दिन उनकी आखरी यात्रा थी उस दिन नेहरू जयपुर चले गए.*     *इतना ही नहीं, राजस्थान के राज्यपाल डां. संपूर्णानंद पटना जाना चाह रहे थे*    *लेकिन नेहरू ने उन्हें वहां जाने से मना कर दिया.*

*जब नेहरु को मालूम चला कि संपूर्णानंद जी पटना जाना चाहते हैं तो उन्होंने संपूर्णानंद से कहा*     *कि ये कैसे मुमकिन है कि देश का प्रधानमंत्री किसी राज्य में आए और उसका राज्यपाल वहां से गायब हो.*
*इसके बाद डा. संपूर्णानंद ने अपना पटना जाने का कार्यक्रम रद्द किया.*

*यही नहीं, नेहरु ने राजेन्द्र बाबू के उतराधिकारी डा. एस. राधाकृष्णन को भी पटना न जाने की सलाह दी.*      *लेकिन, राधाकृष्णन ने नेहरू की बात नहीं मानी और वो राजेन्द्र बाबू के अंतिम संस्कार में भाग लेने पटना पहुंचे.*

*जब भी दिल्ली के राजघाट से गुजरता हूं तो डा. राजेंद्र प्रसाद के साथ नेहरू के रवैये को याद करता हूं.*

*अजीब देश है, महात्मा गांधी के बगल में*     *संजय गांधी*   *को जगह मिल सकती है*

*लेकिन देश के पहले राष्ट्रपति के लिए इस देश में कोई इज्जत ही नहीं है.*

*सोमनाथ मंदिर के पक्ष में होनें के कारण सरदार बल्लभ भाई पटेल को भी कांग्रेसियों ने कोई सम्मान आज तक नहीं दिया,*.   *जबकि मस्जिद क प्रेमियों को बडे बडे मंत्रालय दिये गए ၊*

*पूरे देश में बस गांधी परिवार के नाम पर ही स्मारक और योजनाएं बनाई गई,*

*ऐसा लगता है कि इस देश में महानता और बलिदान की कॉपी राइट सिर्फ नेहरू-गांधी परिवार के पास है.*

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*इन्दिरा बेगम का यह इतिहास* कितने लोग जानते हैं जो नहीं जानते हैं?

*उनको मुहम्मद युनुस की पुस्तक पढ़ना चाहिये,* और यूट्यूब/ गूगल पर सर्च करना चाहिये !

*मुहम्मद यूनुस-इंदिरा गांधी उर्फ़ मेमुना बेगम का दूसरा अघोषित पति था। वह संजय गाँधी का असली पिता था… यह गुप्त निकाह था !*

_उसी यूनुस ने संजय की मेनका के साथ शादी के समय ससुर का रोल किया था और अड़ गया था कि बारात मेरे घर से निकलेगी…_

*जब संजय को यह बात पता चली कि उसका बाप कौन है, तो उसको इन्दिरा से नफरत हो गई* और उसने इंदिरा के गाल पर एक थप्पड़ जड़ कर कांग्रेस का चुनाव चिह्न उसके गाल पर बना दिया… 

*इसी कारण संजय को सफदरजंग एयरपोर्ट पर एक छोटा सा प्लेन क्रैश करवा कर मरवा दिया गया…*  यही मुहम्मद यूनुस था जो संजय गाँधी की लाश पर छाती पीटकर रो रहा था !

*मुहम्मद यूनुस वही है जिसने अपनी पुस्तक Persons, Passions and Politics में लिखा है कि मैं संजय गाँधी का बाप हूँ और मैंने उसका खतना करवाया था…*

कश्मीरी पंडितों के कत्ल राजीव ने करवाये थे अपने भाई को बचाने के लिये… यही सौदा हुआ था !

*उसी मुहम्मद युनुस का एक बेटा और था आदिल शहरयार…. यानी इन्दिरा का तीसरा बेटा जो अमेरिका में ड्रग्स और हथियार की तस्करी के आरोप में 35 वर्ष की सजा पाकर जेल में बंद था… उसी आदिल शहरयार को इंदिरा के वध के बाद राजीव गाँधी की सरकार ने अमेरिकी राष्ट्रपति से क्षमादान दिलाने का प्रयास किया लेकिन सफलता नहीं मिली…  रोनाल्ड रीगन ने क्षमादान नहीं दिया !*

_इसी बीच भोपाल गैस कांड हो गया…. एंडरसन भोपाल आया तो उसे अर्जुन सिंह ने कैद करवा लिया… राजीव गाँधी ने अपने भाई आदिल शहरयार के बदले एंडरसन को छोड़ने का अमेरिका से सौदा किया…_

*सनातनियों की लाशों का सौदा किया गया….  इस नीच जेहादी छद्म मियाँ नेहरू खानदान ने अपने तीसरे भाई आदिल शहरयार को अमेरिका से छुड़वा लिया और एंडरसन को भगा दिया….!*

_इस घटना को सुषमा स्वराज ने संसद में आदिल शहरयार के बारे में बहस की चुनौती रखकर खान्ग्रेसियों की बोलती बंद कर दी थी…  जब वे उन पर ललित मोदी को भगाने का आरोप लगा रहे थे.. यूट्यूब पर वह वीडियो उपलब्ध है !_

*अब आप समझ सकते हैं कि राहुल गांँधी क्यों बोल गये कि कांग्रेस मुस्लिम पार्टी है…*

क्या इस पार्टी से सनातन धर्म को बचाने की कल्पना की जा सकती

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लिखे जो ख़त तुझे

(एक ऐतिहासिक सत्य कथा, बकलम जनाब भूरेलाल जी)

बरस था १९५१ तब पाकिस्तान में स्थित ईरानी दूतावास में एक ईरानी अफ़सर की नियुक्ति वहाँ हुई। अफ़सर अपनी तीस साला ख़ूबसूरत शोख़ हसीन बेगम नाहिद और अपनी लड़की को लिए मुल्क में आया। मुल्क काफ़िरों के चंगुल से ताज़ा आजाद हुआ था और सियासत के गलियारों में वो हुक्मरान भेड़ियों के मानिंद घूम रहे थे जो हिन्दुस्थान से आए थे। ऐसे ही एक हुक्मरान थे जनाब इसिकन्दर मिर्ज़ा। आप नवाब मीर जाफ़र के कुनबे से थे और इस बात पे जनाब मिर्ज़ा को बड़ा गुरूर था। मिर्ज़ा मुल्क के रक्षा मंत्रालय में आसीन थे।

एक शाम की बात है जब रूसी दूतावास में ईरानी अफसरान पाकिस्तानी आमद के साथ पार्टी में मशगूल थे। पार्टी के दौरान बावन साल के मिर्जा जो छह बच्चों के अदद अब्बा थे, की मुलाकात बेगम नाहिद से हुई। बावन साल का मिर्ज़ा बेहद हसीन ईरानी हसीना को देख अपना दिल हार बैठा। दोनों में गुफ्तगू शुरू हुई- मालूम हुआ बेगम तैमूर लंगड़े के कुनबे से वास्ता रखती है। मीर जाफ़र के लहू ने उबाल मारा- तैमूरी ख़ातून तो अपने हरम में होनी चाहिए। पहली ही मुलाक़ात में मिर्ज़ा ने बेगम नाहिद से गुज़ारिश की- क्या आप मेरी दूसरी बीवी बनेंगी?

बेगम को भी इस अधेड़ मरद में अपना मुस्तक़बिल नज़र आया, दिल मचल रहा था कि इस हज़रात को अपना दूसरा खाबिंद बना लूँ किंतु ज़माना क्या कहेगा। आग दोनों तरफ़ लगी थी। बेगम ने हाँ तो नहीं कहा किंतु आँखों से रज़ामंदी दे दी। मिर्ज़ा और बेगम नाहिद के बीच ख़त से अब इश्क़ की गुफ़्तगू शुरू हुई। एक साल में ही बेगम ने अपने फ़ौजी ईरानी शौहर को तलाक दे मिर्ज़ा से निकाह पढ़वा लिया।

मिर्ज़ा के कलपुर्जे अब भी दुरुस्त थे। मिर्ज़ा कुश्तों की बदौलत तीस साल के फ़ौजियों को भी मात देते थे। चुनांचे ईरानी हसीनाएँ भी मिर्ज़ा की मुरीद थी। निकाह के कुछ बरस में ही बेगम नौहिद की क़िस्मत ने पलटा खाया जब पाकिस्तानी को मज़हबी रियासत में तब्दील कर दिया गया और बहुत जल्दी मिर्ज़ा मुल्क के सदर बने। मिर्ज़ा पजामे के ढीले इतने थे कि सियासत में अपना दिमाग़ ना इस्तेमाल करते, सब सियासती फ़ैसले बेगम लेती थी। आख़िर बेगम ने मिर्ज़ा को अपना दिल दिया था तो फ़ैसले तो लेने का हक़ उन्हें था। क़ौमी लेन देन ऐसे ही होते है।

मिर्ज़ा ने सदर होने के नाते बेगम को इनामत तमगे अता किए। लगे हाथों बेगम ने रियासत के मसले जो ईरान के साथ उलझे हुए थे, उन्हें रफ़ा दफ़ा करवाने में अहम भूमिका निभाई। किंतु पाकिस्तानी फ़ौज में इस बात से क्रोध फ़ैल रहा था- लोग सोचते थे बेगम ईरानी एजेंट है और सदर साहब उनके गरारे में रहते थे।

बहुत जल्द तख्ता पलट हुआ जब फौज ने सत्ता अपनी पकड़ में ले ली- मिर्ज़ा और बेगम को वहाँ से लंदन भागना पड़ा। मिर्ज़ा वहाँ मुफ़लिसी में दिल के दौरे से खुदागंज रवाना हुए और बेगम उनकी याद में अकेली रह गई। बेवा बेगम ने अगले पचास साल मिर्ज़ा की याद में अकेले आँसू बहाते हुए निकाले। बेगम की मुराद थी- काश उन्हें कोई वो ख़त ला देता जो उन्होंने मिर्ज़ा को निकाह से पहले छिप कर लिखे थे।

बेनज़ीर ने बेगम नाहिद की ये मुराद पूरी की- उन्हें उनके ख़तों का पुलिंदा ला कर दिया। लेकिन ये क्या- पुलिंदा में केवल ख़ाली लिफ़ाफ़े थे, ख़त नदारद थे। कमबख़्त जनरल अयूब ने वो सब ख़त पढ़ जलवा दिए थे बस लिफ़ाफ़े रहने दिए । बेवा बेगम की तन्हाई और बढ़ गई जब उन्होंने उन लिफाफों पे अपनी इबारत में लिखा पढ़ा-

तुम्हारी तब तक ,जब तक सांस में है साँस!

बेगम ने अपना वायदा निभाई- तीसरा ख़सम ना किया। बेगम ९९ की उम्र में अकेली लंदन में फ़ौत हुई!

तस्वीर में बेगम के साथ चच्चा साहब। बेग़म के साथ खड़े चच्चा साहब—जो ऐसी तमाम बेग़मों के “जनाब-ए-मेज़बान” बन जाते थे। जनाब चच्चा ने ज़िंदगी का उसूल बना रखा था—“किसी की पहली नहीं तो दूसरी सही, और दूसरी नहीं तो तीसरी सही।”

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

Rohit Patel:
હમણાં એક મિત્રએ વોટ્સ એપ પર એક સરસ વીડિયો મોકલાવ્યો હતો. એ વીડિયો કોણે બનાવ્યો એ વિશે એમાં કશી માહિતી નહોતી (આજના સમયમાં આ એક મોટું દૂષણ છે. વીડિયો બનાવનારી કે કોઈ સરસ મેસેજ લખનારી મૂળ વ્યક્તિનું નામ મોટે ભાગે મેસેજ સાથે મોકલવામાં આવતું નથી). જોકે એ વીડિયોમાં જે વાત હતી એ મારા હૃદયને સ્પર્શી ગઈ એટલે વાચકમિત્રો સાથે શેર કરવાનું વિચાર્યું.

આગળના શબ્દો જે વ્યક્તિએ વીડિયો બનાવ્યો છે તેના છે. ભાષાશુદ્ધિ માટે થોડા ફેરફારો કર્યા છે, પણ મૂળ વાત વીડિયો બનાવનારી વ્યક્તિની જ છે. વાંચો….

અમે હાઈ-વે પર કારમાં એક શહેરમાંથી બીજા શહેરમાં જઈ રહ્યા હતા. એક નદી પરનો પુલ પાર કર્યો એ સાથે એક છોકરી નજરે પડી. એ રસ્તાને કિનારે ઊભી રહીને તરબૂચ વેચી રહી હતી.

એ વખતે અમારી સાથે એક કુટુંબ હતું. એમાંના બાળકે જીદ કરી કે મારે તરબૂચ ખાવું છે એટલે કાર પેલી છોકરી પાસે ઊભી રાખીને કારનો કાચ નીચે કરીને મારા મિત્રની પત્નીએ પૂછયું કે ‘શું ભાવ છે તરબૂચનો?’

તે છોકરીએ કહ્યું: ‘પચાસ રૂપિયાનું એક લઈ લો.’

તો અમારા મેડમ ભાવતાલ કરવા લાગ્યા કે ‘ત્રીસ રૂપિયા આપીશ. એથી વધુ નહીં.’ પેલી છોકરી કહેવા લાગી કે ‘ગજબ છો તમે તો…પચાસ રૂપિયાના તરબૂચના ત્રીસ રૂપિયા કહી દીધા!’
અમારા મેડમે કહ્યું, ‘ઠીક છે. ચાલીસ રૂપિયામાં આપી દઈશ?’

છોકરીએ કહ્યું: ‘ચાલીસ રૂૂપિયાનું તો અમને પડ્યું છે. હું પિસ્તાળીસ રૂપિયામાં આપી શકીશ.’

અમારી સાથેના મેડમના પતિ હસી રહ્યા હતા. એમણે પત્નીને કહ્યું કે ‘શું મગજમારી કરે છે આટલી નાની વાતમાં.’ પણ મેડમ તો ભાવતાલમાં લાગેલાં હતાં. પેલી છોકરી તરબૂચ લઈને કારની નજીક આવી. અમારી સાથે જે બાળક હતું એ બારીમાંથી બહાર જોઈ રહ્યું હતું. તો મેડમ એક ઈમોશનલ દાવ રમ્યા કે ‘આ તારા નાના ભાઈ માટે આપી દે ને ચાલીસ રૂપિયામાં?’

છોકરી બોલી ઊઠી : ‘અરે વાહ! કેટલું સરસ બાળક છે તમારું… શું નામ છે?’

બાળકે કહ્યું, ‘મારું નામ ગોલુ છે.’

છોકરીએ હસીને કહ્યું: ‘સાચે જ તું ગોળમટોળ છે.’


છોકરી તરબૂચ તે બાળકના હાથમાં રાખવા ગઈ તો બાળકથી એ પકડાયું નહીં અને નીચે પડી ગયું. પાંચ કિલોની આસપાસનું તરબૂચ હશે. એના ત્રણ-ચાર ટૂકડા થઈ ગયા. બાળક રડવા લાગ્યું કે ‘મારુ તરબૂચ પડી ગયું.’

તે છોકરી બોલી: ‘અરે, મારા ભાઈ, નારાજ કેમ થાય છે હું બીજું લઈને આવું છું.’

એ ફટાફટ બીજું તરબૂચ લઈને આવી. અમારી સાથેના મેડમને લાગ્યું કે હવે આ બે તરબૂચના પૈસા લેશે. તે ચોખવટ કરવા લાગ્યા કે તરબૂચ તારાથી તૂટ્યું છે. એમણે છોકરીને કહ્યું કે ‘અમે તૂટેલા તરબૂચના પૈસા નહીં આપીએ અને આના પણ ચાલીસ રૂપિયા જ આપીશું.’

એ છોકરીએ કહ્યું: ‘આન્ટીજી, મારે કશું જોઈતું નથી. તૂટ્યું એનું પણ નહીં અને આનું પણ નહીં. આ તરબૂચ તો હું મારા નાના ભાઈ માટે લઈને આવી છું. આ મારા તરફથી ભેટ એના માટે! ’

મેડમ બોલી પડ્યાં : ‘નહીં, નહીં. તું પૈસા તો લઈ જ લે.’


મેડમના પતિ પણ કહેવા લાગ્યા કે ‘તું સો રૂપિયા લઈ લે બે તરબૂચના.’

તે છોકરીએ કહ્યું, ‘નહીં, નહીં. હવે હું પૈસા નહીં લઉં. તમે કહ્યું ને કે આ તારો ભાઈ છે. હવે હું ભાઈ પાસેથી થોડા પૈસા લઈશ?!’

તો અમારી સાથે મેડમ હતા એમણે કહ્યું: ‘અરે! મેં તો એમ જ કહ્યું હતું કે આ તારો નાનો ભાઈ છે…તું પૈસા લઈ લે.’

એ વખતે તે નાની છોકરીએ જીવનનો સાર કહ્યો. એણે કહ્યું: ‘મારી મા કહે છે કે સંબંધમાં નફો કે નુકસાન નથી જોવામાં આવતા. પહેલું તૂટી ગયું, વાંધો નહીં. આ બીજું મારા તરફથી ભેટરૂપે તમે લઈ જાઓ.’

જ્યારે એણે એ વાત કહી તો અમારી સાથેના મેડમે પૂછયું: ‘તારા પરિવારમાં કોણ કોણ છે? તારો કોઈ ભાઈ છે?’

એ છોકરીએ કહ્યું ‘મારો ભાઈ તો’


બોલતા બોલતા એ રડવા લાગી. પછી રડતાં રડતાં કહેવા લાગી કે મારો ભાઈ થોડા સમય પહેલાં મરી ગયો. એ બીમાર થઈ ગયો હતો. એને હોસ્પિટલ લઈ ગયા ત્યાં સુધીમાં એ મૃત્યુ પામ્યો. માત્ર બે વર્ષનો હતો તે. મને આમાં મારો ભાઈ દેખાયો. તમે આ તરબૂચ લઈ જાઓ. હું પૈસા નહીં લઉં.’

અમારી સાથે જે મેડમ હતા એ પોતાના ઘરેથી આવી રહ્યા હતા અને બીજા શહેરમાં જઈ રહ્યા હતા. એમણે ત્યાં કોઈ સંબંધીને ત્યાં જવાનું હતું અને બંગડી ગિફ્ટ આપવાની હતી. તે બંગડી કોઈને આપવા માટે જઈ રહ્યા હતા, પણ જરા ય વિલંબ કર્યા વિના એમણે પોતાના પર્સમાંથી મોંઘી બંગડીઓ કાઢી અને તે છોકરીના હાથમાં મૂકી દીધી :

‘બેટા, આ મારા તરફથી તારા માટે!.

છોકરી બોલી ઊઠી : ‘અરે! તરબૂચના બદલામાં આટલું બધું!’

મેડમે કહ્યું: ‘હા, બેટા, સંબંધમાં નફા-નુકસાન નથી જોતા. તેં આ ગોલુને તારો ભાઈ માન્યો તો હું તારી મા થઈ. મારા તરફથી તારા માટે. તારું ધ્યાન રાખજે અને બધાનું ધ્યાન રાખજે.’


એવું કહીને એમણે ગાડી આગળ ચલાવવા કહ્યું. એમના પતિ હસતા હતા :

કેવી છે મારી પત્ની! થોડી વાર પહેલા દસ-દસ રૂપિયા માટે ભાવતાલ કરી રહી હતી અને હવે આટલી મોંઘી બંગડીઓ એમ જ આપી દીધી! લાગણી પણ શું ચીજ છે.

-અને ત્યારે એમને યાદ આવ્યું કે પેલી છોકરીએ કહ્યું હતું કે સંબંધોમાં નફો કે નુકસાન નથી જોવામાં આવતા. એમણે વિલંબ કર્યા વિના પોતાના મોટાભાઈને કોલ લગાવ્યો અને કહ્યું: ‘અરે ભાઈ! પેલો પ્લોટ તમે રાખી લો, બજારની દુકાન પણ તમે રાખી લો મને નથી જોતી. મેં કોર્ટમાં જે કેસ કર્યો છે એ હું પાછો ખેંચી લઈશ.’

મોટાભાઈ પૂછવા લાગ્યા : ‘તને શું થઈ ગયું આ અચાનક.?’

તો એણે કહ્યું: ‘ભાઈ મેં સાંભળ્યું છે અને યાદ રાખ્યું છે કે સંબંધોમાં નફો કે નુકસાન નથી જોવામાં આવતા.’

મોટાભાઈ પણ ઈમોશનલ થઈ ગયા અને કહ્યું કે ‘અરે! તું આટલા પ્રેમથી પહેલા વાત કરત તો વાત આગળ વધત જ નહીં. આવી જા ઘરે. ચા પીએ અને બધું સોલ્વ કરી લઈએ.’


વીડિયોની વાત અહીં પૂરી થાય છે, પણ દરેક વ્યક્તિ માત્ર આટલી વાત યાદ રાખે કે સંબંધમાં નફો કે નુકસાન ન જોવા જોઈએ તો દુનિયામાં કેટલા ઝઘડાઓ અને કેટલા કેસકબાડાઓ બંધ થઈ જાય!

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

Rohit Patel:
હમણાં એક મિત્રએ વોટ્સ એપ પર એક સરસ વીડિયો મોકલાવ્યો હતો. એ વીડિયો કોણે બનાવ્યો એ વિશે એમાં કશી માહિતી નહોતી (આજના સમયમાં આ એક મોટું દૂષણ છે. વીડિયો બનાવનારી કે કોઈ સરસ મેસેજ લખનારી મૂળ વ્યક્તિનું નામ મોટે ભાગે મેસેજ સાથે મોકલવામાં આવતું નથી). જોકે એ વીડિયોમાં જે વાત હતી એ મારા હૃદયને સ્પર્શી ગઈ એટલે વાચકમિત્રો સાથે શેર કરવાનું વિચાર્યું.

આગળના શબ્દો જે વ્યક્તિએ વીડિયો બનાવ્યો છે તેના છે. ભાષાશુદ્ધિ માટે થોડા ફેરફારો કર્યા છે, પણ મૂળ વાત વીડિયો બનાવનારી વ્યક્તિની જ છે. વાંચો….

અમે હાઈ-વે પર કારમાં એક શહેરમાંથી બીજા શહેરમાં જઈ રહ્યા હતા. એક નદી પરનો પુલ પાર કર્યો એ સાથે એક છોકરી નજરે પડી. એ રસ્તાને કિનારે ઊભી રહીને તરબૂચ વેચી રહી હતી.

એ વખતે અમારી સાથે એક કુટુંબ હતું. એમાંના બાળકે જીદ કરી કે મારે તરબૂચ ખાવું છે એટલે કાર પેલી છોકરી પાસે ઊભી રાખીને કારનો કાચ નીચે કરીને મારા મિત્રની પત્નીએ પૂછયું કે ‘શું ભાવ છે તરબૂચનો?’

તે છોકરીએ કહ્યું: ‘પચાસ રૂપિયાનું એક લઈ લો.’

તો અમારા મેડમ ભાવતાલ કરવા લાગ્યા કે ‘ત્રીસ રૂપિયા આપીશ. એથી વધુ નહીં.’ પેલી છોકરી કહેવા લાગી કે ‘ગજબ છો તમે તો…પચાસ રૂપિયાના તરબૂચના ત્રીસ રૂપિયા કહી દીધા!’
અમારા મેડમે કહ્યું, ‘ઠીક છે. ચાલીસ રૂપિયામાં આપી દઈશ?’

છોકરીએ કહ્યું: ‘ચાલીસ રૂૂપિયાનું તો અમને પડ્યું છે. હું પિસ્તાળીસ રૂપિયામાં આપી શકીશ.’

અમારી સાથેના મેડમના પતિ હસી રહ્યા હતા. એમણે પત્નીને કહ્યું કે ‘શું મગજમારી કરે છે આટલી નાની વાતમાં.’ પણ મેડમ તો ભાવતાલમાં લાગેલાં હતાં. પેલી છોકરી તરબૂચ લઈને કારની નજીક આવી. અમારી સાથે જે બાળક હતું એ બારીમાંથી બહાર જોઈ રહ્યું હતું. તો મેડમ એક ઈમોશનલ દાવ રમ્યા કે ‘આ તારા નાના ભાઈ માટે આપી દે ને ચાલીસ રૂપિયામાં?’

છોકરી બોલી ઊઠી : ‘અરે વાહ! કેટલું સરસ બાળક છે તમારું… શું નામ છે?’

બાળકે કહ્યું, ‘મારું નામ ગોલુ છે.’

છોકરીએ હસીને કહ્યું: ‘સાચે જ તું ગોળમટોળ છે.’


છોકરી તરબૂચ તે બાળકના હાથમાં રાખવા ગઈ તો બાળકથી એ પકડાયું નહીં અને નીચે પડી ગયું. પાંચ કિલોની આસપાસનું તરબૂચ હશે. એના ત્રણ-ચાર ટૂકડા થઈ ગયા. બાળક રડવા લાગ્યું કે ‘મારુ તરબૂચ પડી ગયું.’

તે છોકરી બોલી: ‘અરે, મારા ભાઈ, નારાજ કેમ થાય છે હું બીજું લઈને આવું છું.’

એ ફટાફટ બીજું તરબૂચ લઈને આવી. અમારી સાથેના મેડમને લાગ્યું કે હવે આ બે તરબૂચના પૈસા લેશે. તે ચોખવટ કરવા લાગ્યા કે તરબૂચ તારાથી તૂટ્યું છે. એમણે છોકરીને કહ્યું કે ‘અમે તૂટેલા તરબૂચના પૈસા નહીં આપીએ અને આના પણ ચાલીસ રૂપિયા જ આપીશું.’

એ છોકરીએ કહ્યું: ‘આન્ટીજી, મારે કશું જોઈતું નથી. તૂટ્યું એનું પણ નહીં અને આનું પણ નહીં. આ તરબૂચ તો હું મારા નાના ભાઈ માટે લઈને આવી છું. આ મારા તરફથી ભેટ એના માટે! ’

મેડમ બોલી પડ્યાં : ‘નહીં, નહીં. તું પૈસા તો લઈ જ લે.’


મેડમના પતિ પણ કહેવા લાગ્યા કે ‘તું સો રૂપિયા લઈ લે બે તરબૂચના.’

તે છોકરીએ કહ્યું, ‘નહીં, નહીં. હવે હું પૈસા નહીં લઉં. તમે કહ્યું ને કે આ તારો ભાઈ છે. હવે હું ભાઈ પાસેથી થોડા પૈસા લઈશ?!’

તો અમારી સાથે મેડમ હતા એમણે કહ્યું: ‘અરે! મેં તો એમ જ કહ્યું હતું કે આ તારો નાનો ભાઈ છે…તું પૈસા લઈ લે.’

એ વખતે તે નાની છોકરીએ જીવનનો સાર કહ્યો. એણે કહ્યું: ‘મારી મા કહે છે કે સંબંધમાં નફો કે નુકસાન નથી જોવામાં આવતા. પહેલું તૂટી ગયું, વાંધો નહીં. આ બીજું મારા તરફથી ભેટરૂપે તમે લઈ જાઓ.’

જ્યારે એણે એ વાત કહી તો અમારી સાથેના મેડમે પૂછયું: ‘તારા પરિવારમાં કોણ કોણ છે? તારો કોઈ ભાઈ છે?’

એ છોકરીએ કહ્યું ‘મારો ભાઈ તો’


બોલતા બોલતા એ રડવા લાગી. પછી રડતાં રડતાં કહેવા લાગી કે મારો ભાઈ થોડા સમય પહેલાં મરી ગયો. એ બીમાર થઈ ગયો હતો. એને હોસ્પિટલ લઈ ગયા ત્યાં સુધીમાં એ મૃત્યુ પામ્યો. માત્ર બે વર્ષનો હતો તે. મને આમાં મારો ભાઈ દેખાયો. તમે આ તરબૂચ લઈ જાઓ. હું પૈસા નહીં લઉં.’

અમારી સાથે જે મેડમ હતા એ પોતાના ઘરેથી આવી રહ્યા હતા અને બીજા શહેરમાં જઈ રહ્યા હતા. એમણે ત્યાં કોઈ સંબંધીને ત્યાં જવાનું હતું અને બંગડી ગિફ્ટ આપવાની હતી. તે બંગડી કોઈને આપવા માટે જઈ રહ્યા હતા, પણ જરા ય વિલંબ કર્યા વિના એમણે પોતાના પર્સમાંથી મોંઘી બંગડીઓ કાઢી અને તે છોકરીના હાથમાં મૂકી દીધી :

‘બેટા, આ મારા તરફથી તારા માટે!.

છોકરી બોલી ઊઠી : ‘અરે! તરબૂચના બદલામાં આટલું બધું!’

મેડમે કહ્યું: ‘હા, બેટા, સંબંધમાં નફા-નુકસાન નથી જોતા. તેં આ ગોલુને તારો ભાઈ માન્યો તો હું તારી મા થઈ. મારા તરફથી તારા માટે. તારું ધ્યાન રાખજે અને બધાનું ધ્યાન રાખજે.’


એવું કહીને એમણે ગાડી આગળ ચલાવવા કહ્યું. એમના પતિ હસતા હતા :

કેવી છે મારી પત્ની! થોડી વાર પહેલા દસ-દસ રૂપિયા માટે ભાવતાલ કરી રહી હતી અને હવે આટલી મોંઘી બંગડીઓ એમ જ આપી દીધી! લાગણી પણ શું ચીજ છે.

-અને ત્યારે એમને યાદ આવ્યું કે પેલી છોકરીએ કહ્યું હતું કે સંબંધોમાં નફો કે નુકસાન નથી જોવામાં આવતા. એમણે વિલંબ કર્યા વિના પોતાના મોટાભાઈને કોલ લગાવ્યો અને કહ્યું: ‘અરે ભાઈ! પેલો પ્લોટ તમે રાખી લો, બજારની દુકાન પણ તમે રાખી લો મને નથી જોતી. મેં કોર્ટમાં જે કેસ કર્યો છે એ હું પાછો ખેંચી લઈશ.’

મોટાભાઈ પૂછવા લાગ્યા : ‘તને શું થઈ ગયું આ અચાનક.?’

તો એણે કહ્યું: ‘ભાઈ મેં સાંભળ્યું છે અને યાદ રાખ્યું છે કે સંબંધોમાં નફો કે નુકસાન નથી જોવામાં આવતા.’

મોટાભાઈ પણ ઈમોશનલ થઈ ગયા અને કહ્યું કે ‘અરે! તું આટલા પ્રેમથી પહેલા વાત કરત તો વાત આગળ વધત જ નહીં. આવી જા ઘરે. ચા પીએ અને બધું સોલ્વ કરી લઈએ.’


વીડિયોની વાત અહીં પૂરી થાય છે, પણ દરેક વ્યક્તિ માત્ર આટલી વાત યાદ રાખે કે સંબંધમાં નફો કે નુકસાન ન જોવા જોઈએ તો દુનિયામાં કેટલા ઝઘડાઓ અને કેટલા કેસકબાડાઓ બંધ થઈ જાય!

Posted in संस्कृत साहित्य

भोजन


भोजन करो तो ऐसे ही करो जैसे भगवान को ही भोग लगा रहे हो। भोजन तो तुम ही कर रहे हो लेकिन अंततः तो भगवान को ही लग रहा है भोग। वही तो तुम्हारे भीतर आकर भूख बना। उसी ने तो तुम्हारी भूख जगाई। वही तो तुम्हारे भीतर भूखा है। उसके लिए ही तो तुम भोजन दे रहे हो। रस जगाओ। एकाग्रता की बात मत उठाओ। रस का सहज परिणाम एकाग्रता है। जो करते हो उसे रसपूर्ण ढंग से करो। उसमें डुबकी लो। छोटे और बड़े काम नहीं हैं दुनिया में। जिस काम में तुम डुबकी ले लो, वही बड़ा हो जाता है। बुहारी लगाने में डूब जाओ, वही बड़ा हो जाता है।

कबीर कहते हैं: “खाऊं-पिऊं सो सेवा, उठूं-बैठूं सो परिक्रमा।’ मेरा उठना बैठना ही उस परमात्मा की परिक्रमा है। और जो मैं खाता-पीता हूं, यही उसकी सेवा है। रस!

मेरे देखे अधिक लोगों के जीवन का कष्ट यही है कि वे जीवन में कहीं भी रस नहीं ले रहे हैं। जो भी कर रहे हैं, बेमन से कर रहे हैं। कर रहे हैं क्योंकि करना है। खींच रहे हैं। जैसे बैलगाड़ी में जुते बैल; ऐसा जीवन को खींच रहे हैं। नाचते हुए, उमंग से भरे हुए नहीं।

अगर तुम कोई ऐसे काम में लगे हो, जिसमें तुम रस ले ही नहीं सकते तो बदलो वह काम। कोई काम जीवन से ज्यादा मूल्यवान नहीं है। अक्सर ऐसा हुआ है, हो रहा है कि लोग ऐसे काम में उलझे हैं जो उनमें रस नहीं जगाता। किसी को कवि होना था, वह जूते बेच रहा है, बाटा की दुकान पर बैठा है। और जिसको बाटा की दुकान पर बैठना था, वह कविता कर रहा है। तो उसकी कविता में जूते की पालिश की गंध आती। आएगी ही।

लोग वहां हैं, जहां उन्हें नहीं होना था। और यह विकृति के कारण है। क्योंकि तुमने कभी अपने सहज भाव को तो खोजा नहीं। किसी के पिता ने कहा कि दुकान करो। इसमें ज्यादा लाभ है। किसी के पिता ने कहा, डाक्टर बन जाओ। किसी की मां को खयाल था, बेटा इंजीनियर बने। परिवार को धुन थी कि बेटा नेता बने।

तो सब धक्का दे रहे हैं एक दूसरे को कि यह बन जाओ, वह बन जाओ। कोई यह नहीं पूछता कि यह बेटा क्या बनने को पैदा हुआ है? इससे भी तो पूछो। थोड़े इसके हृदय को भी तो टटोलो। तो फिर लोग गलत जगहों पर पहुंच जाते हैं।
ओशो
जिन सूत्र