Posted in नहेरु परिवार - Nehru Family

आखिर क्या था नेहरू-जैकी केनेडी कनेक्शन और चीन का आक्रमण…!!!

सी.आई.ए. के गुप्त दस्तावेजों से खुलासा होता है कि एक तरफ जॉन केनेडी, अमेरिका के राष्ट्रपति जँहा लोकतांत्रिक भारत को साम्यवादी चीन के मुकाबले परमाणु शक्ति सम्पन्न देश बनाना चाहते थे, तो दूसरी तरफ वामपंथी सोच रखने वाले पंडित नेहरु इसे लेकर जरा भी गंभीर नही थे।

नवंबर 1961 में प्रधानमंत्री नेहरू अमेरिका गये। नेहरू अपने साथ बेटी इंदिरा और अपने एक अन्य भाई ब्रजकुमार नेहरू को साथ ले गए, जिन्हें अमेरिका में भारत के नए राजदूत के रूप में नियुक्त किया गया था।
गिलबर्थ (केनेडी व नेहरू के साथ बैठक में मौजूद व भारत मे तत्कालीन अमेरिकी राजदूत) ने अपनी डायरी में लिखा है कि- नेहरू केनेडी के साथ बातचीत में किसी तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त नही कर रहे थे। प्रश्न दर प्रश्न वह एक दो शब्द या वाक्य बोलते थे। राष्ट्रपति केनेडी नेहरू के इस आचरण से बेहद निराश हुए। बाद में केनेडी ने गिलबर्थ से कहा कि उनके कार्यकाल में इससे बुरा दौरा किसी भी राष्ट्राध्यक्ष का नही रहा। उन्होंने केनेडी से आगे कहा कि नेहरू मेरी अपेक्षा जैकी (केनेडी की पत्नी) से बातचीत करने में अधिक रुचि ले रहे थे।

जैकी 1962 में भारत दौरे पर आई। नेहरू जैकी के प्यार में पड़ चुके थे। नेहरू ने अपने और जैकी के साथ वाली तश्वीर को अपने घर के मुख्य द्वार पर स्वयं ही लगाया था, जो उनके लिए सुखद अनुभूति थी। अमेरिकन दूतावास ने श्रीमती केनेडी के लिए एक विला किराये पर लिया था, लेकिन नेहरू ने उन पर दबाव डाला कि वह प्रधानमंत्री आवास स्थित अतिथि गृह में ही रुके। यह वही अतिथि गृह था, जिसमे भारत के अंतिम वायसराय लार्ड माउंटबेटन की पत्नी एडविना माउंटबेटन रुका करती थी।

जॉन एफ केनेडी ने सिर्फ एक बार भारत का दौरा किया था। उस दौरे में भी केनेडी ने नोट किया था कि नेहरू उनके भाई रॉबर्ट की अपेक्षा उनकी 27 वर्षीय खूबसूरत बहन पैट केनेडी में कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी ले रहे थे।
कहने का तात्पर्य यह है कि शीत युद्ध के दौर में जब पंडित नेहरू की पूरी विदेश नीति गुट-निरपेक्षता की आड़ लेकर साम्यवादी दुनिया के पक्ष में दिख रही थी और जब नेहरू सोवियत संघ व चीन, दोनो के ही द्वारा विश्वासघात के शिकार हुए, उस वक्त अमेरिका का एक राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी अपने देश में विरोध झेलकर और अपने परंपरागत मित्र पाकिस्तान को अंधेरे में रखकर भारत को सैन्य व आर्थिक रूप से मजबूत करने का निजी प्रयास कर रहा था, उस समय भारत के प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की रुचि अपने देश की सुरक्षा को ताक पर रख उस अमेरिकी राष्ट्रपति की छोटी बहन व उसकी पत्नी में ज्यादा दिखाई दे रही थी।

जब भारत पर चीनी हमले का गंभीर खतरा मंडरा रहा था, उस समय भारत के प्रधानमंत्री की दिलचस्पी देश की सुरक्षा से अधिक किसी राष्ट्राध्यक्ष के घर की महिलाओं में हो, यह बेहद ही आश्चर्यजनक है। यह पंडित नेहरू की सोच में देशहित व निजी हित के अंतर को स्पष्ट करने का शर्मनाक लेकिन तथ्यगत उदाहरण है। यही कारण है कि अमेरिकी राष्ट्रपति यह कहने तक पर मजबूर हुए कि उनके पूरे कार्यकाल में नेहरू के साथ हुई बैठक से खराब बैठक कभी नही हुई।

महाराजा रसगोत्रा ने लिखा है- एक बात तो सत्य है कि भारत जॉन एफ केनेडी के परमाणु परीक्षण करने के प्रस्ताव को यदि मान लेता तो चीन 1962 में भारत पर हमले की बात स्वप्न में भी नही सोच सकता था।

संदर्भ स्रोत :
द सी.आई.ए. एंड द सिन्यो-इंडियन वार : ब्रुस राइडेल, हार्पर कॉलिन्स पब्लिशर्स

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बहुत समय पहले, हिमालय की ऊँची-ऊँची पहाड़ियों में एक वृद्ध सन्यासी रहा करता था। वह तपस्वी बड़ा ज्ञानी और दूरदर्शी था। उसकी ख्याति इतनी फैली हुई थी कि दूर-दराज़ के लोग अपने दुख और प्रश्न लेकर उसके पास आया करते थे।

एक दिन, एक स्त्री रोते-रोते उसके आश्रम पहुँची। आँसुओं से भरी आँखों और कांपती हुई आवाज़ में उसने कहा—
“बाबा, मेरा पति पहले मुझसे बहुत प्रेम करता था। लेकिन जब से वह युद्ध से लौटा है, उसकी आँखों की चमक खो गई है। वह अब मुझसे ठीक से बात तक नहीं करता।”

सन्यासी ने शांत स्वर में उत्तर दिया—
“युद्ध केवल ज़मीन और लोगों को ही नहीं तोड़ता, वह इंसान के भीतर भी गहरी दरारें छोड़ जाता है।”

स्त्री ने जल्दी से कहा—
“लोग कहते हैं कि आपके पास ऐसी जड़ी-बूटी है जो इंसान के भीतर फिर से प्रेम जागृत कर देती है। कृपा करके आप मुझे वह जड़ी-बूटी दे दीजिए।”

सन्यासी ने कुछ देर ध्यान लगाया, फिर गंभीर स्वर में बोला—
“देवी, मैं तुम्हें वह जड़ी-बूटी दे सकता हूँ, लेकिन उसे बनाने के लिए मुझे एक ऐसी वस्तु चाहिए जो मेरे पास नहीं है।”

स्त्री ने तुरंत कहा—
“आप बताइए बाबा, वह वस्तु मैं लेकर आऊँगी।”

सन्यासी ने उसकी ओर गहराई से देखा और बोला—
“मुझे बाघ की मूंछ का एक बाल चाहिए।”

स्त्री चौंक गई, लेकिन संकल्प दृढ़ था। अगले ही दिन वह घने जंगल की ओर निकल पड़ी। नदी किनारे उसे एक विशालकाय बाघ दिखा। बाघ ने उसे देखते ही भयंकर दहाड़ लगाई। भय से उसका शरीर काँप उठा और वह भाग खड़ी हुई।

लेकिन उसने हार नहीं मानी।
दिन बीतते गए, और वह रोज़ उसी स्थान पर पहुँचने लगी। पहले-पहल वह दूर से खड़ी रहती, फिर धीरे-धीरे नज़दीक आने लगी। बाघ भी अब उसकी उपस्थिति का अभ्यस्त हो गया। स्त्री कभी-कभी उसके लिए मांस छोड़ जाती, और धीरे-धीरे बाघ उस पर विश्वास करने लगा।

महीनों बीत गए। भय की जगह अपनापन आने लगा। अब वह बाघ के पास बैठने लगी, उसके माथे पर हाथ फेरने लगी। और एक दिन, साहस जुटाकर उसने बाघ की मूंछ से धीरे से एक बाल खींच लिया।

वह बाल लेकर हर्षित मन से सन्यासी के पास पहुँची—
“देखिए बाबा! मैं बाघ की मूंछ का बाल ले आई।”

सन्यासी ने मुस्कुराते हुए बाल लिया और बिना कुछ कहे उसे जलती हुई आग में डाल दिया।

स्त्री घबरा उठी—
“अरे बाबा! यह आपने क्या किया? इस बाल को लाने के लिए मैंने न जाने कितनी रातें डर और साहस के बीच गुज़ारीं… अब मेरी जड़ी-बूटी कैसे बनेगी?”

सन्यासी ने गहरी मुस्कान के साथ कहा—
“देवी, अब तुम्हें किसी जड़ी-बूटी की ज़रूरत नहीं है। सोचो, तुमने एक हिंसक और डरावने पशु को धैर्य, विश्वास और प्रेम से अपना मित्र बना लिया। तो क्या तुम उसी धैर्य और प्रेम से अपने पति का हृदय नहीं जीत सकती? जब बाघ बदल सकता है, तो इंसान क्यों नहीं?”

स्त्री की आँखों से आँसू बह निकले। उसने समझ लिया कि असली जड़ी-बूटी तो उसके अपने भीतर थी—धैर्य और प्रेम।
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કાચબાનું સ્થળાંતર

હું રાજકોટથી ભુજ એસ.ટી.મા નીકળવાની તૈયારી માં જ હતો ત્યાં એક મિત્રનો ફોન આવ્યો કે નીકળી ગયો?
મેં ના કહી,તો કહે એક બોક્સ ભુજ મારા બીજા મિત્રને આપવાનું છે.. સરનામું ફોન નંબર બોક્સ ઉપર લખી નાખ્યા છે..સીધો એસ.ટી.સ્ટેશન તને આપી જાઉં છું..
મેં ઓકે કહ્યું ને સૂટકેસ સાથે રિક્ષા પકડી એસટી ડેપો એ પહોંચ્યો..તો મિત્ર બોક્સ સાથે તૈયાર હતો.. બોક્સ હાથમાં લીધું, વજનદાર હતું..
મિત્રને પૂછ્યું તો કહે સ્પેરપાર્ટ કે એવું કંઈક હશે.મને પણ તારા જેવો મિત્ર આપી ગયો છે..

બસમાં બેઠો..સૂટકેસ કેરીયરમા અને બોક્સ ખોળામાં રાખ્યું..બસ ઊપડી.. બોક્સમાં કંઇ સળવળાટ જેવું લાગ્યું
થોડીવાર થઇ તો કંડકટર ટીકીટ માટે આવતો હતો..વારો આવતાં મેં રુપિયા તૈયાર રાખ્યાં.તે આવ્યો પહેલાં ખોળામાં રાખેલ બોક્સમાં શું છે તેમ પૂછ્યું પછી તરત ઉમેર્યું કે બોક્સ તો રોયલ ટેગ વ્હિસ્કી નું છે..
પછી કહે બોક્સ ખોલો..
હું મુંઝાયો..તો તે તાડુકયો કહે જલ્દી ખોલો બોક્સ

મેં ડરતાં ડરતાં બોક્સ ખોલ્યું.. મારાં આશ્ચર્ય વચ્ચે જોયું તો અંદર ત્રણ કાચબા હતા..
કંડકટર કહે કે આ શું? કાચબા! વાંધો નહીં કાચબાની ત્રણ ટીકીટ પણ લઈ લો અને વાત પૂરી કરો.
મેં કહ્યું આ બોક્સ નું વજન વધારે નથી દસ કીલો મારી સૂટકેસ સાથે પણ નહીં થાય,લગેજ ગણી લો..

જે જીવતું હોય અને શ્વાસ લે એને લગેજ ન કહેવાય એ ટીકીટ પાત્ર જ છે

મેં કહ્યું આવી ઉંમર નાની છે માટે અડધી ટીકીટ લો..

હવે ઉંમર નક્કી કરવાનું અઘરું હતું તે કંડકટરે કહેલ નાખી મુસાફરોને કે કોઇ આ કાચબાની ઉંમર કહી શકશે?

ઝબ્બા લેંઘા ધારી એક વડીલ આવ્યા, કાચબા ને ધ્યાનથી જોયા અને કહ્યુ કે સૌથી મોટા કાચબાની ઉંમર ૧૨૦,એનાથી નાનાની ૧૦૦ આને સૌથી નાનાની ઉંમર ૭૦ વર્ષ છે અને તે બંન્ને નો પુત્ર છે..

હવે કંડકટર બગડ્યો કે ચાર ટીકીટ લઇ લો છો કે પછી બસ પુલીસ સ્ટેશન લઇ લઉં?એમ કહી ડબલ ઘંટી મારતાં બસ ઉભી રહી ગઈ..

મેં કહ્યું કે એક મિનિટ મારા વકીલ મિત્ર સાથે વાત કરી પૂછું

વકીલ મિત્ર ને ફોન કર્યો તો કહે કે વન્ય પ્રાણી પ્રતાડના નિવારણ કાયદાની કલમ ૧૨ એ મુજબ કાચબાને હેરાન કરવા એ મોટો ગુન્હો છે જે પાંચ વર્ષની જેલ અને ૫૦હજારના દંડને પાત્ર છે..પોલીસ આમાં વચ્ચે આવે તે પહેલાં તું ચાર ટીકીટ લઇ લે ને તારી જાન છોડાવ..

કંઇક હાશકારાની સાથે કંઇક કચવાટની સાથે છેવટે એક મારી અને ત્રણ કાચબાની, એમ ચાર ટીકીટ ફડાવી..
ભવિષ્યમાં કોઇ સંપેતરા કોઇનાં પણ લેવાં નહીં તેવી પ્રતિજ્ઞા લીધી!

વત્સલ રાણા

Posted in खान्ग्रेस

आपको याद होगा मोदीजी ने  संसद में खड़े होकर,1966 में इंदिरा गांधी के एक खतरनाक कुकर्म से अवगत करवाया था देश को..??
जिसमें मिजोरम में अपने ही देश के भारतीयों पर पहली बार भारतीय वायु सेना ने बमबारी करके मारा था और इस घटना में 40 लोगों की मौत हो गई थी…

भारत के इतिहास में यह प्रथम और अंतिम घटना थी जब भारतीय वायु सेना ने अपनी ही सीमा में अपने ही लोगों पर बम बरसाए थे…

महान द ग्रेट इंदिरा गांधी ने इस कुकर्म के लिए दो पायलटो को चुना था…उसमें से एक फाइटर पायलट थे सुरेश कलमाड़ी जो पहले चित्र में है और दूसरे फाइटर पायलट थे राजेश पायलट

और इन दोनों पायलटो से कहा गया था कि आप इस घटना को अंजाम दीजिए और उसके बाद बवाल मचेगा तो हम आप लोगों से नैतिकता के आधार पर इस्तीफा ले लेंगे ताकि पब्लिक का गुस्सा शांत हो जाए लेकिन उसके बाद हम आप लोगों को कांग्रेस गिरोह में शामिल करके मंत्री बना देंगे और यही हुआ भी…

संसद में इस पर खूब बवाल मचा था तब…

लोगों का गुस्सा खासकर नॉर्थ-ईस्ट के लोगों का गुस्सा शांत करने के लिए भारतीय वायुसेना ने यह कहा कि दोनों फाइटर पायलट सुरेश कलमाडी और राजेश पायलट ने इस्तीफा दे दिया है फिर लश्कर ए कांग्रेस ने दोनों को सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया था…
ऐसी है देश के लिए गद्दार कांग्रेस गिरोह का योगदान भारत और भारतियों के लिए…