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मिसेज़ आफ्टरनून और ग्वादर का किस्सा

सातवें पाकिस्तानी वज़ीर ऐ आज़म  थे सर मलिक फ़िरोज़ ख़ान नून। सर नून इंग्लैंड के पढ़े लिखे थे- आज़ादी से पहले इंग्लैंड में ही नौकरी पे थे- चर्चिल और जिन्ना के बेहद नज़दीकी। सर नून की मुलाक़ात इंग्लैंड में एक ऑस्ट्रियन मूल की लेडी से हुई- विक्टोरिया रेखा उर्फ़ विक्की। लेडी विकी एक इंग्लैंड में रह रहे पंजाबी की ब्याहता थी। लेकिन सर नून और लेडी विकी में पेंच फँस गया- नैन लड़ गए।

सर नून को जिन्ना ने हिंदुस्थान वापस बुलाया- लेडी विकी भी पीछे पीछे चली आई। लेडी विकी ने और सर नून ने अपना अपना दूसरा निकाह करने का फ़ैसला किया। लेडी विक्की सर नून से २७ साल छोटी ज़रूर थी किंतु लेडी की राजनैतिक समझ सर नून से बहुत बहुत आगे थी।

सर नून की पहली बेगम ख़ुद को मिसेज़ नून कहलाना पसंद करती थी। जब सर नून की ये दूसरी बेगम आई तो सर नून के दोस्तों में बात चली- दूसरी बेगम ख़ुद को क्या कहलाना पसंद करेंगी।

एक ज़ालिम दोस्त बोला- चूँकि पहली है मिसेज़ नून तो सर नून की दूजी बेगम का नाम होगा- मिसेज़ आफ्टरनून।

खैर- पोस्ट का उद्देश्य गुड आफ्टर नून या गुड इवनिंग डिस्कस करना नहीं है। मंतव्य कुछ और है।

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भारत पाकिस्तान के आज़ाद होने के बाद ग्वादर बंदरगाह भारत को ऑफर हुआ- ओमानी सरकार के क़ब्ज़े में था ये पोर्ट। भारत को ये ऑफर १९५० से लेके १९५५ तक मिला था जब चच्चा साहब देश के वज़ीर ए आज़म थे। पोर्ट की क़ीमत चूँकि काफ़ी थी लिहाजा देश के अनेक जैन व्यापारियों ने इसे ख़रीदने में दिलचस्पी दिखाई। किंतु चच्चा साहब ने बंदरगाह ख़रीदने से इंकार कर दिया- कारण कदाचित् था कि पोर्ट की क़ीमत बहुत है, पोर्ट का क़ब्ज़ा बिज़नेस समुदाय के पास ना चला जाएँ और सबसे महत्त्वपूर्ण कारण – पोर्ट तक पहुँचने की एक्सेस हमारे पास नहीं होगी, और इस से पाकिस्तान चिढ़ जाएगा।

चच्चा साहब चाहते तो ये पोर्ट आसानी से भारत को मिल सकता था- खरीदने में व्यापारी समुदाय पीछे ना था और ब्रिटिश सिफारिश लेने में चच्चा की महिला मित्र खासमखास थी- मतलब चच्चा को केवल हाँ कहने की देर थी। लेकिन दूरदर्शी चच्चा ने पोर्ट नहीं खरीदा।

इस दौरान पाकिस्तान जोरोशोरों से उस पोर्ट को हासिल करने की जुगत में भिड़ा रहा। क़ीमत अधिक थी – तीन मिलियन पाउंड तो सर आगा ख़ान से रोकड़ा ले लिया। किंतु सबसे बड़ा मुद्दा था ओमान के सुल्तान से मांडवाली करने का। और इस में सबसे अहम भूमिका निभाई लेडी विक्की नून, उर्फ मिसेस आफ्टरनून ने।

मिसेज आफ्टरनून के ख़ाविंद सर नून जब पाकिस्तान के सातवें वज़ीर ए आज़म बने तो मिसेज ब्रिटेन में डेरा डाल पड़ी रही और ब्रिटेन के अहम नेताओं की मदद से ओमानी सुल्तान से इस पोर्ट की ख़रीददारी करवा कर ही साँस ली। सर नून ने पोर्ट ख़रीदने के बाद रेडियो पाकिस्तान में बड़े गर्व से अनाउंस करवाया कि अब ये पोर्ट पाकिस्तानी मिल्कियत है। इसके लिए लेडी आफ्टरनून को “निशान ए इम्तियाज़ “तमगा भी दिया गया। अंदरूनी सूत्र कहते है पहले बेगम नून को “हिला ले इम्तियाज़” तमग़ा देने की बात चली थी फिर आलिमों ने कहा- पड़ोसी मुल्क के बाशिंदे बड़े बेशऊर है, बहुत मज़ाक़ उड़ायेंगे।

तो- जनाब, हज़रात कद्रदानों- इस से हमने क्या सीखा? हमने सीखा-

– चच्चा देश के पहले प्रधान मंत्री रहे जबकि उनके दौरान पाकिस्तान के सात से अधिक पीएम बन के निकल भी लिए। चच्चा अंबुजा सीमेंट की भाँति मजबूती से टिके रहे।
– चच्चा की भी अंग्रेजन गर्लफ्रेंड थी किंतु चच्चा ने उस से कोई राजनैतिक लाभ ना लिया। चच्चा साहब ट्रू लव के हिमायती थे और लव की आड़ में ऐसे छिछोरे काम नहीं करते थे।
– चच्चा चाहते तो बेगम नून की तरह अपनी अंग्रेजन गरलसखी को भी भारत रत्न दे सकते थे किंतु नहीं दिया। बहुत स्वाभिमानी टाइप थे चच्चा जी।

फ़ोटू में रंगीला रतन चच्चा सर नून और लेडी आफ्टरनून उर्फ़ बेगम विकारउलनिस्सा की आगवानी करते हुए!

वो लेडी नून लंदन से बंदरगाह ले आई,
चच्चा ने बस अंग्रेजन संग शायरी सुनवाई।

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