Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

#साभार_पोस्ट

#लोहे_को_लोहे_से_ही_काटना_पड़ता_है

मैं बायोलॉजी की स्टूडेंट थी..

पहले दिन जब हमें bio लैब में ले जाया गया तो बोतलों में रखे विभिन्न जन्तुओं के speciman और फॉर्मेलिन की दुर्गंध से उबकाई आने लगी क्योंकि घर मे तो मम्मी लहसुन तक से परहेज़ रखती थी
मेरे परिवार में मैं इकलौती साइंस स्टूडेंट थी

पहले पहल उन speciman को सामने रखकर जब draw किया  और क्लासीफिकेशन लिखा तो रात को सपने में भी फॉर्मेलिन में डूबे वो speciman डरा रहे थे

ग्रेड 9  के half yearly से हमे डिसेक्शन सिखाया जाने लगा
पहले दिन लैब में एक  बेहोश मेंढक दिया जिसे हमे डिसेक्शन ट्रे में गाड़ कर उसे काटना था। वो देखकर ही चक्कर आ रहा था…नये चमचमाते डिसेक्शन किट से कांपते हाथों से scalpel उठाया…मेंढक की पेट की चमड़ी forcep से पकड़ी और  बीच से काट दिया। भलभला कर खून दे ट्रे भर गई …हमारी टीचर सामने demo दे रही थी।

फिर उसके बाद मेंढक के खुले हुए अंग हमारे सामने थे digestive system से लेकर रेस्पिरेटरी सिस्टम तक सब देखा

उस दिन घर जाकर घण्टों साबुन से हाथ धोया फिर भी लग रहा था कि बदबू आ रही है…रात को सपने में मेंढक की बड़ी बड़ी आंखे दिख थी

फिर हर हफ्ते मेंढक काटने लगे। अब डर नही लग रहा था..हाथ सधने लगा था.. इतनी सफाई से मेंढक कट रहा था कि कौनसा सिस्टम स्पॉट करना है वो बांये हाथ का खेल हो गया

फिर बोर्ड की तैयारी के लिए बारिश में नाली में मिलने वाले मेंढक पकड़ने शुरू किए..घर मे क्लोरोफॉर्म नही होता था तो मेंढक का सर पटक कर बेहोश करना पड़ता था ..बायो में highest marks आने लगे

कभी कभी जब बीच डिसेक्शन के मेंढक को होश आ जाता था तो उसे दबोचना मुश्किल होता था तो उसे forcep से दबा कर उसके मस्तिक्ष पर फिर से चोट करते थे और डिसेक्शन पूरा करते थे।

कम से कम 50 मेंढक काटे होंगे सीखने के लिए

फिर कॉलेज में  बायो लैब में कॉकरोच काटे, डॉग फिश काटी, कबूतर और  खरगोश काटा

अगर आपमे से कुछ लोग ये सब पढ़कर घिना रहे हैं और मुझे गालियाँ देने की तैयारी कर रहे हैं तो जान लीजिए आप वही मेंढक मछली या कॉकरोच हो सकते हैं…

जब आप इसे पढ़ भी नही सकते तो कभी काट भी नही सकते

अगर एक दुर्ज़ी जो अपनी कैंची से हज़ारों कपड़े काटता है लेकिन अपनी सुरक्षा के लिए वही कैंची अपने खूनियों पर नही घोंप सकता तो वो इसलिए की दया ,ममता और  अहिंसा ने हमे पंगु कर रखा है..ये साला “चींटी को भी मत मारो” वाली थ्योरी ने हिजड़ा बना दिया है…

कल को अगर किसी नाई पर आक्रमण हो तो क्या वो अपना उस्तरा किसी के गले पर चला पायेगा? उसे तो उस्तरे से सिर्फ दाड़ी छीलनी आती है

क्या सब्जी वाला कटहल के चाकू से अपनी सुरक्षा कर पायेगा

हम चाकू से सिर्फ सब्जी काटते हैं लेकिन चाकू से चिकन मटन और मछली भी कट सकती है …और भी बहुत कुछ

जरूरी नही की वेजेटेरियन बच्चे मेंढक ना काट सकें …10th तक सब बच्चों को मेंढक काटने का अनिवार्य अभ्यास होना चाहिए जिससे उन्हें भलभलाते हुए खून से डर ना लगे…उन्हें पता हो कि मेंढक के सर के किस हिस्से पर वार करना है जिससे वो बेहोश हो जाता है
उन्हें पता हो कि मेंढक की किस artery को rupture करने से वो पंगु हो जाता है और भाग नही सकता

वेज और वीगन का ज्ञान देते देते लोग खून के नाम से उबकाई लेने लगते हैं लेकिन जब सामना राक्षसों से हो तो खून से डर नही लगना चाहिए बल्कि सीना फाड़ कर बिना एक बूंद भी गिरे कर में खप्पर डाल कर पी जाना चाहिए रक्त चामुंडा की तरह ।
वरना अगर रक्त भूमि पर गिरा तो करोड़ों रक्तबीज पैदा हो जायेंगे

अपने बच्चों को कभी कभी फ्रेश चिकन की दुकान पर ले जाइए educational tour पर…कटने के पहले मुर्गा फड़फड़ाता है छूटने की कोशिश करता है ..अगर  कसाई उसकी आँखों मे देख ले तो कभी काट नही सकता इसलिए वो ऊपर वाले के नाम पर उसे काट देता है.…..जब कसाई जीवित मुर्गे को गर्दन मरोड़कर मारे तो आप व बच्चे  डर से अपनी आँखें ना बन्द करें बल्कि खुली  आँखों से देखे कि यदि वो इस डर से बाहर नही निकले तो एक दिन वो इसी मुर्गे की तरह हलाल कर दिए जायेंगे

नानवेज खाना सेहत के लिए अच्छा नही है लेकिन कसाई को इससे कोई मतलब नही…उसका काम मारना है जिससे उसके घर का चूल्हा जलता है

वो मारने से नही डरता क्योंकि अगर वो जानवरों को नही मारेगा तो खुद भूखा मर जायेगा

अहिंसा से हिंसा को नही जीता जा सकता…रगों में खून सिर्फ पानी होने के लिए नही होता ….

अगर आप कसाई नही तो फिर आप मुर्गा बकरा या मछली …कुछ भी हो सकते हो

मुर्गा खाओ ना खाओ काटना आना चाहिए और अपने बच्चों को भी सिखाओ कि डर को जीतने के लिए डरपोक को मारना पड़ता है

डरपोक की रक्षा भगवान भी नही कर सकता
(अगर आपको लगता है ये पोस्ट शेयर करना जरूरी नही है तो अपना जीवन बीमा जरूर करा लेना अगर घर का कोई सदस्य बचा तो उसे कटे हाथ पैरों से भीख नही मांगनी पड़ेगी)

Posted in रामायण - Ramayan

रामकथा.
वारानिकोवजी ने अज़रबैजान में कभी अपने बचपन के दिनों में एक गड़ेरिया के मुंह से रामकथा सुनी थी । कथा श्रवण मात्र से वे भावविभोर हो गए । वे भारत के राम को देखना चाहते थे। स्पर्श करना चाहते थे । उनकी इच्छा पूरी हुई । वे मास्को यूनिवर्सिटी में भारतविद्या के प्रोफेसर नियुक्त हुए । राम को गहराई में आत्मसात किया । उन्होंने रामचरित मानस का रूसी भाषा में अनुवाद किया । पूरे रूस को रामकथा से परिचित करवाया । वह रूस के तुलसीदास थे । मृत्यु के समय भी वे राम का चिंतन कर रहे थे । मास्को के पास एक शांत जगह उन्हें दफना दी गई । उनकी इच्छा के अनुसार, समाधि  के ऊपर दो श्लोकों में राम की अपार महिमा  लिखी गई । गोरखपुर के हनुमान प्रसाद पोद्दार जी की तरह उनमें राम को खोजने की जिजीविषा थी । वे सफल हुए । उनका स्वप्न फलीभूत हुई । आज रूस की आधुनिक पीढ़ी राम और उनके भारत को बहुत अच्छा जानते हैं । वारानिकोव जी ने रूस को राममय कर दिया । आज रूस और भारत एक हैं । इसके  मूल  में राम और सनातन चिंतन है ।

Posted in नहेरु परिवार - Nehru Family, हिन्दू पतन

देश का पहला दुर्भाग्य PM नेहरु थे भारत में पहली बूथ केप्चरिंग का मास्टर माइंड

जवाहर लाल नेहरू देश में हुए प्रथम आम चुनाव में उत्तर प्रदेश की रामपुर सीट से पराजित घोषित हो चुके कांग्रेसी प्रत्याशी मौलाना अबुल कलाम आजाद को किसी भी कीमत पर जबरजस्ती जिताने के आदेश दिये थे | उनके आदेश पर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री पं गोविन्द वल्लभ पन्त ने रामपुर के जिलाधिकारी पर घोषित हो चुके परिणाम बदलने का दबाव डाला और इस दबाव के कारण प्रशासन ने जीते हुए प्रत्याशी विशन चन्द्र सेठ की मतपेटी के वोट मौलाना अबुल के पेटी के डलवाकर दुबारा मतगणना करवाकर मौलाना अबुल को जीता दिया |

ये रहस्योदघाटन उत्तर प्रदेश के तात्कालीन सुचना निदेशक शम्भुनाथ टंडन ने अपने एक लेख मे किया है |

उन्होंने अपने लेख “जब विशन सेठ ने मौलाना आजाद को धुल चटाई थी भारतीय इतिहास की एक अनजान घटना ” में लिखा है की भारत मे नेहरु ही बूथ कैप्चरिंग के पहले मास्टर माइंड थे | उस ज़माने में भी बूथ पर कब्जा करके परिणाम बदल दिये जाते थे और देश के प्रथम आम चुनाव मे सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही कांग्रेस के 12 हारे हुए प्रत्याशियों को जिताया गया | देश के बटवारे के बाद लोगो मे कांग्रेस और खासकर नेहरु के प्रति बहुत गुस्सा था लेकिन चूँकि नेहरु के हाथ मे अंतरिम सरकार की कमान थी इसलिए नेहरु ने पूरी सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल करके जीत हासिल थी |

देश के बटवारे के लिए हिंदू महासभा ने नेहरु और गाँधी की तुष्टीकरण की नीति को जिम्मेदार मानते हुए देश मे उस समय जबरजस्त आन्दोलन चलाया था और लोगो मे नेहरु के प्रति बहुत गुस्सा था, इसलिए हिंदू महासभा ने कांग्रेस के दिग्गज नेताओ के विरुद्ध हिंदू महासभा के दिग्गज लोगो को खड़ा करने का निश्चय किया था | इसीलिए नेहरु के विरुद्ध फूलपुर से संत प्रभुदत्त ब्रम्हचारी और मौलाना अबुल के विरुद्ध रामपुर से भईया विशन चन्द्र सेठ को लडाया गया | नेहरु को भी अंतिम राउंड मे जबरजस्ती 2000 वोट से जिताया गया | वही सेठ विशन चन्द्र के पक्ष मे भारी मतदान हुआ और मतगणना के पश्चात प्रशासन ने बकायदा लाउडस्पीकरों से सेठ विशन चंद को 10000 वोट से विजयी घोषित कर दिया | और फिर रामपुर मे हिंदू महासभा के लोगो ने विशाल विजयी जुलुस भी निकाला | फिर जैसे ही ये समाचार वायरलेस से लखनऊ फिर दिल्ली पहुची तो मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की अप्रत्याशित हार के समाचार से नेहरु तिलमिला और तमतमा उठे। उन्होंने तुरंत उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री पं गोविन्द वल्लभ पन्त को चेतावनी भरा संदेश दिया की मै मौलाना की हार को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नही कर सकता, अगर मौलाना को जबरजस्ती नही जिताया गया तो आप अपना इस्तीफा शाम तक दे दीजिए |

फिर पन्त जी ने आनन फानन मे सुचना निदेशक (जो इस लेख के लेखक है) शम्भू नाथ टंडन को बुलाया और उन्हें रामपुर के जिलाधिकारी से सम्पर्क करके किसी भी कीमत पर मौलाना अबुल को जिताने का आदेश दिया. . फिर जब शम्भु नाथ जी के कहा की सर इससे दंगे भी भडक सकते है तो इस पर पन्त जी ने कहा की देश जाये भांड मे नेहरु जी का हुकम है | फिर रामपुर के जिलाधिकारी को वायरलेस पर मौलाना अबुल को जिताने के आदेश दे दिये गए | फिर रामपुर के सीटी कोतवाल ने सेठ विशनचन्द्र के पास गया और कहा कि आपको जिलाधिकारी साहब बुला रहे है जबकि वो लोगो की बधाईयाँ स्वीकार कर रहे थे |

और जैसे ही जिलाधिकारी ने उनसे कहा कि मतगणना दुबारा होगी तो सेठ विशन चन्द्र ने इसका कड़ा विरोध किया और कहा कि मेरे सभी कार्यकर्ता जुलुस मे गए है ऐसे मे आप बिना मतगणना एजेंट के दुबारा कैसे मतगणना कर सकते है ? लेकिन उनकी एक नहीं सुनी गयी और जिलाधिकारी के साफ साफ कहा कि सेठ जी हम अपनी नौकरी बचाने के लिए आपकी बलि ले रहे है क्योंकि ये नेहरु का आदेश है |

शम्भु नाथ टंडन जी ने आगे लिखा है कि चूँकि उन दिनों प्रत्याशियो के नामो की अलग अलग पेटियां हुआ करती थी और मतपत्र पर बिना कोई निशान लगाये अलग अलग पेटियों मे डाले जाते थे इसलिए ये बहुत आसान था कि एक प्रत्याशी के वोट दूसरे की पेटी मे मिला दिये जाये | देश मे हुए प्रथम आमचुनाव की इसी खामी का फायदा उठाकर अय्यास नेहरु ने इस देश की सत्ता पर काबिज हुआ था और उस नेहरु ने इस देश मे जो भ्रष्टाचार के बीज बोये थे वो आज उसके खानदान के “काबिल” वारिसों के अच्छी तरह देखभाल करने की वजह के एक वटवृक्ष बन चूका है |

लेखक :- शम्भू नाथ टंडन (तत्कालीन सूचना निदेशक)
साभार :- गाँधी और नेहरू : हिंदुस्तान का दुर्भाग्य

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मिसेज़ आफ्टरनून और ग्वादर का किस्सा

सातवें पाकिस्तानी वज़ीर ऐ आज़म  थे सर मलिक फ़िरोज़ ख़ान नून। सर नून इंग्लैंड के पढ़े लिखे थे- आज़ादी से पहले इंग्लैंड में ही नौकरी पे थे- चर्चिल और जिन्ना के बेहद नज़दीकी। सर नून की मुलाक़ात इंग्लैंड में एक ऑस्ट्रियन मूल की लेडी से हुई- विक्टोरिया रेखा उर्फ़ विक्की। लेडी विकी एक इंग्लैंड में रह रहे पंजाबी की ब्याहता थी। लेकिन सर नून और लेडी विकी में पेंच फँस गया- नैन लड़ गए।

सर नून को जिन्ना ने हिंदुस्थान वापस बुलाया- लेडी विकी भी पीछे पीछे चली आई। लेडी विकी ने और सर नून ने अपना अपना दूसरा निकाह करने का फ़ैसला किया। लेडी विक्की सर नून से २७ साल छोटी ज़रूर थी किंतु लेडी की राजनैतिक समझ सर नून से बहुत बहुत आगे थी।

सर नून की पहली बेगम ख़ुद को मिसेज़ नून कहलाना पसंद करती थी। जब सर नून की ये दूसरी बेगम आई तो सर नून के दोस्तों में बात चली- दूसरी बेगम ख़ुद को क्या कहलाना पसंद करेंगी।

एक ज़ालिम दोस्त बोला- चूँकि पहली है मिसेज़ नून तो सर नून की दूजी बेगम का नाम होगा- मिसेज़ आफ्टरनून।

खैर- पोस्ट का उद्देश्य गुड आफ्टर नून या गुड इवनिंग डिस्कस करना नहीं है। मंतव्य कुछ और है।

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भारत पाकिस्तान के आज़ाद होने के बाद ग्वादर बंदरगाह भारत को ऑफर हुआ- ओमानी सरकार के क़ब्ज़े में था ये पोर्ट। भारत को ये ऑफर १९५० से लेके १९५५ तक मिला था जब चच्चा साहब देश के वज़ीर ए आज़म थे। पोर्ट की क़ीमत चूँकि काफ़ी थी लिहाजा देश के अनेक जैन व्यापारियों ने इसे ख़रीदने में दिलचस्पी दिखाई। किंतु चच्चा साहब ने बंदरगाह ख़रीदने से इंकार कर दिया- कारण कदाचित् था कि पोर्ट की क़ीमत बहुत है, पोर्ट का क़ब्ज़ा बिज़नेस समुदाय के पास ना चला जाएँ और सबसे महत्त्वपूर्ण कारण – पोर्ट तक पहुँचने की एक्सेस हमारे पास नहीं होगी, और इस से पाकिस्तान चिढ़ जाएगा।

चच्चा साहब चाहते तो ये पोर्ट आसानी से भारत को मिल सकता था- खरीदने में व्यापारी समुदाय पीछे ना था और ब्रिटिश सिफारिश लेने में चच्चा की महिला मित्र खासमखास थी- मतलब चच्चा को केवल हाँ कहने की देर थी। लेकिन दूरदर्शी चच्चा ने पोर्ट नहीं खरीदा।

इस दौरान पाकिस्तान जोरोशोरों से उस पोर्ट को हासिल करने की जुगत में भिड़ा रहा। क़ीमत अधिक थी – तीन मिलियन पाउंड तो सर आगा ख़ान से रोकड़ा ले लिया। किंतु सबसे बड़ा मुद्दा था ओमान के सुल्तान से मांडवाली करने का। और इस में सबसे अहम भूमिका निभाई लेडी विक्की नून, उर्फ मिसेस आफ्टरनून ने।

मिसेज आफ्टरनून के ख़ाविंद सर नून जब पाकिस्तान के सातवें वज़ीर ए आज़म बने तो मिसेज ब्रिटेन में डेरा डाल पड़ी रही और ब्रिटेन के अहम नेताओं की मदद से ओमानी सुल्तान से इस पोर्ट की ख़रीददारी करवा कर ही साँस ली। सर नून ने पोर्ट ख़रीदने के बाद रेडियो पाकिस्तान में बड़े गर्व से अनाउंस करवाया कि अब ये पोर्ट पाकिस्तानी मिल्कियत है। इसके लिए लेडी आफ्टरनून को “निशान ए इम्तियाज़ “तमगा भी दिया गया। अंदरूनी सूत्र कहते है पहले बेगम नून को “हिला ले इम्तियाज़” तमग़ा देने की बात चली थी फिर आलिमों ने कहा- पड़ोसी मुल्क के बाशिंदे बड़े बेशऊर है, बहुत मज़ाक़ उड़ायेंगे।

तो- जनाब, हज़रात कद्रदानों- इस से हमने क्या सीखा? हमने सीखा-

– चच्चा देश के पहले प्रधान मंत्री रहे जबकि उनके दौरान पाकिस्तान के सात से अधिक पीएम बन के निकल भी लिए। चच्चा अंबुजा सीमेंट की भाँति मजबूती से टिके रहे।
– चच्चा की भी अंग्रेजन गर्लफ्रेंड थी किंतु चच्चा ने उस से कोई राजनैतिक लाभ ना लिया। चच्चा साहब ट्रू लव के हिमायती थे और लव की आड़ में ऐसे छिछोरे काम नहीं करते थे।
– चच्चा चाहते तो बेगम नून की तरह अपनी अंग्रेजन गरलसखी को भी भारत रत्न दे सकते थे किंतु नहीं दिया। बहुत स्वाभिमानी टाइप थे चच्चा जी।

फ़ोटू में रंगीला रतन चच्चा सर नून और लेडी आफ्टरनून उर्फ़ बेगम विकारउलनिस्सा की आगवानी करते हुए!

वो लेडी नून लंदन से बंदरगाह ले आई,
चच्चा ने बस अंग्रेजन संग शायरी सुनवाई।