बहु बोली ” मां मै राखी खरीदने बाजार जा रही हूँ। ” सास बोली ” पैसे तो है ना तेरे पास ? ” बहु ने मुठी मे बन्द पैसे सास को दिखाये। सास ने पैसे झपट लिए फिर उन मुड़े तुडें नोटो को गिना पूरे तीन सौ चालीस रुपये थे। सास बोली ” पांच भाईयों के लिए राखी खरीदने जा रही हो। इतने से रुपयों मे पांच राखी भी नही आयेगी। फिर मिठाई और नारियल भी खरीदने होंगे। सुरेश से और पैसे मांग ले? ” बहु उदास स्वर मे बोली ” पांच दिन से बरसात हो रही है। मजदूरी पर नही गए। घर पर बैठे हैं। जितने पैसे थे सारे दे दिये। सास बोली ” उदास क्यों होती है बेटा मै हूँ ना। फिर सास ने अपनी सारी जमा पूंजी निकाली। उन्हे गिना। पूरे 900 रुपये थे सारे बहु को देते हुए बोली ” तेरी माँ जैसी ही हूँ मै। परेसानी छुपाया मत कर। बता दिया कर।” बहु सास के सीने से चिपक कर सुबकने लगी। और बोली “आप बस माँ बने रहना। इसी प्यार के दम पर मै सारी परेसानियां झेल लुंगी माँ” ऐसी सास का बुढ़ापा बहुत अच्छा गुजरता है। क्योंकि जो बहु बेटी बन जाती है वो माँ को कभी भी दुख मे नही देख सकती।