Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

पापा ने फोन किया ” बेटी तू रक्षाबंधन के दो दिन पहले आ जा। तेरी दादी तुझे बहुत याद कर रही है। ” सरला बोली ” नही आ सकती पापा। सास बोल रही है रक्षाबंधन वाले दिन ही जाना। आप दादी से मेरी बात कराओ। ” कुछ देर बाद सरला के कान मे दादी की आवाज आई “छोरी तू कल ही आ जा। मरने से पहले तुझे देखना चाहती हूँ। ” सरला की आँखों मे आंसू उमड़ आये ” ऐसे मत बोलो दादी। आपको अभी बहुत दिन और जीना है। ”  दादी ने पोती की आवाज के कम्पन को पहचान लिया ” बोली ” मरी नही हूँ। तू अभी से रोंने लगी। अगर कल नही आई तो सचमुच मर जाऊंगी।”  इतना कह कर दादी ने फोन अपने बेटे को दे दिया। सरला के लिए दादी सबकुछ थी। बचपन से लेकर जवानी तक दादी से ही चिपकी रहती थी। दादी के पास ही सोती थी। माँ से इतना प्रेम नही था जितना दादी से था। दादी ही उसकी माँ थी। सहेली थी। गुरु थी। अगले दिन वह जैसे तैसे सास को मना कर पीहर पहुंची। दौड़कर सबसे पहले दादी के  कमरे मे गई। दादी अब खाट पकड़ चुकी थी। उठ कर चला नही जाता था। सरला सोई हुई दादी के चिपट् कर ढां ढां करके रोने लगी। ” तू मरने की बात मत किया कर दादी। ये क्या हालत बना रखी है। मेरी शादी को दो साल भी पूरे नही हुए और तुमने खटिया पकड़ ली?” दादी ने अपने कमजोर हाथो से उसे जकड़ लिया। फिर धीरे से बोली ” जिसकी सबसे अच्छी सहेली उससे दूर चली गई हो वो खाट नही पकड़ेगी तो क्या करेगी?” सरला रोते हुए बोली ” ऐसे मत बोलो दादी। याद करो ससुराल भी तुमने ही मुझे भेजा था। ” दादी बात बदलते हुए बोली ” मै तो मजाक कर रही हूँ बिटिया। अमर थोड़े हूँ। एक दिन तो जाना ही पड़ेगा।” उस रात वह दादी के पास ही सोई। रात मे दादी ने उसे जगाया फिर अपने सिरहाने से चाबियों का गुच्छा निकाला और सरला को देते हुए बोली ” ले वो संदूक खोल और उसमे से मेरे गहने वाला डिब्बा निकाल।” सरला ने चुपचाप डिब्बा निकाल कर दादी को दे दिया। दादी ने उसमे से सोने के दो भारी कड़े निकाले और उन्हे सरला को देते हुए बोली ” बचपन मे तुझे ये बहुत पसंद थे ना? ले आज से ये तुम्हारे हैं।” सरला उछलते हुए बोली ” नही दादी, ये मुझे नही चाहिए। इन पर आपके बेटे और पोतों का हक है। मै इन्हें नही लुंगी। ” दादी ने भरी आँखों से उसे निहारते हुए कहा ” बेटे और पोतों के लिए और भी गहने है। ये मै तुझे ही दूँगी। मेरी आखरी इच्छा समझ कर रख ले।” सरला भी एक स्त्री ही तो थी। स्त्री के लिए गहना बहुत मायने रखता है। उसने दादी की अंतिम इच्छा समझ कर रख लिए। उसके बाद वह दो दिन रुकी। रक्षाबंधन के अगले दिन ससुराल जाने से पहले पिता  को कड़े दिखाते हुए सारी बात बताई। पिता ने कहा ” माँ ने तुम्हे दिये है तो ये तुम्हारे हुए। दिल पर किसी तरह का बोझ मत रखना। तुम अपनी दादी की पोती ही नही हो। उसकी सहेली हो। देखो तुम्हारे आने से उसके चेहरे पर रौनक आ गई है। ये तुम्हारी दादी और दादा की प्यार की निशानी है इन्हे तुड़वाना मत। सम्भाल कर रखना। ”  उसके बाद वह दादी से मिलकर ससुराल आ गई। मगर अभी वह घर मे प्रवेश भी नही कर पाई थी कि पीहर से फोन आ गया। कि दादी आ  नही रही।

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