#अकबर ने पहली बार हरम को किया व्यवस्थित, अकबर के हरम में रहती थीं पांच हज़ार से ज़्यादा औरते,हरम के अंदर एक ख़ास तरह से चलती थी व्यवस्था, तीन सुरक्षा पंक्तियों के बीच रहती थीं मुग़लों की औरतें –
एक विदेशी #मनूची के साथ मुगल हरम में क्या बीती?
यह किस्सा है इतावली मनूची का। पेशे से चिकित्सक और मुग़ल शहजादे #दाराशिकोह से बेहद घनिष्ठता थी उसकी। मनूची ने अपने संस्मरणों की क़िताब मुग़ल इंडिया (स्टोरिया डो मोगोर) में आगे लिखा है, ‘ऐसे ही एक बार हरम में जाते वक़्त शहजादे ने जब मुझे ढका हुआ देखा तो उसने हिजड़े को आदेश दिया कि मेरे ऊपर से कपड़ों को हटा दिया जाए। भविष्य में मुझे बिना ढके ही अंदर प्रवेश करने और बाहर आने की इजाज़त दे दी गई। शहजादे का मानना था ईसाइयों के दिमाग़ में वैसी गंदगी और अश्लीलता नहीं होती, जैसी मुसलमानों में होती है।’
शाही घराने के रिवाज के मुताबिक जब किसी चिकित्सक को हरम में बुलाया जाता है, तो वहां तैनात हिजड़ों का जिम्मा रहता है कि वे उसे सिर से कमर तक कपड़े से ढक दें। चिकित्सक को वे उसी तरह मरीज के कमरे में ले जाते हैं और इलाज के बाद बाहर ले आते हैं। क्योंकि मैं हरम में कई बार जा चुका था, वे मुझ पर भरोसा करने लगे थे।’
मनूची ने लिखा है कि चूंकि हरम की महिलाओं को अपने पति के अतिरिक्त किसी और मर्द से मिलने का कोई मौका नहीं मिलता, इसलिए वे जानबूझकर बीमार होने का बहाना बनाती हैं, ताकि उन्हें चिकित्सक से मिलने, बात करने और नब्ज़ दिखाने के बहाने उन्हें छूने का मौका मिल सके।
ऐसी मुलाकातों में चिकित्सक और मरीज के बीच एक पर्दा होता। चिकित्सक परदे के भीतर हाथ बढ़ाता। अंदर बैठी औरत उस बढ़े हुए हाथ को पकड़ कर चूमती। फिर उन्हें आहिस्ते से दांतों से काटती। कुछ औरतें उत्सुकतावश उन हाथों को अपने स्तनों तक ले जाकर स्पर्श करातीं।
ख़ुद मनूची के साथ कई दफा ऐसा हुआ। ऐसे में उसने क्या किया? वह बताता है, ‘मैं जानबूझकर अनजान बना रहता ताकि वहां मेरे पास बैठे हिजड़े और परिचारिका को यह मालूम न हो कि अंदर क्या हो रहा है।’
मनूची को मुग़ल हरम के बारे में इतनी सारी जानकारी बस इसलिए मिल सकी, क्योंकि वह चिकित्सक था। वरना तो शाही घराने के सदस्यों के अलावा किसी को अनुमति नहीं थी हरम तक जाने की। इसी वजह से अबुल फजल जैसे दरबारी इतिहासकार भी हरम की औपचारिक संरचना के बारे में ही बता सके, उसके अंदर की रोजाना गतिविधियों के बारे में नहीं।
लेकिन, मनूची की तरह ही #बर्नियर, #थॉमस_रो, #जॉन_मार्शल, फ्रांसिस्को पेलसर्ट, विलियम फिंच जैसे विदेशियों के संस्मरणों में हरम के कई दिलचस्प किस्से मिल जाते हैं। इनमें से कुछ ने वास्तव में चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई की थी, जबकि कुछ नीम-हकीम थे। इसी का फायदा उठाकर इन लोगों ने हरम तक अपनी पहुंच बनाई। हालांकि इनके लिखे में से कुछ में कोरी गप्प होती है और कुछ में बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बातें। फिर भी इनसे हरम के बारे में काफी कुछ पता चल जाता है।
अरबी का शब्द है हरम, जिसका अर्थ होता है पवित्र या वर्जित। मुग़ल साम्राज्य के संस्थापक बाबर के वक़्त भी हरम था, लेकिन चूंकि उसने हिंदुस्तान पर केवल चार बरस हुकूमत की और इसमें भी ज़्यादातर समय लड़ाई के मैदान में बीता, इसलिए वह अपने हरम पर अधिक ध्यान नहीं दे सका। हरम को व्यवस्थित रूप दिया अकबर ने।
मुग़लों ने अपने हरम में दुनिया के कई देशों, विभिन्न धर्म और संस्कृतियों की महिलाओं को लाकर रखा था। यहां मुग़लों की पत्नियां, उनकी महिला रिश्तेदार रहतीं। इनमें से अधिकांश जन्म, निकाह, नियुक्तियों या उपहार के रूप में हरम में दाखिल होती थीं। इन महिलाओं से परदा के नियमों का पालन करने की अपेक्षा की जाती। उन्हें अपनी इच्छा के अनुसार हरम से बाहर जाने की अनुमति नहीं थी।
कहते हैं कि मुग़लों की मानसिकता को समझने के लिए उनके हरम को भी जानना ज़रूरी है। मनूची लिखता है, ‘मुसलमानों का औरतों से बहुत लगाव है। औरतों के बीच ही उन्हें सुकून मिलता है। उनका साथ ही उन्हें सबसे ज़्यादा सुख देता है।’ लेकिन, हरम केवल उनकी यौन भूख को पूरा करने के लिए ही नहीं था और वहां केवल औरते ही नहीं रहती थीं। वहां बच्चे पैदा होते, उनकी परवरिश की जाती। हरम के परिसर में बाज़ार थे, लांड्री थी, कपड़े सिलने वाले दर्जी थे। रसोईघर, स्नानघर, हम्माम, स्कूल, खेल के मैदान – सब कुछ होता था वहां।
हरम में शाही ख़ज़ाना भी होता, जिसमें गुप्त और महत्वपूर्ण दस्तावेज और शाही मुहर होते। यह ऐसी जगह थी, जहां बादशाह चाहे तो बिना किसी बाधा के अपने शाही काम निबटा सके। कई बार बादशाह वहां अपनी रातें भी बिताता था। हरम में एक पदानुक्रम था। बादशाह की पत्नियां और उनके रिश्तेदार प्रमुख पदों पर होते। उनके नीचे हज़ारों औरतें होती थीं, रखैलें और दासियां। हरम का आकार इतना विशाल होता था कि दासियों की उम्र बीत जाती, वे कभी बादशाह को देख तक नहीं पातीं।
हरम के अंदर का जीवन आलीशान होता था। हर सुबह शाही औरतों के लिए नए कपड़े आते। उन्हें वे केवल एक बार पहनतीं और फिर उसे दासियों को दे दिया जाता। अपने को खुश रखने के लिए औरतें खुली हवा में फव्वारे के पास चुपचाप लेटी रहतीं, आतिशबाजियां देखतीं, ग़ज़लें सुनतीं या संगीत का आनंद लेतीं। कबूतर उड़ाना, मुर्गों की लड़ाई, ताश के खेल, तीरंदाजी, कहानी सुनना – यह सब उनकी रोज की ज़िंदगी का हिस्सा थे।
अकबर ने जब फतेहपुर सीकरी को राजधानी बनाकर नया निर्माण किया, तो उसने हरम को पुनर्गठित किया। वहां पांच हज़ार से ज़्यादा औरतें रहती थीं। अकबर ने हरम को अलग-अलग हिस्सों में विभाजित कर रखा था। वहां रह रहे लोगों के बीच शांति बनी रहे और उनकी ज़रूरतें पूरी होती रहें, इसके लिए दरोगा की नियुक्ति की गई थी। तहसीलदार के जिम्मे वित्त प्रबंधन था, जो हरम के निवासियों के लिए वेतन इत्यादि का प्रबंध करता। बादशाह ने हरम की खुफ़िया ख़बर के लिए महलदार को नियुक्त कर रखा था। वह कोई तेजतर्रार औरत होती। अकबर ने अपने हरम के लिए जो कायदा-क़ानून बनाए थे, उसका पालन उसके वंशजों ने भी किया।
एक बार जब कोई लड़की या महिला हरम में प्रवेश करती, तो उससे अपेक्षा की जाती कि उसका बाहरी दुनिया से कोई संबंध न रहे। यहां तक कि बादशाह की मौत के बाद भी उसे हरम छोड़ने की इजाज़त नहीं थी। इसके बजाय उसे हरम के एकांत हिस्से में ले जाया जाता, जिसे सुहागपुर कहते।
मनूची की तरह डच व्यापारी #फ्रांसिस्को_पेलसर्ट की पहुंच भी हरम तक थी। वह जहांगीर का अच्छा दोस्त था। उसने अपने संस्मरणों की क़िताब ‘जहांगीर इंडिया’ में जहांगीर को मुग़ल बादशाहों के इतिहास में सबसे विलासी माना है। वह लिखता है, ‘महज 25 वर्ष की उम्र तक उसकी 20 से ज़्यादा शादियां हो चुकी थीं और उसके हरम में 300 से अधिक औरतें थीं। इनकी संख्या उसके जीवनकाल में बढ़ती ही रही।’
‘जहांगीर की पत्नियों के लिए अलग-अलग कक्ष थे। हरेक की खिदमत के लिए नियुक्त थीं 20 दासियां। उन्हें मासिक भत्ता भी दिया जाता। उन पैसों को वे आभूषणों और कपड़ों पर खर्च करतीं। ये औरतें वह सब कुछ करतीं, जो जहांगीर को उनकी ओर आकर्षित कर सके।’
पेलसर्ट ने लिखा है, ‘जहांगीर जब भी किसी विशेष पत्नी से मिलने की योजना बनाता, तो उस पत्नी के कक्ष को बड़े पैमाने पर सजाया जाता। कक्ष को इत्रों के छिड़काव से सुगंधित किया जाता। बादशाह जब कक्ष में प्रवेश करता, तो वहां मौजूद दासियां उसके कपड़े उतारकर चंदन और शीशम की बनी क्रीम से उसके पूरे शरीर की मालिश करतीं। कुछ दासियां रेशमी पंखों से हवा करतीं, तो कुछ गुलाब जल का छिड़काव करती रहतीं। इस दौरान उन सबों के बीच निर्वस्त्र बैठा हुआ बादशाह जहांगीर शराब, अफीम या अन्य उत्तेजित करने वाले पदार्थों का सेवन करता रहता। पत्नी के अतिरिक्त कोई और लड़की अगर उसे पसंद आ जाती, तो वह उसके साथ ही पूरी रात बिताता। अगर वह जहांगीर को संतुष्ट कर पाती, तो उसे बहुत सारा इनाम मिलता। वह बादशाह की चहेती बन जाती। उसे इसका अतिरिक्त फायदा भी मिलता। अगर वह बादशाह को खुश नहीं कर पाती, तो उसे कहीं किनारे कर दिया जाता।’
हरम की महिलाओं को सारे सुख हासिल थे, सबसे महंगे कपड़े, लज़ीज़ खाना, आभूषण और दासियां, लेकिन वे यौन सुख की स्वतंत्रता और बुनियादी मानवाधिकारों से वंचित थीं। वे हरम छोड़ कर नहीं जा सकती थीं। अगर बादशाह को वे पसंद आईं, तो उन्हें यौन सुख मिलता वरना पूरी ज़िंदगी बिना किसी मर्द के बितानी पड़ती। यौन सुख के लिए कई बार हरम की औरतें अपनी जान को जोखिम में डालते हुए हरम के किसी अधिकारी के साथ संबंध बना डालतीं।
#sex lives of mughal women
हरम की हिफाजत के लिए तीन सुरक्षा पंक्तियां थीं। पहली पंक्ति में थीं मजबूत तातार औरतें। इनके साथ घातक धनुष और भाले से लैस भारी-भरकम डीलडौल वाली उज्बेक औरतें होतीं, जिन्हें शायद तुर्किस्तान की रहस्यमय घाटियों से लाया गया था। इसके बाद होते थे हिजड़े। इनका काम हरम में अनुशासन बनाए रखना होता था। ये हिजड़े एशियाई-अफ्रीकन नस्ल के थे, जिन्हें या तो बचपन से ही बहाल किया गया था या फिर तुर्की और उत्तरी अफ्रीकी राजाओं द्वारा उपहार में मिले थे।
एक हुनरमंद हिजड़ा अपने मालिक के लिए बहुत उपयोगी साबित होता। उसे आदमियों की परख होती थी। ज़रूरी और महत्वपूर्ण सूचनाएं जुटाने में वह निपुण होता। कई बार वह अपने मालिक को उपयुक्त राजनीतिक सलाह भी देता। अगर इन सब में वह निपुण हुआ, तो उसे राजनीतिक ताकत भी हासिल हो जाती। कई बार ऐसा हुआ कि बादशाह को हिजड़े पर काफी भरोसा हो जाता और वह उससे मित्रवत व्यवहार करता। आगरा में ऐसे हिजड़ों के कई मक़बरे भी हैं, जिन्हें बादशाह की नजदीकी हासिल थी।
सुरक्षा की तीसरी पंक्ति में मजबूत कद काठी वाले बंदूकों से लैस पैदल सिपाही थे। उन्हें आदेश था कि वे किसी भी संदिग्ध घुसपैठियों को देखते ही गोली मार दें।
मुग़ल बादशाहों ने हरम की संरचना ही इस प्रकार की थी कि वह केवल उसकी ज़रूरतों को पूरा कर सके, उसे खुश रख सके। वही अकेले पुरुष थे, जो हरम में आसानी से घूम सकते थे। दूसरों के लिए सख्त पर्दा था। हरम में केवल बादशाह की इच्छा चलती। वहां औरतों की भरमार थी, लेकिन उनकी इच्छाओं का कोई मतलब नहीं था।
#We_support_hindutava_unity
Day: August 1, 2025
कृपा प्रभु की अपरम्पार।
11 सितंबर, 2001 की दुखद घटनाओं के एक साल बाद, एक अमेरिकी अखबार में एक छोटा नोट दिखाई दिया । यह सरल था। शांत। शक्तिशाली।
इसे ध्यान से पढ़ें। और अगर आप ऐसे व्यक्ति हैं जो अक्सर जीवन में छोटी — छोटी चीजों से निराश हो जाते हैं-तो शायद इसे दो बार पढ़ें ।
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“आपने एक प्रमुख कंपनी के सीईओ के बारे में सुना होगा जो हमलों से सिर्फ इसलिए बच गया क्योंकि उसके बच्चे को प्रीस्कूल ले जाने की उसकी बारी थी ।
एक और आदमी रहता था क्योंकि डोनट्स लाने का उसका दिन था ।
एक महिला को देर हो गई क्योंकि उसकी अलार्म घड़ी बंद नहीं हुई थी ।
न्यू जर्सी टर्नपाइक पर कोई ट्रैफिक में फंस गया ।
एक और बस छूट गई ।
एक ने उसके ब्लाउज पर कॉफी बिखेरी और उसे बदलना पड़ा ।
एक व्यक्ति की कार स्टार्ट नहीं होगी ।
कोई फोन कॉल का जवाब देने के लिए लौटा ।
दूसरे के बच्चे को तैयार होने में बहुत समय लगा ।
एक बस एक टैक्सी नहीं पकड़ सका ।
लेकिन जिस चीज ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया — वह एक आदमी था जो बच गया क्योंकि उस सुबह, उसने नए जूते पहने थे ।
उन्होंने उसे एक छाला दिया, इसलिए वह एक पट्टी खरीदने के लिए एक फार्मेसी में रुक गया ।
इसलिए वह रहता था । ”
और अब, जब मैं खुद को ट्रैफिक में फंसा हुआ पाता हूं, एक लिफ्ट गायब हो जाती है, चाबियों के लिए घर वापस जाती है, या आखिरी सेकंड में फोन कॉल का जवाब देती है…
मैं विराम देता हूं और सोचता हूं:
शायद मैं वही हूँ जहाँ मैं होना चाहता हूँ । शायद यह देरी सुरक्षा है जिसे मैं कभी नहीं समझ पाऊंगा।
तो अगली बार आपकी सुबह योजना के अनुसार नहीं जाती है —
बच्चे तैयार होने में धीमे हैं ।
आपको अपनी चाबी नहीं मिल रही है ।
आप हर लाल बत्ती मारा…
गुस्सा मत करो । घबराओ मत ।
भगवान काम पर हो सकता है । उन तरीकों से आपकी रक्षा करना जो आप कभी नहीं देखेंगे ।
नानक दुखिया सब संसार
एक साधु वर्षा के जल में प्रेम और मस्ती से भरा चला जा रहा था…
कि इस साधु ने एक मिठाई की दुकान को देखा जहां एक कढ़ाई में गरम दूध उबाला जा रहा था तो मौसम के हिसाब से दूसरी कढ़ाई में गरमा गरम जलेबियां तैयार हो रही थी।
साधु कुछ क्षणों के लिए वहाँ रुक गया..शायद भूख का एहसास हो रहा था या मौसम का असर था…
साधु हलवाई की भट्ठी को बड़े गौर से देखने लगा साधु कुछ खाना चाहता था लेकिन साधु की जेब ही नहीं थी तो पैसे भला कहां से होते…. साधु कुछ पल भट्ठी से हाथ सेंकने के बाद चला ही जाना चाहता था….. कि नेक दिल हलवाई से रहा न गया और एक प्याला गरम दूध और कुछ जलेबियां साधु को दें दी… मलंग ने गरम जलेबियां गरम दूध के साथ खाई और फिर हाथों को ऊपर की ओर उठाकर हलवाई के लिऐ प्रार्थना की….. फिर आगे चल दिया…..
साधु बाबा का पेट भर चुका था दुनिया के दु:खों से बेपरवाह वे फिर इक नए जोश से बारिश के गंदले पानी के छींटे उड़ाता चला जा रहा था……. वह इस बात से बेखबर था कि एक युवा नव विवाहिता जोड़ा भी वर्षा के जल से बचता बचाता उसके पीछे चला आ रहें है ……एक बार इस मस्त साधु ने बारिश के गंदले पानी में जोर से लात मारी….. बारिश का पानी उड़ता हुआ सीधा पीछे आने वाली युवती के कपड़ों को भिगो गया उस औरत के कीमती कपड़े कीचड़ से लथपथ हो गये…..
इसलिए वह आस्तीन चढ़ाकर आगे बढ़ा और साधु के कपड़ो से पकड़ कर कहने लगा अंधा है…… तुमको नज़र नहीं आता तेरी हरकत की वजह से मेरी पत्नी के कपड़े गीले हो गऐ हैं और कीचड़ से भर गऐ हैं….. साधु हक्का-बक्का सा खड़ा था…. जबकि इस युवा को साधु का चुप रहना नाखुशगवार गुजर रहा था….. महिला ने आगे बढ़कर युवा के हाथों से साधु को छुड़ाना भी चाहा…. लेकिन युवा की आंखों से निकलती नफरत की चिंगारी देख वह भी फिर पीछे खिसकने पर मजबूर हो गई…..
राह चलते राहगीर भी उदासीनता से यह सब दृश्य देख रहे थे लेकिन युवा के गुस्से को देखकर किसी में इतनी हिम्मत नहीं हुई कि उसे रोक पाते और आख़िर जवानी के नशे मे चूर इस युवक ने एक जोरदार थप्पड़ साधु के चेहरे पर जड़ दिया बूढ़ा मलंग थप्पड़ की ताब ना झेलता हुआ…. लड़खड़ाता हुऐ कीचड़ में जा पड़ा….. युवक ने जब साधु को नीचे गिरता देखा तो मुस्कुराते हुए वहां से चल दीया…..बूढे साधु ने आकाश की ओर देखा और उसके होठों से निकला वाह मेरे भगवान कभी गरम दूध जलेबियां और कभी गरम थप्पड़…. लेकिन जो तू चाहे मुझे भी वही पसंद है……..
यह कहता हुआ वह एक बार फिर अपने रास्ते पर चल दिया….दूसरी ओर वह युवा जोड़ा अपनी मस्ती को समर्पित अपनी मंजिल की ओर अग्रसर हो गया….. थोड़ी ही दूर चलने के बाद वे एक मकान के सामने पहुंचकर रुक गए……वह अपने घर पहुंच गए थे…. वे युवा अपनी जेब से चाबी निकाल कर अपनी पत्नी से हंसी मजाक करते हुए ऊपर घर की सीढ़ियों तय कर रहा था….बारिश के कारण सीढ़ियों पर फिसलन हो गई थी अचानक युवा का पैर फिसल गया और वह सीढ़ियों से नीचे गिरने लगा….महिला ने बहुत जोर से शोर मचा कर लोगों का ध्यान अपने पति की ओर आकर्षित करने लगी जिसकी वजह से काफी लोग तुरंत सहायता के लिये युवा की ओर लपके….. लेकिन देर हो चुकी थी युवक का सिर फट गया था और कुछ ही देर मे ज्यादा खून बह जाने के कारण इस नौजवान युवक की मौत हो चुकी थी कुछ लोगों ने दूर से आते साधु बाबा को देखा तो आपस में कानाफुसी होने लगीं कि निश्चित रूप से इस साधु बाबा ने थप्पड़ खाकर युवा को श्राप दिया है…. अन्यथा ऐसे नौजवान युवक का केवल सीढ़ियों से गिर कर मर जाना बड़े अचम्भे की बात लगती है….. कुछ मनचले युवकों ने यह बात सुनकर साधु बाबा को घेर लिया एक युवा कहने लगा कि आप कैसे भगवान के भक्त हैं जो केवल एक थप्पड़ के कारण युवा को श्राप दे बैठे…… भगवान के भक्त मे रोष व गुसा हरगिज़ नहीं होता ….आप तो जरा सी असुविधा पर भी धैर्य न कर सकें….. साधु बाबा कहने लगा भगवान की क़सम मैंने इस युवा को श्राप नहीं दिया
अगर आप ने श्राप नहीं दिया तो ऐसा नौजवान युवा सीढ़ियों से गिरकर कैसे मर गया? तब साधु बाबा ने दर्शकों से एक अनोखा सवाल किया कि आप में से कोई इस सब घटना का चश्मदीद गवाह मौजूद है? एक युवक ने आगे बढ़कर कहा….. हाँ मैं इस सब घटना का चश्मदीद गवाह हूँ साधु ने अगला सवाल किया.. .मेरे क़दमों से जो कीचड़ उछला था क्या उसने युवा के कपड़े को दागी किया था? युवा बोला….. नहीं…. लेकिन महिला के कपड़े जरूर खराब हुए थे मलंग ने युवक की बाँहों को थामते हुए पूछा…., फिर युवक ने मुझे क्यों मारा? युवा कहने लगा…… क्योंकि वह युवा इस महिला का प्रेमी था और यह बर्दाश्त नहीं कर सका कि कोई उसके प्रेमी के कपड़ों को गंदा करे….. इसलिए उस युवक ने आपको मारा
युवा बात सुनकर साधु बाबा ने एक जोरदार ठहाका बुलंद किया और यह कहता हुआ वहाँ से विदा हो गया…..तो भगवान की क़सम मैंने श्राप कभी किसी को नहीं दिया लेकिन कोई है जो मुझ से प्रेम रखता है…. अगर उसका यार सहन नहीं कर सका तो मेरे यार को कैसे बर्दाश्त होगा कि कोई मुझसे मारे और वह इतना शक्तिशाली है कि दुनिया का बड़े से बड़ा राजा भी उसकी लाठी से डरता है
*उस परमात्मा की लाठी दिखती नही और आवाज भी नही करती लेकिन पड़ती है तो बहुत दर्द देती है। हमारे कर्म ही हमें उसकी लाठी से बचाते हैं बस कर्म अच्छे होने चाहिए
हास्य को हास्य में लीजिये !
एक हंसमुखी भारतीय ने अपना पुराना जॉब छोड़कर कनाडा के , एक विश्व के सबसे बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर में सेल्समेन की नौकरी ज्वाइन की ।
बॉस ने पूछा ” – तुम्हे कुछ तज़ुर्बा है ? उसने कहा – हाँ , मैं भारत में सेल्समेन ही था ।
पहले दिन उस भारतीय ने पूरा मन लगाकर काम किया । शाम के 6 बजे बॉस ने पूछा “- आज पहले दिन तुमने कितने सेल किये ?
भारतीय ने कहा कि सर मैंने 1 सेल किया । बॉस चौंक कर बोले – क्या मात्र एक ही सेल ??? सामान्यत: यहाँ कार्य करने वाले हर सेल्समेन 20 से 30 सेल रोज़ाना करते है । अच्छा ये बताओं तुमने कितने का सेल किया ।
” 933005 पाउंड्स ” – भारतीय बोला ।
” क्या ??? – लेकिन तुमने यह कैसे किया ” आश्चर्यजनक रूप से बॉस ने पूछा !
“अच्छा बताता हूँ , भारतीय ने कहा – ” एक व्यक्ति आया और मेने उसे एक छोटा मछली पकड़ने का हुक बेचा , फिर एक मझोला और फिर अंततः एक बड़ा हुक बेचा ।
फिर उसे मैंने एक बड़ी फिशिंग रॉड और कुछ फिशिंग गियर बेचे । फिर मैंने उससे पूछा कि तुम कहाँ मछली पकड़ोगे तो उसने कहा कि वह कोस्टल एरिया में पकड़ेगा । तब मैंने कहा कि इसके लिए एक नाव की भी ज़रूरत पड़ेगी । अतः मैं उसे नीचे बोट डिपार्टमेंट में ले गया और उसे 20 फीट की डबल इंजन वाली स्कूनर बोट बेच दी ।
जब उसने कहा कि यह बोट उसकी वोल्कस वेगन में नहीं आएगी । तब मैं उसे अपने ऑटो मोबाइल सेक्शन में ले गया और उसे बोट केरी करने के लिए नयी डीलक्स 4 × 4 ब्लेज़र बेचीं ।
और जब मैंने उसे पूछा कि तुम मछली पकड़ते वक़्त कहाँ रहोगे । उसने कुछ प्लान नहीं किया था । तो मैं उसे कैम्पिंग सेक्शन में ले गया और उसे फोल्डिंग टेंट बेच दिया ।
अब बॉस दो कदम पीछे हटा और बेहद ही भौचक्के अंदाज़ में पूछने लगा -” तुमने इतना सब उस आदमी को बेच दिया जो केवल एक मछली पकड़ने का काँटा खरीदने आया था ? ? ?
” NO, SIR,” युवा भारतीय सेल्समेन ने जवाब दिया । ” वह तो केवल सरदर्द दूर करने की एक टेबलेट लेने आया था । मैंने उसे समझाया कि मछली पकड़ना ही सरदर्द दूर करने का सबसे अच्छा उपाय है ???” ।
बॉस – ” तुमने इसके पहले भारत में कहाँ काम किया था ” ?
भारतीय सेल्समेन – ” जी मैं ,भारत में LIC में बीमा एजेंट था ।
बॉस बोला – तुम मेरी कुर्सी पर बैठो । मैं तुम्हारी पुरानी संस्था ज्वाईन करने जा रहा हूँ । आदमी को फंसाने का प्लान सीखता हूँ फिर आगे जिन्दगी के साथ भी और जिन्दगी के बाद भी ??? हँसते रहिये !
हा हा हा !😊😊
मालेगांव ब्लास्ट
आज अभी मैं यूपीए सरकार द्वारा मालेगांव ब्लास्ट पर चार्जशीट पढ़ रहा था
उसमें लिखा है कि कश्मीर में पोस्टिंग के दौरान कर्नल पुरोहित ने 80 किलो आरडीएक्स चुराया और उसे महाराष्ट्र लाये और उसे आरडीएक्स में से 40 किलो आरडीएक्स मालेगांव में और 40 किलो आरडीएक्स गुजरात के मोडासा में ब्लास्ट करने में इस्तेमाल किया गया
हालांकि इस पॉइंट पर जज ने बड़ी हैरानी जताई
क्योंकि सेना का भी इसमें गवाही हुआ था और सेना ने कहा कि जिस आरडीएस की बरामदगी दिखाई जा रही है वह आरडीएक्स भारतीय सेना कहीं इस्तेमाल ही नहीं करती
जज ने सबसे बड़ी हैरानी यह जताई 80 किलो आरडीएस कश्मीर से महाराष्ट्र तक कोई लेकर आ गया रास्ते में किसी ने पकड़ा नहीं किसी ने देखा नहीं ???
सोचिए हिंदुओं को आतंकवादी साबित करने के लिए कांग्रेस और गांधी परिवार किस हद तक नीचता कर रहा था
वैसे यही दोगले पुलवामा ब्लास्ट में कहते हैं की 60 किलो आरडीएक्स कहां से आ गया और यह दोगले खुद स्वीकार कर रहे हैं उनके शासन काल में कोई व्यक्ति सेना में से 80 किलो RDX चुरा सकता है उसे ट्रक में लोड कर सकता है और उसे कश्मीर से महाराष्ट्र तक लेकर जा सकता है
इसीलिए मैं बार-बार कहता हूं कि जो हिंदू कांग्रेस पार्टी को वोट देता है वह किसी हिंदू की औलाद को ही नहीं सकता
अटल जी की ही तरह मोदी जी ने भी सोनिया कांग्रेस को जूतों में दाल पीने पर मजबूर कर दिया….
कैसे..
तो जानिए ऐसे…
लालकृष्ण आडवाणी की एक पुस्तक है ….
“माय कंट्री माय लाइफ।”
जब अमेरिका मे 9/11 का हमला हुआ तो अफगानिस्तान की धुलाई निश्चित हो गयी।
दिल्ली मे विदेश मंत्री जसवंत सिंह को पत्र आया वाजपेयी सरकार से अपील थी कि मुंबई का बंदरगाह और कश्मीर के पूँछ सेक्टर मे एक फ्यूल स्टेशन अमेरिका को प्रयोग करने दे।
जसवंत सिंह ने
वाजपेयी को बताये बिना इसे स्वीकृति दे दी और वाजपेयी के लिये सिरदर्द बढ़ा दिया।
भारत नहीं चाहता था कि कल को वो तालिबान के निशाने पर आये।
वाजपेयी ने तब अपने विरोधी सोनिया गाँधी और हरकिशन सिंह सुरजीत को याद किया। वाजपेयी ने उन्हें कहा कि मैं चाहता हुँ अमेरिका अफगानिस्तान के विरुद्ध हमारी धरती प्रयोग करें।
बस फिर क्या था ……
कांग्रेस और कम्युनिस्टो ने विरोध शुरू कर दिया।
विरोध इतना तीव्र था कि वाजपेयी ने अमेरिका संदेश भेज दिया कि वे सहायता नहीं दे पाएंगे।
उस समय
अमेरिकी चैनलों पर यह विरोध प्रसारित हो रहा था कि सोनिया गाँधी अमेरिका विरोधी है।कांग्रेसी संसद भवन घेरकर खड़े थे और वाजपेयी अपने ऑफिस से उन्हें देखकर मुस्कुरा रहे थे।
बाद मे ज़ब जॉर्ज बुश की अटल बिहारी से मुलाक़ात हुई तो वाजपेयी ने मदद ना कर पाने का खेद जताया।
इस पर बुश ने कहा …..
“मैं भी जानता हुँ कि राजनीति कैसे खेली जाती है!!”
इतना कहकर बुश ठहाके मारकर हँस पड़े।
यदि विपक्ष अंधविरोधी हो तो कई बार आपके ही काम कर देता है।
कल जो संसद मे बहस हुई उसका निचोड़ कुछ यू है
पाकिस्तान और कश्मीर समस्या की जननी कांग्रेस है।
सीजफ़ायर किसी विदेशी शक्ति ने नहीं करवाया और कांग्रेस ने ऑपरेशन महादेव के लिये मेज ना थपथपाकर एक घटिया राजनीति का उदाहरण पेश किया।
कांग्रेस जो धूल उड़ाने चली थी वही उसके चेहरे पर चिपक गयी और ये लोग मोदीजी के भाषण के पीछे पड़े तो थे लेकिन मोदीजी ज़ब आए तो ये फिर जलील होकर बैठे है।
मोदीजी ने ट्रम्प का नाम नहीं लिया, जाहिर है अभी ट्रेड डील करनी है और ऊपर से टेरीफ का संकट भी है। जो लोग विदेश नीति समझते है वे समझ जाएंगे कि सत्ता पक्ष के लिये एक अल्पविराम या पूर्ण विराम का भी बहुत महत्व होता है।
डोनाल्ड ट्रम्प का सीधे नाम लेना एक बचकानी बात होती।
राहुल गाँधी और कांग्रेस ले सकते है और इन्होने नाम लेकर वैसे ही मदद की जैसे 2001 मे सोनिया ने की थी।
पश्चिमी देशो ने इसे वैसे ही कवर किया है कि भारत का विपक्ष डोनाल्ड ट्रम्प से नाराज है और सरकार ने डोनाल्ड ट्रम्प का सीजफ़ायर का दावा खारिज कर दिया।
कल को यदि अमेरिकी दूतावास आपत्ति ले कि आप बार बार ट्रम्प की जग हँसाई क्यों कर रहे है तो सरकार कह सकती है कि हम आगे से नहीं कर रहे।
विपक्ष हमसे ट्रम्प का दावा बार बार रिजेक्ट करवा रहा है।
कल एक तीर से बहुत से निशान सध गए, पप्पू के चक्कर मे अखिलेश फ्री मे पिस गया। नेहरूजी को कोसने का फिर एक कारण मिल गया।
26/11 के लिये कांग्रेस फिर जलील हो गयी और ऑपरेशन सिंदूर की सुखद यादें भी ताज़ा हो गयी।
इसके अलावा ट्रम्प चाचा को बिना देखे ठेंगा भी दिखा दिया।
मूर्ख विपक्ष सत्तापक्ष के लिये मोहरे का काम करता है, कल यह दोबारा सिद्ध हुआ।
*लुकमान की कहानी*
लुकमान की एक छोटी कहानी है। और लुकमान ने कहानियों में ही अपना संदेश दिया है। ईसप की प्रसिद्ध कहानियां आधे से ज्यादा लुकमान की ही कहानियां हैं, जिन्हें ईसप ने फिर से प्रस्तुत किया है।
लुकमान कहता है, एक मक्खी एक हाथी के ऊपर बैठ गयी। हाथी को पता न चला मक्खी कब बैठी। मक्खी बहुत भिनभिनाई, आवाज की, और कहा, ‘भाई!’ मक्खी का मन होता है हाथी को भाई कहने का। कहा, ‘भाई! तुझे कोई तकलीफ हो तो बता देना। वजन मालूम पड़े तो खबर कर देना, मैं हट जाऊंगी।’
लेकिन हाथी को कुछ सुनाई न पड़ा। फिर हाथी एक पुल पर से गुजरता था बड़ी पहाड़ी नदी थी, भयंकर गङ्ढ था, मक्खी ने कहा कि ‘देख, दो हैं, कहीं पुल टूट न जाए! अगर ऐसा कुछ डर लगे तो मुझे बता देना। मेरे पास पंख हैं, मैं उड़ जाऊंगी।’ हाथी के कान में थोड़ी-सी कुछ भिनभिनाहट पड़ी, पर उसने कुछ ध्यान न दिया। फिर मक्खी के बिदा होने का वक्त आ गया। उसने कहा, ‘यात्रा बड़ी सुखद हुई। तीर्थयात्रा थी, साथी-संगी रहे, मित्रता बनी, अब मैं जाती हूं। कोई काम हो, तो मुझे कहना।’
तब मक्खी की आवाज थोड़ी हाथी को सुनाई पड़ी। उसने कहा, ‘तू कौन है कुछ पता नहीं। कब तू आयी, कब तू मेरे शरीर पर बैठी, कब तू उड़ गयी, इसका कोई हिसाब नहीं है। लेकिन मक्खी तब तक जा चुकी थी।
*लुकमान कहता है, ‘हमारा होना भी ऐसा ही है। इस बड़ी पृथ्वी पर हमारे होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। इस बड़े अस्तित्व में हाथी और मक्खी के अनुपात से भी हमारा अनुपात छोटा है।*
क्या भेद पड़ता है? लेकिन हम बड़ा शोरगुल मचाते हैं। हम बड़ा शोरगुल मचाते हैं! वह शोरगुल किसलिये है? वह मक्खी क्या चाहती थी? वह चाहती थी हाथी स्वीकार करे, तू भी है; तेरा भी अस्तित्व है।
हमारा अहंकार अकेले तो नहीं जी सक रहा है। दूसरे उसे मानें, तो ही जी सकता है। इसलिए हम सब उपाय करते हैं कि किसी भांति दूसरे उसे मानें, ध्यान दें, हमारी तरफ देखें; उपेक्षा न हो।
हम वस्त्र पहनते हैं तो दूसरों के लिये, स्नान करते हैं तो दूसरों के लिये, सजाते-संवारते हैं तो दूसरों के लिये। धन इकट्ठा करते, मकान बनाते, तो दूसरों के लिये। दूसरे देखें और स्वीकार करें कि तुम कुछ विशिष्ट हो। तुम कोई साधारण नहीं। तुम कोई मिट्टी से बने पुतले नहीं हो। तुम कोई मिट्टी से आये और मिट्टी में नहीं चले जाओगे, तुम विशिष्ट हो। तुम्हारी गरिमा अनूठी है। तुम अद्वितीय हो। अहंकार सदा इस तलाश में है-
वे आंखें मिल जाएं, जो मेरी छाया को वजन दे दें।
ओशो
बिन बाती बिन तेल – प्रवचन -17
*संकलन-रामजी 🙏🌹🌹*
“જે કોઈ મારા રેકોર્ડમાંથી એક પણ રન ઓછો કરે છે તે પૈસા મેળવવાને લાયક નથી !!” …
ભારત ઈંગ્લેન્ડ વચ્ચેની માન્ચેસ્ટર ટેસ્ટ રવીન્દ્ર જાડેજા- વોશિંગ્ટન
સુંદરની લડાયક રમતથી ડ્રોમાં પરિણમી તેમાં તે બંનેની સદી વિશે બિનજરૂરી વિવાદ ખડો થયો . તેમાં ઈંગ્લેન્ડના કેપ્ટન બેન સ્ટોક્સે જે વલણ અપનાવ્યું તેને મીડિયામાં અને ક્રિકેટ જગતમાં
અમુક અંશે સમર્થન પ્રાપ્ત થયું પરંતુ મહદ્ અંશે ટીકા થઈ.
ઈંગ્લેન્ડના જ ઘણા ભૂતપૂર્વ ખેલાડીઓએ જાડેજા અને સુંદર ને સમર્થન આપ્યું તેમાં ભૂતપૂર્વ ઓપનર સર જ્યોફ્રી બોયકોટનો સમાવેશ હતો.
બોયકોટે જાડેજા અને સુંદરની પ્રશંસા કરી, અને કહ્યું કે તેમને તેમની ઇનિંગ ચાલુ રાખવાનો અધિકાર હતો. ડ્રોની ઓફર સમયે, જાડેજા 89 અને સુંદર 80 રને બેટિંગ કરી રહ્યા હતા.
બોયકોટે કહ્યું “આ ભારતના ખેલાડીઓ ખૂબ જ મજબૂત છે. તેઓ એક ડગલું પણ પાછળ હટ્યા નહીં. પોતાની ટીમ માટે ટેસ્ટ મેચ બચાવવા માટે તેમણે આખો દિવસ સખત મહેનત કરી હતી, હું જો રમતો હોત તો હું પણ કોઈ મને 89 રને રમત પૂરી કરવા કહે તે ન સ્વીકારેત. રવિન્દ્ર જાડેજા અને વોશિંગ્ટન બંને તેમની સદીના હકદાર હતા.”
સર જ્યોફ બોયકોટ તેમના વખતમાં એક ચીટકુ બેટ્સમેન તરીકે જાણીતા હતા અને પોતાના રનની બાબતે બહુ ચોક્કસ અને કંજૂસ ગણાતા હતા.
તે બાબતે સુનિલ ગાવસ્કરે બોયકોટ વિશેની રમુજી વાર્તા કહી છે.!
“સર જ્યોફ્રી એકવાર વેસ્ટ ઈન્ડિઝના પ્રવાસ વખતે ત્રિનિદાદના પોર્ટ ઓફ સ્પેનમાં ટેક્સીમાં બેઠા. ડ્રાઈવરે અરીસામાં જોયું અને કહ્યું: ‘જ્યોફ્રી બોયકોટ! તમે મારા પ્રિય છો, યાર! વાસ્તવમાં તમે મેન ઓફ ધ મેચ હતા – ટોની ગ્રેગ નહીં. તેણે 8 વિકેટ લીધી, પરંતુ તમારા 95 અને 107 રનથી ઇંગ્લેન્ડ જીત્યું!’
થોડીવાર પછી, કેબ હોટેલ પહોંચે છે. બોયકોટ બહાર નીકળે છે, ડ્રાઈવર તરફ ફરીને કહે છે:
‘મેં 95 રન બનાવ્યા નથી, મેં 97 રન બનાવ્યા છે. મેં 107 રન બનાવ્યા નથી, મેં 112 રન બનાવ્યા છે. અને જે કોઈ મારા રેકોર્ડમાંથી એક પણ રન ઓછો કરે છે તે પૈસા મેળવવાને લાયક નથી !!’
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🏵मैंने सुना है,
न्यूयार्क में एक घर में एक विवाह का जलसा हुआ। कोई दो सौ मित्र मेहमान थे, आमंत्रित थे। मेहमान सब आ गए, भोजन शुरू होने को था कि एक मेहमान ने अपने खीसे से एक बहुत खूबसूरत छोटी सी पेटी निकाली और उसमें से एक सिक्का निकाला। सिक्का तीन हजार वर्ष पुराना इजिप्त का सिक्का था, मिश्र का सिक्का था।
और उसने कहा कि मैंने इसे पच्चीस हजार रुपये देकर खरीदा है–एक रुपये के सिक्के को। तीन हजार वर्ष पुराना है। यह सबसे ज्यादा पुराना सिक्का है जो उपलब्ध है। एक सिक्का और है इसी के समय का, बस ये दो ही सिक्के हैं। एक सिक्का दुनिया में किसी और दूसरे आदमी के पास है, एक यह है।
मैंने खरीदा तो मैंने सोचा कि शादी में ले चलूं, मित्रों को दिखा दूंगा, वे खुश होंगे। सिक्का हाथों-हाथ घूमने लगा। कुछ लोगों ने भीड़ लगा ली और उससे पूछने लगेः कितना पुराना है? किस राजा के वक्त का है? किस धातु का बना है? ये सारी बातें, इस पर क्या लिखा हुआ है? और सिक्का घूमने लगा।
आधा घंटे बाद सिक्का मिलना मुश्किल हो गया, वह न मालूम कहां खो गया। जिससे भी पूछा, उसने कहाः मुझे मिला था, लेकिन मैंने पड़ोसी को देखने को दे दिया, मुझे कुछ पता नहीं। जिससे भी पूछा, उसने कहाः मेरे हाथ में आया था, मैंने देखा, फिर मैंने दूसरे को दे दिया। वहां भीड़ थी दो सौ लोगों की, शादी का घर था, सिक्का कहां गया? मुश्किल हो गया। सिक्का था कीमती। बड़ी कठिनाई हो गई!
शादी की रंग-रौनक उड़ गई! चोरी का मामला हो गया! सारे मेहमान इकट्ठे हो गए और उन्होंने कहाः हमारे खीसे देख लिए जाएं, कपड़े देख लिए जाएं, हमने तो लिया नहीं। यही तय हुआ कि सबके कपड़े देख लिए जाएं।
लेकिन एक आदमी ने कहा कि मैं तो यहां मेहमान की तरह आया हूं, चोर की तरह नहीं। इतना मैं कह सकता हूं कि मैंने सिक्का नहीं लिया। लेकिन मेरे खीसे में कोई हाथ नहीं डाल सकता है। मैंने आपसे कहा भी नहीं था कि आप सिक्का दिखलाइए। इतना मैं कहता हूं, मैंने सिक्का नहीं लिया।
लेकिन मेरे खीसे में हाथ नहीं डालने दूंगा, मैं कोई चोर थोड़े ही हूं। सोच कर डालना, यह पिस्तौल मेरे हाथ में है। तब तो बात और भी स्पष्ट हो गई। हम सबको भी स्पष्ट हो गई, बात साफ है कि इस आदमी ने सिक्का ले लिया। पुलिस को फोन करना पड़ा।
लेकिन इसके पहले कि पुलिस आती एक और अदभुत घटना घट गई। पुलिस को फोन किया गया, सारे घर के दरवाजे बंद कर दिए गए। झगड़े की नौबत साफ थी। उस आदमी को छूना ठीक नहीं था, वह गोली चला सकता था। अजीब पागल था! लोग समझा भी रहे थे, लेकिन वह राजी नहीं था।
और तभी एक नौकर ने एक पानी के बर्तन को टेबल पर से उठाया और लोगों ने देखा कि उस बर्तन के नीचे वह सिक्का रखा हुआ है। उस आदमी ने बेचारे ने सिक्का नहीं लिया था, सिक्का टेबल के ऊपर था।
तो लोगों ने कहाः तुम कैसे पागल हो? जब तुमने सिक्का नहीं लिया, तो इतना उपद्रव क्यों खड़ा किया?
उसने अपने खीसे में हाथ डाला और उसी जैसा दूसरा सिक्का बाहर निकाला, उसने कहाः दूसरे सिक्के का मालिक मैं हूं।
यह जो आदमी कह रहा था कि दूसरा सिक्का है, वह मेरे पास है। मैंने भी सोचा कि चलूं शादी में लेता चलूं और वहां दिखला दूं। लेकिन इसने पहले दिखला दिया, तो मैं चुप रह गया। अब कोई मतलब न था दिखलाने का।
लेकिन पांच मिनट पहले कौन मेरा विश्वास कर सकता था कि यह सिक्का चोरी का नहीं है? कौन विश्वास कर सकता था? पांच मिनट पहले कौन ऐसा आदमी होगा उन दो सौ लोगों में जिसने शक न किया हो कि इसने चोरी की?
लेकिन जिंदगी इतनी रहस्यपूर्ण है, जिंदगी इतनी मिस्टीरियस है कि इस तरह के निर्णय लेने बिल्कुल अचेतन, मैकेनिकल हैं। इनमें कोई होश नहीं है, ये निर्णय सजग और जागरूक नहीं हैं।
तो जिंदगी में एक-एक चीज परखें। जो हम विचार करते हैं, वह सजग होकर विचार कर रहे हैं? क्या उसके सारे पहलुओं को हम जानते हैं? क्या सारे रहस्य से हम परिचित हैं? जो हम काम कर रहे हैं, वह सजग होकर कर रहे हैं?
🏵️ओशो🏵️
⚜️अपने माहीं टटोल⚜️