છવ્વીસ વરસના જ્હોન એફ. કેનેડી અમેરિક્ન નૌકાદળમાં લેફ્ટેનન્ટ હતા. બીજી ઓગસ્ટ, ૧૯૪૩ની રાત વાદળોને
કારણે વધુ અંધારી હતી. સોલોમન ટાપુઓ પર કેનેડી અને સાથીદારો બોટમાં બેસીને પેટ્રોલિંગ કરી રહ્યા હતા. તેવામાં
એક જાપાની ડિસ્ટ્રોયર વીજળિક ઝડપે આવી પહોંચી, ધુમ્મસમાં તેણે કેનેડીના નાનકડા જહાજને બે ભાગમાં ચીરી નાખ્યું.આકાશમાં આગ અને ધુમાડાનો ગોળો સર્જાયો, કેનેડીના પેટ્રોલિંગ જહાજ પરના બે સૈનિકો માર્યા ગયા. કેનેડી અને બીજા દસ સૈનિકો તૂટેલા જહાજની આસપાસ એકઠા થઈ ગયા, તેઓને સમજાયું કે તરીને નજીકના ટાપુ સુધી પહોંચવા સિવાય તેઓની પાસે કોઈ વિકલ્પ નથી.
કેનેડી જ્યારે હાવર્ડ યુનિવર્સિટીમાં હતા ત્યારે ત્યાંની તરણબાજોની ટીમના સભ્ય હતા. આસપાસના જળમાં શાર્ક માછલીઓ અને મગરમચ્છો પણ મોટી સંખ્યામાં હતાં. કેનેડીએ પોતાના ઘવાયેલા સાથીનાં કપડાંને પોતાના દાંતથી કચકચાવીને પકડ્યા અને એને ખેંચતા ખેંચતા પાંચ કલાક સુધી તરતા રહ્યા. શિકારી માછલીઓ અને મગરમચ્છોથી ડર્યા વગર એ ‘પ્લમ પૂડિંગ’ નામના ટાપુ પર પહોંચ્યા અને ત્યાં નારિયેળ ખાઈને જીવ ટકાવી રાખ્યો. ઘણા દિવસો એમ જ વીતી ગયા. દરમિયાન નજીકથી એક હોડીમાં સોલોમન
ટાપુના કેટલાક લોકો પસાર થયા ત્યારે તેઓને મદદ માટેનો વાવટો બતાવ્યો.
એ ટાપુવાસીઓએ અમેરિકા અને મિત્ર દેશોની ફોજને સંદેશો પહોંચાડશે તેવી ધરપત આપી, પરંતુ ભાષાની તકલીફ હતી. એ ટાપુવાસીઓ અંગ્રેજી જાણતા ન હતા. કાગળ-પેન હતાં નહીં. કેનેડીએ તાજા નારિયેળની એક કાચલી લીધી અને
તેના પર ચપ્પુથી કોતરીને એક સંદેશો લખ્યો કે, ‘કમાન્ડર, આ સ્થાનિક લોકો જાણે છે કે અમે કઈ જગ્યાએ ફસાયા
છીએ. તેઓ તમોને દોરીને અહીં સુધી લઈ આવશે. અમે ૧૧ જણ જીવતાં છીએ, એક બોટ લઈને મદદે આવો. કેનેડી.’ સ્થાનિક લોકોએ એ નારિયેળ કમાન્ડર સુધી પહોંચાડ્યું અને મદદ આવી પહોંચી અને એ અગિયારને બચાવી લેવામાં આવ્યા.
(અભિયાન દીપોત્સવી વિશેષાંક ( ૨૦૨૦) માંથી સાભાર)
સં./ ટાઈપીંગઃ હસમુખ ગોહીલ
Month: July 2025
सलोनी ने आज कई दिनों के बाद फेसबुक खोला था, एग्जाम के कारण उसने अपने स्मार्ट फोन से दूरी बना ली थी, फेसबुक ओपन हुआ तो उसने देखा की 35-40 फ्रेंड रिक्वेस्ट पेंडिंग पड़ी थीं,
उसने एक सरसरी निगाह से सबको देखना शुरू कर दिया, तभी उसकी नज़र एक लड़के की रिक्वेस्ट पर ठहर गई, उसका नाम राज शर्मा था,
बला का स्मार्ट और हैंडसम दिख रहा था अपनी डी पी में, सलोनी ने जिज्ञासावश उसके बारे मे पता करने के लिये उसकी प्रोफाइल खोल कर देखी तो वहाँ पर उसने एक बढ़कर एक रोमान्टिक शेरो शायरी और कवितायें पोस्ट की हुई थीं, उन्हें पढ़कर वो इम्प्रेस हुए बिना नहीं रह पाई, और फिर उसने राज की रिक्वेस्ट एक्सेप्टकर ली, अभी उसे राज की रिक्वेस्ट एक्सेप्ट किये हुए कुछ ही देर हुई होगी की उसके मैसेंजर का नोटिफिकेशनटिंग के साथ बज उठा, उसने चेक करा तो वो राज का मैसेज था, उसने उसे खोल कर देखा तो उसमें राज ने लिखा था ” थैंक यू वैरी मच “, वो समझ तो गई थी की वो क्यों थैंक्स कह रहा है फिर भी उससे मज़े लेने के लिये उसने रिप्लाई करा ” थैंक्स किसलिये ?” उधर से तुरंत जवाब आया ” मेरी रिक्वेस्ट एक्सेप्ट करने के लिये ।
सलोनी ने कोई जवाब नहीं दिया बस एक स्माइली वाला स्टीकर पोस्ट कर दिया और फिर मैसेंजर बंद कर दिया, वो नहीं चाहती थी की एक ही दिन में किसी अनजान से ज्यादा खुल जाये और फिर वो घर के कामों में व्यस्त हो गई, अगले दिन उसने अपना फेसबुक खोला तो उसे राज के मैसेज नज़र आये, राज ने उसे कई रोमान्टिक कवितायें भेज रखीं थीं, उन्हें पढ़ कर उसे बड़ा अच्छा लगा, उसने जवाब में फिर से स्माइली वाला स्टीकर सेंड कर दिया,
थोड़ी देर मे ही राज का रिप्लाई आ गया, वो उससे उसके उसकी होबिज़ के बारे मे पूँछ रहा था,
उसने राज को अपना संक्षिप्त सा परिचय दे दिया, उसका परिचय जानने के बाद राज ने भी उसे अपने बारे मे बताया कि वो एम बीए कर रहा है और जल्दी ही उसकी जॉब लग जायेगी, और फिर इस तरह से दोनों के बीच चैटिंग का सिलसिला चल निकला, सलोनी को अब उसके मेसेज का इंतज़ार रहने लगा था, जिस दिन उसकी राज से बात नहीं हो पाती थी तो उसे लगता जैसे कुछ अधूरापन सा है, राज उसकी ज़िन्दगी की आदत बनता जा रहा था, आज रात फिर सलोनी राज से चैटिंग कर रही थी, इधर-उधर की बात होने के बाद राज ने सलोनी से कहा..
” यार हम कब तक यूंहीं सिर्फ फेसबुक पर बाते करते रहेंगे, यार मै तुमसे मिलना चाहता हूँ, प्लीज कल मिलने का प्रोग्राम बनाओ ना “,
सलोनी खुद भी उससे मिलना चाहती थी और एक तरह से उसने उसके दिल की ही बात कह दी थी लेकिन पता नहीं क्यों वो उससे मिलने से डर रही थी,
शायद अंजान होने का डर था वो, सलोनी ने यही बात राज से कह दी,” अरे यार इसीलिये तो कह रहा हूँ की हमें मिलना चाहिये, जब हम मिलेंगे तभी तो एक दूसरे को जानेंगे “
राज ने उसे समझाते हुए मिलने की जिद्द की,” अच्छा ठीक है बोलो कहाँ मिलना है, लेकिन मैं ज्यादा देर नहीं रुकुंगी वहाँ ” सलोनी ने बड़ी मुश्किल से उसे हाँ की, “
ठीक है तुम जितनी देर रुकना चाहो रुक जाना ” राज ने अपनी खुशी छिपाते हुए उसे कहा,
और फिर वो सलोनी को उस जगह के बारे मे बताने लगा जहाँ उसे आना था,
अगले दिन शाम को 6 बजे, शहर के कोने मे एक सुनसान जगह पर एक पार्क, जहाँ पर सिर्फ प्रेमी जोड़े ही जाना पसंद करते थे, शायद एकांत के कारण, राज ने सलोनी को वहीँ पर बुलाया था,
थोड़ी देर बाद ही सलोनी वहाँ पहुँच गई, राज उसे पार्क के बाहर गेट के पास अपनी कार से पीठ लगा के खड़ा हुआ नज़र आ गया,
पहली बार उसे सामने देख कर वो उसे बस देखती ही रह गई, वो अपनी फोटोज़ से ज्यादा स्मार्ट और हैंडसम था,
सलोनी को अपनी तरफ देखता हुआ देखकर उसने उसे अपने पास आने का इशारा करा, उसके इशारे को समझकर वो उसके पास आ गई और मुस्कुरा कर बोली “
हाँ अब बोलो मुझे यहाँ किसलिये बुलाया है “
‘अरे यार क्या सारी बात यहीं सड़क पर खड़ी-2 करोगी,आओ कार मे बैठ कर बात करते हैं “
और फिर राज ने उसे कार मे बैठने का इशारा करके कार का पिछला गेट खोल दिया, उसकी बात सुनकर सलोनी मुस्कुराते हुए कार मे बैठने के लिये बढ़ी,
जैसे ही उसने कार मे बैठने के लिये अपना पैर अंदर रखा तो उसे वहाँ पर पहले से ही एक आदमी बैठा हुआ नज़र आया, शक्ल से वो आदमी कहीं से भी शरीफ नज़र नहीं आ रहा था, सलोनी के बढ़ते कदम ठिठक गये, वो पलट कर राज से पूँछने ही जा रही थी की ये कौन है कि तभी उस आदमी ने उसका हाथ पकड़ कर अंदर खींच लिया और बाहर से राज ने उसे अंदर धक्का दे दिया, ये सब कुछ इतनी तेजी से हुआ की वो संभल भी नहीं पाई, और फिर अंदर बैठे आदमी ने उसका मुँह कसकर दबा लिया ताकि वो चीख ना पाये और उसके हाँथों को राज ने पकड़ लिया,
अब वो ना तो हिल सकती थी और ना ही चिल्ला सकती थी, और तभी कार से दूर खडा एक आदमी कार मे आ के ड्राइविंग सीट पर बैठ गया और कार स्टार्ट करके तेज़ी से आगे बढ़ा दी, और पीछे बैठा आदमी जिसने सलोनी का मुँह दबा रखा था वो हँसते हुए राज से बोला ” वाह भाई …… वाह……. मज़ा आ गया……. आज तो तुमने तगड़े माल पर हाथ साफ़ करा है….
…. शबनम बानो इसकी मोटी कीमत देगी “
उसकी बात सुनकर उर्फ़ राज मुँह ऊपर उठा कर ठहाके लगा के हँसा, उसे देख कर ऐसा लग रहा था जैसे कोई भेड़िया अपने पँजे मे शिकार को दबोच के हँस रहा हो, और वो कार तेज़ी से शहर के बदनाम इलाके जिस्म की मंडी की तरफ दौड़ी जा रही थी……
ये कोई कहानी नहीं बल्कि सच्चाई है छत्तीसगढ़ की सलोनी ।
जो मुम्बई से छुड़ाई गई है ।
ये सलोनी की कहानी उन लड़कियो को सबक देती है जो सोशल मीडिया से अनजान लोगो से दोस्ती कर लेती है और अपनी जिंदगी गवां लेती है ।
शेयर जरूर करे ताकि कोई और सलोनी ऐसी दलदल में ना फंस जाए…..
🙏🙏🙏
कांग्रेस मणिपुर मणिपुर क्यों चिल्ला रही थी समझिए…???
क्यों की आज मणिपुर है कल पूरे देश में होना है
👇 इन दस्तावेजों के मुताबिक कुकी #शरणार्थियों को जून 1968 में #कांग्रेस ने #मणिपुर में बसाया था।
#मैतेईस(हिंदुओ) ने उन्हें स्वीकार किया और खुले दिल और बांहों से उनका स्वागत किया।
अब वे ‘शरणार्थी’ ( ईसाई और मुस्लिम) मैतेई(हिंदुओ) लोगों के गांवों को जला रहे हैं और अपना एक अलग राज्य चाहते हैं।
जल्द ही वे अलग देश की मांग करेंगे.
जब मूलनिवासी मैतई ने विरोध प्रकट किया तो
उल्टा उन्हे हिंसक बताएजाने लगा और शरणार्थी अपना पुराना विक्टिम कार्ड खेलने लगी जैसा आमतौर पर मुस्लिम ईसाई करते ही हैं
और इस काम को कांग्रेस ने खूब प्रचारित किया मैंतईं को ठीक वैसे ही हिंसक बताए जाने लगा जैसा राहुल गांधी ने सदन में हिंदुओं को हिंसक बताया था
जबकि एक भी हिंदू हिंसक प्रवृत्ति में नहीं है उल्टा हिंदू पीड़ित है
हिंसा जो कर रहे हैं उनका तो नाम भी नहीं बताते यह लोग
कांग्रेस ने यही खेल उत्तर पूर्व के सभी राज्यो में खेला था
आज जहा जहा रोहिंगा बंग्लादेशियो को आप पाल रहे हो जनसंख्या बढ़ने पर
कल वो आपके ही मकान पर कब्जा करेगे ठीक वैसे जेसी कल कश्मीर में और आज मणिपुर में कर रहे है….
.
हिंदू तो है ही दिमागी पोपला वो भी बिना पूरा जाने मणिपुर मणिपुर चिल्ला रहा है
कांग्रेस को तो सत्ता के लिए देश जलाना और अराजकता फैलाना है फिर चाहे पंजाब हो केरल हो बंगाल हो या पूर्वोत्तर के राज्य….
ये जो बिहार में SIR यानी फर्जी मतदाता को रोकने के कार्यक्रम है कांग्रेस उसके खिलाफ सुप्रीमकोर्ट तक पहुंच गई
समझिए कांग्रेस मुस्लिमो की आबादी बढ़ा कर पूरे देश की डेमोग्राफी बदलना चाहती है ताकि सालों तक राज कर सके
ऐसा ही सपना इंदिरा ने देखा था
बंग्लादेशियों को शरणार्थी बता कर पूरे देश में बसने दिया था
ओर आज इसका पोता देख रहा है


સુપ્રીમ કોર્ટના ન્યાયાધીશ અબ્દુલ નઝીર, જેમણે ટ્રિપલ તલાકને ગેરબંધારણીય જાહેર કરતા ચુકાદા પર સહી કરવાનો ઇનકાર કર્યો હતો. તેમણે બંધારણ કરતાં ધર્મ ને પસંદ કર્યું.
ભૂતપૂર્વ રાષ્ટ્રપતિ હામિદ અંસારી, જેમણે RAW અધિકારી એન.કે. સૂદના મતે, વિદેશમાં ભારતીય ગુપ્તચર એજન્સીઓનો પર્દાફાશ કરવામાં સામેલ હતા, જેના કારણે અનેક RAW અધિકારીઓની હત્યા થઈ હતી.
ભૂતપૂર્વ મુખ્ય ચૂંટણી કમિશનર એન.વાય. કુરૈશી, જેમના કાર્યકાળમાં બંગાળ અને ઝારખંડમાં સૌથી વધુ ગેરકાયદેસર બાંગ્લાદેશી મુસ્લિમ મતદાર ઓળખપત્રો બનાવવામાં આવ્યા હતા.
શિક્ષિત હોય કે અશિક્ષિત, ધર્મની વાત આવે ત્યારે તેઓ એક જ રીતે વર્તે છે. તેમના માટે, રાષ્ટ્ર પહેલા નથી. તે હંમેશા ધર્મ પહેલા છે.

पत्नी का देहांत हुए 15 दिन हो चुके थे लोगों का आना जाना अब बन्द हो गया था। वह अकेला बैठा पुरानी यादों में खोया था कि अचानक उसे पत्नी का लिखा पत्र मिला। पत्र में लिखा था-
प्रिय पतिदेव
मुझे पता चल चुका है कि मुझे कैंसर है और वह भी अंतिम स्टेज में चल रहा है। मैं यह भी जानती हुँ कि मेरे पास अब बहुत कम दिन बचे हैं।
मुझे यह भी पता है कि आपने मेरे इलाज में अपनी सारी जमापूंजी खर्च कर दी है।सारे गहने बिक चुके हैं। कितनी मेहनत से बचत कर के जो प्लॉट हमने खरीदा था वह भी मेरी बीमारी की भेंट चढ़ चुका है।
आप क्या समझते थे कि आप यदि ये सारी बातें मुझे नहीं बताओगे तो क्या मुझे पता नहीं चलेगा?
मैं आपकी अर्धांगिनी हूँ। मैंने जिंदगी के 12 साल आपके साथ गुजारे हैं। मैं आपके चेहरे को पढ़कर जान जाती हूँ कि
आप किस हालत में हो मगर मेरी मजबूरी तो देखिए कि मैं आपके आंसू भी नही पोंछ सकती।
आप अकेले में जब रोते हो तब छुप कर देखती हूँ और फिर खुद भी रोती हूँ। कमबख्त जिंदगी हमें किस मोड़ पर ले आयी है? हम एक दूसरे का दर्द भी नहीं
बाँट सकते। एक दूसरे के आंसू भी नहीं पोंछ सकते।
आप समझते हैं कि आपको रोते देख कर मैं कमजोर पड़ जाऊंगी, इधर मैं नही चाहती आप कमजोर पड़े। कितनी बेगानी हो गई हूं न मैं? आपकी उदासी का कारण भी आपसे नहीं पूछ सकती!
आज कल सब जान पहचान वाले मिलने आ रहे हैं। शायद अब मैं एक दो दिन की ही मेहमान हूँ। शायद मेरी यात्रा पूरी हो चुकी है। ये कैसा बुलावा है जिसका मुझे पहले से पता है?
मुझे मरने से डर नहीं लगता।
मुझे डर लगता है कि आप कैसे सह पाओगे मेरी जुदाई ? शाम को घर आते ही मुझे तलाश करते हो। मगर अब मैं घर में नही मिलूंगी।
कलेजा मजबूत कर लेना। जानती हूं कि आपके लिए बहुत मुश्किल होगा मुझे भुलाना। मैं दो दिन मायके चली जाती हूँ तो पीछे-पीछे चले आते हो। अब तो हमेशा के लिए बुलावा आ गया है। हाथ और साथ दोनों छोड़ कर जा रही हूँ। मगर आप हिम्मत मत हारना।
बच्चे अभी बहुत छोटे हैं ,उनसे कहना मम्मी भगवान के पास गयी है। जल्दी
लौट कर आएगी। मेरे चले जाने के बाद बिल्कुल भी मत रोना। कलेजे को पत्थर कर लेना।
आप मुझसे कहा करते थे ना कि मैं बहुत डरपोक हूँ , बात बात पर रो पड़ती हूँ ।अब देखो ना आपकी पत्नी कितनी मजबूत हो गयी है! दुनिया से विदा होने वाली है, रात दिन दर्द को लेकर जी रही है। मगर एक बार भी नही रोयी।
हमारे साथ का सफर बहुत छोटा रहा, मगर क्या करूँ अब साथ नहीं दे पाऊंगी।
इतना प्यार देने के लिए शुक्रिया।
मेरे सारे नखरे उठाने के लिए शुक्रिया।
मुझे टूट कर चाहने के लिए शुक्रिया।
जानती हूं आपको मेरी लत लगी हुई है भुलाना बहुत मुश्किल है। मगर आपको खुद को सम्भालना ही होगा। मैं रोज आसमान से देखा करूँगी।
आप टाइम पर नहाना, टाइम पर खाना खा लेना क्योंकि आपको ये सब याद दिलाने के लिए आपकी पत्नी अब नहीं होगी।
अब मैं ना रहूँगी, अब आलस करना छोड़ देना। जब तक मैं थी आप घर की हर चिंताओं से मुक्त थे। मुझे दोनों बच्चों की तरह आपका भी ख़याल रखना पड़ता था मगर अब आप बच्चा बनना छोड़ देना ।
अब रूठना छोड़ देना क्योंकि आपको मनाने के लिए अब आपकी पत्नी नहीं रहेगी।
अब टूटना भी छोड़ देना क्योंकि आपकी हिम्मत बंधाने के लिए आपकी पत्नी नहीं होगी।
अय जिंदगी!
तेरे सफर में इतने गम क्यों है?
जो जीना ही नहीं चाहते
उनकी तू बहुत लंबी है
मगर जो जीना चाहते है
उनकी सांसे इतनी कम क्यों है?
अय जिंदगी
तेरे सफर में…
मुझसे अब और नहीं लिखा जाता। हाथों में दम बिल्कुल भी नहीं है फिर भी मैं लिख रही हूँ। आप दो दिन से सोये नहीं थे इसलिए आज गहरी नींद में सो रहे हो अत: मुझे लिखने का वक़्त मिल गया। मगर अब मैं लिखना बन्द करके आपको थोड़ा सा निहारना चाहती हूँ। पता नहीं सुबह उठूं या ना उठूं? आज आखरी बार आपके हाथों का तकिया बना कर सोना चाहती हूँ। आपके सीने से कान लगाकर आपकी धड़कनों में खोना चाहती हूं…
ફીલ્મ અભિનેતા..’બલરાજ સાહની’નું ચંદિગઢ મા શુટિંગ ચાલતું હતુ ઘણા લોકો એમને મળવા આવતા હતા..એમા એક અપંગ માણસ..એને મળવા આવ્યો..
પણ મોટા માણસ ને મળવું હોય તો બીજા બહું આડા આવે.
આ માણસ જુના ફાટેલા આર્મી ના યુનિફોર્મ મા એક હાથે ઘોડી પકડી ને સતત ત્રણ કલાક થી..બલરાજ સાહની બહાર આવે એની રાહ જોઇ ને બેઠો હતો….એમા કોઇ ને દયા આવી અને અંદર જઇ ને એણે બલરાજ સાહની ને વાત કરી કે,એક અપંગ માણસ છેલ્લા ત્રણ કલાક થી આપની રાહ જોઇ ને બેઠો છે.અને એ એવું કહે છે..કે,હું એમને મળ્યા વગર નહીં જાવ.
બલરાજ સાહની તરત બહાર આવ્યા..અને કહ્યુ..”આપ મને મળવા ઇચ્છતા હતા.. બોલો શુ કામ છે..?”
પેલા માણસે કહ્યુ…”તમે ‘હકીકત’ નામની ફિલ્મ મા જે મેજર ની ભુમિકા નિભાવી છે..ને..એજ લડાઇ મા મે આ પગ કપાવ્યો છે…”
આટલું સાંભળતા બલરાજ સાહની ભાવુક થયા અને એ સૈનિક ને એમણે આટલા લોકો ની વચ્ચે પણ પોતાનો મરતબો ભુલી ને સલ્યુટ કરી…પછી પુછ્યુ” હું આપના માટે કાંઈ કરી શકું.?”
પેલા સૈનિકે કહ્યુ..”મારા ઘરે ચા પીવા આવશો..?”
અને બલરાજ સાહની તરત એ માણસ સાથે ચાલી નિકળ્યા..સાવ ઝુંપડી જેવા લાગતા ઘરે…. અને ગરીબો ની વસ્તી મા જઇ ને આ મહાન કલાકારે ચા પીધી..
આવા સંવેદનશીલ હ્રદય ધરાવતા કલાકારો આજે જોવા મળે ખરા..?
*पांच फीट जमीन*
========================
“ अरे बुढिया तू यहाँ न आया कर , तेरा बेटा तो चोर-डाकू था . इसलिए गोरों ने उसे मार दिया“ जंगल में लकड़ी बिन रही एक मैली सी धोती में लिपटी बुजुर्ग महिला से वहां खड़ें भील ने हंसते हुए कहा .
“ नही चंदू ने आजादी के लिए कुर्बानी दी हैं “ बुजुर्ग औरत ने गर्व से कहा ।
उस बुजुर्ग औरत का नाम जगरानी देवी देवी था और इन्होने पांच बेटों को जन्म दिया था , जिसमे आखरी बेटा कुछ दिन पहले ही शहीद हुआ था .
उस बेटे को ये माँ प्यार से चंदू कहती थी और दुनियां उसे “ आजाद “ जी हाँ ! चंद्रशेखर आजाद के नाम से जानती हैं ।
हिंदुस्तान आजाद हो चुका था , आजाद के मित्र सदाशिव राव एक दिन आजाद के माँ-पिता जी की खोज करतें हुए उनके गाँव पहुंचे . आजादी तो मिल गयी थी लेकिन बहुत कुछ खत्म हो चुका था . चंद्रशेखर आज़ाद की शहादत के कुछ वर्षों बाद उनके पिता जी की भी मृत्यु हो गयी थी . आज़ाद के भाई की मृत्यु भी इससे पहले ही हो चुकी थी . अत्यंत निर्धनावस्था में हुई उनके पिता की मृत्यु के पश्चात आज़ाद की निर्धन निराश्रित वृद्ध माताश्री उस वृद्धावस्था में भी किसी के आगे हाथ फ़ैलाने के बजाय जंगलों में जाकर लकड़ी और गोबर बीनकर लाती थी तथा कंडे और लकड़ी बेचकर अपना पेट पालती रहीं . लेकिन वृद्ध होने के कारण इतना काम नहीं कर पाती थीं कि भरपेट भोजन का प्रबंध कर सकें . कभी ज्वार कभी बाज़रा खरीद कर उसका घोल बनाकर पीती थीं क्योंकि दाल चावल गेंहू और उसे पकाने का ईंधन खरीदने लायक धन कमाने की शारीरिक सामर्थ्य उनमे शेष ही नहीं थी ।
शर्मनाक बात तो यह कि उनकी यह स्थिति देश को आज़ादी मिलने के 2 वर्ष बाद (1949 ) तक जारी रही ।
चंद्रशेखर आज़ाद जी को दिए गए अपने एक वचन का वास्ता देकर सदाशिव जी उन्हें अपने साथ अपने घर झाँसी लेकर आये थे, क्योंकि उनकी स्वयं की स्थिति अत्यंत जर्जर होने के कारण उनका घर बहुत छोटा था अतः उन्होंने आज़ाद के ही एक अन्य मित्र भगवान दास माहौर के घर पर आज़ाद की माताश्री के रहने का प्रबंध किया था और उनके अंतिम क्षणों तक उनकी सेवा की ।
मार्च 1951 में जब आजाद की माँ जगरानी देवी का झांसी में निधन हुआ तब सदाशिव जी ने उनका सम्मान अपनी माँ के समान करते हुए उनका अंतिम संस्कार स्वयं अपने हाथों से ही किया था ।
आज़ाद की माताश्री के देहांत के पश्चात झाँसी की जनता ने उनकी स्मृति में उनके नाम से एक सार्वजनिक स्थान पर पीठ का निर्माण किया . प्रदेश की तत्कालीन सरकार (प्रदेश में कंग्रेस की सरकार थी और मुख्यमंत्री थे गोविन्द बल्लभ पन्त ) ने इस निर्माण को झाँसी की जनता द्वारा किया हुआ अवैध और गैरकानूनी कार्य घोषित कर दिया . किन्तु झाँसी के नागरिकों ने तत्कालीन सरकार के उस शासनादेश को महत्व न देते हुए चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति स्थापित करने का फैसला कर लिया ।
मूर्ती बनाने का कार्य चंद्रशेखर आजाद के ख़ास सहयोगी कुशल शिल्पकार रूद्र नारायण सिंह जी को सौपा गया . उन्होंने फोटो को देखकर आज़ाद की माताश्री के चेहरे की प्रतिमा तैयार कर दी ।
जब सरकार को यह पता चला कि आजाद की माँ की मूर्ती तैयार की जा चुकी है और सदाशिव राव, रूपनारायण, भगवान् दास माहौर समेत कई क्रांतिकारी झांसी की जनता के सहयोग से मूर्ती को स्थापित करने जा रहे है तो उसने अमर बलिदानी चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति स्थापना को देश, समाज और झाँसी की कानून व्यवस्था के लिए खतरा घोषित कर उनकी मूर्ति स्थापना के कार्यक्रम को प्रतिबंधित कर पूरे झाँसी शहर में कर्फ्यू लगा दिया । चप्पे चप्पे पर पुलिस तैनात कर दी गई ताकि अमर बलिदानी चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति की स्थापना ना की जा सके ।
जनता और क्रन्तिकारी आजाद की माता की प्रतिमा लगाने के लिए निकल पड़ें . अपने आदेश की झाँसी की सडकों पर बुरी तरह उड़ती धज्जियों से तिलमिलाई तत्कालीन सरकार ने अपनी पुलिस को सदाशिव को गोली मार देने का आदेश दे डाला किन्तु आज़ाद की माताश्री की प्रतिमा को अपने सिर पर रखकर पीठ की तरफ बढ़ रहे सदाशिव को जनता ने चारों तरफ से अपने घेरे में ले लिया . जुलूस पर पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया .सैकड़ों लोग घायल हुए, दर्जनों लोग जीवन भर के लिए अपंग हुए और कुछ लोग की मौत भी हुईं . (मौत की पुष्टि नही हुईं ) . चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति स्थापित नहीं हो सकी ।
आजाद हम आपको कौन से मुंह से आपको श्रधांजली दें ? जब हम आपकी माताश्री की 2-3 फुट की मूर्ति के लिए उस देश में 5 फुट जमीन भी हम न दे सकें जिस देश के लिए आप ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे ।
लालच ही हमारे दु:खों का कारण है…!!
एक पण्डित जी कई वर्षो से काशी में शास्त्रों और वेदों का अध्ययन कर रहे थे। उन्हें सभी वेदों का ज्ञान हो गया था। पण्डित जी को लगा कि अब वह अपने गाँव के सबसे ज्ञानी व्यक्ति कहलायेगे। उनके अन्दर घमण्ड आ गया था।
अगले दिन पण्डित जी अपने गाँव जाने लगे। गाँव में आते ही एक किसान ने उनसे पूछा–‘क्या आप हमें बता सकते है, कि हमारे समाज में लोग दु:खी क्यों है ?’ पण्डित जी ने कहा–‘लोगों के पास जीने के लिए पर्याप्त साधन नहीं हैं। अपनी आवश्यकता पूर्ण करने के लिए धन नहीं है, इसलिए लोग दु:खी है।
किसान ने कहा–‘परन्तु पण्डित जी जिन लोगो के पास धन दौलत है, वह लोग भी दु:खी है। मेरे पास धन सम्पत्ति है फिर भी मै दुखी हूँ क्यों ?’ पण्डित जी को कुछ समझ नहीं आया कि वह किसान को क्या उत्तर दें।
किसान ने कहा–‘वह आपको अपनी सारी सम्पत्ति दान कर देगा अगर आप उस के दुःख का कारण पता करके उसे बता दें तो।’ पण्डित जी ने उसकी सम्पत्ति के लालच में कहा–‘ठीक है मैं कुछ दिनों में ही आपके दुःख का कारण ढूँढ लाऊँगा।’
यह कहकर पण्डित जी पुनः काशी चले गए। उन्होंने शास्त्रों और वेदों का फिर से अध्ययन किया, परन्तु उन्हें किसान के सवाल का जवाव नहीं मिला। पण्डित जी बहुत परेशान थे। वह सोच रहे थे कि ‘अगर मैं किसान के सवाल का उत्तर नहीं दे पाया तो, लाखो की सम्पत्ति हाथ से चली जाएगी।
उनकी मुलाकात एक औरत से हुई, जो रोड पर भीख माँग कर अपना गुजारा करती थी। उसने पण्डित जी से उनके दुःख का कारण पूछा। पण्डित जी ने उसे सब कुछ बता दिया।
उस औरत ने कहा–‘वह उनको उनके सवाल का उत्तर देगी, परन्तु उसके लिए उन्हें उसके साथ कुछ दिन रहना पड़ेगा।’ पण्डित जी कुछ देर चुप रहे वह सोच रहे थे कि, ‘वह एक ब्राह्मण हैं, इसके साथ कैसे रह सकते हैं। अगर वह इसके साथ रहे तो उनको धर्म नष्ट हो जायेगा।’
फिर पण्डित जी ने सोचा–‘कुछ दिनों की बात है, उन्हें किसान के सवाल का उत्तर जब मिल जायेगा वह चले जायेंगे, और किसान की सम्पत्ति के मालिक बन जायेंगे।’
पण्डित जी उसके साथ रहने के लिए तैयार हो गए। कुछ दिन तक वह उसके साथ रहे पर सवाल का उत्तर उस औरत ने नहीं दिया। पण्डित जी ने उससे कहा–‘मेरे सवाल का उत्तर कब मिलेगा।’
औरत बोली–‘आपको मेरे हाथ का खाना खाना होगा।’ पण्डित जी मान गए। जो किसी के हाथ का पानी भी नहीं पीते थे, वह उस गन्दी औरत के हाथ का बना खाना खा रहे थे। उनके सवाल का उत्तर अब भी नहीं मिला।
अब औरत ने बोला–‘उन्हें भी उनके साथ सड़क पर खड़े होकर भीख मांगनी पड़ेगी।’ पण्डित जी को किसान के सवाल का उत्तर पता करना था, इसलिए वह उसके साथ भीख मांगने के लिए भी तैयार हो गए। उसके साथ भीख मांगने पर भी उसे अभी तक सवाल का उत्तर नहीं मिला था।
एक दिन औरत ने पण्डित जी से कहा कि उन्हें आज उसका झूठा भोजन खाना है। यह सुनकर पण्डित जी को गुस्सा आया, और वह उसपर चिल्लाये और बोले–‘तुम मुझे मेरे सवाल का उत्तर दे सकती हो तो बताओ।’
वह औरत मुस्कुराई और बोली–‘पण्डित जी यही तो आपके सवाल का उत्तर है। यहाँ आने से पहले आप किसी के हाथ का पानी भी नहीं पीते थे।
मेरे जैसी औरतों को तो आप देखना भी पसन्द नहीं करते थे, परन्तु किसान की सम्पत्ति के लालच में आप मेरे साथ रहने के लिए भी तैयार हो गए।
पण्डित जी इंसान का लालच और उसकी बढ़ती हुई इच्छाएँ ही उसके दुःख का कारण हैं। जो उसे वह सब कुछ करने पर मजबूर कर देती हैं, जो उसने कभी करने के लिए सोचा भी नहीं होता।’
700 साल पुराना शाप जो आज भी कूच बिहार को डराता है
केंदु कलि जी की भक्ति,श्राप और पुनर्जन्म “कामेश्वर की वापसी” में हुआ
जानिए कामाख्या मंदिर की रहस्यमयी कहानी
आखिर क्यों मां कामाख्या ने अपने ही
पुजारी का मस्तक छेद कर दिया होगा ?
ऐसा कौन सा श्राप था जिसके श्राप के कारण कामाख्या के जो राज परिवार है वे आज भी जय सालों के उपरांत के बाद भी मां कामाख्या के दर्शन नहीं कर पाते हैं आखिर क्यों मां कामाख्या ने सदैव लिए नीलांचल क्षेत्र को छोड़ दिया था ?
कामाख्या मंदिर से जुड़ी कई महान तांत्रिक, मंत्र और अघोरी साधकों की कथाएँ हैं। उन्हीं में से एक कथा जुड़ी है केन्दुगलि जी से। केन्दुगलि मां कामाख्या के मुख्य पुजारी थे और गर्भगृह में पूजा-अर्चना करते थे। वे मां के महान उपासक थे।
अब हुआ यह कि वहां के जो राजा थे नर नारायण वे भी मां कामाख्या के परम भक्त थे। वे कूच बिहार राजवंश से थे, जिसे कोच बहार वंश के नाम से भी जाना जाता है। राजा नर नारायण मां के अत्यंत भक्त होने के कारण प्रतिदिन दर्शन हेतु नीलांचल क्षेत्र में आया करते थे। नीलांचल, वह पर्वत है जहाँ मां कामाख्या निवास करती हैं, इसलिए उन्हें ‘नीलांचलवासिनी’ भी कहा जाता है।
जब राजा दर्शन हेतु नीलांचल आते, तो उनकी भेंट केन्दुगलि जी से होती। वे उन्हीं के माध्यम से मां की पूजा-अर्चना करवाते थे। केन्दुगलि जी मां के इतने बड़े भक्त थे कि उनके पास आई, वे (केंदुगली जी) ऐसे महान भक्त थे जो भक्तों की हर समस्या का समाधान करने में सक्षम थे।
एक बार एक माता उनके पास आई, जिसके हाथों में उसकी मृत बच्ची थी। वह रो-रोकर कहने लगी ‘आप ही मेरी अंतिम आशा हैं। मैं आपसे प्रार्थना करती हूँ कि मां की कृपा और आशीर्वाद से मेरी बेटी को फिर से जीवन मिले।
केंदुगली जी ने शांत स्वर में उत्तर दिया माता, यह संभव नहीं है। क्योंकि एक बार जिसकी मृत्यु हो जाती है, वह जीवित नहीं हो सकता। लेकिन उस माता को केंदुगली जी पर अपार विश्वास और श्रद्धा थी। उसने कहा मुझे विश्वास है, अगर आप एक बार मां से कहेंगे, तो वह आपकी बात को मना नहीं कर पाएंगी।
केंदुगली जी बोले आपकी श्रद्धा को प्रणाम। मैं मां से आपके लिए प्रार्थना अवश्य करूँगा, बाकी सब मां की इच्छा पर निर्भर करेगा।
इसके बाद उन्होंने उस मृत बच्ची को गोद में उठाया और मां की पाषाण प्रतिमा, अर्थात ब्रह्मांड-योनि पर जाकर उसे रख दिया। जैसे ही केंदुगली जी ने आंखें मूंदकर मां से प्रार्थना की
“हे मां! यदि मेरे हृदय में सच्ची भक्ति है, यदि आप मेरे साथ हैं, तो इस नन्ही जान को फिर से जीवनदान दीजिए…”
तभी चमत्कार हुआ। मां की शक्ति प्रकट हुई और वह मृत बच्ची धीरे-धीरे अपने आप हिलने लगी… उसके शरीर में फिर से प्राण लौट आए…”
केंदुगली जी की इस विनम्र प्रार्थना पर मां ने कृपा की। मृत बच्ची को जीवनदान मिला वह फिर से जीवित हो गई।
यह चमत्कारी घटना धीरे-धीरे पूरे नगर में फैल गई। अंततः इसकी खबर राजा नरनारायण तक भी पहुँची। जब राजा ने सुना कि केंदुगली जी इतने सिद्ध महायोगी हैं कि उनके माध्यम से मां स्वयं किसी को जीवनदान दे सकती हैं तब उनके मन में भी गहरी श्रद्धा जाग उठी। राजा ने इच्छा व्यक्त की कि वे भी मां के साक्षात दर्शन करना चाहते हैं।
उधर उस क्षेत्र के लोगों को यह भलीभांति ज्ञात था कि जब मंदिर के पट रात्रि में बंद हो जाते हैं, तब केंदुगली जी अपनी आँखों पर पट्टी बांध लेते हैं और मां की पूजा-अर्चना करते हैं। उस समय मां कामाख्या स्वयं प्रकट होती थीं।
मां के प्रकट हो जाने के बाद भी केंदुगली जी की स्तुति, उनका भजन, उनका मंत्रोच्चार कुछ भी नहीं रुकता था। वे पूरी भक्ति में लीन हो जाते थे और मां के लिए भावविभोर होकर श्लोकों का गान करते थे।
माना जाता है कि उस समय मां स्वयं नृत्य करती थीं वह भी नग्न रूप में। क्योंकि मां कामाख्या ब्रह्मांड योनि की अधिष्ठात्री देवी हैं।
मां कामाख्या का संबंध स्वयं ब्रह्मांड योनि से है।
यह वही स्थान है जहाँ देवी सती का योन भाग स्थापित हुआ था यानी वह शक्ति-केन्द्र, जहाँ से संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति मानी जाती है। यही वह नीलांचल क्षेत्र है, जिसे आज कामाख्या धाम के रूप में जाना जाता है।
केंदुगली जी, जो मां के परम भक्त और गर्भगृह के प्रधान पुजारी थे, उन्हीं के पास एक दिन राजा नरनारायण आए जो कोच बिहार वंश के महान शासक और मां के अनन्य उपासक थे।
राजा ने विनती की “मैं भी मां के दिव्य दर्शन करना चाहता हूं। कृपया मुझे गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति दीजिए।”
केंदुगली जी ने स्पष्ट कहा
“राजन, यह मैं नहीं कर सकता। क्योंकि जब मैं स्वयं मां की पूजा करता हूं तो रात्रि में, मंदिर के कपाट बंद होने के बाद मैं भी अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर मां का पूजन करता हूं। बिना मां की अनुमति के गर्भगृह में कोई भी उपस्थित नहीं रह सकता।
लेकिन राजा नरनारायण अपनी जिद पर अड़े रहे।
उन्होंने साम, दाम, दंड, भेद सभी उपाय अपनाकर केंदुगली जी को विवश कर दिया।
विवश होकर केंदुगली जी ने कहा
“ठीक है राजन, मैं आपको गर्भगृह में तो नहीं ला सकता, लेकिन वहां एक छेद है एक छोटा सा छिद्र जहां से आप मां को दर्शन करते हुए देख सकते हैं।
“मैं जब स्तुति गाना आरंभ करूंगा, तभी आप झांक सकते हैं। लेकिन ध्यान रहे यह आपकी जिम्मेदारी है कि आप उस मर्यादा का उल्लंघन न करें।
आप उस छिद्र से बस एक नज़र कीजिएगा जैसे ही आपकी दृष्टि जाएगी मां साक्षात प्रकट हो चुकी होंगी…”यही वादा किया था केंदुगली जी ने राजा नरनारायण से।
रात्रि का समय हुआ और मंदिर के कपाट बंद किए गए। केंदुगली जी ने आंखों पर पट्टी बांधी और स्तुति गाना प्रारंभ किया। जैसे ही उनका भजन आरंभ हुआ मां कामाख्या गर्भगृह में प्रकट हो गईं। लेकिन नृत्य शुरू होने से पहले ही मां को यह आभास हो गया कि उनके साथ छल हुआ है। किसी ने उनकी मर्यादा को भंग करने का प्रयास किया है।
मां ने क्रोधित होकर सर्वप्रथम केंदुगली जी का सिर धड़ से अलग कर दिया क्योंकि उन्होंने ही गुप्त रूप से राजा को दर्शन देने की छूट दी थी। इसके बाद मां ने राजा नरनारायण को श्राप दिया
“अब से तुम्हारा वंश कूच बिहार राजवंश यदि इस पवित्र क्षेत्र में भटकने की भी कोशिश करेगा, तो मैं उसका नाश कर दूंगी। इस राजवंश का अंत निश्चित है।
यह श्राप इतना शक्तिशाली और अनुल्लंघनीय था कि राजा नरनारायण ने उसी क्षण नीलांचल पर्वत क्षेत्र को सदा के लिए छोड़ दिया।
आज भी जब कूच बिहार वंश के कोई वंशज ट्रेन, बस या किसी अन्य साधन से कामाख्या क्षेत्र से गुजरते हैं तो वे मौन हो जाते हैं, सिर झुका लेते हैं। वे मां के दर्शन का प्रयास तक नहीं करते। ऐसा माना जाता है कि यदि उन्होंने मां की ओर आंख उठाकर भी देखा, तो अनिष्ट निश्चित है।
यह कथा केवल एक ऐतिहासिक प्रसंग नहीं, अपितु उस दैवी चेतना का प्रमाण है जो मां कामाख्या की ऊर्जा और मर्यादा में आज भी विद्यमान है।
कुछ लोग कहते हैं कि जब भी कूच बिहार वंश के राजा या उनके वंशज कामाख्या क्षेत्र से गुजरते हैं चाहे ट्रेन से, चाहे कार से, वे सदैव अपने बाजू में एक छतरी (अंब्रेला) खोल देते हैं। इसका उद्देश्य होता है कि गलती से भी उनकी दृष्टि मां कामाख्या की ओर न चली जाए।
दूसरी ओर, केंदु कलि जी के संबंध में दो रहस्यमयी कथाएं मिलती हैं।
🔹 पहली कथा यह कहती है कि जब मां ने क्रोध में आकर राजा नरनारायण को श्राप दिया, तब मां ने केंदु कलि जी का शिर भी धड़ से अलग कर दिया क्योंकि उन्होंने मां की अनुमति के बिना राजा को दर्शन की युक्ति बताई थी।
🔹 वहीं दूसरी कथा के अनुसार, मां ने क्रोध में आकर उन्हें पत्थर की मूर्ति में परिवर्तित कर दिया था। आज भी कहा जाता है कि कामाख्या के गुप्त गर्भगृह में एक विशेष पत्थर की आकृति है, जिसे कुछ साधक केंदु कलि जी का अवशेष मानते हैं।
राजा नरनारायण और उनके वंशजों (कूच बिहार राजवंश) के विषय में यह भी कहा जाता है कि वे मां के उस श्राप के भय से आज भी उस क्षेत्र में सीधे नहीं आते। कुछ लोग कहते हैं कि इस वंश के किसी भी सदस्य को कामाख्या क्षेत्र से गुजरते समय भी माँ के मंदिर की ओर देखने की अनुमति नहीं है।
एक लोक कथा के अनुसार, कथा है केंदु कलि जी का पुनर्जन्म “कामेश्वर की वापसी” में हुआ
मां कामाख्या के परम उपासक, तांत्रिक केंदु कलि जी, जब राजा नरनारायण की छलबल का शिकार बने और मां के क्रोध से उनका सिर धड़ से अलग हो गया तो मां के करुण रूप ने उस क्षण ही उन्हें एक वचन दिया।
“हे तांत्रिक! तुमने भले ही मुझसे धोखे में राजा को छिद्र दर्शन की छूट दी, परंतु तुम्हारी भक्ति निष्कलंक है। मैं तुम्हें पुनर्जन्म दूंगी तुम फिर लौटोगे, और इस बार तुम मेरे लिए ‘कामेश्वर’ रूप में मेरे तंत्र को संवारोगे।”
यह वचन केवल एक आशीर्वाद नहीं था, बल्कि मां का आदेश था।
पुनर्जन्म की भविष्यवाणी और संकेत
कहते हैं, मां कामाख्या ने भविष्यवाणी की थी कि
“मेरी महाशक्ति की जब तीसरी लहर जागेगी, तब तुम पश्चिम से लौटोगे — तुम्हारे मस्तक पर त्रिशूल की आकृति होगी, और बाल्यकाल से ही तुम्हें मृत आत्माओं के साथ संवाद की क्षमता होगी। तुम पुनः मेरे प्रांगण में तांत्रिक महामंडल की स्थापना करोगे।
केंदु कलि जी का पुनर्जन्म बंगाल में
कई लोककथाओं के अनुसार, मां का यह वचन सत्य हुआ।
17वीं शताब्दी के अंत में बंगाल के नवद्वीप क्षेत्र में एक बालक जन्मा जो बचपन से ही शव साधना की ओर आकर्षित था। उसे लोग “महाश्मशानी बालक” कहकर बुलाते थे। बालक का नाम इतिहास में नहीं मिलता, लेकिन तांत्रिक ग्रंथों और साधकों के अनुसार वह ही केंदु कलि जी का पुनर्जन्म था।
इस बालक ने बाद में
मां तारा पीठ, तारापीठ (बीरभूम, बंगाल) में तपस्या की
13 वर्षों तक शव साधना की
कामाख्या पीठ में लौटकर “कामेश्वरानंद” नाम से फिर से मां के पूजा स्थल का तांत्रिक शुद्धिकरण किया
महाअग्नि यज्ञ और तृतीय चक्र स्थापना
यह भी कहा जाता है कि उन्हीं के प्रयास से कामाख्या मंदिर में
तृतीय यंत्र चक्र (गुप्त योनि चक्र) की स्थापना हुई
64 योगिनियों की छाया साधना की पुनः स्थापना हुई
और नागा साधुओं व अघोरियों को अलग-अलग दीक्षा पद्धति में बांटा गया
इस कथा का रहस्य और सीमाएँ
यह कथा तांत्रिक ग्रंथों या प्रमाणिक शास्त्रों में नहीं मिलती
कामाख्या मंदिर के पुरातन पुजारियों द्वारा सुनाई जाती है
अघोरपंथ, वामाचार साधकों व बंगाल के तांत्रिक अखाड़ों में इसे “गुप्त कथा” माना जाता है
साधकों के अनुसार “केंदु कलि का पुनर्जन्म” ही कामाख्या की दूसरी आध्यात्मिक क्रांति का कारण बना था

अक्का महादेवी शिव भक्त थीं।
शिव को वह अपने पति के रूप में देखती थीं। बचपन से ही उन्होंने अपने आप को पूरी तरह से शिव के प्रति समर्पित कर दिया था। जब वह युवा हुईं तो एक राजा की नजर उन पर पड़ी। वह इतनी खूबसूरत थीं कि राजा ने उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया,
लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। राजा ने उन्हें धमकाया – अगर तुम मुझसे विवाह नहीं करोगी, तो मैं तुम्हारे माता पिता को मार डालूंगा। डरकर उन्होंने उससे शादी कर ली, लेकिन उसे शारीरिक रूप से दूर ही रखा। राजा उनसे कई तरीकों से प्रेम निवेदन करता रहा,
लेकिन हर बार वह एक ही बात कहतीं – मेरी शादी तो बहुत पहले शिव के साथ हो चुकी है। यह अक्का का कोई मतिभ्रम नहीं था, यह उनके लिए शत प्रतिशत सच्ची बात थी। विवाह का मतलब होता है कि आप अपना शरीर, मन, और भावनाएं अपने जीवन-साथी को सौंप देते हैं।
मस्तिष्क और भावों के भी आगे एक पूर्णत: अलग स्तर तक पहुंच गया था और पूरी तरह से वास्तविक बन गया था। आप केवल कुछ प्रसिद्ध भक्तों के बारे में जानते हैं, लेकिन ऐसे बहुत सारे भक्त हुए हैं जो गुमनाम हैं और जो इस अवस्था में पहुंच चुके थे। अक्का महादेवी के लिए भी यह सब वास्तविक था।
उनके लिए यह कोई कल्पना नहीं थी, यह शत प्रतिशत सच था। अक्का महादेवी का यह कहना कि उनकी शादी पहले ही शिव से हो चुकी है, राजा को सहन नहीं हुआ। तो एक दिन राजा ने सोचा कि ऐसी पत्नी को रखने का कोई मतलब नहीं है। ऐसी पत्नी के साथ भला कोई कैसे रह सकता है
जिसने किसी अदृश्य व अनजाने व्यक्ति से विवाह किया हुआ है। उन दिनों औपचारिक रूप से तलाक नहीं होते थे। पर राजा परेशान रहने लगा। उसे समझ नही आ रहा था कि वह क्या करे। उसने अक्का को अपनी राजसभा में बुलाया और राजसभा से फैसला करने को कहा।
जब सभा में अक्का से पूछा गया तो वह यही कहती रहीं कि उनके पति कहीं और हैं।राजा को गुस्सा आगया क्योंकि इतने सारे लोगों के सामने उसकी पत्नी कह रही थी किउसका पति कहीं और है।आठ सौ साल पहले किसी राजा के लिए यह सहन करना कोई आसान बात नहीं थी।समाज में ऐसी बातों का सामना करना आसान नहीं था।
राजा ने कहा, ‘अगर तुम्हारा विवाह किसी और के साथ हो चुका है तो तुम मेरे साथ क्या कर रही हो? चली जाओ।’ अक्का ने कहा, ‘ठीक है’ और वहां से चल पड़ीं। भारत में उन दिनों किसी महिला के लिए यह सोचना भी दुश्वार था कि वह हमेशा के लिए अपने पति का घर छोडक़र जा सकती है,
लेकिन अक्का वहां से चल पड़ीं।
जब राजा ने देखा कि अक्का बिना किसी परेशानी के उसे छोडक़र जा रही है, तो क्रोध के कारण उसके मन में नीचता आ गई। उसने कहा, ‘तुमने जो कुछ भी पहना हुआ है, गहने, कपड़े, सब कुछ मेरा है। यह सब यहीं छोड़ दो और तब जाओ।’
लोगों से भरी राजसभा में सत्रह-अठ्ठारह साल की उस युवती अक्का महादेवी ने अपने सभी वस्त्र उतार दिए और वहां से निर्वस्त्र ही चल पड़ी। उस दिन के बाद से उन्होंने वस्त्र पहनने से इनकार कर दिया। बहुत से लोगों ने उन्हें समझाने की कोशिश की कि उन्हें वस्त्र पहनने चाहिए,
क्योंकि इससे उन्हें ही परेशानी हो सकती है, लेकिन उन्होंने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। पूरे जीवन वह निर्वस्त्र ही रहीं और एक महान संत के रूप में जानी गईं। उनका निधन कम उम्र में ही हो गया था, लेकिन इतने कम समय में ही उन्होंने शिव और उनके प्रति अपनी भक्ति के बारे में सैकड़ों खूबसूरत कविताएं लिखीं। उनकी भक्ति ऐसी थी कि वह हर दिन प्रार्थना करती थीं, ”हे शिव, मुझे आज भोजन न मिले। मैं चाहती हूं कि आपका अंश बनने के लिए मैं जिस तड़प और पीड़ा से गुजर रही हूं, वह मेरे शरीर से भी जाहिर हो।
अगर मैं भोजन कर लूंगी तो मेरा शरीर संतुष्ट हो जाएगा। मेरा शरीर नहीं समझता है कि मैं कैसा महसूस कर रही हूं। इसलिए मैं चाहती हूं कि मुझे भोजन ही न मिले। अगर मेरे हाथ में भोजन आए भी तो इससे पहले कि मैं उसे खाऊं, वह जमीन पर गिर जाए।
अगर यह जमीन पर गिर गया तो मेरे जैसी मूर्ख उसे उठाकर खा सकती है इसलिए इससे पहले कि गिरे हुए भोजन को मैं उठाकर खाऊं, कोई कुत्ता आए और उसे ले जाए।” यह उनकी रोजाना की प्रार्थना थी।
भक्त पूरी तरह से अलग प्राणी होते हैं।
एक सच्चा भक्त सामाजिक ताने-बाने में फिट नहीं बैठता, इसलिए ऐसे लोग हमेशा समाज से अलग रहते हैं। कुछ भक्त अपने अलग तौर-तरीकों के बावजूद भी किसी तरह समाज में स्वीकार कर लिए जाते हैं, लेकिन ज्यादातर लोग गुमनामी में कहीं खो जाते हैं या कई बार ऐसा भी होता है
कि उन्हें मार दिया जाता है। कई दूसरी सभ्यताओं और देशों में ऐसे लोगों की हत्या कर दी जाती है, लेकिन भारत में कम से कम ऐसा नहीं होता। भक्त इस दुनिया के नहीं होते, उनका केवल भौतिक शरीर यहां होता है।
उनके जीने का तरीका और वह शक्ति, जो उनके पास होती है, पूरी तरह से किसी दूसरे लोक की होती है।
