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एक विवाह ऐसा भी — जब दूल्हा पीछे छूट गया और ध्रुव-नागराज आगे निकल गए

नब्बे का दशक था — ज़ेब खर्च कम थे और बाल-सुलभ लालच ज़्यादा। स्कूल की पढ़ाई के नाम पर कॉमिक्स पढ़ी जाती थी, और कॉमिक्स भी ऐसी-वैसी नहीं, राज कॉमिक्स वाली, जिनमें नागराज का विषैला रोमांस, ध्रुव की न्यायप्रिय मुस्कान और चाचा चौधरी की कंप्यूटर से तेज़ बुद्धि घुली-मिली होती थी।

मगर समस्या ये थी कि हम जिस कस्बे में पले-बढ़े, वहाँ कॉमिक्स किराए पर मिलना वैसा ही था जैसे व्रत में रसगुल्ला मिल जाए — असंभव नहीं, मगर दुर्लभ। और कॉमिक्स खरीदना तो जैसे किसी नेशनल हाईवे पर टोल टैक्स चुकाने जैसा लगता था — हर बार जेब पर मार और आत्मा पर बोझ।

ऐसे ही एक दिन बड़ों के सौभाग्य और हमारे कॉमिक्सीय नसीब का मिला-जुला आयोजन हुआ — हमारे चचेरे चाचा की शादी थी। बारात #बिसौली जानी थी। बस में लदकर पहुँचे जनवासे के पास, और फिर… हुआ एक चमत्कार!

कॉमिक्स की स्वर्गद्वारी दुकान

जनवासे से कुछ ही दूरी पर एक पतली सी गली में एक दुकान थी — मगर वो दुकान नहीं थी, हमारे लिए तो वैकुंठ थी! बाहर सुतली में लटकती रंग-बिरंगी कॉमिक्स, जैसे अमर चित्र कथा और राज कॉमिक्स ने अपनी ब्रह्माण्डीय ब्रांच खोल ली हो। अंदर कोने में धूल खाए मगर गर्व से मुस्कुराते पुलिंदे — बिल्लू, पिंकी, फ़ौलादी सिंह , जम्बू और मकड़ी रानी — सब यहीं थे!

उस दिन पहली बार जाना कि भगवान मंदिर में नहीं, कॉमिक्स की दुकान में भी मिल सकते हैं — बस उन्हें चवन्नी देकर बुलाना होता है।

बारात? कौन सी बारात?

जनवासे में घुसना तो दूर, नए जोड़े को देखने की कल्पना तक नहीं की। उस दुकान पर ही चवन्नियाँ अर्पित करते रहे, और हर कॉमिक्स को श्रद्धा से पढ़ते रहे। दुकानदार से सीधा सौदा — “चवन्नी में कॉमिक्स, सीट मैं खुद लाऊँगा (मतलब ज़मीन) और पंखा ईश्वर देखेगा।”

उस शाम हम ध्रुव की बाइक पे बैठकर बुराइयों का पीछा कर रहे थे, नागराज के साथ विषदंत से जूझ रहे थे, और चाचा चौधरी के साथ साबू को जुपिटर ग्रह भेज रहे थे — उधर मंडप में चाचा जी की शादी हो रही थी, इधर हम कॉमिक्स से सगाई कर बैठे थे।

रात के ग्यारह बजे दुकानदार ने जैसे संसार का अंत घोषित किया — “अब बंद कर रहा हूँ।”

उसने तो शायद पहली बार देखा था कि कोई बाराती उसकी दुकान में बिना खाने के बस चवन्नी और चाव के सहारे पाँच घंटे बैठ सकता है।

कॉमिक्स से नशा चढ़ा हुआ था, भूख प्यास मर चुकी थी। धर्मशाला लौटे, ज़मीन पे चाँदनी बिछी थी — हम चित लेट गए, जैसे किसी युद्ध के विजेता हों। ना दावत की चिंता, ना नई चाची की जिज्ञासा — बस संतुष्टि का साया ओढ़े सो गए।

सुबह लोगों ने बताया…

बारात में कितना स्वागत हुआ, दूध कैसे गिलास दर गिलास परोसा गया, किस हलवाई ने कितनी डिश बनाई, और चाचा कितना शरमा रहे थे— सबका विवरण सुनकर हमने बस मुस्कुरा कर सिर हिलाया।

क्योंकि हमारी बारात भी शानदार थी — दावत नहीं खाई, मगर मन भर के कॉमिक्स खाई थीं।

वो शादी नहीं, एक कॉमिक्स महोत्सव था मेरे लिए —
वहाँ चाचा दूल्हा थे, पर मैं असली हीरो था — विसर्पी के संग।

ऐसी बारात फिर कभी नसीब नहीं हुई — और शायद हो भी नहीं सकती।

क्योंकि तब जेब में कुछ चवन्नी थी, और दिल में कॉमिक्स का सपना।

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