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मनमोहन राज में प्रधानमंत्री रिलीफ फंड से हर साल कई हजार करोड़ रुपये राजीव गांधी फाउंडेशन को डोनेट किए जाते थे । जिसे राजीव गांधी फाउंडेशन देश विदेश से आए तमाम डोनेशन को जिसमें चीन से भी आते थे, यहां तक कि जाकिर नाईक ने भी ₹5000000 दिया था, ऐसे तमाम कुल 1000 करोड़ रुपए तमिलनाडु में रजिस्टर्ड और तमिलनाडु में ऑफिस रखने वाली एक संस्था वर्ल्ड विजन को ट्रांसफर करते थे ।
कुछ साल पहले तक राजीव गांधी फाउंडेशन की वेबसाइट पर उनके पार्टनर में वर्ल्ड विजन इंडिया और वर्ल्ड विजन इंटरनेशनल का भी नाम होता था ।

लेकिन जब कुछ साल पहले बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने राजीव गांधी और वर्ल्ड विजन की सच्चाई बताई तब उसे हटा दिया गया ।
और मोदी सरकार ने राजीव गांधी फाउंडेशन का फेरा और फेमा लाइसेंस कैंसिल कर दिया, ताकि अब उसे विदेशों से डोनेशन ना मिले ।

अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर मोदी सरकार ने तथाकथित सेवा में जुटे राजीव गांधी फाउंडेशन का फेरा, फेमा लाइसेंस क्यों कैंसिल किया ???

जब राजीव गांधी फाउंडेशन का फेरा और फेमा लाइसेंस कैंसिल किया गया तब कांग्रेस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके बताया था कि मोदी सरकार राजीव गांधी फाउंडेशन के सेवा कार्यों से डर गई है ।
तो जनाब यह एंटोनियो माइनो उर्फ सोनिया गांधी भारत में चर्च की सबसे बड़ी दलाल है…

वर्ल्ड विजन की वेबसाइट का लिंक मैं आपको कमेंट बॉक्स में दे रहा हूं । हालांकि मैंने कुछ स्क्रीनशॉट वर्ल्डविजन से लिए हैं यह संस्था विश्व की सबसे बड़ी ईसाई मिशनरी है, जो बच्चों और किशोरों के धर्मांतरण में लिप्त है ।

दुनिया के 80 देशों में यह प्रतिबंधित है और इस पर प्रतिबंध लगाने वाले 80 देशों में कुछ मुस्लिम देश हैं और ज्यादातर धर्मनिरपेक्ष देश हैं । वहां जब यह पाया गया कि वर्ल्डविजन संस्था बच्चों की सेवा करने के नाम पर उनका अवैध धर्मांतरण करवाती है तो उस पर प्रतिबंध लगा दिया गया ।

लेकिन इस संस्था को सोनिया गांधी चर्च के इशारे पर 1000 करोड़ रुपए हर साल देती थी, ताकि भारत में खासकर कर्नाटक तमिलनाडु और केरल में और नॉर्थ ईस्ट में छोटे-छोटे बच्चों का बड़े पैमाने पर धर्मांतरण करवाया जा सके…।

जब वर्ल्ड विजन इंडिया का फेरा लाइसेंस मनमोहन राज में ही यह कहकर नहीं दिया गया कि यह संस्था विश्व के तमाम देशों पर प्रतिबंधित है, क्योंकि यह संस्था बच्चों और किशोरों के अवैध धर्मांतरण में लिप्त है, तब चर्च ने अपनी सबसे बड़ी दलाल सोनिया गांधी को एक्टिवेट किया और सोनिया गांधी ने इस संस्था को खूब पैसा मिले, इसके लिए पूरी ताकत लगा दी।

वर्ल्ड विजन की गंदी सच्चाई जाने के बाद तमाम बीजेपी शासित राज्यों में इसके कामकाज पर प्रतिबंध है, लेकिन यह संस्था आज भी केरल, तमिलनाडु और अब कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद तथा झारखंड यानी ऐसे राज्यों में जहां बीजेपी सत्ता में नहीं है, वहां बड़े पैमाने पर धर्मांतरण में लगी है ।

सबसे आश्चर्य इस बात पर है कि मनमोहन सिंह हम सबके टैक्स का पैसा यानी प्रधानमंत्री रिलीफ फंड का पैसा राजीव गांधी फाउंडेशन को देते थे और राजीव गांधी फाउंडेशन वर्ल्ड विजन को देता था ।

चूंकि राजीव गांधी फाउंडेशन के पास फेरा और फेमा लाइसेंस था, इसलिए राजीव गांधी फाउंडेशन पूरी दुनिया से तमाम ईसाई संस्थाओं तमाम सरकारों से डोनेशन के नाम पर और वह रुपए लेता था और उस पैसे को वह वर्ल्ड विजन को देता था, ताकि भारत में ईसाईयत फैलाई जा सके ।

क्योंकि यदि मनमोहन सिंह सीधे ईसाई मिशनरी को पैसा ट्रांसफर कर दे, तब किस पर बवाल होता ? लेकिन सोनिया गांधी ने इसका एक अलग रास्ता इस तरह निकाला था कि भारत में सोनिया गांधी अपना धर्मांतरण का काम करती रहे ।

जितेंद्र सिंह
(चंद्राश्मि सिंह की भित्ति से)

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साल 1964 – अमेरिका के न्यू जर्सी की बैल लेब्रोटरी में रॉबर्ट विल्सन तथा अर्नो पंजिया नामक दो युवा वैज्ञानिक अंतरिक्ष से पृथ्वी पर आने वाली क्षीण ऊर्जा तरंगों (माइक्रो वेव्स) का अध्ययन कर रहे थे। आश्चर्यजनक तौर पर दोनों वैज्ञानिकों ने पाया कि जितनी ऊर्जा की उन्हें उम्मीद थी, उससे कहीं ज्यादा एनर्जी डिस्टर्बेंस उनके एंटीना डिटेक्टर्स को प्राप्त हो रही थी। यह अनपेक्षित एनर्जी डिस्टर्बेंस, चाहें दिन हो अथवा रात, हर मौसम में आकाश के हर हिस्से से प्राप्त हो रही थी।

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परेशान और हैरान दोनों वैज्ञानिकों के पास इस गुत्थी को सुलझाने का एकमात्र क्लू इस “एनर्जी डिस्टर्बेंस की तीव्रता अर्थात वेवलेंथ” थी, जिसकी वैल्यू 1.015 सेंटीमीटर थी। इस वेवलेंथ का समकक्ष तापमान लगभग 3.5 केल्विन होता है। अर्थात आप कह सकते हैं कि – पंजिया और विल्सन को अंतरिक्ष में व्याप्त 3.5 केल्विन का एक ऐसा रहस्यमयी ऊर्जा का नाद सुनाई दे रहा था – जिसकी उत्पत्ति और उद्गम का कोई ओर-छोर प्रतीत नहीं हो रहा था।

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जब पंजिया और विल्सन इस समस्या से जूझ रहे थे, उन्ही दिनों एक अन्य वैज्ञानिक “पी.जे पेबल्स” ने एक शोध प्रकाशित किया था, जिसमें यह सवाल उठाया गया था कि आज भी ब्रह्मांड में पदार्थ की कुल मात्रा का 99% हिस्सा हाइड्रोजन और हीलियम जैसे हल्के तत्व ही क्यों हैं? जबकि ब्रह्मांड के शुरुआती समय में इन दोनों तत्वों को न्यूक्लियर रिएक्शन्स के बदौलत भारी तत्वों में बदल जाना चाहिए था। ऐसा नहीं हुआ, इसका निहितार्थ यह है कि – ब्रह्मांड की बेहद शुरुआती सघन अवस्था में कोई चीज थी, जो स्थिर परमाणुओं के निर्माण को रोक रही थी। वो चीज क्या है? उत्तर है – तापमान

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ब्रह्मांड निर्माण के पश्चात काफी लंबे समय तक, मतलब लाखों वर्षों तक, ब्रह्मांड हाई एनर्जी रेडिएशन (प्रकाश) तथा मूलभूत कणों (प्रोटॉन इलेक्ट्रॉन्स इत्यादि) से भरा हुआ एक सघन पिंड था, ऐसा पिंड जो हर समय आकार में बड़ा भी हो रहा था।

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इस अवस्था के दौरान बेहद अधिक तापमान के कारण इलेक्ट्रॉन्स इतने वेगवान हो गए थे कि प्रोटॉन्स उन्हें अपने आकर्षण बल से खींच कर स्थिर परमाणु बनाने में सक्षम नहीं थे। इस अवस्था के दौरान ब्रह्मांड रूपी पिंड इतना सघन था कि प्रकाश को मुक्त गति करने का मौका ही न मिलता और फोटॉन्स इस सघन पिंड में मौजूद इलेक्ट्रॉन्स-प्रोटॉन्स से टकरा कर टप्पा खाके पिंड के अंदर ही अंदर विचरण कर रहे थे। मने उस समय किसी युक्ति से आप इस पिंड के बाहर खड़े होकर पिंड के भीतर देखते तो आपको कुछ दिखता ही नहीं। दिखता तो तब, जब यह पिंड प्रकाश को मुक्त गति करने देता।

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बहरहाल, जैसा हमनें ऊपर कहा कि इस दौरान ब्रह्मांड निरंतर बड़ा हो रहा था और जब कोई चीज बड़ी होती है, तो उसका एवरेज टेम्परेचर भी ड्राप होता है। निरंतर प्रसारित होते ब्रह्मांड में अंततः लगभग 380000 वर्ष बाद वह समय आया, जब ब्रह्मांड का तत्कालीन आकार 8.45 करोड़ प्रकाशवर्ष और औसत तापमान ड्राप हो कर 3000 केल्विन पर आ गया था। इस तापमान पर प्रोटॉन्स इलेक्ट्रान को कैप्चर कर के स्टेबल परमाणु बनाने में सक्षम हुए और अंततः पिंड में कैद प्रकाश अपने मुक्त सफर पर कूच कर सका।

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ब्रह्मांड की अवस्था के इस युग अर्थात जन्म के 380000 वर्ष बाद के समय को रिकॉम्बिनेशन एरा कहते हैं। यह सबसे प्राचीन समय है, जिसे हम डायरेक्टली प्रकाश के सहारे देख सकते हैं। ब्रह्मांड की इससे प्राचीन अवस्था देख पाना संभव नहीं, कम से कम प्रकाश के सहारे तो बिल्कुल नहीं।

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लगभग 14 अरब वर्ष पूर्व रिकॉम्बिनेशन एरा में 3000 केल्विन का जो प्रकाश मुक्त हुआ था, उसे ही वैज्ञानिक भाषा में “कॉस्मिक बैकग्राउंड रेडिएशन” कहते हैं, जिसकी खोज का श्रेय विल्सन, पंजिया और पेबल्स जैसे वैज्ञानिकों को जाता है।

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14 अरब वर्ष पहले मुक्त हुई वह प्राचीन प्रदीप्ति आज क्षीण हो कर लगभग 2.7 केल्विन स्तर (Updated Value) की वैल्यू पर ब्रह्मांड में हर जगह व्याप्त है, चाहें भूलोक हो अथवा अंतरिक्षलोक। आप इस प्रकाश से हर समय घिरे हुए हैं। अगर आप अभी रेडियो खोल कर दो चैनल्स के बीच कोई भी रैंडम वेवलेंथ पर रेडियो सुनने का प्रयास करें तो आपको सुनाई देने वाले “शोर” में लगभग 10% हिस्सा कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड रेडिएशन का होगा।

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So in a way, if you ever want to hear the birth of the Universe – just turn your radio on.

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And As Always

Thanks For Reading!

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– झकझकिया

(चित्र – अर्नो पंजिया और रॉबर्ट विल्सन)

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महाभारत में युधिष्ठिर और भीष्म के बीच एक रोचक संवाद है।
युधिष्ठिर ने कहा: हे भीष्म (गांगेय), अगर किसी के घर में कबूतर घुसकर बस जाए, तो शांति लाने के लिए क्या करना चाहिए? कृपया मुझे जल्दी से बताएं। ठीक है!
तो कबूतरों की यह समस्या तब भी थी!

युधिष्ठिर उवाच –
कपोतो यदि गाङ्गेय!
निविश­त्यालयं नृणाम् ।
कथं शान्तिर्भवेत् तस्य
क्षिप्रमेतद्वद­स्व मे ।
वास्तु शास्त्र और अनुष्ठान प्रथाओं की प्राचीन भारतीय परंपरा में मनुष्यों और उनके पर्यावरण के बीच सामंजस्य बनाए रखने के लिए विस्तृत मार्गदर्शन शामिल है। शास्त्रीय ग्रंथों में वर्णित विभिन्न शगुन और उनके उपायों में से, किसी के घर में कबूतर का अप्रत्याशित प्रवेश विशेष महत्व रखता है।
युधिष्ठिर के अनुरोध में तात्कालिकता – “मुझे जल्दी बताओ” – समकालीन मान्यता को दर्शाता है कि कबूतर की समस्याओं को बढ़ने से रोकने के लिए तत्काल हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है।
भीष्म ने कहा: “हे राजन! जब कोई कबूतर, जिसे अशुभ माना जाता है, किसी घर में प्रवेश करता है, तो घर बर्बाद हो जाता है। या तो घर का मालिक जल्दी ही मर सकता है, या पत्नी, या प्रसव पीड़ा से पीड़ित महिला को कष्ट हो सकता है, या राजा बहुत क्रोधित हो सकता है (निवासी से)। इनमें से किसी भी तरह से, घर अशांत और अस्त-व्यस्त हो जाता है। एक बार कबूतर घर में प्रवेश कर जाता है, तो समृद्धि नहीं रहती।”
भीष्म उवाच –
प्रविष्टे सदनं राजन्!
कपोते­भयकारिणि ।
उत्सन्नं जायते सद्म
नात्र कार्य्या विचार­णा ।
अथ वा सद्मनःस्वामी
त्वरितं मृत्युमाप्नुयात् ।
गेहिनी वा सुती वापि
राजा कुप्यति वा भृशम् ।
पहली नज़र में, यह अंधविश्वास लग सकता है। लेकिन जब हम आधुनिक शहरों में हो रही घटनाओं को देखते हैं, तो प्राचीन ज्ञान समझ में आने लगता है। शहरी भारत पहले से कहीं ज़्यादा कबूतरों की समस्या से जूझ रहा है: प्रत्येक कबूतर प्रति वर्ष 12-15 किलोग्राम मल त्यागता है! इन मल में हानिकारक कण हो सकते हैं जो हवा में रहते हैं और हमारे फेफड़ों में चले जाते हैं। इससे बर्ड फैन्सियर लंग (BFL) जैसी बीमारियाँ हो सकती हैं, जिससे गंभीर साँस लेने की समस्याएँ और यहाँ तक कि मृत्यु भी हो सकती है।
वास्तव में, कुछ डॉक्टर कबूतरों को “उड़ने वाले चूहे” कहते हैं क्योंकि उनका मल कितना खतरनाक हो सकता है। प्राचीन ग्रंथों में कबूतरों को “भयकारिणी” (भय पैदा करने वाला) और “विघ्नकारक” (परेशानी पैदा करने वाला) के रूप में मान्यता दी गई है, जो कबूतरों के शहरी कीटों या अधिक रंगीन आधुनिक शब्दावली में “उड़ने वाले चूहे” के रूप में समकालीन वर्णन से उल्लेखनीय रूप से मेल खाता है।
भीष्म अपनी विशिष्ट प्रत्यक्षता के साथ प्राथमिक समाधान प्रस्तुत करते हैं:
उस परेशानी पैदा करने वाले कबूतर को हटा दिया जाना चाहिए। एक बुद्धिमान व्यक्ति को इसे नष्ट कर देना चाहिए, और इसे (मृत्यु के बाद) शांति के लिए पवित्र अग्नि (होम) में अर्पित करनी चाहिए।
यह उपाय प्राचीन समझ को दर्शाता है कि कभी-कभी सद्भाव को बहाल करने के लिए निर्णायक कार्रवाई आवश्यक होती है, जिसके बाद किसी भी नकारात्मक परिणाम को बेअसर करने के लिए अनुष्ठान किया जाता है।

निर्विशेत्सदनं यस्तु
कपोतो विघ्नकारकः ।
स हन्तव्यो मृतस्यास्य
मेदसा जुहुयात् सुधीः ।

समस्या क्यों है।
यह वास्तव में कबूतरों की गलती नहीं है। असली मुद्दा मानव व्यवहार है:
बहुत से लोग दया या आदत के कारण कबूतरों को खाना खिलाते हैं।
शहरों में खुली खिड़कियाँ, चबूतरे और वेंट हैं जहाँ कबूतर घोंसला बना सकते हैं।
कबूतर तेजी से प्रजनन करते हैं और अन्य पक्षियों को बाहर निकाल देते हैं।
2023 स्टेट ऑफ इंडियाज बर्ड्स रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि कबूतरों की अधिक आबादी अन्य पक्षी प्रजातियों को नुकसान पहुँचा रही है और शहरों में स्वास्थ्य जोखिम बढ़ा रही है।
युधिष्ठिर और भीष्म के बीच संवाद से पता चलता है कि मानव-कबूतर संघर्षों की गहरी ऐतिहासिक जड़ें हैं, और हमारे पूर्वजों ने इन मुद्दों को संबोधित करने के लिए परिष्कृत रूपरेखाएँ विकसित की हैं।
स्रोत: वाचस्पति, टी. (सं.). (1968). वाचस्पत्यं (खंड 3, संस्कृत)

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इतिहास में दफन कुकर्म…

अंडमान निकोबार द्वीप समूह में भारत के नौसेना का बड़ा अड्डा है ये तो सभी को ज्ञात है पर क्या आप ये जानते है के हमारे इस नौसैनिक अड्डे से सिर्फ 20 किलोमीटर दूर चीन का भी एक नौसैनिक अड्डा है…..!

जी हां भारत से सिर्फ 20 KM दूर… जहां से चीनी हमारी हर हरकत पर नज़र रखते है….!

इस चीनी नौसैनिक अड्डे का नाम है #Coco_Islands (तस्वीर देखें)…..साल 1950 तक ये भारत का ही हिस्सा हुआ करता था……पर आज भारत के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक है….अंडमान निकोबार सहित पूरा दक्षिण भारत, कोलकाता, चेन्नई जैसे बड़े शहर आज इस चीनी अड्डे की मिसाइलों की जद में है….ये भारत की वो कमजोर नस है जो चीन की उंगलियों के बीच दबी है….!

सबसे मजेदार चीज़ ये अड्डा चीन ने हमसे बिना लड़े बिना एक गोली खर्च किये बिना एक बूंद खून बहाए लिया है…..क्या कुछ अजीब लग रहा है……..!

इस ऐतिहासिक मूर्खता को समझने को आपको कुछ साल पीछे लौटना होगा…..

सबसे पहले इस महा मूर्खता का खुलासा भारत के पूर्व रक्षा मंत्री श्री #जॉर्ज_फर्नांडीस ने 2003 में किया था…उन्हों ने संसद और देश को बताया था के कैसे जो कोको आइलैंड देश के लिए सबसे बड़ा खतरा है उसे जवाहरलाल नेहरू नाम के एक अय्यास ने बाप का माल समझ दान में दे दिया था…..!

साल 1937 तक बर्मा(#म्यांमार) भारत का ही हिस्सा हुआ करता था फिर अंग्रेज़ों ने बर्मा को अलग कॉलोनी बनाया….तब के किसी भी भारतीय राजनीतिक नेता ने इसका कोई विरोध नहीं किया उल्टा कांग्रेस ने इस निर्णय को पूरा समर्थन दिया…..इस बटवारे में अंग्रेज़ों ने सामरिक फायदे को देख #कोको_आइलैंड को बर्मा के साथ जोड़ कर वहां काला पानी जैसी ही जेल बनाई जबकि ये बर्मा से 250 KM दूर था और भारत से सिर्फ 20KM…..!

1942 में इस द्वीप समूह पर अंडमान निकोबार के साथ ही जापान ने जीत हासिल की और बाद में इसे आज़ाद हिंद का इलाका माना….!

1947 में भारत को आज़ादी मिलने के बाद अंडमान एक स्वतंत्र देश की तरह बन गया जो बाद में 1950 में भारतीय गणराज्य में शामिल हुआ …..तब तक 1948 मैं बर्मा भी आज़ाद हो चुका था…..!

भारत का तब का प्रधानमंत्री खुद के विश्व नेता होने की गलत फहमी से नथुनों तक भरा था और इसी वाहियात सनक में उसने अंडमान निकोबार के पांच द्वीपों का समूह कोको आइलैंड बर्मा को दे दिया….!

नेहरू की इस #भयानक_अदूरदर्शिता का खामियाजा भारत ने भुगता 1994 में जब बर्मा की सरकार ने ये द्वीप सैनिक अड्डा बनाने को चीन के हवाले कर दिए…..वर्ष 2013 तक चीन ने यहां राडार, हवाई पट्टी, मिसाइलें सब खड़ा कर लिया न भारत की बार बाला सरकार ने न कोई विरोध किया न इस मुद्दे को बर्मा या चीन के साथ द्विपक्षीय वार्ता में कभी उठाया…!

नेहरू कितना बड़ा विश्व नेता बन सका ये तो सभी को ज्ञात है पर भारत के सीने में कोको आइलैंड के रूप में ठोंकी उसकी कील आने वाले समय में कितना दर्द देगी इसका किसी को क्या कोई अनुमान है……!

सिर्फ सोच के देखिए सिहर उठेंगे आप!

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It is time this country made a decision:
Do we want Dr. Bhimrao Ambedkar’s Constitution
or
Mrs. Indira Gandhi’s version of the Constitution?
I support Dr. Ambedkar’s Constitution.
The Congress party maligned and weakened the Constitution — especially during the dark days of the Emergency.

—अब समय आ गया है कि इस देश को यह निर्णय लेना चाहिए:
क्या हमें डॉ. भीमराव अंबेडकर का संविधान चाहिए
या
श्रीमती इंदिरा गांधी का संविधान?
मैं डॉ. अंबेडकर के संविधान का समर्थन करता हूं।
कांग्रेस पार्टी ने संविधान को बदनाम किया और उसे कमजोर किया – खासकर आपातकाल के काले दिनों में।

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भागवत कथा में बांस की स्थापना क्यों की जाती है?

जब महात्मा गोकर्ण जी ने महाप्रेत धुंधुकारी के उद्धार के लिए श्रीमद् भागवत की कथा सुनायी थी, तक धुंधुकारी के बैठने के लिए कोई बांस की अलग से व्यवस्था नहीं की थी । बल्कि उसके बैठने के लिए एक सामान्य आसान ही बिछाया गया था ।

महात्मा गोकर्ण जी ने धुंधुकारी का आह्वान किया और कहा – “भैया धुंधुकारी ! आप जहाँ कहीं भी हों, आ करके इस आसान पर बैठ जाईये । यह भागवत जी की परम् पवित्र कथा विशेषकर तेरे लिए ही हो रही है । इसको सुनकर तुम इस प्रेत योनि से मुक्त हो जाओगे । अब धुंधुकारी का कोई शरीर तो था नहीं, जो आसन पर स्थिर रहकर भागवत जी की कथा सुन पाते । वह जब जब आसन पर बैठने लगता, हवा का कोई झोंका आता और उसे कहीं दूर उड़ाकर ले जाता । ऐसा उसके साथ बार-बार हुआ ।

वह सोचने लगा कि ऐसा क्या किया जाये कि मुझे हवा उड़ा ना पाए और मैं सात दिन तक एक स्थान पर बैठकर भागवत जी की मंगलमयी कथा सुन पाऊँ, जिससे मेरा उद्धार हो जाये और मेरी मुक्ति हो जाये । वह सोचने लगा कि मेरे तो अब माता-पिता भी नहीं हैं, जिनके भीतर प्रवेश करके या उनके माध्यम से मैं कथा सुन पाता। वो भी मेरे ही कारण मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं।

मेरे परिवार का तो कोई सदस्य भी नहीं बचा, जिनके माध्यम से मैं भागवत जी की मोक्षदायिनी कथा सुन पाऊँ । अब तो सिर्फ मेरे सौतेले भाई महात्मा गोकर्ण ही बचे हैं। जिनका जन्म गऊ माता के गर्भ से हुआ है। लेकिन उनके अन्दर मैं कैसे प्रवेश कर सकता हूँ, क्योंकि वो तो पवित्र व्यास पीठ पर बैठकर मुझे परमात्मा की अमृतमयी कथा सुनाने के लिए उपस्थित हैं।

वह धुंधुकारी महाप्रेत ऐसा विचार कर ही रहा था कि उसने देखा जहाँ व्यास मंच बना हुआ है, वहाँ बांस का एक बगीचा भी है और उसकी नजर एक सात पोरी के बांस पर पड़ी । यह सोचकर कि बांस में हवा का प्रकोप नहीं होगा, सो वह बांस के अन्दर प्रवेश कर गया और बांस की पहली पोरी में जाकर बैठ गया ।

पहले दिन की कथा के प्रभाव से बांस की पहली पोरी चटक गयी । धुंधुकारी दूसरी पोरी में जाकर बैठ गया । दूसरे दिन की कथा के प्रभाव से दूसरी पोरी चटक गयी । धुंधुकारी तीसरी पोरी में जाकर बैठ गया । ऐसे ही प्रतिदिन की कथा के प्रभाव से क्रमशः बांस की एक-एक पोरी चटकती चली गयी

और जब अन्तिम सातवें दिन की कथा चल रही थी तो धुंधुकारी महाप्रेत भी अन्तिम सातवीं पोरी में ही बैठा हुआ था । अब जैसे ही अन्तिम सातवें दिन भागवत जी की कथा का पूर्ण विश्राम हुआ तो बांस बीच में से दो फाड़ हो गया और धुंधुकारी महाप्रेत देवताओं के समान शरीर धारण करके प्रकट हो गया ।

उसने हाथ जोड़कर बड़े ही विनय भाव से महात्मा गोकर्ण जी का धन्यवाद किया और कहा – “भैया जी ! मैं आपका शुक्रिया किन शब्दों में करुँ ? मेरे पास तो शब्द भी नहीं हैं । आपने जो परमात्मा की मंगलमयी पवित्र कथा सुनाई, देखो उस महाभयंकर महाप्रेत योनि से मैं मुक्त हो गया हूँ

और मुझे अब देव योनि प्राप्त हो गयी है । आपको मेरा बारम्बार प्रणाम् तभी सबके देखते-देखते धुंधुकारी के लिए भगवान के धाम से सुन्दर विमान आया और धुंधुकारी विमान में बैठकर भगवान के धाम को चले गए।

सही मायने में सात पोरी का बांस और कुछ नहीं, हमारा अपना शरीर ही है । हमारे शरीर में मुख्य सात चक्र हैं ।

मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपुर चक्र, अनाहद चक्र,विशुद्ध चक्र, आज्ञा चक्र और सहस्रार चक्र ।

यदि किसी योग्य गुरु के सानिध्य में रहकर प्राणायाम का अभ्यास करते हुए मनोयोग से सात दिन की कथा सुनें तो उसको आत्म ज्ञान प्राप्त हो जाता है और उसकी कुण्डलिनी शक्ति पूर्णरुप से जागृत हो जाती है । इसमें कोई शक नहीं है । यह सात पोरी का बांस हमारा ही शरीर है।https://whatsapp.com/channel/0029VaZ6ew6AInPmnHVT103r

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2014 तक सोनिया गाँधी को एक बीमारी थी जिसका उपचार कराने वो हर 6 महीने मे विदेश जाती थी, साथ मे ढेरो सूटकेस जाते थे अब 2014 के बाद यह बीमारी बंद हो गयी।

प्रियंका गाँधी ने 2.5 करोड़ की पेंटिंग यस बैंक के राणा कपूर को बेचीं थी, आश्चर्य है 2014 के बाद उसके अंदर का आर्टिस्ट ही मर गया और उसने 100 रूपये की पेंटिंग भी नहीं बेचीं।

एके एंथनी की पत्नी सरकार को 28 करोड़ की पेंटिंग बेचती थी 2014 के बाद उसने पेंटिंग ही बंद कर दीं।

महाराष्ट्र मे कांग्रेस जैसे ही सत्ता से बाहर हुई, बम विस्फोट बंद हो गए। कोई हाज़ी मस्तान, कोई दाऊद इब्राहिम नहीं पैदा हुआ।

हरियाणा मे कांग्रेस बाहर हुई उसके बाद रॉबर्ट वाड्रा ने जमीने खरीदनी ही बंद कर दीं।

2014 के बाद पी चिदंबरम ने कभी भी 6 करोड़ रूपये की फसले अपने खेतो मे नहीं उगाई।

उत्तरप्रदेश मे आजकल मायावती को हीरे से तोलने की प्रथा बंद है जबकि अखिलेश यादव सैफई मे महोत्सव नहीं करवाता।

निःसंदेह आप बीजेपी का विकल्प सोच सकते है लेकिन जो उपलब्ध विकल्प है एक बार उनका इतिहास भी ध्यान रखिये।

✍️परख सक्सेना✍️

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आयुर्वेद ग्रंथों  में हमारे ऋषि मुनियों ने पहले ही बता दिया गया  था कि
धोवन पानी पीने का वैज्ञानिक तथ्य और आज की आवश्यकता

वायुमण्डल में प्राणवायु ऑक्सीजन की अधिकतम मात्रा 21% है, लेकिन यह मात्रा भारत के किसी गाँव में 18 या 19% से ज्यादा नही है और शहरों में तो 11 या 12°/. तक ही है।
भारतीय गाय के ताज़ा गोबर में #प्राणवायु ऑक्सीजन की मात्रा 23% है। जब इस गोबर को सुखा कर कण्डा बनाया जाता है तो इसमें ऑक्सीजन की मात्रा बढ़कर 27% हो जाती है।जब इस कण्डे को जलाकर जो राख बनतीं हैं तो इसमें
ऑक्सीजन की मात्रा बढ़कर 30% हो जाती है।
इसी  को  भस्म बना देने पर प्राणवायु 46.6% हो जाती है।

जब भस्म को दोबारा जलाकर विशुद्ध भस्म बनाते हैं तो इसमें 60% तक प्राणवायु आ जाता है।

जब कि मॉडर्न विज्ञान कहता है कि किसी भी वस्तु को प्रोसेस करने से उसमें हानि होती है।
10 लीटर जल में अगर 25 ग्राम भस्म मिला दे तो जल शुद्ध होने के साथ उसमें सभी आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति हो जाती है।

🏘️अपने घरमें गोबर कंडेका धुंआ कीजिये और राख को पीनेके पानीमें

अग्निहोत्र भस्म
  अग्निहोत्र गौ भस्म_को ध्यान से पढ़ेगें तो पायेंगे कि यह गौ-भस्म ( राख ) आपके लिए कितनी उपयोगी है।
साधू -संत लोग संभवतः इन्ही गुणों के कारण इसे प्रसाद रूप में भी देते थे।
जब गोबर से बनायीं गयी भस्म इतनी उपयोगी है तो गाय कितनी उपयोगी होगी यह आप सोच सकते है।

आपको एक लीटर पानी में 10-15 ग्राम  यानि 3-4 चम्मच भस्म मिलाना है , उसके बाद भस्म जब पानी के तले में बैठ जाये फिर इसे पी लेना है।
इससे सारे पानी की अशुद्धि दूर हो जाएगी और आपको मिलेगा इतने पोषक तत्व।
यह लैबोटरी द्वारा प्रमाणित है।
#तत्व_रूप / #ELEMENT_FORM
१. ऑक्सीजन  O = 46.6 %
२. सिलिकॉन  SI  = 30.12 %
३. कैल्शियम Ca = 7.71 %
४. मैग्नीशियम Mg = 2.63 %
५.  पोटैशियम K = 2.61 %
६. क्लोरीन CL = 2.43 %
७. एल्युमीनियम Al  = 2.11 %
८. फ़ास्फ़रोस P = 1.71 %
९. लोहा Fe = 1.46 %
१०. सल्फर S =1.46 %
११. सोडियम Na = 1 %
१२. टाइटेनियम Ti = 0.19 %
१३. मैग्नीज Mn =0.13 %
१४. बेरियम Ba = 0.06 %
१५. जस्ता Zn = 0.03 %
१६. स्ट्रोंटियम Sr = 0.02 %
१७. लेड Pb = 0.02 %
१८. तांबा Cu = 80 PPM
१९. वेनेडियम V=72 PPM
२०. ब्रोमिन Br = 50 PPM
२१. ज़िरकोनियम Zr 38 PPM
#आक्साइड_रूप :-
१. सिलिकाँन डाइऑक्साइड –
              SIO2 = 64.44%
२. कैल्शियम ऑक्साइड
            CaO =10.79 %
३. मैग्नीशियम ऑक्साइड
       MgO = 4-37 %
४. एल्युमीनियम ऑक्साइड
        AI2O3 = 3.99%
५. फास्फोरस पेंटाक्साइड
        P2O5 = 3.93%
६. पोटेशियम ऑक्साइड
       K2O = 3.14 %
७. सल्फर ऑक्साइड
       SO3 = 2.79%
८. क्लोरीन  CL=2.43 %
९.  आयरन ऑक्साइड
      Fe2O3=2.09%
१०. सोडियम ऑक्साइड
       Na2O = 1.35 %
११.  टाइटेनियम ऑक्साइड
        TiO2 = 0.32%
१२. मैंगनीज ऑक्साइड
      MnO = 0.17 %
१३.  बेरियम ऑक्साइड
        BaO = 0.07 %
१४.  जिंक ऑक्साइड 
       ZnO = 0.03%
१५.  स्ट्रोंटियम ऑक्साइड
        SrO = 0.03%
१६. लेड ऑक्साइड
      PbO = 0.02%
१७. वेनेडियम ऑक्साइड
      V2O5 = 0.01 %
१८. कॉपर ऑक्साइड
       CuO = 0.01%
१९. जिरकोनियम ऑक्साइड
         ZrO2 =52 PPM
२०. ब्रोमिन Br = 50 PPM
२१.  रुबिडियम ऑक्साइड
      Rb2O = 32 PPM

शरीर में आक्सीजन की मात्रा को बढ़ाने के लिए यह गोबर की भस्म  बहुत उपयोगी है।
स्वस्थ रहे, प्रसन्न रहे
आयुर्वेद अपनाये, सुरक्षित रहे।