Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

कहानी प्रिंसटन की।
ऋतु वहां पढ़ती थी।तब मैंने भी देखा है।
आपने ओपनहाईमर फिल्म में।

“प्रिंसटन औपचारिक सम्मेलनों के द्विवार्षिक का जश्न मना रहा था जिसने विद्वानों और गणमान्य लोगों को लंबी दूरी से आकर्षित किया ।  डिराक परमाणु विज्ञान के भविष्य पर तीन दिवसीय सत्र के हिस्से के रूप में प्राथमिक कणों पर बोलने के लिए सहमत हुए थे ।  फेनमैन को अपने एक बार के नायक का परिचय देने और बाद में चर्चा का नेतृत्व करने के लिए आमंत्रित किया गया था ।

उन्होंने डिराक के पेपर को नापसंद किया, क्वांटम इलेक्ट्रोडायनामिक्स के साथ अब परिचित कठिनाइयों का एक प्रतिबंध ।  इसने उसे अपने हैमिल्टन ऊर्जा-केंद्रित जोर में पिछड़े-दिखने के रूप में मारा—एक मृत अंत ।  उन्होंने इतने घबराए हुए चुटकुले बनाए कि नील्स बोहर, जो दिन में बाद में बोलने वाले थे, खड़े हो गए और उनकी गंभीरता की कमी के लिए उनकी आलोचना की ।  फेनमैन ने सिद्धांत की अस्थिर स्थिति के बारे में हार्दिक टिप्पणी की ।

  “हमें गणितीय औपचारिकता पर एक सहज छलांग की आवश्यकता है, जैसे कि हमारे पास डिराक इलेक्ट्रॉन सिद्धांत में था,” उन्होंने कहा ।  “हमें प्रतिभा का एक स्ट्रोक चाहिए । ”

जैसा कि दिन पर पहना था—रॉबर्ट विल्सन प्रोटॉन के उच्च ऊर्जा बिखरने के बारे में बोलते हुए, ईओ लॉरेंस ने अपने कैलिफ़ोर्निया त्वरक पर व्याख्यान दिया-फेनमैन ने खिड़की से बाहर देखा और डिराक को घास के एक पैच पर देखा और आकाश में देखा ।  उनके पास एक सवाल था कि वह युद्ध से पहले से डिराक से पूछना चाहते थे ।  वह बाहर भटक गया और बैठ गया ।

डिराक के 1933 के पेपर में एक टिप्पणी ने फेनमैन को शास्त्रीय यांत्रिकी में कार्रवाई के क्वांटम-मैकेनिकल संस्करण की खोज की दिशा में एक महत्वपूर्ण सुराग दिया था ।  “अब यह देखना आसान है कि इस सब का क्वांटम एनालॉग क्या होना चाहिए, “डिराक ने लिखा था, लेकिन न तो उन्होंने और न ही किसी और ने इस सुराग का पीछा किया था जब तक कि फेनमैन को पता नहीं चला कि” एनालॉग ” वास्तव में आनुपातिक था ।  एक कठोर और संभावित उपयोगी गणितीय बंधन था ।  अब उन्होंने डिराक से पूछा कि क्या महान व्यक्ति को सभी के साथ पता था कि दो मात्राएं आनुपातिक थीं ।

“क्या वे हैं?”डिराक ने कहा । 

फेनमैन ने कहा हाँ, वे थे।

एक चुप्पी के बाद वह दूर चला गया.”

Posted in काश्मीर - Kashmir, खान्ग्रेस

25 जून_ 1990 मानवीय इतिहास का काला दिन ; जब इस्लामिक आतंकियों ने की कश्मीरी महिला गिरिजा टिक्कू की नृशंस हत्या ।

तारीख- 25 जून 1990 जगह- बांदीपोरा, कश्मीर 28 साल की शादीशुदा महिला गिरिजा टिक्कू एक सरकारी स्कूल में लैब असिस्टेंट थीं। घाटी में हालात बिगड़ने पर वो और उनका परिवार जम्मू पलायन कर चुका था। घर में पैसों की सख्त जरूरत थी, इसलिए एक दिन वो अपनी सैलरी लेने लौटीं।

बांदीपोरा में गिरिजा अपनी पहचान के एक मुस्लिम परिवार के घर में ठहरी हुई थीं। अचानक उस घर में कुछ हथियारबंद लोग घुस आए। उन्होंने गिरिजा की आंख पर पट्टी बांधी और उसे कार में बिठा ले गए। सभी ने उनका सामूहिक बलात्कार किया। बदहवास गिरिजा उनमें से एक शख्स की आवाज पहचान गईं और उसे नाम से पुकारा।

पहचान उजागर होने के डर से बलात्कारियों ने गिरिजा को कार से निकाला और पास की आरा मशीन में ले गए। आरी से गिरिजा के दो टुकड़े कर दिए और शव वहीं फेक दिया। पोस्टमॉर्टम में पता चला कि काटे जाते वक्त गिरिजा की सांसें चल रही थीं। 1990 के दशक का कश्मीर ऐसे ही खूनी किस्सों से सना हुआ था।

घाटी में आतंकवाद बढ़ने और उसके सबसे बड़े शिकार कश्मीरी पंडितों की कहानी
सितंबर 1982 में कश्मीर के सबसे बड़े नेता शेख अब्दुल्ला का निधन हो गया। उसके बाद हुए जम्मू-कश्मीर के चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने बहुमत हासिल किया और शेख के बेटे फारूक अब्दुल्ला CM बने, लेकिन 1984 में एक बड़ा खेल हुआ।
उस वक्त के राज्यपाल जगमोहन मल्होत्रा ने अपनी किताब ‘माय फ्रोजन टर्बुलेंस इन कश्मीर’ में लिखते हैं, ‘1 जुलाई 1984 की देर शाम फारूक के बहनोई गुलाम मोहम्मद शाह ने 12 विधायकों के साथ फारूक की सरकार से समर्थन वापस ले लिया। वो कांग्रेस (आई) के साथ मिलकर सरकार बनाना चाहते थे।’
अगली सुबह राज्यपाल ने फारूक की सरकार बर्खास्त कर दी। 2 जुलाई की शाम ही कांग्रेस और अन्य के समर्थन से गुलाम मोहम्मद शाह ने जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। अगले ढाई साल जम्मू-कश्मीर में सबसे भ्रष्ट सरकार का दौर रहा। शाह को कश्मीरी जनता का तीखा विरोध झेलना पड़ा। 7 मार्च 1986 को जीएम शाह की सरकार बर्खास्त कर दी गई।

मार्च 1987 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव हुए। इसमें राजीव गांधी की कांग्रेस और फारूक अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ्रेंस ने गठबंधन किया। दूसरी तरफ गिलानी की जमात-ए-इस्लामी जैसी एक दर्जन कट्टरपंथी पार्टियों ने मिलकर मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट, यानी MUF बनाया।

इस चुनाव में धांधली की हर सीमा पार हो गई। लेखक और राजनीतिक विश्लेषक सुमंत्र बोस अपनी किताब ‘कश्मीर: रूट्स ऑफ कॉन्फ्लिक्ट, पाथ टु पीस’ में लिखते हैं कि वोटरों को उनके घर भेज दिया गया था। बूथ कैप्चरिंग की गई। सारे मतपत्रों पर नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस की मुहर लगा दी गई। इसमें सरकार और उनकी पूरी मशीनरी काम कर रही थी।
नतीजों में भी हेरा-फेरी हुई। लेखक अशोक कुमार पांडेय अपनी किताब ‘कश्मीरनामा’ में इसकी एक बानगी देते हैं। श्रीनगर की आमिर कदल सीट से मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट का यूसुफ शाह उम्मीदवार था। उसके पोलिंग एजेंट का नाम यासीन मलिक था। बेमिना डिग्री कॉलेज में मतगणना शुरू हुई। रुझानों में यूसुफ बड़े अंतर से जीत रहा था। उसके प्रतिद्वंदी नेशनल कॉन्फ्रेंस के मोइउद्दीन शाह निराश होकर घर चले गए।
थोड़ी देर बाद मोइउद्दीन शाह को मतगणना अधिकारी ने घर से बुलाया और विजयी घोषित कर दिया। ऐसा कई जगह हुआ। लोग सड़क पर उतर आए। इसके बाद सरकार ने मोहम्मद यूसुफ शाह और उसके चुनाव प्रबंधक यासीन मलिक को गिरफ्तार कर लिया। इन चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन को जीत हासिल हुई।

मोहम्मद यूसुफ शाह दो चुनाव हार चुका था। तीसरी बार धांधली करके जीता चुनाव हरवा दिया गया। 20 महीने बाद जेल से छूटने के बाद यूसुफ शाह ने राजनीति छोड़ दी और सीमा पार पाकिस्तान चला गया। यही यूसुफ शाह आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन का कमांडर बना। उसके पोलिंग एजेंट रहे यासीन मलिक ने जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट नाम का आतंकी संगठन बनाया।

कश्मीर एक्सपर्ट क्रिस्टोफर स्नेडेन अपनी किताब ‘अंडरस्टैंड कश्मीर एंड कश्मीरी’ में लिखते हैं कि इस चुनाव के बाद सिर्फ यूसुफ शाह ही नहीं, तमाम निराश युवा कश्मीरी मुसलमान बॉर्डर पार करके PoK चले गए। वहां पाकिस्तानी सेना और ISI ने उन्हें हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी। जब वे लौटे तो उनके हाथ में आधुनिक हथियार थे। सपोर्ट करने के लिए पैसा था। पाकिस्तान ने ये सब इसलिए किया था कि वो इन आतंकियों के भरोसे भारत के खिलाफ लड़ सके।

इन चुनावों में पर्यवेक्षक रहे जी.एन. गौहर के मुताबिक-
अगर आमिर कदल और हब्बा कदल सीटों पर चुनाव में धांधली नहीं होती, तो शायद कश्मीर में हथियारबंद संघर्ष को कुछ सालों तक टाला जा सकता था।

लेखक अशोक कुमार पांडेय अपनी किताब ‘कश्मीर और कश्मीरी पंडित’ में लिखते हैं कि ‘हत्याओं का जो सिलसिला उस दौर में शुरू हुआ, भारत और कश्मीर के अपरिपक्व राजनीतिक नेतृत्व के चलते वो एक ऐसे हिंसक चक्रव्यूह में फंसता चला गया, जिससे बाहर निकलना आज तक मुमकिन नहीं हुआ और इसकी कीमत सबको चुकानी पड़ी- बंदूक उठाए लोगों को, बेगुनाह पंडितों और बेगुनाह मुसलमानों को भी।’
1990 के दशक में जम्मू कश्मीर में हुए कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार से आज लगभग सारी दुनियां वाकिफ है। उस दौर में घाटी से हजारों की संख्या में कश्मीरी हिंदुओं को आतंक के कारण पलायन करना पड़ा था। सैंकड़ों निर्दोष मासूम लोगों की इस्लामिक आतंकियों ने मौत ने नृशंस हत्या कर दी थी। आज लगभग 3 दशक बाद भी जब वो मंजर आंखों के सामने आता है तो कलेजा सिहर उठता है।

गिरिजा टिक्कू की कहानी –
ऐसी ही दिल को झकझोर कर रख देने वाली एक कहानी है कश्मीरी हिन्दू गिरिजा टिक्कू की। 1990 में हुए उस जघन्य अपराध की चर्चा मात्र से आपका कलेजा दर्द से कराह उठेगा। अमानवीय अत्याचारों से गुजरने वाले कई दर्दनाक किस्सों में से एक दर्दनाक किस्सा है कश्मीरी हिन्दू गिरिजा टिक्कू का। वो गिरिजा टिक्कू जो 1990 के दौर में अपनी ही जन्मभूमि में इस्लामिक आतंकियों का शिकार हुईं और आतंकियों द्वारा उनकी निर्ममता से हत्या की गई। 25 जून, 1990- निर्भया कांड से भी बदतर बर्ताव हुआ था, कश्मीरी महिला गिरिजा टिक्कू के साथ ।

11 जून 1990 काला दिन :

कश्मीरी हिन्दू गिरिजा कुमारी टिकू बारामूला जिले के गांव अरिगाम (वर्तमान में बांदीपोरा जिले) की रहने वाली थी। गिरिजा एक स्कूल में लैब सहायिका के तौर पर कार्यरत थीं।
कश्मीर की मस्जिदों से खुलेआम ऐलान हो रहा था कि हिन्दुओं, तुम अपनी औरतों को छोड़कर कश्मीर से भाग जाओ या निजाम ए मुस्तफा कबूल करो । प्रतिदिन हिन्दुओं की क्रूर हत्याएं हो रही थीं । इस दहशत भरे माहौल में गिरिजा अपने परिवार के साथ कश्मीर छोड़ चुकी थी । जब पैसों की आवश्यकता हुई तो उसने सहकर्मी से वहां के हालात के बारे में पूछा । सहकर्मी ने माहौल ठीक है कहकर भरोसा दिलाया । तब गिरिजा अपना वेतन लेने और अपने घर से सामान लेने कश्मीर आई।
11 जून 1990 की सुबह गिरिजा टिकू अपने घर से अपनी सैलरी लेने स्कूल के लिए निकली। स्कूल पहुंचकर सैलरी लेकर वो पास में मौजूद अपने एक मुस्लिम सहकर्मी के घर चली गईं।

गिरिजा इस बात से बेखबर थीं कि उनका पीछा किया जा रहा है। गिरिजा टिकू पर इस्लामिक जिहादियों की नजर लंबे वक्त से थी। गिरिजा को उसके सहकर्मी के घर से आतंकियों ने उसकी आंखों में पट्टी बांध कर अपहृत कर लिया। खास बात यह थी कि गिरिजा का अपहरण गांव में रहने वाले लोगों की नजरों के सामने ही हुआ। पर खौफ का माहौल ऐसा था कि किसी ने भी अपनी आवाज नहीं उठाई।

गिरिजा के साथ सामूहिक दुष्कर्म
आतंकियों ने गिरिजा टिक्कू को अपहरण करने के बाद गांव से दूर ले गए और उनके साथ कई दिनों तक सामूहिक दुष्कर्म किया। सिर्फ इतना ही नहीं उन्हें कई तरह की यातनाएं भी दीं। हैवानियत और बर्बरता की सारी हदों को पार करने के बाद भी जब इन जिहादियों का जी नहीं भरा तो उन्होंने 25 जून को गिरिजा टिककू को लकड़ी काटने वाली आरा मशीन के बीच लेटाकर गांव वालों के सामने ही दो अलग-अलग हिस्सों में काट दिया, क्योंकि उन 5 राक्षसों में एक उसका सहकर्मी भी था, जिसे गिरिजा पहचान गई थी।

यह भयावह मंजर वहां खड़े लोग एक टक देखते रहे। 1990 के उस दौर में आतंकियों का कश्मीरी हिंदुओं को सन्देश साफ़ था कि जम्मू कश्मीर में केवल “निज़ाम –ऐ- मुस्तफा” को मानने वाले लोग ही रह सकते हैं और गिरिजा टिक्कू जैसी एक सामान्य सी अध्यापिका को भी वो ”निजाम –ऐ- मुस्तफा” के लिए खतरा मानते थे।

अपने पीछे छोड़ गईं अपने दो मासूम बेटे और बेटी
गिरिजा टिक्कू अपने पीछे पति, 4 साल का बेटा और 2 साल की बेटी छोड़ गईं। 1990 में कश्मीर में हुए इस हादसे पर वहां के स्थानीय लोग चुप रहे।

#25_जून_1990 न भूलने वाली तारीख –
इतिहास में हुआ एक बलात्कार और निर्मम हत्या, कश्मीर में 35 वर्षों पूर्व । हमारी बहन, बेटी, एक पत्नी, एक माँ गिरिजा टिक्कू आयु मात्र 28 वर्ष को 5 मुस्लिम जिहादी मानसिकता वाले राक्षसों ने पहले बलात्कार किया और फिर उसको आरे में बीच में से चीर दिया उसके गर्भाशय से आरम्भ करते हुए ऊपर तक उसके जीवित होते हुए, फिर उसके दो टुकड़े सड़क के किनारे फेंक दिए, जैसे कोई गाजर मूली का पत्ता हो।

इन 5 मुस्लिम राक्षसों में से एक इसका  सहकर्मी था, जिसने गिरिजा को धोखा देकर आतंकवादियों को बुलाया था।

यदि आप सब का हृदय इसकी यातना की सोच मात्र से ही कांप उठा है तो सोचो इस बहन को कितनी पीड़ा हुई होगी, जब इसके जीवित होते हुए…..???

मैं जब तक जीवित हूँ, प्रति वर्ष अपनी इस बहन को ना केवल याद रखूँगा और सबको भी इसकी याद दिलाता रहूँगा।

भावपूर्ण श्रद्धांजलि 💐🙏

सव्यसाची
आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा २०८२

Posted in संस्कृत साहित्य

ગોત્ર


🚩🙏🚩શું તમે તમારા ગોત્રની વાસ્તવિક શક્તિ જાણો છો?

કોઈ ધાર્મિક વિધિ નથી. અંધશ્રદ્ધા નથી. તે તમારી પ્રાચીન સંહિતા છે.

આ સંપૂર્ણ થ્રેડ વાંચો જેમ કે તમારો ભૂતકાળ તેના પર આધાર રાખે છે.

૧. ગોત્ર એ તમારું અટક નથી. તે તમારું આધ્યાત્મિક ડીએનએ છે.

તમે જાણો છો કે શું પાગલ છે?
આપણામાંથી મોટાભાગના લોકો એ પણ જાણતા નથી કે આપણે કયા ગોત્રના છીએ.

અમને લાગે છે કે તે ફક્ત પંડિતજી પૂજા દરમિયાન કહે છે તે કોઈ પંક્તિ છે. પરંતુ એવું બિલકુલ નથી.

તમારા ગોત્રનો અર્થ છે – તમે કયા ઋષિના મન સાથે જોડાયેલા છો.

લોહીથી નહીં. પરંતુ વિચાર, ઉર્જા, આવર્તન અને જ્ઞાનથી.

દરેક હિન્દુ આધ્યાત્મિક રીતે ઋષિ (ઋષિ) સુધી પહોંચે છે. તે ઋષિ તમારા બૌદ્ધિક પૂર્વજ છે. તેમનું જ્ઞાન, તેમનો માનસિક પેટર્ન, તેમની આંતરિક આવર્તન – બધું તમારામાંથી વહે છે.

૨. ગોત્રનો અર્થ જાતિ નથી.

આજે લોકો તેને ભેળસેળ કરે છે.

ગોત્ર બ્રાહ્મણ, ક્ષત્રિય, વૈશ્ય કે શુદ્ર વિશે નથી.

તે જાતિ પહેલા, અટક પહેલા, રાજ્યો પહેલા પણ અસ્તિત્વમાં હતું.

તે ઓળખની સૌથી પ્રાચીન પદ્ધતિ છે – જ્ઞાન પર આધારિત, શક્તિ પર નહીં.

દરેક વ્યક્તિ પાસે ગોત્ર હતું – ઋષિઓ પણ એવા વિદ્યાર્થીઓને ગોત્ર આપતા હતા જેઓ તેમના ઉપદેશોને નિષ્ઠાપૂર્વક અપનાવતા હતા. તે શિક્ષણ દ્વારા પ્રાપ્ત થયું હતું.

તો ના – ગોત્ર કોઈ લેબલ નથી.

તે આધ્યાત્મિક વારસાનો મહોર છે.

૩. દરેક ગોત્ર એક ઋષિમાંથી આવે છે – એક સુપરમાઇન્ડ

ધારો કે તમે વશિષ્ઠ ગોત્રમાંથી છો.

એનો અર્થ એ કે તમારા પૂર્વજોના ઋષિ વશિષ્ઠ મહર્ષિ હતા – એ જ ઋષિ જેમણે ભગવાન રામ અને રાજા દશરથને પણ માર્ગદર્શન આપ્યું હતું.

એ જ રીતે, ભારદ્વાજ ગોત્ર?
તમે એવા ઋષિ સાથે જોડાયેલા છો જેમણે વેદોના વિશાળ ભાગો લખ્યા હતા અને યોદ્ધાઓ અને વિદ્વાનોને તાલીમ આપી હતી.

૪૯ મુખ્ય ગોત્ર છે – દરેક ઋષિઓ સાથે જોડાયેલા છે જે ખગોળશાસ્ત્રીઓ, ઉપચાર કરનારા, યોદ્ધાઓ, મંત્ર ગુરુઓ અથવા પ્રકૃતિ વૈજ્ઞાનિકો હતા.

૪. શા માટે વડીલો સમાન ગોત્ર લગ્નની મનાઈ કરે છે?

અહીં એક હકીકત છે જે તેઓ શાળામાં ક્યારેય શીખવતા નથી:

પ્રાચીન ભારતમાં, ગોત્રનો ઉપયોગ આનુવંશિક રેખાઓને ટ્રેક કરવા માટે થતો હતો.

ગોત્ર પુરુષ રેખામાંથી પસાર થાય છે – એટલે કે પુત્રો ઋષિ-રેખાને આગળ ધપાવે છે.

તેથી જો એક જ ગોત્રના બે લોકો લગ્ન કરે છે, તો તેઓ આનુવંશિક રીતે ખૂબ નજીક હોય છે, જેમ કે ભાઈ-બહેનો.

આ બાળકોમાં માનસિક અને શારીરિક ખામીઓનું કારણ બની શકે છે.

ગોત્ર પ્રણાલી = પ્રાચીન ભારતીય ડીએનએ વિજ્ઞાન
અને આપણે તે હજારો વર્ષ પહેલાં જાણતા હતા – પશ્ચિમી વિજ્ઞાને આનુવંશિકતા શોધ્યા તે પહેલાં.

૫. ગોત્ર = તમારું માનસિક પ્રોગ્રામિંગ

ચાલો આને વ્યક્તિગત બનાવીએ.

કેટલાક લોકો જન્મજાત વિચારક હોય છે.

કેટલાકને ઊંડા આધ્યાત્મિક ભૂખ હોય છે.

કેટલાક સ્વભાવે શાંતિ અનુભવે છે.

કેટલાક કુદરતી નેતાઓ અથવા સત્ય શોધનારા હોય છે.

શા માટે?
કારણ કે તમારા ગોત્ર ઋષિનું મન હજુ પણ તમારી કુદરતી વૃત્તિને આકાર આપે છે.

એવું લાગે છે કે તમારું મન હજુ પણ ઋષિના સંકેત – જે રીતે તેમણે વિચાર્યું, અનુભવ્યું, પ્રાર્થના કરી, શીખવ્યું તેના પર ટ્યુન છે.

જો તમારું ગોત્ર યોદ્ધા ઋષિનું છે, તો તમે હિંમત અનુભવશો.

જો તે કોઈ ઉપચારક ઋષિ તરફથી હોય, તો તમને આયુર્વેદ કે દવા ગમતી હશે.

આ સંયોગ નથી. આ ઊંડા પ્રોગ્રામિંગ છે.

૬. ગોત્રનો ઉપયોગ એક સમયે શિક્ષણને કસ્ટમાઇઝ કરવા માટે થતો હતો

પ્રાચીન ગુરુકુળોમાં, તેઓ દરેકને એકસરખી રીતે શીખવતા નહોતા.

ગુરુ પૂછતા પહેલા પ્રશ્ન? – “બેટા, તુમ્હારા ગોત્ર ક્યા હૈ?”

શા માટે? કારણ કે તે તેમને કહેતું હતું કે વિદ્યાર્થી કેવી રીતે શ્રેષ્ઠ શીખે છે.

જ્ઞાનની કઈ શાખા તેને અનુકૂળ આવે છે. તેની ઉર્જા માટે કયા મંત્રો શ્રેષ્ઠ કામ કરે છે.

અત્રિ ગોત્રનો વિદ્યાર્થી ધ્યાન અને મંત્રોમાં તાલીમ મેળવી શકે છે.

કશ્યપ ગોત્રનો વિદ્યાર્થી આયુર્વેદિક જ્ઞાનમાં ઊંડાણમાં જઈ શકે છે.

ગોત્ર ફક્ત ઓળખ નહોતી – તે તમારી શીખવાની શૈલી હતી, તમારો જીવન માર્ગ હતો.

૭. અંગ્રેજોએ તેની મજાક ઉડાવી. બોલીવુડે તેની મજાક ઉડાવી. અમે તેને ભૂલી ગયા.

જ્યારે અંગ્રેજો આવ્યા, ત્યારે તેઓએ આ પ્રણાલી જોઈ અને તેને બકવાસ કહ્યું.
તેઓ ગોત્રોને અંધશ્રદ્ધા તરીકે મજાક ઉડાવતા હતા કારણ કે તેઓ તેને સમજી શક્યા ન હતા.

પછી બોલીવુડે મજાક ઉડાવી.

“પંડિતજી ફરીથી ગોત્ર માંગે છે!” – જાણે કે તે કોઈ હેરાન કરતી જૂની રિવાજ હોય.

અને ધીમે ધીમે, અમે અમારા દાદા-દાદીને પૂછવાનું બંધ કરી દીધું.

અમે અમારા બાળકોને કહેવાનું બંધ કરી દીધું.

અને માત્ર 100 વર્ષમાં, 10,000 વર્ષ જૂની સિસ્ટમ અદૃશ્ય થઈ રહી છે.

તેમણે તેને મારી ન હતી. અમે તેને મરવા દીધું.

8. જો તમને તમારું ગોત્ર ખબર ન હોય તો – તમે નકશો ગુમાવી દીધો છે

કલ્પના કરો કે તમે કોઈ પ્રાચીન રાજવી પરિવારનો ભાગ છો, પરંતુ ક્યારેય તમારી પોતાની અટક જાણતા નથી.

આ કેટલું ગંભીર છે.

તમારું ગોત્ર તમારા પૂર્વજોના GPS છે – જે તમને માર્ગદર્શન આપે છે
– સાચા મંત્રો
– સાચા ધાર્મિક વિધિઓ
– સાચા ઉર્જા ઉપચાર
– સાચો આધ્યાત્મિક માર્ગ
– લગ્નમાં યોગ્ય મેળ

તેના વિના, આપણે આપણા પોતાના ધર્મમાં આંધળા થઈ જઈએ છીએ.

9. ગોત્ર વિધિઓ “ફક્ત દેખાડો માટે” ન હતી

જ્યારે પંડિતો પૂજામાં તમારું ગોત્ર કહે છે, ત્યારે તેઓ ફક્ત ઔપચારિકતા કરતા નથી.

તેઓ તમને ઋષિની ઊર્જા સાથે પાછા જોડી રહ્યા છે.

તમારા આધ્યાત્મિક વંશને ધાર્મિક વિધિના સાક્ષી બનવા અને આશીર્વાદ આપવા માટે બોલાવવા.

એટલા માટે સંકલ્પ (કોઈપણ પૂજાની શરૂઆત) દરમિયાન તમારા ગોત્રનો ઉચ્ચારણ ખૂબ જ મહત્વપૂર્ણ છે – તે કહેવા જેવું છે:
“હું, ભારદ્વાજ ઋષિનો પુત્ર, મારા આત્માના પૂર્વજની સંપૂર્ણ જાગૃતિ સાથે દૈવી મદદ માંગું છું.”

તે સુંદર છે. પવિત્ર. વાસ્તવિક.

૧૦. ખૂબ મોડું થાય તે પહેલાં તમારા ગોત્રને પુનર્જીવિત કરો

તમારા માતાપિતાને પૂછો.

તમારા દાદા-દાદીને પૂછો.
જો તમારે તેનું સંશોધન કરવું હોય તો કરો. પરંતુ તમારા આ ભાગને જાણ્યા વિના ન જીવો.

તેને લખી લો. તમારા બાળકોને આપો. ગર્વથી કહો.

તમે ફક્ત ૨૦૦૦ કે ૧૯૯૦ માં જન્મેલા વ્યક્તિ નથી.

તમે હજારો વર્ષ પહેલાં ઋષિ દ્વારા પ્રગટાવવામાં આવેલી શાશ્વત જ્યોતના વાહક છો.

તમે મહાભારત પહેલાં, રામાયણ પહેલાં, સમય ગણતરી પહેલાં શરૂ થયેલી વાર્તાનો (હાલ માટે) અંતિમ પ્રકરણ છો.

૧૧. તમારું ગોત્ર તમારા આત્મા માટે ભૂલી ગયેલા પાસવર્ડ જેવું છે

આજની દુનિયામાં, આપણે Wi-Fi પાસવર્ડ, ઇમેઇલ લોગિન, નેટફ્લિક્સ કોડ યાદ રાખીએ છીએ…

પરંતુ આપણે સૌથી પ્રાચીન પાસકોડ – આપણું ગોત્ર – ભૂલી જઈએ છીએ.

તે એક શબ્દ પૂર્વજોના જ્ઞાન, માનસિક ટેવો, કર્મકાંડની યાદો, તમારી આધ્યાત્મિક નબળાઈઓ અને શક્તિઓનો સંપૂર્ણ પ્રવાહ ખોલી શકે છે.

તે ફક્ત એક લેબલ નથી – તે એક ચાવી છે. તમે કાં તો તેનો ઉપયોગ કરો છો… અથવા તેને ગુમાવો છો.

૧૨. લગ્ન પછી સ્ત્રીઓ પોતાનું ગોત્ર “ગુમાવતી” નથી – તેઓ તેને ચૂપચાપ સાચવે છે

ઘણા લોકો માને છે કે લગ્ન પછી સ્ત્રીઓ પોતાનું ગોત્ર “બદલે છે”. પરંતુ સનાતન ધર્મ સૂક્ષ્મ છે.

શ્રદ્ધા જેવા ધાર્મિક વિધિઓમાં, સ્ત્રીનું ગોત્ર હજુ પણ તેના પિતા પાસેથી લેવામાં આવે છે.

શા માટે? કારણ કે ગોત્ર Y-રંગસૂત્ર (પુરુષ રેખા)માંથી પસાર થાય છે.

સ્ત્રીઓ ઊર્જા વહન કરે છે, પરંતુ તેને આનુવંશિક રીતે પસાર કરતી નથી.

તો ના – સ્ત્રીનું ગોત્ર અદૃશ્ય થતું નથી.  તે લગ્ન પછી પણ તેની અંદર રહે છે.

૧૩. દેવતાઓ પણ ગોત્ર નિયમોનું પાલન કરતા હતા

રામાયણમાં, જ્યારે ભગવાન રામ અને સીતાના લગ્ન થયા – ત્યારે તેમના ગોત્રો પણ તપાસવામાં આવ્યા હતા.

– રામ: ઇક્ષ્વાકુ વંશ, વશિષ્ઠ ગોત્ર
– સીતા: જનકની પુત્રી, કશ્યપ ગોત્ર વંશ

તેઓએ પ્રેમના નામે આંધળા લગ્ન કર્યા ન હતા. દેવતાઓએ પણ ધર્મનું પાલન કર્યું હતું.

આ પ્રણાલી એટલી પવિત્ર હતી – અને છે.

૧૪. ગોત્ર અને પ્રારબ્ધ કર્મ જોડાયેલા છે

ક્યારેય એવું લાગે છે કે તમે બાળપણમાં પણ ચોક્કસ કાર્યો, ટેવો, વિચારો તરફ આકર્ષાયા છો?

તેમાંથી કેટલાક તમારા પ્રારબ્ધમાંથી આવે છે – તે કર્મ જે આ જીવનમાં ફળ આપવાનું શરૂ કરી દીધું છે.

અને ગોત્ર આને પણ અસર કરે છે.

જુદા જુદા ઋષિઓના જુદા જુદા કર્મ વલણો હતા.

તમે, તેમની ઉર્જા વહન કરતા, ઘણીવાર સમાન કર્મ બ્લુપ્રિન્ટ્સ મેળવો છો – સિવાય કે તમે સભાનપણે ચક્ર તોડો.

તમારા ગોત્રને જાણવાથી તમને તમારા કર્મ માર્ગને સમજવામાં અને સાફ કરવામાં મદદ મળે છે.

૧૫. દરેક ગોત્રમાં ચોક્કસ મંત્રો અને દેવતાઓ હોય છે

ગોત્રો ફક્ત માનસિક વંશાવળી નથી – તે ચોક્કસ દેવતાઓ (દેવતાઓ) અને બીજ મંત્રો સાથે પણ જોડાયેલા છે જે તમારા આત્માની આવૃત્તિ સાથે શ્રેષ્ઠ રીતે સુસંગત છે.

તમને આશ્ચર્ય થશે કે કેટલાક મંત્રો તમારા માટે “કામ” કેમ નથી કરતા.

કદાચ તમે તમારા ફોનને ખોટા ચાર્જરથી ચાર્જ કરવાનો પ્રયાસ કરી રહ્યા છો.

સાચો મંત્ર + તમારું ગોત્ર = આધ્યાત્મિક પ્રવાહ.

આ જાણવાથી તમારા ધ્યાન, મંત્ર સાધના અને ઉપચાર શક્તિમાં ૧૦ ગણો વધારો થઈ શકે છે.

ગોત્ર = મૂંઝવણ દરમિયાન આંતરિક માર્ગદર્શન

આજના વિશ્વમાં, દરેક વ્યક્તિ ખોવાઈ જાય છે.

હેતુ, સંબંધો, કારકિર્દી, ધર્મ વિશે મૂંઝવણ.

પરંતુ જો તમે શાંતિથી બેસો અને તમારા ગોત્ર, તમારા ઋષિ, તમારા પૂર્વજોના ગુણો પર ચિંતન કરો – તો તમને આંતરિક સ્પષ્ટતા મળશે.

તમારા ઋષિ મૂંઝવણમાં રહેતા નહોતા. તેમનો વિચારધારા (વિચાર-પ્રવાહ) હજુ પણ તમારી નસોમાં વહે છે.

તેની સાથે જોડાઓ – અને તમે ઓછા ખોવાયેલા, વધુ મૂળવાળા અનુભવશો.

૧૭. દરેક મહાન હિન્દુ રાજા ગોત્રોનું સન્માન કરતા હતા

ચંદ્રગુપ્ત મૌર્યથી લઈને હર્ષવર્ધન સુધી અને શિવાજી મહારાજ સુધી – આપણા રાજાઓમાં હંમેશા એક રાજગુરુ રહેતો હતો જે કુલ (કુટુંબ), ગોત્ર અને સંપ્રદાયનો રેકોર્ડ રાખતો હતો.

રાજકારણ અને યુદ્ધમાં પણ – તેઓ ગોત્ર જોડાણોના આધારે નિર્ણયો લેતા હતા, જોડાણો અને રક્તરેખાઓનો આદર કરતા હતા.

કેમ? કારણ કે ગોત્રને અવગણવું એ તમારી કરોડરજ્જુને અવગણવા જેવું હતું.

૧૮. ગોત્ર પ્રણાલી મહિલાઓને શોષણથી સુરક્ષિત કરતી હતી

તમે તેને “પ્રતિગામી” કહો તે પહેલાં, આ સમજો – પ્રાચીન સમયમાં ગોત્ર ટ્રેકિંગ વ્યભિચારને અટકાવતું હતું, કુટુંબ રેખાઓ માટે આદર જાળવી રાખતું હતું અને નાના સમુદાયોમાં છુપાયેલા ચાલાકીથી છોકરીઓનું રક્ષણ કરતું હતું.

જ્યારે કોઈ સ્ત્રીનું યુદ્ધમાં અપહરણ કરવામાં આવતું હતું અથવા અલગ કરવામાં આવતી હતી, ત્યારે પણ તેના ગોત્રથી તેના ઘર, વંશ અને યોગ્ય ગૌરવને ઓળખવામાં મદદ મળતી હતી.

તે પછાત નથી. તે શાનદાર છે.

૧૯. ગોત્ર પણ બ્રહ્માંડિક કોયડામાં તમારી ભૂમિકા છે

દરેક ઋષિ ફક્ત ધ્યાન કરતા નહોતા – તેમની બ્રહ્માંડ પ્રત્યેની ફરજ હતી.
– કેટલાક શરીરને સાજા કરવા પર ધ્યાન કેન્દ્રિત કરતા હતા
– કેટલાક તારાઓને સમજવા પર
– કેટલાક ધર્મનું રક્ષણ કરવા પર
– કેટલાક ન્યાય પ્રણાલીઓના નિર્માણ પર

તમારા ગોત્રમાં તે હેતુનો પડઘો છે.

જો તમે જીવનમાં ખાલીપણું અનુભવી રહ્યા છો – તો કદાચ તે એટલા માટે છે કારણ કે તમે બ્રહ્માંડિક રમતમાં તમારી ભૂમિકા ભૂલી ગયા છો.

તમારા ગોત્રને શોધો. તમને તમારી ભૂમિકા મળશે.

૨૦. આ ધર્મ વિશે નથી. આ ઓળખ વિશે છે.

ભલે કોઈ નાસ્તિક હોય… આધ્યાત્મિક હોય પણ ધાર્મિક ન હોય… ધાર્મિક વિધિઓ વિશે મૂંઝવણ હોય… ગોત્ર હજુ પણ મહત્વપૂર્ણ છે.

કારણ કે આ ધર્મની બહાર છે.

આ પૂર્વજોની ચેતના છે.

આ ઊંડા મૂળિયાં ધરાવતું ભારતીય શાણપણ છે જે દબાણ કરતું નથી, પરંતુ ચૂપચાપ માર્ગદર્શન આપે છે.

તમારે તેના પર “વિશ્વાસ” કરવાની જરૂર નથી.

તમારે ફક્ત તેને યાદ રાખવાની જરૂર છે.

અંતિમ શબ્દો:

તમારું નામ આધુનિક હોઈ શકે છે.

તમારી જીવનશૈલી વૈશ્વિક હોઈ શકે છે.
પરંતુ તમારું ગોત્ર કાલાતીત છે.

અને જો તમે તેને અવગણશો, તો તમે એક નદી જેવા છો જે જાણતી નથી કે તે ક્યાંથી આવી છે.

ગોત્ર તમારો ભૂતકાળ નથી.

તે ભવિષ્યના શાણપણનો તમારો પાસવર્ડ છે.

તેને અનલૉક કરો – આગામી પેઢી ભૂલી જાય કે તેનું અસ્તિત્વ પણ છે.🙏🚩🙏

Posted in संस्कृत साहित्य

आषाढस्य प्रथमदिवसे मेधमाश्लिष्टसानुं
वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेत्क्षणीयंददशॅ ।।

કાલિદાસે તેમના નાયક યક્ષને કેન્દ્રમાં રાખીને લખ્યું “આષાઢસ્ય પ્રથમ દિવસે…”. અષાઢનો પ્રથમ દિવસ. આકાશમાં મેઘઘટા અને પાષાણશિલા પર ઊભેલા એ વિરહીને પ્રિયા યાદ આવી અને વાદળને સંબોધીને તેણે સંદેશો પાઠવ્યો..૨૦૧૦માં નાગપુર ગયો ત્યારે કાલિદાસની આ સુંદર કથાવસ્તુએ જ્યાં આકાર લીધો તે નાગપુર નજીક રામટેકની મુલાકાત લીધી,ટકો તોડી નાખે એવો વૈશાખનો બળબળતો બપોર હતો એટલે અમોને તો તે સમયે આવા ઘનઘોર ઘટા કે મેઘાડંબરની ત્રિભુવન વ્યાસની “ઈન્દ્રતણી નભધેનુ સરખી, જળભર વાદળીઓ શિલ ઝૂકી, શીતળ ભીનો પવન સરૂક્યો, વાદળદળમાં વીજ ઝબૂકી, ક્ષિતિજમાં અંબર ગગડ્યો, ઘન ગગન અષાઢી ઘોર ચડ્યો…” જેવી અનુભૂતિ નહોતી થઈ..પણ જ્યારે કાલિદાસે ‘મેઘદૂત’ માટે આ સ્થળ પસંદ કર્યુ ત્યારે આ સ્થળનું સૌંદર્ય કેવું હશે તેનો કલ્પનાવિહાર કરી મન મનાવવું પડ્યું!
‘મેઘદૂત’ના ગુજરાતીમાં સમશ્લોકી અને વિષમશ્લોકી એવા કાવ્યમય 40 જેટલા અનુવાદો અને એક અનુવાદ અંગ્રેજીમાં થયા હોવાનું ઉમાશંકર જોશીએ નોંધ્યું છે.  જેમાં શ્રી કિલાભાઇ ઘનશ્યામે કરેલો અનુવાદ ખૂબ જાણીતો છે. સૌપ્રથમ 1913માં આપણને એ ગ્રંથ સ્વરૂપે પ્રાપ્ત થયો પછી તેની સરસ સી.ડી. પણ રજનીકુમાર પંડ્યાનાં પ્રયત્નોથી બની.રાજકોટના એક અત્તિ ઉત્તમ પુસ્તકાલય સિસ્ટર નિવેદિતા સ્કૂલનાં ‘ખેલાઘર’માંથી મને તે મળેલી. અમદાવાદના વસુંધરા પ્રકાશને ગદ્ય સ્વરૂપે બહાર પાડેલું ‘મેઘદૂત’ પણ વાંચવું ગમે તેવું છે.ડો.ગૌતમ પટેલ દ્વારા પણ ‘મેઘદૂત’નું એક સંપાદન કદાચ 1996ની આસપાસ રાજકોટના પ્રવીણ પુસ્તક ભંડાર દ્વારા પ્રકાશિત થયેલ. .અને હા ‘ખામોશી’ના હેમંતકુમારના કંઠે ગવાયેલ અતિપ્રિય ગીત ‘તુમ પુકાર લો, તુમ્હારા ઇંતજાર હૈ. . “માં વહિદા રહેમાનનાં હાથોમાં ક્યુ પુસ્તક હોય છે?
1945માં શાહુ મોડક અને લીલા દેસાઈ ને ચમકાવતી ‘મેઘદૂત’ નામની એક ફિલ્મ પણ બનેલી જેમાં ગીતકાર ફૈયાઝ હાશ્મીએ સંગીતકાર કમલ દાસગુપ્તાના સંગીતમાં
“ઓ બરસા કે પહેલે બાદલ
મેરા સંદેશા લે જાના…
અંસુઅન કી બુંદન બરસા કર ,
અલકાનગરી મેં તુમ જાકર
ખબર મેરી પહૂંચાના….
ઓ બરસા કે…”
જેવાં ગીતથી ‘મેઘદૂત’નો સાર આપવાનો પ્રયત્ન કરેલો. પણ વરસાદનું આ સૌંદર્ય અને આ અનુભૂતિ તો સદીઓ પહેલાંની વાત થઇ. જળવાયુ પરિવર્તને (ક્લાઇમેન્ટ ચેન્જ યૂ સ્સી. . . 😊)કુદરતનો લય ખોરવી નાખ્યો છે. મોબાઇલ ફોનના આ યુગમાં માનુષને મેઘને દૂત તરીકે રાખવાની મોહતાજી ક્યાં છે? ! યંત્રયુગના આદમને ઇચ્છે તો પણ એ મેઘમલ્હારનું સૌંદર્ય ક્યાંથી નસીબ થવાનું? 😣એટલે તો સુરેશ દલાલે સાઠના દાયકામાં આ કવિતા લખી:

“આષાઢસ્ય પ્રથમ દિવસે હું ઊભો રહી ઝરૂખે
ન્યાળી રહું છું ગગન ઘનથી ઘોર ઘેરાયેલાને;
ક્યાં છે પેલો પુનિત ગરવો રામઅદ્રિ અને ક્યાં?
શૃંગેછાયો જલધર? સ્મરું કાલિદાસી કલાને!
ક્યાં છે પેલા મદકલભર્યા સારસોના નિનાદ?
ને ક્યાં કાળા નભમહીં જતાં રાજહંસો રૂપાળા?
ક્યાં છે પેલી નગરી અલકા ને વળી આ ભૂમિ કયાં?
એમાંનું ના કદી મળી શકે તત્વ એકે અહીંઆં!
આંહી ઊંચા ગગન ચૂમતાં કૈં મકાનો બને છે,
કાવ્યો કેરા સુખ થકી સદા માનવીઓ અલિપ્ત
દોડી ટ્રેને, તરી પવનમાં વાયુયાને, ટપાલે,
ટેલિફોને,વિરહસુખ કેરા દિનોને હણે જે!
આથી તો ના અધિક સુખિયો યક્ષ કે જે પ્રિયાને
સંદેશો કહી ફૂલ શું  હળવું જે કરે છે હિયાને?!”

😂અષાઢના પ્રથમદિવસે યક્ષ અને મેઘદૂતનું સ્મરણ થાય તો બીજા દિવસે ‘કચ્છી માડું જે નયે વરેંં જી વધાઈયું . અષાઢી બીજ એટલે કચ્છ અને હાલારનું નવું વર્ષ. વળી આ જ અષાઢમાં ભડલી નોમ આવે,જે વરસાદના તળપદી વરતારાવાળા ભડલી વાક્યો લખનાર ભડલીનો જન્મદિવસ છે. અષાઢ એ વરસાદનો મહિનો છે, મેઘવર્ષા અને ભીતરથી ભીના થવાની મોસમ…😊
અષાઢના ઉપલક્ષ્યમાં ૧૯૬૦માં ટપાલખાતાએ બહાર પાડેલી ૧૫ પૈસાની ટપાલટિકિટ #From_My_Collection 😊
©યતીન કંસારા

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मोदी को तानाशाह ओर “गोदी” मीडिया कहने बाले लोग कौन है…??
क्या किसी ‘गोदी मीडिया’ ने आपको कभी यह बताया है?

1977 से पहले
लोक जनसम्पर्क विभाग द्वारा प्रोजेक्टर द्वारा 4’×3′ की सफेद कपड़े वाली स्क्रीन पर नगरों की गलियों में और गाँवों के चौराहों पर रात के 7-8 बजे उपकार और पूरब और पश्चिम फिल्में दिखायी जाती थी जिनके एक दो गीतों में तिरंगे झंडे के साथ गाँधी और नेहरू का नाम अवश्य होता था। तब चूँकी आजादी नयी-नयी मिली थी तो इन नामों का जादू सिर चढ़ कर बोला करता था।

हर सिनेमा हॉल में फिल्म आरंभ होने से पहले 15 मिनट की डाक्यूमेंट्री फिल्म दिखाना आवश्यक होता था जिनमें 14 मिनट और 50 सैकिंड के लिये नेहरू और इंदिरा गांधी के वीडियो उनके कारनामों सहित दिखाये जाते थे।

उन डाक्यूमेंट्री फिल्मों में लाल बहादुर शास्त्री को वायुयान से उतरते हुए केवल 5-10 सैकिंड के लिये ही दिखाया जाता था तो सिनेमा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठता था। उनके जय जवान जय किसान के नारे को दिखाना तो दूर की बात है 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध में हुई विजय तो कभी दिखायी ही नहीं जाता था।

उन फिल्मों में भारतीय संविधान निर्माता भीम राव अंबेडकर को कभी एक बार भी नहीं दिखाया जाता था। सुभाष चन्द्र बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर इत्यादि को तो दिखाना ही क्यों था?

उन दिनों स्कूलों और कॉलिजों में जो प्रतियोगिता कार्यक्रम होते थे या यूथ फेस्टिवल होते थे तो उनमें उन्हीं भाषणों, नाटकों इत्यादि को प्रथम, द्वितीय और तृतीय पुरस्कार मिलते थे जो कि नेहरू और इंदिरा गांधी के कारनामों का बखान किया करते थे।

हर 14 नवंबर को स्कूली बच्चों से ‘चाचा’ नेहरू जिंदाबाद के नारे लगवा कर और उन्हें 2-2 लड्डू बाँट कर स्कूल की छुट्टी कर दी जाती थी।

हर 30 जनवरी को प्रातःकाल 10 बजे नगरपालिका का भोंपू बजा करता था। तब सरकारी कार्यालयों, स्कूलों इत्यादि में हर किसी को मौन खड़े हो कर ‘उसे’ श्रद्धांजलि देना आवश्यक होता था।

सरकारी कृषि विभाग के खेतों में कीट नाशक दवाओं का छिड़काव करने वाले छोटे हेलीकॉप्टर नुमा हवाई जहाजों से कांग्रेस उम्मीदवारों के चुनाव प्रचार के पर्चें फैंकना सो सामान्य बात थी। उन चुनावों के दौरान चुनाव आयोग छुट्टी ले कर नानी के यहाँ चला जाता था।

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की रैलियों में सभी सरकारी कर्मचारियों की उपस्थिति आवश्यक होती थी और उनके अधिकारी उन रैलियों में हाजिरी रजिस्टर अपने साथ ले जाते थे और उपस्थित कर्मचारियों की हाजिरी लगाते थे। यदि कोई कर्मचारी किसी रैली में उपस्थित नहीं होता था तो बाद में उस पर कारवाई की जाती थी।

■ मैंने सोचा कि मैं ये बातें नयी पीढ़ी को भी बता देता हूँ।

● ऐसी ‘सहिष्णु’ थी इंदिरा गांधी 😀

इस पोस्ट को पढ़ कर नयी पीढ़ी का दिमाग फिर हिल जायेगा

फिल्म निर्देशक अमृत नाहटा ने 1974 में एक फिल्म बनायी थी जिसका नाम था किस्सा कुर्सी का। इस फिल्म ने इंदिरा गांधी की सरकार को हिला कर रख दिया था। जब इस फ़िल्म को सेंसर बोर्ड ने देखा तो इसके किसी सदस्य ने केंद्र सरकार से यह चुगली कर दी कि इस फिल्म के कुछ दृश्य सरकार विरोधी हैं। बस इतना सुनते ही तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दिमाग का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया था और उसने सूचना और प्रसारण मंत्री विद्या चरण शुक्ल से कठोर कारवाई करने को कहा। फिर वे मंत्री जी भी कहाँ टिकने वाले थे।

👉 फिल्म के सारे प्रिंट ही गुड़गांव में जला दिये थे और संजय गांधी को जाना पड़ा था तिहाड़ जेल

जब 1977 में जनता पार्टी की मोरारजी देसाई सरकार ने इंदिरा गांधी की उस करतूत की तह तक जाने के लिये एक जाँच आयोग बिठा दिया था। उस समय समाचार पत्रों में छपा था कि इसके लिये संजय गांधी को एक महीना तिहाड़ जेल में बिताना पड़ा था।

1974 में बनी अमृत नाहटा की फिल्म कभी रिलीज नहीं हुई थी। 1977 के चुनाव में यह फिल्म बहुत बड़ा मुद्दा बनी थी। इस फिल्म को बनाने वाले अमृत नाहटा दो बार कांग्रेस और एक बार जनता पार्टी से सांसद रहे।

किस्सा कुर्सी का फिल्म में राजनीतिक पार्टी का चुनाव चिह्न ‘जनता की कार’ था।
उस समय मारुति कार संजय गांधी का ड्रीम प्रोजेक्ट था जिसे जनता की कार बताया गया था।

फिल्म किस्सा कुर्सी का भारतीय सिने इतिहास की सबसे विवादास्पद फिल्म मानी जाती है।

1977 में अमृत नाहटा ने इस फिल्म  फिर से इसी नाम से अर्थात फिल्म किस्सा कुर्सी का बनायी तो उस समय यह सुपर हिट रही थी।

इसके मुख्य कलाकार थेः

राज बब्बर और शबाना आज़मी
दोनों कांग्रेसी

Manish Soni