Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक सेठ के यहां कई नौकर काम करते थे।

उनमें शंभु नामक एक रसोइया भी था।

वह सेठ जी के परिवार और सभी नौकरों का भोजन एक साथ बनाता था।

एक दिन सेठ जी जब खाना खाने लगे तो उन्हें सब्जी मीठी लगी। वह समझ गए कि शंभु ने भूल से सब्जी में नमक की जगह चीनी डाल दी है।

मगर सेठ जी ने उसके सामने बड़े चाव से सारी सब्जी खाई। शंभू को कुछ पता नहीं चला।

खाने के बाद सेठ जी ने शंभु से कहा, ‘शायद तुम परेशान हो। क्या बात है

शंभू ने कहा, ‘पत्नी कई दिनों से बीमार है। यहां से जाने के बाद उसकी देखभाल करने में ही सारी रात बीत जाती है।

‘ सेठ ने उसे कुछ पैसे देते हुए कहा, ‘तुम अभी घर चले जाओ और पत्नी जब पूरी तरह स्वस्थ हो जाए तभी आना।

और पैसे की जरूरत पड़े तो आकर ले जाना।

‘ शंभु चला गया। उसके जाने के बाद सेठानी ने कहा, ‘आप ने उसे जाने क्यों दिया।

अभी तो और लोगों ने खाना तक नहीं खाया है। सारा काम पड़ा है।

‘ सेठ जी बोले, ‘उसके मन में अपने से ज्यादा हमारी चिंता है तभी उसने एक दिन छुट्टी नहीं की।

आज उसने सब्जी में नमक की जगह चीनी डाल दी है। मैं उसके सामने सब्जी खा गया ताकि उसे कुछ पता न चले।

यह तो बहुत छोटी बात,

लेकिन यदि यह सब्जी दूसरे नौकर खाएंगे तो शंभु के आने पर सब उसका मजाक उड़ाएंगे।

वह लज्जित होगा। इसलिए तुम इसे जानवरों को खिला दो और दूसरी सब्जी बना कर सभी को खिलाओ।’

पत्नी बोली, ‘आप भी कमाल करते हैं। हमारे पास संपत्ति है, सम्मान है फिर भी नौकरों को लेकर इतनी चिंता क्यों?

‘ सेठ जी ने कहा, ‘आज हमारे पास जो कुछ भी है, वह इन्हीं लोगों की मेहनत और ईमानदारी का फल है।

मैंने अभी तक जो रिश्ते कमाए हैं उन्हें खोना नहीं चाहता। असली धन तो यही है।’

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जंगल के राजा शेर ने ऐलान कर दिया कि अब आज के बाद कोई अनपढ़ नही रहेगा।
हर पशु को अपना बच्चा स्कूल भेजना होगा राजा साहब का स्कूल, पढ़ा-लिखाकर सबको सर्टिफिकेट बांटेगा।

सब बच्चे चले स्कूल हाथी का बच्चा आया,शेर का ,बंदर  का मछली का,खरगोश का कछुआ का ऊँट का भी और जिराफ भी।

प्रथम परीक्षा हुई तो हाथी का बच्चा फेल।
किस विषय में फेल हो गया पेड़ पर चढ़ने में फेल हो गया, हाथी का बच्चा।

अब का करें……

ट्यूशन दिलवाओ,कोचिंग में भेजो अब हाथी की जिन्दगी का एक ही मक़सद था कि हमारे बच्चे को पेड़ पर चढ़ने में टॉप कराना है।

किसी तरह साल बीता अंतिम रिजल्ट आया तो हाथी, ऊँट, जिराफ सब  के बच्चे फेल हो गए और बंद र की सन्तान प्रथम आयी।

प्रधानाचार्य ने मंच पर बुलाकर मैडल दिया बंद र ने उछल-उछल के कलाबाजियाँ दिखाकर
गुलाटियाँ मार कर खुशी का इजहार किया।

उधर अपमानित महसूस कर रहे हाथी,ऊँट और जिराफ ने अपने अपने बच्चे कूट दिये। नाआलायकों,
इतने महँगे स्कूल में पढ़ाते हैं तुमको ट्यूशन-कोचिंग सब लगवाए फिर भी आज तक तुम पेड़ पर चढ़ना नहीं सीखे ; सीखो बंद र के बच्चे से सीखो कुछ,
पढ़ाई पर ध्यान दो।

फेल हालांकि मछली भी हुई थी लेकिन तैराकी में प्रथम आयी थी
पर बाकी विषय में तो फेल ही थी।
मास्टरनी बोली,आपकी बेटी  के साथ उपस्थिति की समस्या है।
मछली ने बेटी को आँखें दिखाई!
बेटी ने समझाने की कोशिश की कि, माँ, मेरा दम घुटता है इस स्कूल में मैं साँस ही नहीं ले पाती,
मुझे नहीं पढ़ना इस स्कूल में
हमारा स्कूल तो तालाब में होना चाहिये न……
माँ – नहीं,ये तो राजा का स्कूल है
तालाब वाले स्कूल में भेजकर मुझे अपनी बेइज्जती नहीं करानी
समाज में कुछ इज्जत है मेरी तुमको इसी स्कूल में पढ़ना है बस
पढ़ाई पर ध्यान दो।

हाथी,ऊँट और जिराफ अपने अपने बच्चों को पीटते हुए ले जा रहे थे।
रास्ते में बूढ़े बरगद ने पूछा,क्यों पीट रहे हो, बच्चों को…….

जिराफ बोला,
पेड़ पर चढ़ने में फेल हो गए……

बूढ़ा बरगद सोचने के बाद पते की बात बोला,
पर इन्हें पेड़ पर चढ़ाना ही क्यों है उसने हाथी से कहा,अपनी सूंड उठाओ और सबसे ऊँचा फल तोड़ लो जिराफ तुम अपनी लंबी गर्दन उठाओ और सबसे ऊँचे पत्ते तोड़-तोड़ कर खाओ,ऊँट भी गर्दन लंबी करके फल पत्ते खाने लगा ।
हाथी के बच्चे को क्यों चढ़ाना चाहते हो पेड़ पर ! मछली को तालाब में ही सीखने दो न….

दुर्भाग्य से आज स्कूली शिक्षा का पूरा चक्र और सिलेबस सिर्फ बंद र के बच्चे के लिये ही डिज़ाइन है।
इस स्कूल में 35 बच्चों की क्लास में सिर्फ बंद र ही प्रथम आएगा बाकी सबको फेल ही होना है।
हर बच्चे के लिए अलग सिलेबर्स अलग विषय और अलग स्कूल चाहिये।

हाथी के बच्चे को पेड़ पर चढ़ाकर
अपमानित मत करो जबर्दस्ती उसके ऊपर फेलियर का ठप्पा मत लगाओ।
ठीक है, बं द र का उत्साहवर्धन करो पर शेष बच्चों को ना लायक
कामचो र, लापरवाह,मू र्ख या फे ल
घोषित मत करो।

मछली बेशक़ पेड़ पर न चढ़ पाये
पर एक दिन वो पूरा समंदर नाप देगी।

इसलिए  आवश्यक है अपने बच्चों की क्षमताओं व प्रतिभा की कद्र करें ,चाहे वह पढ़ाई, खेल, नाच,गाने,कला,अभिनय, व्यापार,खेती,बागवानी या फिर मकेनिकल किसी भी क्षेत्र में हो उन्हें उसी दिशा में आगे बढने दें।
जरूरी नहीं कि सभी बच्चे पढ़ने में अव्वल हो ! बस जरूरत हैं उनमें अच्छे संस्कार व नैतिक मूल्यों की जिससे बच्चे गलत रास्ते नहीं चुने ध्यान रखियेगा की आपके बच्चे आपसे ही सीखेंगे अब ये आपके ऊपर निर्भर है कि आप उन्हें क्या सिखाना पसन्द करेंगे…I

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कबीर की मृत्यु कैसे हुई? कबीर की मृत्यु का सच….
जब कबीर ने इस्लाम स्वीकार करने से मना कर दिया तो सिकंदर लोधी के आदेश से जंजीरो में जकड़कर कबीर को मगहर लाया गया। वहां लाते ही जब शहंशाह के हुक्म के अनुसार कबीर को मस्त हाथी के पैरों तले रौंदा जाने लगा, तब लोई पछाड़ खाकर पति के पैरों पर गिर पड़ी। पुत्र कमाल भी पिता से लिपटकर रोने लगा। लेकिन कबीर तनिक भी विचलित नहीं हुऐ। आंखों में वही चमक बनी रही। चेहरे की झुर्रियों में भय का कोई चिद्द नहीं उभरा। एकदम शान्त-गम्भीर वाणी में शहंशाह को सम्बोधित हो कहने लगा –

माली आवत देखिकर
कलियन करी पुकार।
फूले फूले चुन लिए
काल्हि हमारी बार।

और फिर इतना कहते ही हलके से मुस्कुरा दिया। कबीर आगे बोले, ‘मुझे तो मरना ही था; आज नहीं मरता तो कल मरता। लेकिन सुलतान कब तक इस गफलत में भरमाए पड़े रह सकेंगे, कब तक फूले-फूले फिरेंगे कि वह नहीं मरेंगे?’

कबीर को जिस समय हाथी के पैरों तले कुचलवाया जा रहा था, उस समय कबीर का एक शिष्य भी वहां मौजूद था, उसके मुख से निकल पडा-

अहो मेरे गोविन्द तुम्हारा जोर
काजी बकिवा हस्ती तोर।
बांधि भुजा भलैं करि डार्यो
हस्ति कोपि मूंड में मार्यो।
भाग्यो हस्ती चीसां मारी
वा मूरत की मैं बलिहारी।
महावत तोकूं मारौं सांटी
इसहि मराऊं घालौं काटी।
हस्ती न तोरे धरे धियान
वाकै हिरदै बसे भगवान।
कहा अपराध सन्त हौ कीन्हा
बांधि पोट कुंजर कूं दीन्हा।
कुंजर पोट बहु बन्दन करै
अजहु न सूझे काजी अंधरै।
तीन बेर पतियारा लीन्हा
मन कठोर अजहूं न पतीना।
कहै कबीर हमारे गोब्यन्द
चौथे पद में जन का ज्यन्द।

अर्थात ‘हे गोविन्द! आपकी शक्ति की बलिहारी जाऊं। काजी ने आपको (कबीर को) हाथी से तुड़वाने का आदेश दिया। कबीर की भुजाएं अच्छी तरह से बांधकर डाल दिया गया। महावत ने हाथी को क्रोधित करने के लिए उसके सिर पर चोट मारी। हाथी चिंघाड़कर दूसरी ओर भाग चला। उस प्रकार भागते हुए हाथी की मूरत पर मैं बलिहारी जाऊं। हाथी को भागता देख काजी ने महावत से कहा कि मैं तुझे छड़ी से पीटूंगा और इस हाथी को कटवा डालूंगा। लेकिन हाथी तो उस समय भगवान के ध्यान में मस्त था। लोग भी कहने लगे कि इस सन्त ने क्या अपराध किया है। जो इसका गट्ठर सा बांधकर हाथी के सामने डाल दिया गया है। लेकिन हाथी बार-बार उस गट्ठर की वन्दना करने लगा। पर अज्ञान से अन्धे हुए काजी को यह देखकर भी कुछ सुझाई न दिया। तीन बार उसने परीक्षा ली, परन्तु कठोर मनवाले काजी को अब भी विश्वास न हुआ। कबीर मन में कहने लगे कि गोविन्द तो हमारे हैं, मैं जन का जिश्न्दा पीर हूं तथा मैंने चौथी बार चौथे पद (मोक्ष) को प्राप्त कर लिया।’

लोग कहते हैं कबीर मरने के बाद फूल बन गये और हिन्दू और मुस्लिमो ने उन्हें बराबर बांट लिया, जबकि सचाई यह है कि सिकंदर लोदी ने उन्हें हाथी के पैरो से कुचलवाकर मरवा दिया था, क्योंकि वे सामाजिक कुरीतियों का खंडन करते थे…उपर जो छंद है वह कबीर के मरते वक्त ही रचा गया था और कबीर ग्रंथावली के अंत में भी जोड़ा गया है।

साभार

घनश्याम अग्रवाल

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जब दूसरा विश्वयुद्ध समाप्त हुआ तो अमेरिका के पास 22000 टन सोना जमा हो चुका था। स्वाभाविक था कि यूरोपीय देशो ने सोना बेचकर उससे हथियार खरीदे थे।

युद्ध के बाद वाशिंगटन मे सभी देशो की मीटिंग हुई और यही समस्या रखी गयी कि किस मुद्रा मे व्यापार करें…?

क्योंकि ब्रिटिश पाउंड की स्थिति खराब थी।
तब अमेरिका ने कहा कि डॉलर मे लेन देन करो।

भारत चीन को डॉलर देगा, चीन चाहे तो इस डॉलर को आगे प्रयोग करें या फिर अमेरिका को देकर सोना ले जाए क्योंकि अमेरिका के पास सोने की कमी नहीं थी।

28 ग्राम सोने के बदले 35 डॉलर का मूल्य तय हुआ।

इस तरह सभी देश खुश हो गए और डॉलर अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बन गया। अमेरिका पर भी दबाव था कि ज्यादा डॉलर ना छापे अन्यथा उतना गोल्ड कहाँ से लाएगा?

1960 मे सोने के भाव मे बढ़ोत्तरी हुई,
28 ग्राम सोना 40 डॉलर तक पहुँच गया।

ऐसे मे लोग 35 डॉलर मे अमेरिका से गोल्ड खरीदते फिर 40 डॉलर मे लंदन के गोल्ड एक्सचेंज पर बेच देते।

उस समय ब्रिटेन को लोन चाहिए था इसलिए अमेरिका ने ब्रिटेन के मुँह मे पैसे भरकर यह मार्केट ही बंद करवा दिया।

यही कारण है कि आज भी दोनों के रिश्ते अटूट है क्योंकि मज़बूरी के साथी है।

15 अगस्त 1971 को अचानक अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन घोषणा कर देते है कि अब से डॉलर के बदले गोल्ड वाली स्कीम ही बंद।

ये विश्व को धोखा था….
मगर निक्सन को इसकी परवाह नहीं थी।

दुनिया का हर देश डॉलर लिये बैठा था
वो इसे फाड़ भी नहीं सकता था,

उस समय डॉलर को बचाना अमेरिका से ज्यादा दुनिया का सिरदर्द बन गया क्योंकि यदि डॉलर खत्म हो गया तो आपके पास तो विदेशी मुद्रा भंडार ही नहीं बचा।

उसी बीच अरब देशो मे तेल निकला,
इन अरब देशो मे राजपरिवार का शासन था जिन्हे हमेशा क्रांति होने का डर था। अमेरिका ने इन्हे सुरक्षा दी और सुनिश्चित किया कि ये डॉलर मे ही तेल बेचे।

जाहिर है ज़ब तेल डॉलर मे मिलेगा तो अन्य देशो के लिये डॉलर का रिजर्व रखना मज़बूरी होंगी।

ज़ब बैंकिंग सिस्टम उन्नत होने लगा तो अमेरिका ने स्विफ्ट सिस्टम मे खुद को आगे किया।

ये ऐसा होता है कि मानो आपको SBI से न्यूजीलैंड की किसी बैंक मे पैसे भेजना है तो जरूरी नहीं कि दोनों बैंक एक दूसरे को जानते हो। ऐसे मे पहले पैसा अमेरिकन बैंक जाएगा और वहाँ से न्यूजीलैंड।

जाहिर है डॉलर का रोल यहाँ भी आएगा।

हालांकि इसी स्विफ्ट को चुनौती देने भारत का UPI आया है, अब आप समझ गए होंगे कि राहुल गाँधी और पी चिदंबरम इसके विरोध मे क्यों थे?

वे बेवकूफ नहीं है….
बस अमेरिकी डॉलर का नमक अदा कर रहे है।

बेवकूफ तो हम है जिन्हे उनकी आवाज मे लोकतंत्र दिख रहा है। खैर डॉलर के डोमिनेशन की कहानी यही है,

अमेरिका अरबो डॉलर खर्च करता है,
ताकि अन्य देशो मे राजनीतिक हस्तक्षेप कर सके।

अमेरिका के लिये बेहद जरूरी है कि किसी भी देश की सरकार डॉलर का विरोध ना करें।

UPI आ गया तो स्विफ्ट को खा जाएगा इसलिए पहले NGO को फंडिंग होती है फिर राहुल गाँधी और चिदंबरम जैसे लोग UPI के खिलाफ बोलते है।

सद्दाम हुसैन करीब 25 वर्ष से तानाशाह था
लेकिन लोकतंत्र की आड़ मे उसे तब ही मारा गया ज़ब उसने डॉलर को चुनौती दी।

ये हस्तक्षेप करने के लिये अमेरिका को अरबो डॉलर खर्च करने पड़ते है एक इकोसिस्टम बनाना पड़ता है।

अब आपको अमेरिका की ये नीति चाहे जैसी भी लगी हो लेकिन उसके अर्थशास्त्रियों की प्रशंसा करनी होंगी। इसमें हमारे लिये भी कुछ सबक है।

आज ट्रम्प है, कल बाइडन थे, परसो ओबामा थे तो नरसो बुश थे। सभी ने अमेरिका के हित मे ही निर्णय लिये है ना कि भारत के हित मे, इसलिए हमें किसी का प्रशंसक होने की जरूरत नहीं है।

हमें सिर्फ अपना हित देखना है।

भारत सरकार ने अपने प्रयास तेज कर दिये है,
अरब देशो से संबंध सुधारकर UPI को वहाँ भी ले जा रहे है इसलिए नूपुर शर्मा जैसे केस मे थोड़ा झुकना पड़ता है।

यूरोप और ऑस्ट्रेलिया के लिये हमें 1947 वाला विश्वसनीय अमेरिका बनना है इसलिए सीधे किसी भी देश पर मिलिट्री एक्शन लेकर युद्ध के हालात नहीं बना सकते।

हर चीज बोलने लिखने की नहीं होती,
नागरिको को अपने विवेक का भी प्रयोग करना होगा।

आपको समझना होगा कि भारत मोदी युग मे अचानक इतना कैसे बदलने लगा।

हो सकता है हम सुपर पॉवर ना बन सके
मगर प्रयास भी ना करें ये कैसे संभव है।

इन सबमे समय लगेगा तब तक राहुल गाँधी हजारों बार जाति परस्त और उद्योग विरोधी बातो मे उलझायेगा।

कई राज्यों को मणिपुर बनाने का प्रयास होगा, लेकिन आपको समझना होगा कि ये अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र है।

इस स्टेज पर आकर….
हम देश का सौदा नहीं कर सकते।