अर्बन नक्सल का मायाजाल
आज मिडिया, न्यायलय, राजनीति और विश्विद्यालय में अर्बन नक्सली प्रभावी हैं. वे एक झूठ का मायाजाल बन रहे हैं और सामान्य आदमी उस में फंस रहा है. आज के युग में जानकारी ही बचाव है .सामान्य हिन्दू का अज्ञान ही इनकी ताकत है. सुचना के स्रोत को ध्यान से देखिए. मिडिया द्वारा एक जनमानस बनाने की कोशिश हो रही है जो बताता है कि लव जेहाद काल्पनिक है. दलित उत्पीडन और मोब लिंचिग वास्तविक है.
वामपंथियों द्वारा इस तकनीक का बहुतायत में उपयोग किया गया है | भारत के परिप्रेक्ष्य में देखें तो हम हिन्दुओं के एक बड़े वर्ग (जिसे आज कल छद्म सेक्युलर कहा जाता है) को आज वामपंथी यह यकीन दिलाने में सफल हुए हैं कि जो भी समस्या है वह हिन्दुओं द्वारा प्रदत्त है, बल्कि हिंदुत्व ही सारी समस्याओं की जड़ है | जब भी किसी लिबरल सेक्युलर हिन्दू के मन में आता कि इस्लामी आतंकवाद में कोई समस्या है तो फिर बाबरी मस्जिद के नाम पर कभी दंगों के नाम पर उनके मन में यह संदेह उत्पन्न करने की कोशिश की जाती कि “नहीं हम में ही कुछ ना कुछ खोट है” |
कम्युनिष्ट शासन वाले देशों ने कभी भी इस्लामिक शरिया कानून को विचार लायक भी नहीं समझा. उनकी नजर में शरिया कानून ईश्वरीय कानून नहीं है. किसी भी मुस्लिम बहुल देश ने कम्युनिष्ट शासन पद्धति को नहीं माना. 90% मुस्लिम देशों में समाजवाद की बात करना भी अपराध है.
कम्युनिस्ट भारतीय राष्ट्रवाद के किसी भी शत्रु से सहकार्य करेंगे. भारतीयों को अब सोचना है. वक़्त ज्यादा नहीं है आज इस्लामिक आतंकवाद पर यदि कोई बोलना चाहता है तो सबसे पहले ये कम्युनिस्ट ही आतंकी को बचाने में सहायता करने आते हैं।
कुछ साल पहले कोच्चि में माकपा की बैठक में अनोखा नजारा देखने को मिला। मौलवी ने नमाज की अजान दी तो माकपा की बैठक में मध्यांतर की घोषणा कर दी गई। मुसलिम कार्यकर्ता बाहर निकले। रात को उन्हें रोजा तोड़ने के लिए पार्टी की तरफ से नाश्ता परोसा गया। यह बैठक वहां के रिजेंट होटल हाल में हो रही थी।
कुछ साल हुए. कन्नूर (केरल) से माकपा सांसद केपी अब्दुल्लाकुट्टी हज यात्रा पर गए। जब बात फैली तो सफाई दी कि अकादमिक वजहों से गए थे। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का कोई भी नेता केपी अब्दुल्लाकुट्टी के खिलाफ बोलने का साहस नहीं जुटा पा रहा है।’मगर यह सफेद झूठ था क्योंकि उन्होंने उमरा भी कराया था। अकादमिक वजहों से जाने वाला उमरा जैसा धार्मिक कर्मकांड नहीं कराएगा। ( उमरा —-सउदी जाकर मजहबी कर्त्तव्य करने को उमरा कहते हैं जैसे ख़ास तरह के वस्त्र धारण करना, बाल कटवाना आदि }
वहीं जब पश्चिम बंगाल के खेल व परिवहन मंत्री सुभाष चक्रवर्ती तारापीठ मंदिर गए तो पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने तो यहां तक कह दिया, ‘सुभाष चक्रवर्ती पागल हैं।
कम्युनिस्ट हिन्दुओं के मानबिन्दुओं का अपमान करने में ही सबसे आगे रहे हैं। इसलिए सीपीएम नेता कडकम्पल्ली सुरेंद्रन जब यह झूठ बोलते हैं कि ‘किसी भी संगठन द्वारा मंदिरों का इस्तेमाल हथियारों और शारीरिक प्रशिक्षण के लिए करना श्रद्धालुओं के साथ अन्याय है।’ तब हिन्दुओं के खिलाफ किसी साजिश की बू आती है। जिन्होंने कभी हिन्दुओं की चिंता नहीं की, वे हिन्दुओं की आड़ लेकर राष्ट्रवादी विचारधारा पर प्रहार करना चाह रहे हैं।
सरकार की नीयत मंदिरों पर कब्जा जमाने की है। केरल की विधानसभा में एक विधेयक पेश किया गया है। इस विधेयक के पारित होने के बाद केरल के मंदिरों में जो भी नियुक्तियाँ होंगी, वह सब लोक सेवा आयोग (पीएससी) के जरिए होंगी। माकपा सरकार इस व्यवस्था के जरिए मंदिरों की संपत्ति और उनके प्रशासनिक नियंत्रण को अपने हाथ में रखना चाहती है। मंदिरों की देखरेख और प्रबंधन के लिए पूर्व से गठित देवास्वोम बोर्ड की ताकत को कम करना का भी षड्यंत्र माकपा सरकार कर रही है। माकपा सरकार ने देवास्वोम बोर्ड को ‘सफेद हाथी’ की संज्ञा दी है और इस बोर्ड को समाप्त करना ही उचित समझती है।
दरअसल, दो अलग-अलग कानूनों के जरिए माकपा सरकार ने हिंदू मंदिरों की संपत्ति पर कब्जा जमाने का षड्यंत्र रचा है। एक कानून के जरिए मंदिर के प्रबंधन को सरकार (माकपा) के नियंत्रण में लेना है और दूसरे कानून के जरिए मंदिरों से राष्ट्रवादि विचारधारा को दूर रखना है। ताकि जब कम्युनिस्ट मंदिरों की संपत्ति का दुरुपयोग करें, तब उन्हें टोकने-रोकने वाला कोई उपस्थित न हो।
हमारे प्रगतिशील कामरेड वर्षों से भोपाल गैस कांड को लेकर अमेरिकी कंपनी तथा वहां के शासकों की निर्ममता के विरूध्द आग उगलते रहे हैं। लेकिन भोपाल गैस कांड के लिए दोषी यूनियन कार्बाइड की मातृ संस्था बहुराष्ट्रीय अमेरिकी कंपनी डाऊ केमिकल्स को हल्दिया-नंदीग्राम में केमिकल कारखाना लगाने के लिए बंगाल की कम्युनिस्ट सरकार न्यौता दिया था. यह कैसा मजाक और दोहरा मानदंड है। आप भोपाल गैस कांड के लिए दोषी प्रबंधकों तथा पीड़ितों को मुआवजा न देने वाले लोगों को दंडित करवाने के बजाय उनकी आरती उतारने के लिए बेताब हैं।
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सेक्युलरिज्म के नियम —
– अफजल गुरू, कसाब और मदानी जैसे आतंकवादियों के प्रति उदासीनता बरती जाए तब तो ऐसे लोग भी सेक्युलरवादी होते है परन्तु एमसी शर्मा के बलिदान का समर्थन किया जाए तो वे लोग साम्प्रदायिक बन जाते है।
एम.एफ. हुसैन सेक्युलर है परन्तु तस्लीमा नसरीन साम्प्रदायिक है, तभी तो उसे पश्चिम बंगाल के सेक्युलर राज्य से बाहर निकाल दिया गया।
इस्लाम का अपमान करने वाला डेनिश कार्टूनिस्ट तो साम्प्रदायिक है परन्तु हिन्दुत्व का अपमान करने वाले करूणानिधि को सेक्युलर माना जाता है।
मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के बलिदान का उपहास उड़ाना सेक्युलरवादी होता है, दिल्ली पुलिस की मंशा पर सवाल खड़ा करना सेक्युलरवादी होता है, परन्तु एटीएस के स्टाइल पर सवाल खड़ा करना साम्प्रदायिकता के घेरे में आता है।
– राष्ट्र-विरोधी ‘सिमी’ सेक्युलर है तो राष्ट्रवादी रा.स्व.सं साम्प्रदायिक है।
– एमआईएम, पीडीपी, एयूडीएफ और आईयूएमएल जैसी विशुध्द मजहब-आधारित पार्टियां सेक्युलर है, परन्तु भाजपा साम्प्रदायिक है।
– बांग्लादेशी आप्रवासियों, विशेष रूप से मुस्लिमों का और एयूडीएफ का समर्थन करना सेक्युलर है, परन्तु कश्मीरी पंडितों का समर्थन करना साम्प्रदायिक है।
– नंदीग्राम में 2000 एकड़ क्षेत्र में किसानों पर गोलियों की बरसात करना सेक्युलरिज्म है परन्तु अमरनाथ में 100 एकड़ की भूमि की मांग करना साम्प्रदायिक है।
मजहबी धर्मांतरण सेक्युलर है तो उनका पुन: धर्मांतरण करना साम्प्रदायिक होता है।
– हिन्दू समुदाय के कल्याण की बात करना साम्प्रदायिक है तो उधर मुस्लिम तुष्टिकरण सेक्युलर है।कामरेडों का नमाज में भाग लेना, हज जाना और चर्च जाना तो सेक्युलरिज्म है परन्तु हिन्दूओं का मंदिरों में जाना या पूजा में भाग लेना साम्प्रदायिक है।
पाठय-पुस्तकों में छत्रपति शिवाजी और गुरू गोविन्द सिंह जैसी धार्मिक नेताओं के प्रति अपशब्दावली का इस्तेमाल ‘डिटोक्सीफिकेशन’ या सेक्युलरिज्म माना जाता है और भारत सभ्यता का महिमामंडन साम्प्रदायिक कहा जाता है।
Day: June 20, 2025
अर्बन नक्सल का मायाजाल
आज मिडिया, न्यायलय, राजनीति और विश्विद्यालय में अर्बन नक्सली प्रभावी हैं. वे एक झूठ का मायाजाल बन रहे हैं और सामान्य आदमी उस में फंस रहा है. आज के युग में जानकारी ही बचाव है .सामान्य हिन्दू का अज्ञान ही इनकी ताकत है. सुचना के स्रोत को ध्यान से देखिए. मिडिया द्वारा एक जनमानस बनाने की कोशिश हो रही है जो बताता है कि लव जेहाद काल्पनिक है. दलित उत्पीडन और मोब लिंचिग वास्तविक है.
वामपंथियों द्वारा इस तकनीक का बहुतायत में उपयोग किया गया है | भारत के परिप्रेक्ष्य में देखें तो हम हिन्दुओं के एक बड़े वर्ग (जिसे आज कल छद्म सेक्युलर कहा जाता है) को आज वामपंथी यह यकीन दिलाने में सफल हुए हैं कि जो भी समस्या है वह हिन्दुओं द्वारा प्रदत्त है, बल्कि हिंदुत्व ही सारी समस्याओं की जड़ है | जब भी किसी लिबरल सेक्युलर हिन्दू के मन में आता कि इस्लामी आतंकवाद में कोई समस्या है तो फिर बाबरी मस्जिद के नाम पर कभी दंगों के नाम पर उनके मन में यह संदेह उत्पन्न करने की कोशिश की जाती कि “नहीं हम में ही कुछ ना कुछ खोट है” |
कम्युनिष्ट शासन वाले देशों ने कभी भी इस्लामिक शरिया कानून को विचार लायक भी नहीं समझा. उनकी नजर में शरिया कानून ईश्वरीय कानून नहीं है. किसी भी मुस्लिम बहुल देश ने कम्युनिष्ट शासन पद्धति को नहीं माना. 90% मुस्लिम देशों में समाजवाद की बात करना भी अपराध है.
कम्युनिस्ट भारतीय राष्ट्रवाद के किसी भी शत्रु से सहकार्य करेंगे. भारतीयों को अब सोचना है. वक़्त ज्यादा नहीं है आज इस्लामिक आतंकवाद पर यदि कोई बोलना चाहता है तो सबसे पहले ये कम्युनिस्ट ही आतंकी को बचाने में सहायता करने आते हैं।
कुछ साल पहले कोच्चि में माकपा की बैठक में अनोखा नजारा देखने को मिला। मौलवी ने नमाज की अजान दी तो माकपा की बैठक में मध्यांतर की घोषणा कर दी गई। मुसलिम कार्यकर्ता बाहर निकले। रात को उन्हें रोजा तोड़ने के लिए पार्टी की तरफ से नाश्ता परोसा गया। यह बैठक वहां के रिजेंट होटल हाल में हो रही थी।
कुछ साल हुए. कन्नूर (केरल) से माकपा सांसद केपी अब्दुल्लाकुट्टी हज यात्रा पर गए। जब बात फैली तो सफाई दी कि अकादमिक वजहों से गए थे। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का कोई भी नेता केपी अब्दुल्लाकुट्टी के खिलाफ बोलने का साहस नहीं जुटा पा रहा है।’मगर यह सफेद झूठ था क्योंकि उन्होंने उमरा भी कराया था। अकादमिक वजहों से जाने वाला उमरा जैसा धार्मिक कर्मकांड नहीं कराएगा। ( उमरा —-सउदी जाकर मजहबी कर्त्तव्य करने को उमरा कहते हैं जैसे ख़ास तरह के वस्त्र धारण करना, बाल कटवाना आदि }
वहीं जब पश्चिम बंगाल के खेल व परिवहन मंत्री सुभाष चक्रवर्ती तारापीठ मंदिर गए तो पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने तो यहां तक कह दिया, ‘सुभाष चक्रवर्ती पागल हैं।
कम्युनिस्ट हिन्दुओं के मानबिन्दुओं का अपमान करने में ही सबसे आगे रहे हैं। इसलिए सीपीएम नेता कडकम्पल्ली सुरेंद्रन जब यह झूठ बोलते हैं कि ‘किसी भी संगठन द्वारा मंदिरों का इस्तेमाल हथियारों और शारीरिक प्रशिक्षण के लिए करना श्रद्धालुओं के साथ अन्याय है।’ तब हिन्दुओं के खिलाफ किसी साजिश की बू आती है। जिन्होंने कभी हिन्दुओं की चिंता नहीं की, वे हिन्दुओं की आड़ लेकर राष्ट्रवादी विचारधारा पर प्रहार करना चाह रहे हैं।
सरकार की नीयत मंदिरों पर कब्जा जमाने की है। केरल की विधानसभा में एक विधेयक पेश किया गया है। इस विधेयक के पारित होने के बाद केरल के मंदिरों में जो भी नियुक्तियाँ होंगी, वह सब लोक सेवा आयोग (पीएससी) के जरिए होंगी। माकपा सरकार इस व्यवस्था के जरिए मंदिरों की संपत्ति और उनके प्रशासनिक नियंत्रण को अपने हाथ में रखना चाहती है। मंदिरों की देखरेख और प्रबंधन के लिए पूर्व से गठित देवास्वोम बोर्ड की ताकत को कम करना का भी षड्यंत्र माकपा सरकार कर रही है। माकपा सरकार ने देवास्वोम बोर्ड को ‘सफेद हाथी’ की संज्ञा दी है और इस बोर्ड को समाप्त करना ही उचित समझती है।
दरअसल, दो अलग-अलग कानूनों के जरिए माकपा सरकार ने हिंदू मंदिरों की संपत्ति पर कब्जा जमाने का षड्यंत्र रचा है। एक कानून के जरिए मंदिर के प्रबंधन को सरकार (माकपा) के नियंत्रण में लेना है और दूसरे कानून के जरिए मंदिरों से राष्ट्रवादि विचारधारा को दूर रखना है। ताकि जब कम्युनिस्ट मंदिरों की संपत्ति का दुरुपयोग करें, तब उन्हें टोकने-रोकने वाला कोई उपस्थित न हो।
हमारे प्रगतिशील कामरेड वर्षों से भोपाल गैस कांड को लेकर अमेरिकी कंपनी तथा वहां के शासकों की निर्ममता के विरूध्द आग उगलते रहे हैं। लेकिन भोपाल गैस कांड के लिए दोषी यूनियन कार्बाइड की मातृ संस्था बहुराष्ट्रीय अमेरिकी कंपनी डाऊ केमिकल्स को हल्दिया-नंदीग्राम में केमिकल कारखाना लगाने के लिए बंगाल की कम्युनिस्ट सरकार न्यौता दिया था. यह कैसा मजाक और दोहरा मानदंड है। आप भोपाल गैस कांड के लिए दोषी प्रबंधकों तथा पीड़ितों को मुआवजा न देने वाले लोगों को दंडित करवाने के बजाय उनकी आरती उतारने के लिए बेताब हैं।
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सेक्युलरिज्म के नियम —
– अफजल गुरू, कसाब और मदानी जैसे आतंकवादियों के प्रति उदासीनता बरती जाए तब तो ऐसे लोग भी सेक्युलरवादी होते है परन्तु एमसी शर्मा के बलिदान का समर्थन किया जाए तो वे लोग साम्प्रदायिक बन जाते है।
एम.एफ. हुसैन सेक्युलर है परन्तु तस्लीमा नसरीन साम्प्रदायिक है, तभी तो उसे पश्चिम बंगाल के सेक्युलर राज्य से बाहर निकाल दिया गया।
इस्लाम का अपमान करने वाला डेनिश कार्टूनिस्ट तो साम्प्रदायिक है परन्तु हिन्दुत्व का अपमान करने वाले करूणानिधि को सेक्युलर माना जाता है।
मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के बलिदान का उपहास उड़ाना सेक्युलरवादी होता है, दिल्ली पुलिस की मंशा पर सवाल खड़ा करना सेक्युलरवादी होता है, परन्तु एटीएस के स्टाइल पर सवाल खड़ा करना साम्प्रदायिकता के घेरे में आता है।
– राष्ट्र-विरोधी ‘सिमी’ सेक्युलर है तो राष्ट्रवादी रा.स्व.सं साम्प्रदायिक है।
– एमआईएम, पीडीपी, एयूडीएफ और आईयूएमएल जैसी विशुध्द मजहब-आधारित पार्टियां सेक्युलर है, परन्तु भाजपा साम्प्रदायिक है।
– बांग्लादेशी आप्रवासियों, विशेष रूप से मुस्लिमों का और एयूडीएफ का समर्थन करना सेक्युलर है, परन्तु कश्मीरी पंडितों का समर्थन करना साम्प्रदायिक है।
– नंदीग्राम में 2000 एकड़ क्षेत्र में किसानों पर गोलियों की बरसात करना सेक्युलरिज्म है परन्तु अमरनाथ में 100 एकड़ की भूमि की मांग करना साम्प्रदायिक है।
मजहबी धर्मांतरण सेक्युलर है तो उनका पुन: धर्मांतरण करना साम्प्रदायिक होता है।
– हिन्दू समुदाय के कल्याण की बात करना साम्प्रदायिक है तो उधर मुस्लिम तुष्टिकरण सेक्युलर है।कामरेडों का नमाज में भाग लेना, हज जाना और चर्च जाना तो सेक्युलरिज्म है परन्तु हिन्दूओं का मंदिरों में जाना या पूजा में भाग लेना साम्प्रदायिक है।
पाठय-पुस्तकों में छत्रपति शिवाजी और गुरू गोविन्द सिंह जैसी धार्मिक नेताओं के प्रति अपशब्दावली का इस्तेमाल ‘डिटोक्सीफिकेशन’ या सेक्युलरिज्म माना जाता है और भारत सभ्यता का महिमामंडन साम्प्रदायिक कहा जाता है।
इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जियो मेलोनी मोदीजी के वात्सल्यमयी व्यवहार के कारण यदि एक बेटी की तरह सहज आत्मीयता के साथ मिलती है तो यह हम भारतीयों के लिए गर्व की बात है। यह हमारे प्रधानमंत्री की सन्त प्रकृति के प्रति उनकी नैसर्गिक प्रतिक्रिया है जिसे दुनिया भर के करोड़ो लोग देखते है और भारत के उच्च नैतिक मापदण्डो के प्रति अपने विश्वास को और दृढ़ करते है। जहाँ अमेरिका डोनाल्ड ट्रम्प, बिल क्लिंटन के स्त्री प्रसंगों पर शर्मिंदगी उठाता है वहीं हम अपने निर्मल उज्ज्वल प्रधानमंत्री की सदाशयता का उपहास उड़ाते है सिर्फ अपने घटिया हास्यबोध के नाम पर। कृपया 70 के दशक के युगांडा के बर्बर राष्ट्रपति ईदी अमीन के स्त्री प्रसंगों के बारे में पढ़िए आप कलेजा दहल जाएगा । ईदी अमीन के इतने प्रेम संबंध थे कि उनकी गिनती करना मुश्किल है। कहा जाता है कि जब भी उसका मन होता था उस समय उसके लिए कम से कम 30 महिलाओं का हरम हाजिर किया जाता था इस तरह के हरम जो पूरे युगांडा में फैले होते थे । ये बेचारी मजबूर महिलाएं ज़्यादातर होटलों, दफ़्तरों और अस्पतालों में नर्सों के रूप में काम करती थीं।
हमेशा से दुनिया भर के देश अपने राष्ट्र नायकों की बाजारू लम्पटता से शर्मिंदगी झेलते रहे है खुद हमारा देश भी एक समय ऐसे दौर से गुजरा है । क्या ऐसे में अगर देश एक विलक्षण बेदाग वैश्विक छवि के नायक के नेतृत्व में आगे बढ़ रहा है तो क्यो हम उनके व्यक्तिगत मधुर सम्बन्धो का मजाक उड़ा रहे है।
यूं भी उनका यह परस्पर व्यवहार हम सार्वजनिक रूप से और अनेक बार राष्ट्राध्यक्षो के मध्य देखते है पर वहां खड़ा कोई व्यक्ति इस और ध्यान देता असहज दिखाई नही देता ना ही शातिर वामपंथी पश्चिमी मीडिया भी इसमें कुछ मसाला खोज पाता है पर सुदूर हमारे देश में बैठे हमारे ही अपने लोग खास कर मोदी समर्थक ऐसा करते है तो यह चिंतनीय है कि वे ऐसा कर के वे जाने अनजाने धीरे धीरे एक अप्रतिम राष्ट्र सेवक की छवि धूल धूसरित करने की दिशा में आगे बढ़ रहे है।
खेद के साथ लिखना पड़ता है कि यह हमारा स्वस्थ हास्य बोध नही अपितु अंतर्मन में सैकड़ो वर्षो की गुलामी से से जमा पत्थर हो चुका आत्म हीनता बोध है जो कहता है
तुम श्रेष्ठ हो ही नही सकते
तुम नेतृत्व कर ही नही सकते
तुम पवित्र हो ही नही सकते
तुम वीर हो ही नही सकते
तुम्हारी संस्कृति जाहिल है
तुम्हारी परंपराएं सड़ चुकी है
तुम सिर्फ और सिर्फ दासत्व के लायक हो।

लोग कहते हैं इसी लड़की का श्राप ईरान को लगा है क्योंकि इस लड़की के फांसी के बाद से ईरान में कभी शांति नहीं रही.!
सबसे क्रूर सजा दिए जाने का जो मामला दुनिया के सामने आया था, वो ईरान की 16 वर्षीय मासूम लड़की अतीफेह रजबी सहलीह का मामला है……!
जिसके अंदर तनिक भी मानवता जीवित है, कहानी पढ़कर उसके रोंगटे खड़े हो जाएंगे।
जब वह पांच साल की थी, तब एक कार दुर्घटना में अतेफे की मां की मृत्यु हो गई। बताया जाता है कि कुछ देर बाद उसका छोटा भाई नदी में डूब गया था। वह अपने वृद्ध दादा-दादी के साथ रहती थी…!
उसकी जिंदगी का असली बुरा दौर तो तब शुरू हुआ जब एक 51 वर्ष के रीटायर्ड गॉर्ड अली दराबी की उस पर बुरी नजर पड़ी। 51 वर्ष के अली ने 15-16 साल की इस मासुम लड़की के साथ बलात्कार किया! एक या दो बार नहीं, बल्कि सैकड़ो बार…..!!
दरअसल रजबी के परिवार को मजदूरी जैसे कामो की वजह से सारा दिन घर से बहार रहना पड़ता था। उसी दौरान अली दराबी उसे अपनी हैवानियत का शिकार बनता था। उसने रजबी को बुरी तरह धमका दिया था कि अगर उसने किसी से कुछ भी कहा तो उसे और उसके परिवार को मार डालेगा।
डरी सहमी रजबी घुट-घुट कर जीती रही और ये दरिंदा उस मासूम बच्ची को अपनी हैवानियत का शिकार बनता रहा। यह सिलसिला पुरे तीन साल तक चलता रहा!!!
कहा जाता है कि रजबी ने फिर भी अपने घर वालो को इस बारे में बताने की कोशिश की थी लेकिन उनने उसे ही फटकार के चुप करा दिया।
लेकिन जब धीरे-धीरे इस दरिंदे की हैवानियत हद से ज्यादा बढ़ने लगी तब रजबी के पिता ने परिवार के लाख आग्रह के बाद पुलिस को इस बात की सुचना दी।
हमारे कुछ बुद्धिजीवी जिस खाड़ी देश की सम्पनता का गुणगान करते नहीं थकते वहां का कानून कैसा है…..!
पुलिस ने इस बात की खबर लगते ही आरोपी के बजाये पीड़िता (रजबी) को ही थाने बुला कर उससे कड़ी पूछताछ की, और उसे वहीँ Crimes against chastity के आरोप में गिरफ्तार कर लिया।
दरअसल इस्लामिक शरिया कानून के अनुसार, Crimes against chastity, सतित्वता (virginity) के उल्लंघन और यौन व्यवहार से संबंधित अपराध होता है, जिसमे गैर मर्द से किसी भी तरह के सम्बन्ध बनने पर महिला को ही सजा दी जाती है जब तक वो यह साबित न कर सके की उसने आरोपी को सम्बन्ध बनाने के लिए लालहित नहीं किया था!!
इस वजह से रजबी को सलाखों के पीछे डाल दिया गया. यहाँ उसे अली से तो छुटकारा मिला, लेकिन दरिंदगी से नहीं। जी हाँ, मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार रजबी को थाने में भी बेहद प्रताड़ित (टॉर्चर) किया जाता था और कई पुलिस वाले बारी-बारी से उसका दुष्कर्म भी करते थे।
काफी मशक्कत के बाद जब रजबी की दादी को उससे मिलने की इजाजत दी गई तो रिज्बी ने बताया कभी कभी तो उसके साथ इतनी दरिंदगी की जाती है कि वो अपने पैरो पर खड़ी भी नहीं हो पाती। उस दर्द कि वजह से उसे चलने के लिए भी अपने चारो हाथ-पैर के सहारे ही चलना पड़ता था।
अब अगर आपमें जरा भी मानवता होगी तो मै दावे के साथ कह सकता हु कि ये सब सुन के आपके भी रोंगटे खड़े हो गए होंगे… लेकिन अभी थोड़ी और हिम्मत रखिये, क्योकि इस सिस्टम का अभी एक और कांड उजागर होना बाकी है।
लेकिन कोर्ट में आरोपी और पुलिस ने मिलकर ऐसी-ऐसी दलीले दी की मामला रजबी के ही खिलाफ जाने लगा। फिर ऊपर से सरिया कानून!! जज हाजी रेजाई (Haji Rezai) उल्टा रजबी पर ही सजाये सुनाने लगा..!
जब अतीफा रजबी को एहसास हुआ कि वह अपना केस हार रही है, तो उसने अपनी सफाई देने के लिए जल्दबाजी में अपने चेहरे से हिजाब (बुर्का) को उठा लिया और कहा कि अदालत को उसे नहीं बल्कि अली दरबी को दंडित करना चाहिए।
लेकिन उस अक्ल के अंधे जज ने हिजाब हटाने को अदालत का घोर अपमान बताते हुए रजबी को उम्र कैद की सजा सुना दी….!
यह सुन रिज्बी गुस्से में लाल हो गई, और होती भी क्यों न, इतना अन्याय झेलने के बाद भी उसे इन्साफ देने के बजाये वापस उस नर्क में जाने का जो कहा जा रहा था। उसे सिर्फ वो दर्दनाक पल याद आ रहे होंगे इसलिए उसने विरोध में अपनी जूती निकाल कर जज की ओर फेक दी। इससे जज हाजी रेजाई इतना बौखला गया की उसने तुरंत रिज्बी को फांसी की सजा सुना दी…..!
15 अगस्त 2004 को ईरान के नेका में उसे एक क्रेन से लटका कर सरेआम फांसी दी गई……!
बीबीसी के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ऑफ अपील में पेश किए गए दस्तावेजों में उनकी उम्र 22 साल बताई गई है, लेकिन उनके जन्म प्रमाण पत्र और मृत्यु प्रमाण पत्र में कहा गया है कि वह 16 साल की थीं…….!
ये कैसा न्याय है? ये कैसा कानून है? क्या यही है मुस्लिम बहुयाद वाले देशों में मुस्लिम महिलाओं की जिंदगी की असली तस्वीर?
और ये तो सिर्फ एक ऐसा मामला है जो ईरान से बाहर की दुनिया तक पहुंच पाया। ईरान, ईराक, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, उज़्बेकिस्तान और न जाने ऐसे कितने इस्तान है जहाँ ऐसे क्रूर कानून की वजह से कितनी निर्दोष बालिकाएं मौत के घाट उतार दी जाती होगी।।
-साभार अज्ञात!!
સાભાર એફબી – સંજયસિંહા
… ગઈકાલે હું દિલ્હીથી મુંબઈ જતી ફ્લાઇટમાં એક સજ્જનને મળ્યો. તેમની પત્ની પણ તેમની સાથે હતી. તે સજ્જન લગભગ ૮૦ વર્ષના હશે. મેં પૂછ્યું નહોતું, પણ તેમની પત્ની પણ ૭૫ વર્ષથી ઉપરની હશે.
… જો આપણે ઉંમરની કુદરતી અસરોને બાજુ પર રાખીએ તો, બંને લગભગ સ્વસ્થ હતા. પત્ની બારી પાસે બેઠી હતી, સજ્જન વચ્ચે હતા અને હું ધારની સીટ પર હતો.
… ફ્લાઇટ ઉડાન ભરતાની સાથે જ પત્નીએ થોડું ભોજન કાઢ્યું અને પતિને પીરસ્યું. પતિ ધ્રૂજતા હાથે ધીમે ધીમે ખાવા લાગ્યો.૬પછી જ્યારે ફ્લાઇટમાં ભોજન પીરસવાનું શરૂ થયું, ત્યારે તેમણે રાજમા-ચાવલનો ઓર્ડર આપ્યો.
… બંને ખૂબ જ આરામથી રાજમા-ચાવલ ખાતા રહ્યા. મને ખબર નથી કે મેં પાસ્તા કેમ ઓર્ડર કર્યો. સારું, મારી સાથે ઘણીવાર એવું બને છે કે હું જે પણ ઓર્ડર કરું છું, મને લાગે છે કે મારી સામેની વ્યક્તિએ મારા કરતાં વધુ સારો ઓર્ડર આપ્યો છે.
… હવે કોલ્ડ ડ્રિંકનો વારો હતો. મેં કોકનો ઓર્ડર આપ્યો હતો. મેં મારા કોક કેન નું ઢાંકણ ખોલ્યું અને ધીમે ધીમે પીવાનું શરૂ કર્યું. તે સજ્જને થોડું જ્યુસ પીધું હતું. ભોજન ખાધા પછી, જ્યારે તેમણે કોક કેન નું ઢાંકણ ખોલવાનો પ્રયાસ કર્યો, ત્યારે ઢાંકણ ખુલ્યું નહીં. તે સજ્જન ધ્રૂજતા હાથે તેને ખોલવાનો પ્રયાસ કરી રહ્યા હતા.
… હું સતત તેમની તરફ જોઈ રહ્યો હતો. મને લાગ્યું કે તેમને ઢાંકણ ખોલવામાં મુશ્કેલી પડી રહી છે, તેથી સૌજન્ય રૂપે મેં કહ્યું, “મને આપો… હું ખોલીશ.” સજ્જને મારી તરફ જોયું, પછી હસતાં હસતાં કહ્યું, “દીકરા, મારે જાતે ઢાંકણ ખોલવું પડશે.” મેં કંઈ પૂછ્યું નહીં, પણ પ્રશ્નાર્થ નજરે તેમની તરફ જોયું. આ જોઈને સજ્જને આગળ કહ્યું, “દીકરા, આજે તું ખોલીશ. પણ આગલી વખતે..? કોણ ખોલશે? એટલે જ મને જાતે ખોલવાનું ખબર હોવી જોઈએ.” પત્ની પણ પતિ તરફ જોઈ રહી હતી. તેમણે હજુ પણ જ્યુસ બોટલનું ઢાંકણ ખોલ્યું ન હતું. પરંતુ પતિ પ્રયાસ કરતો રહ્યો અને ઘણા પ્રયત્નો પછી પણ તેણે ઢાંકણ ખોલ્યું.
… બંને આરામથી જ્યુસ પી રહ્યા હતા. દિલ્હીથી મુંબઈની આ ફ્લાઇટમાં મને જીવનનો પાઠ મળ્યો. તે સજ્જને મને કહ્યું કે તેમણે એક નિયમ બનાવ્યો છે કે તે પોતાનું બધું કામ જાતે કરશે. ઘરે બાળકો છે, સંપૂર્ણ પરિવાર છે. બધા સાથે રહે છે. પણ તે પોતાના રોજિંદા કામો કરતો નથી. પોતાની જરૂરિયાતો માટે તે ફક્ત તેની પત્ની પાસેથી જ મદદ લે છે, બીજા કોઈની નહીં. બંને એકબીજાની જરૂરિયાતો સમજે છે તે સજ્જને મને કહ્યું કે શક્ય તેટલું, વ્યક્તિએ પોતાનું કામ જાતે કરવું જોઈએ.
… જો હું એક વાર કામ કરવાનું બંધ કરી દઉં, બીજા પર નિર્ભર થઈ જાઉં, તો સમજવું કે હું પથારીવશ થઈ જઈશ. પછી મારું મન હંમેશા કહેશે કે મારે આ કામ આ વ્યક્તિ પાસેથી કરાવવું જોઈએ,
… પોતાનું કામ બીજી વ્યક્તિ પાસેથી કરાવવું ન જોઈએ. પછી મારે ચાલવા માટે પણ બીજાની મદદ લેવી પડશે. હમણાં ચાલતી વખતે મારા પગ ધ્રૂજે છે, જમતી વખતે પણ મારા હાથ ધ્રૂજે છે, પરંતુ જ્યાં સુધી તમે આત્મનિર્ભર રહી શકો છો, તમારે રહેવું જોઈએ.
… અમે ગોવા જઈ રહ્યા છીએ, અમે ત્યાં બે દિવસ રહીશું. અમે મહિનામાં એક કે બે વાર ફરવા જઈએ છીએ. દીકરો અને વહુ કહે છે કે એકલા રહેવું મુશ્કેલ બનશે, પણ તેમને કોણ સમજાવે કે જ્યારે અમે ફરવાનું બંધ કરીશું અને પોતાને ઘરમાં જ સીમિત રાખીશું ત્યારે તે મુશ્કેલ બનશે,
… મેં આખી જિંદગી સખત મહેનત કરી છે. હવે મેં મારા દીકરાઓને બધું આપી દીધું છે અને મારા માટે માસિક પગાર નક્કી કર્યો છે. અને અમે બંને તેમાં આરામથી મુસાફરી કરીએ છીએ,
… જ્યાં પણ અમારે જવું હોય ત્યાં એજન્ટો ટિકિટ બુક કરાવે છે. ટેક્સીઓ અમારા ઘરે આવે છે. ટેક્સીઓ અમારા પાછા ફરતી વખતે એરપોર્ટ પર આવે છે. હોટેલમાં કોઈ સમસ્યા નથી. તબિયત બિલકુલ સારી છે, ઉંમર પ્રમાણે ક્યારેક જ્યુસની બોટલ ખુલતી નથી, પણ જો તમે થોડી મહેનત કરો તો તે ખુલી જાય છે.
… મારી આંખો પહોળી રહી. મેં નક્કી કર્યું હતું કે આ વખતે હું ફ્લાઇટ દરમિયાન મારા લેપટોપ પર આખી ફિલ્મ જોઈશ. પણ અહીં મેં જીવનની ફિલ્મ જોઈ. એક ફિલ્મ જેમાં જીવન જીવવાનો સંદેશ છુપાયેલો હતો.
શક્ય હોય ત્યાં સુધી,
આત્મનિર્ભર બનો,
તમારું કામ જાતે કરો,
શક્ય હોય ત્યાં સુધી…